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कबीले में चुनाव -8: सियासत में सब दिखावा, दिखावे से प्रभावित करने के प्रयास

हिरन और खरगोश की आठवें दिन की मुलाकात में खरगोश ने फुंकनी यंत्र से कहा, आज तुम कुछ नहीं बोल रहे।

फुंकनी यंत्र ने कहा, आज मैं बोलूंगा नहीं, केवल दिखाऊंगा। सियासत में भी सब दिखावा होता है, दिखावे से प्रभावित करने के प्रयास होते हैं।

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गुरु महाराज आए थे देवता के दर्शन और पूजापाठ के लिए। आधुनिक यंत्रों के सहयोग से प्रजा को घरों पर ही उनकी पूजा पाठ को दिखाने का प्रबंध किया गया था।

उसी दिन बड़े महाराज ने भी भ्रमण करके अन्य स्थान पर देवता को जल अर्पित किया और अपने यंत्र से सभी तक यह बात पहुंचाई कि मैं देवता का पूजन कर रहा हूं।

फिर अचानक बड़े महाराज को क्या हुआ, गुरु महाराज के देवता के दर्शन और पूजापाठ पर नाराज हो गए। अब मेरी समझ में बड़े महाराज की यह बात नहीं आ रही है कि आप देवता के दर्शन करो तो सही, आपके विरोधी करें तो वो सियासत हो जाता है।

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खरगोश ने कहा, फुंकनी यंत्र मैं तो छोटा सा जीव हूं। मेरे पास बहुत ज्यादा समझ भी नहीं है। पर, मैं इतना जानता हूं कि जो भी कुछ मेरे आसपास है, वो देवता ने बनाया है। मैं प्रतिदिन देवता को नमन करता हूं और किसी को पता भी नहीं चलता। उस समय मेरे और देवता के बीच कोई नहीं होता।

तभी हिरन बोला, जब मैं इंसानों को देखता हूं, खास रूप से सियासत करने वालों को, तो वो देवता की पूजा सबको बताकर करते हैं। वो पूजा करेंगे, इसकी सूचना कई दिन पहले से बताई जाने लगती है। हो सकता है कि हम जंगल के जीव, इतना ज्ञान नहीं रखते हों। देवता की पूजा करने से पहले सभी को बताना आवश्यक होने से ही सफलता मिलती होगी।

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फुंकनी यंत्र ने कहा, सामान्य प्रजा तो शांत होकर बिना किसी दिखावे के देवता को याद करती है, उनकी पूजा करती है। उनका वंदन करती है। पर, सियासत में दिखावे की आवश्यकता इसलिए भी होती है, क्योंकि सियासी लोग चाहते हैं कि प्रजा देखे कि हम उनके देवता के कितने पास हैं। हम देवता और धार्मिक स्थलों का कितना ध्यान रखते हैं।

पर, मुझे लगता है कि वो भूल जाते हैं कि देवता ने तो पूरी सृष्टि को बनाया है। मैं तो मानता हूं कि देवता ही सभी का ध्यान रखते हैं।

खरगोश बोला, कबीले में बहुत सारे मुद्दे हैं, जिनमें सियासत करने के लिए बहुत कुछ है। पर, उन पर किसी का ध्यान क्यों जाएगा। उनको जो सबसे आसान लगता है, उस पर काम करते हैं।

फुंकनी यंत्र बोला, खरगोश जी, मुझे लगता है, आज की सभा यहीं समाप्त कर दी जाए। क्योंकि जिस विषय पर हम बात कर रहे हैं, हमारे अनुसार वो कबीले की सियासत में नहीं होना चाहिए। पर, हमारे सोचने या विचार करने से कुछ नहीं हो सकता।

कल फिर मिलते हैं, कुछ औऱ जानकारियां लेकर।

*यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। इसका किसी से कोई संंबंध नहीं हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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