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कबीले में चुनाव-6: गुणी महाराज के सियासी गुण दिखने लगे

छठें दिन की मुलाकात के लिए खरगोश अपने फुंकनी यंत्र के साथ मैदान की ओर दौड़ लगा रहा है। अचानक फुंकनी यंत्र से नई तरह की ध्वनि आती है, जो पहले कभी नहीं सुनी गई।

खरगोश रुककर सोचता है फुंकनी यंत्र को यह अचानक क्या हो गया। कहीं यह काम करना तो बंद नहीं कर देगा।

खरगोश ने पूछा, क्या हो गया फुंकनी महाराज, ओह… मेरा मतलब है फुंकनी यंत्र।

फुंकनी यंत्र बोला, कबीले की सियासत की एक नई सूचना।

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खरगोश ने कहा, क्या तुम बातें भी करते हो।

फुंकनी यंत्र ने जवाब दिया, आज से ही मुझे यह गुण प्राप्त हुआ है। मैं तो भूल ही गया, नई सूचना गुणी महाराज को लेकर है। बड़े महाराज, बड़बोले महाराज और अक्कड़ महाराज से भिड़ते-भिड़ते वो भी थोड़ा-थोड़ा सियासी हो गए।

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खरगोश ने पूछा, क्या गुणी महाराज पहले सियासी नहीं थे। वो राजा हैं भाई, बिना सियासत के कोई राजा कैसे बन सकता है। उनके बारे में गलत सूचना मत दो।

फुंकनी यंत्र ने कहा, चलो ठीक है। तुम जैसा मानो।

सामने से हिरन को आते देख, फुंकनी यंत्र ने कहा, तुम्हारा दोस्त भी आ गया। अब तुम्हें दिखाता और समझााता हूं, क्या नया हो रहा है देवता के दरबार में।

फुंकनी यंत्र की चपटी सी पत्ती पर चलचित्र दिखाई दे रहा है।

देवता के स्थान पर गुणी महाराज, बड़बोले महाराज के साथ भ्रमण कर रहे हैं। दोनों बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं।

खरगोश बोला, अरे… यह हम क्या देख रहे हैं। ये दोनों तो एक दूसरे से दुखी थे। अब एक दूसरे के साथ सुखी कैसे हो गए।

हिरन ने कहा, यही तो सियासत है, जितना अभी तक मेरी समझ में आ रहा है।

फुंकनी यंत्र बोला, कबीले की सियासत में बड़बोले महाराज ही ऐसे हैं, जिनमें सभी को अपने विरोधियों के लिए कुछ न कुछ खास दिखता है।

पर, दुख की बात यह है कि बड़बोले महाराज अपनी खासियत को खुद ही नहीं समझ पा रहे हैं। वो कभी किसी के शस्र बन जाते हैं और किसी के लिए अस्त्र।

मेरी बात को ध्यान से सुनो, बड़बोले महाराज का पूरा किस्सा बताता हूं।

बड़े महाराज को इनमें बहुत सारी अच्छाइयां नजर आती हैं। उनके लिए ये गद्दी तक पहुंचाने का सुलभ मार्ग हो सकते हैं। वो इनको अपने गुट में लेना चाहते हैं। पर, बड़बोले महाराज का मन बहुत चंचल प्रवृत्ति का है, वो उनको एक स्थान पर टिकने नहीं देता। वो स्वयं को दोहराए पर खड़ा पाते हैं। मंथन करते हैं, वहां जाऊंगा तो क्या होगा। यहीं रहूंगा तो क्या होगा। यही प्रवृत्ति उनको गद्दी से दूर रख रही है।

पांच वर्ष पहले बड़े महाराज की गद्दी खिसकाने के लिए बिज्जू महाराज ने इनको बगावत में भागीदार बनाया।

अब बड़े महाराज ने इनको अपनी सियासत को धार देने के लिए इस्तेमाल किया।इनके माध्यम से गुणी महाराज के गुट को बेचैन किया और अपने लिए पूरा माहौल बनाया।

कुछ समय पहले, ये बड़े महाराज के विरोध में उनके ही गुट के कुछ सियासी पहलवानों के साथ दिखने लगे।

