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कबीले में चुनाव-21ः मुखौटा लगाकर नहीं उगती ईख

खरगोश और हिरन की मुलाकात काफी दिन बाद हुई। खरगोश ने हिरन से पूछा, क्या हो गया दोस्त। इतने दिन बाद आए हो, मैं तो तुम्हारे बारे में पता भी नहीं कर पाया। यह फुंकनी यंत्र भी तभी से सुन्न पड़ा है। न तो बोलता है और न ही किसी बात का जवाब देता है।

हिरन बोला, मेरा स्वास्थ्य खराब हो गया था। लगता है ठंड लग गई थी। कुछ खाने पीने का मन भी नहीं कर रहा था। मैं भी तुम से संपर्क नहीं कर पाया। सारा दिन धूप में बैठा रहता। मन में कोई विचार भी नहीं आ रहा था। रही बात सियासत की, इसको तो जानने की इच्छा ही नहीं होती।

खरगोश ने कहा, यह ईख का समय है, क्या तुमने ईख तो नहीं खा लीं। मैंने सुना है, ठंड में ज्यादा ईख खाने से ठंडी लग जाती है।

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हिरन बोला, तुम्हें कैसे पता, मैंने ईख खाई थी।

खरगोश ने कहा, देख लो, यह मैंने अंदाजा लगाया है। मैंने सही कहा न।

हिरन ने जवाब दिया, मैंने ज्यादा ही ईख खा लिया था। पर, तुम्हें कैसे पता चला कि मैंने ईख खाया था।

खरगोश ने कहा, मैंने तो ऐसे ही तुक्का मार दिया दोस्त। पर, देखो अंधेरे में चलाया तीर निशाने पर लग गया। ये जो मैंने किया न, वो ही यहां सियासत में भी चल रहा है। रही बात, ईख की, तो आजकल ईख पुरुष का नाम खूब चल रहा है।

हिरन बोला, कौन ईख पुरुष।

खरगोश ने जवाब दिया, अपने बड़े महाराज, उनको ईख से इतना प्यार हो गया है कि उसके बारे में न जाने क्या क्या अच्छा अच्छा बोल रहे हैं। मैं तुमसे ईख के बारे में ज्यादा बात करूंगा तो गाजर, जो कि मुझे सबसे ज्यादा अच्छी लगती है, बुरा मान जाएगी।

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हिरन हंसते हुए बोला, लगता है तुम सठिया गए हो, गाजर बुरा मान जाएगी…।

खरगोश ने कहा, तुम तो ऐसे बोल रहे हो, जैसे बड़े महाराज ने ईख का महिमामंडन करके बहुत बड़ी भूल कर दी हो। जब ईख इंसानों की तरह व्यवहार कर सकती है तो गाजर क्यों नहीं।

हिरन ने पूछा, ईख इंसानों की तरह व्यवहार कैसे कर सकती है। कल कहोगे, घास भी इंसान जैसी हो गई। ये पेड़ भी, ये फूल भी और हां… ये झाड़ियां देख रहो हो न , वो भी। क्या मजाक करते हो। ठीक है, हम सियासत पर बात करते हैं, पर सियासत में इतना भी मजाक नहीं हो रहा है, जो तुम बताना चाहते हो।

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खरगोश बोला, यह मैं नहीं कर रहा हूं। बड़े महाराज ने जो बात कही है, उस पर तो मैं यहीं कह सकता हूं कि ईख भी इंसानों की तरह जाति, धर्म को मानने या नहीं मानने वाली हो सकती है। तो क्या यह समझना चाहिए कि ईख इंसानों जैसी होती है। ईख को भी जाति की समझ है, वो भी अपने अनुसार धर्म को जानती या मानती है। हो सकता है, वो किसी धर्म को मानने वालों को मीठी लगती हो और दूसरे धर्म को मानने वालों को खट्टी या किसी और स्वाद की।

