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कबीले में चुनाव-3ः बड़बोले महाराज ने बगावत नहीं, सियासत की है

तीसरे दिन की मुलाकात में हिरन बड़ी उत्सुकता से खरगोश से पूछता है, यार तुम्हारा फुंकनी यंत्र क्या बता रहा है।

खरगोश बोला, फुंकनी यंत्र बड़े काम की बात बता गया आज।

बड़बोले महाराज को तरह-तरह की बोलियां आती हैं। वो पहले भी बड़े महाराज के लिए कई तरह की बोलियां प्रयोग में ला चुके हैं। लगता है, उनकी यही कला कुछ काम करने लगी है।

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हिरन ने कहा, यार जल्दी बताओ, बड़बोले महाराज को क्या फायदा हो रहा।

खरगोश ने कहा, फायदा क्या होगा, यह तो अभी नहीं कह सकता, पर उनकी एक अधूरी इच्छा पूरी हो गई। आज उनकी अपने गुट के बड़कू महाराज से मुलाकात हो गई। बड़कू महाराज बहुत ताकतवर हैं। वो इतने ताकतवर हैं कि किसी का भी भला या नुकसान कर दें। उनकी ताकत किसी भी कबीले के राजा को हटाने की है।

बड़कू महाराज से मिलने की इच्छा बिज्जू महाराज ने पूरी कराई। बिज्जू महाराज वहीं हैं, जिनके साथ बड़बोले महाराज ने बड़े महाराज की सत्ता को ठुकरा दिया था।

हिरन बोला, उसको ठुकराया नहीं कहते, वो बगावत होती है।

खरगोश झुंझलाते हुए बोला, यार फिर बगावत की बात। चुनाव से पहले यह सब होता रहता है। जहां दबाव न हो, जहां स्वार्थ न हो, जहां खेला न हो, जहां झूठ न हो… वहां सियासत का क्या काम। इसको बगावत नहीं कहते, यह तो सियासत है मेरे दोस्त।

हिरन ने पूछा, अच्छा यह बताओ, बड़कू महाराज से मिलने के बाद बड़बोले महाराज के मन में क्या चल रहा है। अपने मनभेदी फुंकनी यंत्र से पूछकर बताओ।

खरगोश ने कहा, यह भी कोई बड़ी बात है, अभी सुनो।

खरगोश ने फुंकनी को हिलाया और फिर कान में लगाकर ध्यान से कुछ सुनने लगा।

खरगोश ने जो सुना, वो हिरन को सुना रहा।

खरगोश- बड़बोले महाराज का मन इस समय उहापोह में है। उनका मन कह रहा है, बाहर और भीतर दबाव बनाने में सफलता तो मिल रही है, पर अब यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि यहीं रहूं या फिर से बगावत वाली सियासत।

बड़े महाराज वाले गुट में चला गया तो वहां फिलहाल कुछ नहीं मिल पाएगा। अगर, बड़े महाराज का गुट चुनाव जीत जाता है तो वहां राजा बनने से रहा। बड़े महाराज की अनंत इच्छाओं के सामने हमारी सुनता कौन है। वो तो अपने साथियों को आगे बढ़ने का मौका नहीं देते।

वैसे, यहां भी तो कुछ नहीं मिल रहा। बागी बनकर यहां राजा बनने की इच्छा से ही आया था, पर इन्होंने भी निराश ही किया। यहां दो राजा बदल दिए, पर मेरी तरफ किसी ने नहीं देखा। कितना अनुभव है मेरे पास, किसी को कोई फिक्र नहीं। मुझसे उम्र में, सियासत में छोटे गुणी महाराज को राजा बना दिया। वैसे भी इस गुट में वरिष्ठों को किनारे बैठाने की परंपरा है।

अगर यह गुट चुनाव में जीतता है तो गुणी महाराज को कोई हिला नहीं सकता। उनको तो सबसे बड़े महाराज ने आशीर्वाद दे दिया है। कहां जाऊं, बहुत व्यथित हूं। सोच रहा हूं, संन्यास ले लूं, पर इतने साल सियासत का यह परिणाम तो नहीं हो सकता। मुझे भी राजा बनना है, हां मुझे भी राजा बनना है।