कबीलों का भ्रमण करने वाले ढोलन महाराज को इनमें अपने लिए कुछ खास दिखा। वो इनको बड़े कबीले का भ्रमण कराने ले गए। भ्रमण तो बहाना था, उनका उद्देश्य गुणी महाराज को यह संदेश देना था कि बेचैन करने वाली बूटी (बड़बोले महाराज) उनके झोले से बाहर नहीं हैं।

अक्कड़ महाराज को पसंद नहीं करने वाले बड़बोले महाराज को अपने लिए कैसे इस्तेमाल किया जाए, इस पर गुणी महाराज निरंतर मंथन कर रहे थे। गुणी महाराज वो तरीका तलाश रहे थे, जिससे बड़बोले महाराज उनके लिए कोई संकट खड़ा न करें और उनके ही संकट मोचक बन जाएं। अब उनको अवसर के साथ तरीका भी मिल गया और देवता के स्थान से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। क्योंकि सियासत के लिए हमेशा देवता के स्थान का ही तो उपयोग करते रहे हैं।

गुणी महाराज सुबह सुबह ही बड़बोले महाराज को लेकर देवता के दरबार में पहुंच गए। कुछ दिन बाद यहां गुरु महाराज को पहुंचना है। वो ही तो उनके तारणहार हैं।

खरगोश ने पूछा फुंकनी यंत्र ऐसा करके गुणी महाराज क्या संदेश देना चाहते हैं।

फुंकनी यंत्र बोला, कुछ दिन पहले अक्कड़ महाराज को देवता के दरबार में विरोध का सामना करना पड़ा था। गुणी महाराज नहीं चाहते कि इस विरोध की आंच गुरु महाराज के भ्रमण में दिखाई दे। इसलिए वो वहां देवता के पुजारियों से मिलने गए थे। मुझे तो लगता है कि अक्कड़ महाराज के उस अध्याय को ही निरस्त कर देंगे, जो उन्होंने पुजारियों को देवता से दूर करने के लिए लिखा था।

रही बात बड़बोले महाराज को अपने साथ देवता के दरबार में ले जाने की, तो उसके दो संदेश स्पष्ट हैं-

पहला, वो बड़े महाराज को बताना चाहते हैं कि बड़बोले महाराज अब कहीं नहीं जाने वाले। वो हमारे गुट में हैं, हमारे साथ हैं।

दूसरा, वो अक्कड़ महाराज को दिखाना चाहते हैं कि विरोध आपका हुआ है, हमारे गुट का नहीं। यदि गुट का विरोध होता तो मुझे भी देवता के दरबार में जाने से रोका जाता। तुम्हारे विरोधी बड़बोले महाराज भी मेरे साथ हैं। कहते हैं, जब दुश्मन का दुश्मन दोस्त बन जाए तो सियासत के रंग कमाल के लगते हैं। गुणी महाराज इन रंगों को इतना खिलाना चाहते हैं कि विरोधियों के सियासी खेल फीके पड़ने लगें।

खरगोश ने कहा, मैं समझ गया। अब देखना यह है कि बड़बोले महाराज इनके साथ कितने दिन तक टिक पाएंगे। उनको कहीं भी ज्यादा समय रुकने की आदत नहीं है।

हिरन ने पूछा, अक्कड़ महाराज के क्या हाल हैं।

फुंकनी यंत्र ने कहा, वो अपनी जिद पर हैं, कह रहे हैं, मैंने जो किया, वो सही किया था। वो अपनी बात पर अड़े हैं।

हिरन बोला, क्या इससे गुणी महाराज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

फुंकनी यंत्र बोला, नहीं…, उन्होंने बड़ेबोले महाराज को अपने साथ ले लिया। वैसे भी, अक्कड़ महाराज के बोल, जितना बिगाड़ सकते हैं, बिगाड़ दिया। अब कुछ नहीं बचा।

फुंकनी यंत्र से सियासी ज्ञान लेकर खरगोश बोला, मुझे लक्कड़बग्घे को सूचनाएं देनी हैं। वो मेरा इंतजार कर रहा है। खरगोश तेजी से दौड़ता हुआ हिरन की नजरों से ओझल हो गया।

  • यह काल्पनिक कहानी है, इसका किसी से कोई संबंध नहीं हैं।

 

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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