हिरन ने कहा, तुम भी अजीब बातें करते हो, ईख से जो भी कुछ बनता है, वो मीठा होता है। ईख का रस मीठा ही होता है। वो सबके के लिए एक जैसी ही होती है। वो ईख है, उसको ईख कहा जाए, और कुछ भी नहीं। वो मुखौटा लगाकर नहीं उगती और न ही वो चेहरे देखकर अपना व्यवहार बदलती है। वो लोगों से बहुत अलग है और जीवन में मिठास घोलने के लिए ही धरती पर उगती है।

खरगोश ने कहा, हो सकता है ईख उगाने वाले लोग अलग-अलग धर्म, जाति, सियासी समूहों, क्षेत्रों में बंटे हों। यह तो पक्का होगा।

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हिरन बोला, ऐसा करते हैं मिट्टी से पूछते हैं, ईख तो वही उगाती है। वैसे भी हम जंगल के अज्ञानी जीव, जो सुनते हैं, उसे ही गाते हैं। मिट्टी ज्यादा ज्ञानवान हैं। ईख के बारे में उनसे ज्यादा कौन जानता है।

खरगोश ने कहा, धरती मां… बताओ, ईख क्या है। उसका व्यवहार क्या है। क्या वो धर्म, जाति, समूहों की सीमाओं में बंधी है।

धरती ने खरगोश के शब्दों को सुना, पर कुछ देर शांत रहीं।

खरगोश ने कहा, क्या आप मुझे सुन रही हो।

धरती ने कहा, हां… मैं तुम्हें सुन रही हूं। पर, मैं कुछ सोच रही हूं। वो यह कि मैंने जिन भी वनस्पतियों को जन्म दिया, उनमें से क्या कोई ऐसी भी है, जो धर्म, जाति या समूहों की सीमाओं में बंधी है। मुझे तो याद नहीं आ रहा है।

याद तो तभी आएगा, जब कोई वनस्पति ऐसी होगी। रही बात ईख की, वो तो मिठास है, जीवन है, आजीविका है, खुशहाली है, हरियाली है। मेरी जन्मीं वनस्पतियां कितनी ही ऊँचाई पर पहुंच जाएं, पर हमेशा जमीन से जुड़ी रहती हैं। वनस्पतियों और सियासत करने वालों का दूर-दूर तक कहीं कोई मेल नहीं दिखता।

खरगोश ने पूछा, सियासत और वनस्पतियों में मेल क्यों नहीं है।

धरती ने कहा, सियासत से जुड़े लोग वनस्पतियों की तरह जमीन से नहीं जुड़े होते। अगर कोई होगा तो वो अपवाद हो सकता है। दूसरा वनस्पतियों में बहुत सारे छाया देते समय किसी का चेहरा, समूह या रिश्ता नहीं देखते, उनके लिए सब समान हैं। पर सियासी लोगों में पहले तो छाया प्रदान करने का व्यवहार नहीं होता, यदि किसी को छाया यानी सहारा देते भी हैं, तो सबसे पहले परिवार, रिश्ते, संबंध, समूह, चेहरों को देखा जाता है।

मेरी वनस्पतियां फल देती हैं, जब फलों से लद जाती हैं तो झुक जाती है, ताकि इंसान फल प्राप्त कर सकें। पर, सियासी लोग फल देने वाला बनने से पहले प्रजा से ही कुछ चाहते हैं। जब वो फल प्रदान करने की स्थिति में होते हैं तो वो झुकने की बजाय अकड़ जाते हैं। प्रजा चाहकर भी उनसे फल प्राप्त करना तो दूर मुलाकात तक नहीं कर पाती।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वनस्पतियां कभी झूठे वादे नहीं करती। फल मीठे हैं तो पक जाने पर मीठा होने का ही आभास कराएंगे। यदि कोई फल खट्टा है तो खट्टा ही रहेगा, वो अपने गुण को बदलता नहीं है। जबकि सियासत में तो चाल, व्यवहार एवं चरित्र बदलने की कई कहानियां हैं।

