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कबीले में चुनाव -9: सवाल पर सवाल की सियासत

खरगोश अपने फुंकनी यंत्र के साथ घास के हरे मैदान में कभी इधर तो कभी उधर उछलकूद कर रहा था। लगता है खरगोश बेचैन है। वो बड़ी बेसब्री से हिरन का इंतजार कर रहा था। मन ही मन कह रहा था, हिरन क्यों नहीं आया होगा। लगता है,कहीं फंस गया। सियासत की बातें सुन सुनकर हिरन को बहुत आनंद मिल रहा था, कहीं कोई गुट तो नहीं बना रहा है।

उसने फुंकनी यंत्र से कहा, बताओ इस समय मेरा दोस्त हिरन कहां है, वो क्या कर रहा है। फुंकनी यंत्र ने कहा, मुझे थोड़ा समय लगेगा।

खरगोश बोला, पहले तो तुरंत बता और दिखा देते थे, अब क्या हो गया।

फुंकनी यंत्र बोला, इस समय कबीले में बहुत सारे यंत्रों में सियासी गुटों के चलचित्र और छाया चित्र देखे जा रहे हैं। इसलिए तरंगें बाधित हो रही हैं। तुम्हें शायद नहीं पता, मैं तरंगों के माध्यम से तुम्हें यह सबकुछ दिखाता हूं। कुछ समय लगेगा, सब्र करो।

खरगोश बोला, तरंगें बाधित हो रही हैं, अजीब बात कर रहे हो। सियासी गुटों के कितने सारे चल चित्र और छाया चित्र हैं।

फुंकनी यंत्र ने कहा, बहुत सारे। तुम्हें तो पता होगा, सियासत करने वाले आधुनिक हो गए हैं। वो घर में बैठकर ही प्रजा से मिल लेते हैं। वो जब चाहे प्रजा तक अपनी बात पहुंचा देते हैं। पूरी सियासत तरंगों वाले यंत्रों के भरोसे हो गई है।

खरगोश ने पूछा, और प्रजा उन तक अपनी बात कैसे पहुंचाएगी।

फुंकनी यंत्र ने कहा, प्रजा उनसे बातें करना चाहती है, अपनी बात रखना चाहती है, सवाल भी पूछती है, पर जवाब नहीं मिलता।

यह सियासत करने वालों का इच्छा है, जवाब दें या नहीं। वो अपने विरोधी गुटों के सवालों के जवाब नहीं देते तो प्रजा की कौैन सुनेगा।

खरगोश ने फिर पूछा, अच्छा यह बताओ, सियासत वालों के यंत्रों में क्या हो रहा है।

फुंकनी यंत्र ने कहा, अब तुम ही देख लो।

फुंकनी यंत्र की चपटी पत्ती पर हिरन दिखता है। हिरन उनकी ओर दौड़ रहा है।

खरगोश बोला, हिरन तो आ रहा, मुझे दिखने लगा है। तुम बड़े महाराज को दिखाओ, वो क्या कर रहे हैं।

बड़े महाराज और उनके गुट के लोग दिखते हैं। वो कुछ बोल रहे हैं। पर, क्या बोल रहे हैं सुनाई नहीं दे रहा है।

फुंकनी यंत्र बोला, तुम सुनो मत देखो और अपना दिमाग लगाओ।

खरगोश दिमाग लगाता है, बड़े महाराज अपने सहयोगियों को कुछ चलचित्र दिखाकर कह रहे हैं, ऐसे ही बहुत सारे निकालो। उनके पास गुरु महाराज के उस समय के छायाचित्र हैं, जब वो देवता के दर्शन के लिए आए थे। कुछ छायाचित्र देखकर बड़े महाराज और उनके साथियों के चेहरे पर मुस्कान आती है। वो अपने सहयोगियों को छायाचित्र देते हैं। उनके सहयोगी छायाचित्र को अपने यंत्र में डाल देते हैं।

फिर बड़े महाराज अपने उस समय के चलचित्र और छाया चित्र अपने सहयोगियों को देते हैं, जब वो स्वयं देवता के समक्ष उपस्थित होने गए थे।

