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कबीले में चुनाव-10ः बड़े महाराज की दो कदम आगे, एक कदम पीछे की सियासत

कबीले के चुनाव पर पूरी नजर रखने वाले खरगोश और हिरन भी थोड़ा सा सियासी हो गए। सुबह-सुबह घास से भरे मैदान में खरगोश हिरन का इंतजार कर रहा है। उसने सोचा, फुंकनी यंत्र से पता लगाता हूं कि हिरन कहां है, इससे पहले ही उसको हिरन अपनी ओर आता दिखा।

वो देख रहा है कि हिरन दो कदम उसकी ओर बढ़ा रहा है और फिर एक कदम पीछे जा रहा है। इस तरह हिरन तीन कदम चलने के बाद भी केवल एक कदम ही आगे बढ़ पा रहा है।

खरगोश ने आवाज लगाई, दोस्त यह तुम क्या कर रहे हो।

हिरन बोला, मैं सियासत कर रहा हूं।

खरगोश ने कहा, यह कैसे सियासत। इस तरह तो दौड़ में तुम पिछड़ जाओगे।

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हिरन ने जवाब दिया, मैं अभी जहां से आ रहा हूं, वहां यही चर्चा चल रही है। बड़े महाराज कुछ इस तरह की सियासत कर रहे हैं। शुरू शुरू में वो बड़े जोश से अपने विरोधी गुट पर सियासी हमला करते हैं और फिर मेरी तरह ही एक कदम पीछे हो लेते हैं। मैं भी उनकी तरह बनना चाहता हूं, इसलिए अभ्यास कर रहा हूं।

खरगोश बोला, वो बड़े महाराज है। वो कब क्या कदम उठा लें, कुछ देर पहले तक तो वो भी नहीं जानते। उनकी सियासी चाल ऐसी ही होती हैं। तुम उनकी नकल करके अपना समय खराब मत करो दोस्त।

हिरन को अपनी सीधी उल्टी चाल से परेशानी हो रही थी और वो खरगोश के पास देरी से पहुंचता। इसलिए उसने सीधे ही दौड़ लगा ली।

खरगोश बोला, यह हुई न बात। हिरन भी न… बहुत सीधा है, जैसा सुनता है, वैसा ही करने लगता है।

खरगोश ने फुंकनी यंत्र से कहा, दोस्त बताओ, बड़े महाराज की चाल का राज क्या है।

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फुंकनी यंत्र जो अभी तक मौन उपवास पर था, बोला बड़े महाराज सही चाल चल रहे हैं। वो गुणी महाराज के गुट पर पूरी नजर रखे हैं और उनकी चाल को समझकर अपने निर्णय ले रहे हैं। जब वो समझते हैं कि एक ही चाल से लाभ नहीं मिलेगा तो तत्काल दूसरी चाल चलते हैं।

उनके पास बहुत सारी चालें हैं, कब कौन सी चल दें, पता नहीं चलता। उनकी सियासत का असर भी होता है। अब तुम हिरन को देख लो दो कदम आगे, एक कदम पीछे चल रहा था। मैं मौन उपवास रखने लगा हूं।

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अच्छा तो तुम्हें बताता हूं, बड़े महाराज ऐसा क्यों कर रहे हैं। गुरु महाराज देवता के दरबार में पहुंचे तो बड़े महाराज को लगा कि राजा की गद्दी पाने का संघर्ष और कड़ा होता जा रहा है।

अब तुम्हें तो पता है कि बड़े महाराज को इस बार हर हाल में गद्दी चाहिए। उन्होंने भी वहीं करना शुरू कर दिया, जो गुरु महाराज का गुट कर रहा है। वो भी देवता और उनके पुजारियों के समक्ष उपस्थित हो रहे हैं।

उनको देवता की भक्ति में लीन होकर ही राज गद्दी तक पहुंचने का मार्ग दिख रहा है। इसलिए इस समय वो सबकुछ भूल सकते हैं, पर देवता के समक्ष उपस्थिति को नहीं भूलेंगे। अपने भ्रमण के चलचित्रों एवं छाया चित्रों को विभिन्न यंत्रों के माध्यम से प्रजा तक पहुंचा रहे हैं।

फुंकनी यंत्र बताता है कि, बड़े महाराज ने अपने गुट की चुनाव यात्रा को भी पीछे कर दिया। अब नये तरीके से योजना बना रहे हैं। उनकी चुनाव यात्रा देव स्थान से ही निकाली जाएगी।

पहले वो विरोधी गुट को चुनाव में देवता के स्थान को केंद्र बनाने का विरोध कर रहे थे। फिर अचानक मौन हो गए और कहने लगे अब कोई बात नहीं है। ऐसा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि वो भी अब वही कर रहे हैं और जोर शोर से करना चाह रहे हैं, जो विरोधी गुट कर रहा है।

खरगोश बोला, पता चला है कि गुरु महाराज, बड़कू महाराज हमारे कबीले के भ्रमण पर आ रहे हैं। वो जब भी आते हैं बड़े महाराज को अपनी गद्दी पहले से और दूर जाती दिखती है। पता चला कि बड़े महाराज दो कदम आगे, एक कदम पीछे की चाल ही चलते रहें, विरोधी गुट बहुत आगे निकल जाए।

फुंकनी यंत्र बोला, ऐसा नहीं है, जैसा तुम समझ रहे हो। बड़े महाराज सियासी चालों के बड़े पारखी हैं। वो खाली बरतन को भट्टी पर चढ़ाकर ऐसा छोंक लगा सकते हैं, जिससे सभी को छींकें आने लगें।

उन्होंने बागी, बागी… बोलकर बड़बोले महाराज के बोल इतने तेज कर दिए थे कि उनके गुट में भगदड़ सी हालत कर दी थी। बड़ी मुश्किल से बड़बोले महाराज को संभाला जा सका। गुणी महाराज की दिक्कतों को बढ़ा दिया था उन्हें।

वो दूसरों को अपनी सियासत के लिए प्रयोग करते हैं। या यह कहें कि वो सियासत में तरह-तरह के प्रयोग करते हैं। इसमें कभी लाभ होता है और कभी हानि, यह सब तो चलता है।

वो तुरंत चाल बदलने में माहिर हैं। बड़कू महाराज, गुरु महाराज की किसी भी सियासी चाल को तुरंत भांपकर अपनी गति को धीमा या तेज कर सकते हैं। अपने गुट में सबसे अलग, सबसे बड़े और सबसे तेज गति वाले हैं बड़े महाराज। वो जो करते दिखते हैं, ऐसा सच में है, कहा नहीं जा सकता।

फुंकनी यंत्र बोला, अब मुझे मौन उपवास करना है, अभी तक के लिए इतना ही।

इसके बाद हिरन और खरगोश भी मैदान की घास चरने में व्यस्त हो गए। हिरन कह रहा था कि मौन में बहुत शक्ति होती है। विरोधी गुट से सियासी संघर्ष के लिए शक्ति मौन उपवास से ही तो इकट्ठी कर रहे हैं बड़े महाराज। हमें भी शक्ति के लिए मौन उपवास रखना होगा। यह कहते ही दोनों पूरा दिन के लिए मौन हो गए।

  • यह काल्पनिक कहानी है, इसका किसी से कोई संबंध नहीं हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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