इसलिए सियासत और वनस्पतियों में मेल नहीं हो सकता। पर, सियासी लोगों को तो सब कुछ स्वयं जैसा दिखता है। इसलिए वो प्रजा के बीच स्वयं को वनस्पतियों जैसा प्रस्तुत करने में नहीं हिचकते। पर, प्रजा तो सब जानती है, वो तो वर्षों से सियासत के मंच और उसके पात्रों को समझ चुकी है। प्रजा ने इस मंच पर क्या कुछ नहीं देखा। यहां सत्ता के लिए षड्यंत्र को देखा है, विश्वासघात को देखा है, छल, प्रपंच को समझा है।

हिरन ने कहा, हमें सही उत्तर प्राप्त हो गया है। धरती आपको तो सबकुछ पता है।

धरती ने हंसते हुए कहा, मुझे सबके बारे में नहीं पता। मुझे केवल उन्हीं के बारे में जानकारी है, जो धरती से जुड़े हैं, जिनकी जड़ें जमीन से जुड़ी हैं। जो जड़ों को छोड़ गए, उनके बारे में जानने की मेरी कोई इच्छा नहीं है।

हिरन ने पूछा, उड़ान भरने, मेरा मतलब है… कि ज्यादा ऊंचाई तक जाने के लिए तो जड़ों को छोड़ना होगा। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो सफलता का आसमां कैसे छू पाएंगे।

धरती ने कहा, यह तुमसे किसने कह दिया। उड़ान भरने या सफलता प्राप्त करने के लिए जिस संबल और शक्ति की आवश्यकता होती है, वो जड़ों से ही मिल सकती है। सफलता में जड़ों का महत्व इसलिए है, क्योंकि वो मर्यादा में रहना सिखाती हैं, सीमाओं में बांधती हैं और नियंत्रण से बाहर नहीं होने देतीं।

यह बात अलग है कि सफलता के बाद कोई यह समझ ले कि मुझे अब इनकी आवश्यकता नहीं है। यानी वो जड़ों का त्याग कर दे। पर, जिस तरह वनस्पतियों को उनकी जड़ें पोषण प्रदान करती हैं, उसी तरह व्यक्ति के जीवन को आगे बढ़ाती हैं।

पर, क्या तुम जानते हो, मनुष्यों की जड़ें क्या होती हैं। मनुष्य की जड़ें उनका परिवार, उनका समाज, समुदाय, उनके अपने लोग, उनकी संस्कृति, व्यवहार, खानपान आदि होते हैं। ये सभी उसको खुशी खुशी, शांत मन और सुकून के साथ जीवन को आगे बढ़ने में सहयोग करते हैं।

खरगोश ने कहा, पर जो सफलता प्राप्त करने के बाद जड़ों को छोड़ दे। उनके बारे में क्या कहना है।

धरती ने उत्तर दिया, जड़ों को छोड़ने का मतलब है अपने लोगों से अलग होना। उनका हश्र जानना है तो अतीत में बहुत सारे उदाहरण हैं। सियासत के संदर्भ में बात करें तो बहुत सारे ऐसे सियासी लोग रहे हैं, जिनको प्रजा ने ऊंची उड़ान भरने में सहयोग किया, पर जब लगा कि वो प्रजा की बजाय अपने आसमां की ओर ज्यादा देख रहे हैं, तो प्रजा ने उनको धरती पर लाकर बैठा दिया। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि प्रजा ने हमेशा लोककल्याण की अवधारणा पर काम करने वालों को सम्मान दिया है।

अभी तक के लिए इतना ही काफी है। फिर भी कुछ पूछना हो तो स्वागत है।

खरगोश और हिरन के लिए खुशी की बात यह है कि उनको धरती से मिलने के लिए कहीं जाना नहीं होगा, क्योंकि धरती तो हर जगह है। वो क्या, हम सभी धरती पर रहते हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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