खरगोश बोला, लगता है दोनों गुट अपनी अपनी जीत के लिए देवता का सहारा लेने वाले हैं।

फुंकनी यंत्र ने कहा, सहारा लेने वाले नहीं हैं, बल्कि सहारा लेने लगे हैं।

इतने में हिरन भी हांफता हुआ पहुंच गया। बोला, मैं जब यहां आ रहा था तो देवता के स्थान पर कबीले के बहुत सारे लोग इकट्ठा थे। वहां भोजन कराया जा रहा था। मैं देख रहा था कि सियासत वाले कौन-कौन यहां आते हैं। वहां तो बड़े महाराज और गुरु महाराज दोनों के गुटों के लोग पहुंच रहे थे। अब लग गया, चुनाव आने वाले हैं।

फुंकनी यंत्र ने कहा, इस बार चुनाव में प्रजा की दिक्कतों पर न तो कोई सवाल होगा और न ही किसी से कोई उत्तर मिलेगा। यहां तो देवता के दरबार में क्या हुआ, वहां क्या होना चाहिए था, वहां कौन-कौन आ रहा है, पर ही बातें होंगी। प्रजा के बीच जाकर चुनाव लड़ना है, उसमें देवता को बीच में क्यों ला रहो हो। देवता तो सभी के हैं, हमारे तुम्हारे भी।

खरगोश बोला- पर, यहां तो यह बताने की होड़ लगी है कि देवता हमारे सबसे ज्यादा नजदीक हैं। हम देवता के दरबार पर इतना धन व्यय कर रहे हैं, हमने वहां इतना धन व्यय किया था। स्थिति यह है कि दोनों गुट अपने- अपने पूजा पाठ को बड़ा बता रहे हैं।

हिरन ने कहा, फुंकनी यंत्र यह बताओ,बड़े महाराज क्या कह रहे हैं।

फुंकनी यंत्र बोला, वो कह कुछ नहीं रहे हैं, वो सियासत कर रहे हैं। उनको भी दिखने लगा है कि सियासत में बस अब देवता के सहारे ही बेड़ापार लग सकता है। एक और नई बात, वो यहां के राजा थे, पर अब पूछ रहे हैं कि प्रजा को क्या चाहिए। वो प्रजा से ही पूछ रहे हैं।

हिरन ने कहा, यह तो कमाल की बात है। पर, बड़े महाराज के मन में क्या घुमड़ रहा है, वो ही जानें। वो जो करते हैं, उसके मतलब बहुत होते हैं। सुना है, गुणी महाराज ने बड़बोले महाराज को थाम लिया है। इसलिए बड़े महाराज सियासत को गरमाने के लिए पहले बड़कू महाराज पर और फिर गुरु महाराज के कबीला भ्रमण को लेकर सवाल पर सवाल पूछे जा रहे हैं।

फुंकनी यंत्र ने कहा, विरोधी गुट से उनके सवाल के उत्तर नहीं मिल रहे हैं, पर उल्टे ही सवाल और पूछे जा रहे हैं। यहां तो सवाल पर सवाल की सियासत चल रही है। रही बात प्रजा की, उसे तो चुनाव से पहले सियासत के रंगों को देखने का आनंद उठाना है। चुनाव से पहले जय हो, जय हो… की ध्वनि और तेज होती जाएगी।

खरगोश बोला, सभी राजा की गद्दी तक पहुंचने के लिए जय हो, जय हो…कर रहे हैं। अब देखना है कि कबीले में किसकी जय होती है।

फुंकनी यंत्र ने कहा, अच्छा तो बाकी बातें कल बताऊंगा। खरगोश जी, चलो लक्कड़बग्घे को यहां की जानकारी भी देनी है।

इसके बाद फिर से मिलने का वादा करके खरगोश और हिरन अपने ठिकानों की ओर दौड़ लिए।

  • यह काल्पनिक कहानी है, इसका किसी से कोई संबंध नहीं हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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