कुछ दिन रुककर हवा का रुख देखता हूं। गुणी महाराज को घेरने वालों की ताकत देखता हूं। ढोलन महाराज से अच्छी मित्रता हो गई है, वो मेरे लिए कुछ करने का वादा भी कर चुके हैं। उनके और मेरे विरोधी भी एक ही हैं। वो भी अक्कड़ महाराज को पसंद नहीं करते और मैं भी। वो भी गुणी महाराज को राजा बनाने से नाराज हैं और मैं भी। कहते हैं दुश्मन के दुश्मन दोस्त हो जाते हैं। वैसे भी, उनका और हमारा लक्ष्य एक ही है, वो है राजा की गद्दी।

रही बात बिज्जू महाराज की, वो गुट में एकता का संदेश लेकर इसलिए घूम रहे हैं, क्योंकि उनको बड़े कबीले में जगह बनानी है। सब अपना हित साध रहे हैं।

हिरन ने कहा, अच्छा तो यह बात है। सियासी दोस्ती में मतलब के सिवाय कुछ भी तो नहीं दिखता।

अच्छा यह बताओ, बड़े महाराज क्या कर रहे हैं। वो चुप तो कतई नहीं बैठने वाले। उनका मन टटोल कर बताओ।

खरगोश बोला, तुम्हें बड़ा मजा आ रहा है। बड़े महाराज का मन तो आज तक कोई नहीं टटोल पाया। वहां यह फुंकनी यंत्र फेल हो जाएगा। उनका मन किसी पेंडुलम की तरह घुमता है, जो थोड़ी देर में ऊँचाई पर दिखता है और फिर ढलान पर। पर, इसकी खासियत यह है कि यह गतिमान होते हुए भी फिक्स रहता है। यहां जो फिक्स वाला प्वाइंट है न, वही सत्य है।

हिरन ने कहा, मैं कुछ समझा नहीं।

खरगोश ने जवाब दिया, इसमें समझने जैसी कोई बात नहीं। बड़े महाराज कभी कुछ बोलते हैं, कभी कुछ बोलते हैं। पर जो चाहते हैं, वो फिक्स है। उससे इधर उधर नहीं होते। थोड़ा बहुत जो मैं समझ पा रहा हूं, वो जान लो।

बड़े महाराज ने बड़बोले महाराज पर निशाना साधकर गुणी महाराज वाले गुट की बेचैनी बढ़ा दी। उनको पता है, मैं वहां किसी पर कुछ बोलूं तो कोई जल्दी से प्रतिक्रिया नहीं देगा, पर बड़बोले महाराज कुछ न कुछ जरूर बोलेंगे।

उनके बोलने से सियासत को गरमाहट मिलेगी। इसी गरमाहट पर अपने लिए कुछ न कुछ पका लेंगे। चुनाव से माहौल तो बनाना ही होगा। माहौल बनाकर कुछ न कुछ मिलने की चाह में उन्होंने अपने अनुयायियों को कह दिया, सब जगह यह कहते रहो, कि गुणी महाराज वाले गुट से छह लोग हमारे गुट में मिलने वाले हैं।

हिरन ने पूछा, यह बताओ, बड़े महाराज के पास इस समय कुछ नहीं है, तो उनके गुट में कौन और क्यों शामिल होना चाहेगा।

खरगोश बोला, सियासत में सपनों का महत्व होता है। ये सपने गणित पर आधारित होते हैं। इस गणित में अगली-पिछली घटनाओं के आंकड़े शामिल किए जाते हैं। कौन किसके साथ है, कौन किससे अलग हो रहा है, कौन मजबूत हो रहा है और कौन कमजोर, इन सबका आकलन किया जाता है।

…जारी

*यह कहानी काल्पनिक है, इसका किसी से कोई संबंध नहीं है।

 

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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