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NEWSLIVE24x7 > Blog > Blog Live > कबीले में चुनाव-18ः नीम के घोल में डुबोकर तेज चलती है जुबान
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कबीले में चुनाव-18ः नीम के घोल में डुबोकर तेज चलती है जुबान

Rajesh Pandey
Last updated: November 21, 2021 11:40 pm
Rajesh Pandey
4 years ago
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  • राजेश पांडेय
खरगोश की तबीयत थोड़ी नासाज है। वो बार-बार उल्टी कर रहा है। बहुत परेशान और बेचैन लग रहा है।
हिरन ने पूछा, दोस्त क्या, कुछ उल्टा सीधा खा लिया।
खरगोश बोला, मुझे नहीं पता था। वो फल दिखने में अच्छा लग रहा था, मैंने सोचा स्वाद में भी बढ़िया होगा, इसलिए चख लिया। खाने में थोड़ा कड़वा था। जो कुछ मुंह में था, वो तो बाहर उगल दिया, पर जो पेट में चला गया उसका क्या। तब से परेशान हूं, समझ में नहीं आ रहा क्या करूं।
हिरन बोला, दोस्त जरूरी नहीं जो फल दिखने में सुंदर लगे, वो खाने में भी अच्छा हो। तुम तो समझदार हो, फिर भी ऐसी हरकत। सोच समझ कर खाया पीया करो। तुम एक काम करो।

यह भी पढ़ें- कबीले में चुनाव-1ः सत्ता, सियासत और बगावत

Contents
खरगोश की तबीयत थोड़ी नासाज है। वो बार-बार उल्टी कर रहा है। बहुत परेशान और बेचैन लग रहा है।हिरन ने पूछा, दोस्त क्या, कुछ उल्टा सीधा खा लिया।खरगोश बोला, मुझे नहीं पता था। वो फल दिखने में अच्छा लग रहा था, मैंने सोचा स्वाद में भी बढ़िया होगा, इसलिए चख लिया। खाने में थोड़ा कड़वा था। जो कुछ मुंह में था, वो तो बाहर उगल दिया, पर जो पेट में चला गया उसका क्या। तब से परेशान हूं, समझ में नहीं आ रहा क्या करूं।हिरन बोला, दोस्त जरूरी नहीं जो फल दिखने में सुंदर लगे, वो खाने में भी अच्छा हो। तुम तो समझदार हो, फिर भी ऐसी हरकत। सोच समझ कर खाया पीया करो। तुम एक काम करो।खरगोश ने पूछा, क्या करना जल्दी से बताओ। मेरा तो दम ही निकल रहा है। आह! क्या करूं। हे देवता जी, अब तो तुम्हारा ही आसरा है।हिरन ने कहा, कुछ मीठा खा लो, तुम्हारे पेट में जो भी कड़वा है, उसका असर कुछ कम हो जाएगा। ऐसा लगा रहता है, उल्टी होने से पेट में मौजूद जो भी विकार हैं, बाहर निकल जाएंगे। तुम्हें केवल एक काम करना है, खूब पानी पियो। हो सके तो कुछ खट्टे मीठे फल खा लो।खरगोश को हिरन की सलाह पसंद आ गई और उसने आसपास मौजूद खट्टे मीठे फल खाए और खूब पानी पीया। करीब एक घंटा भी नहीं लगा, जीभ से लेकर पेट तक घुला कड़वापन खत्म हो गया।खरगोश बोला, हिरन भाई दोस्त तो दोस्त होता है, तुमने दोस्ती वाली सलाह दी। मैं एक दम फिट हो गया। सारा कड़वापन खत्म हो गया, यहां तक कि मन में घुला भी।हिरन ने पूछा, मन में कड़वापन, क्या बात करते हो। तुम्हारे मन में कड़वापन, मैं नहीं मान सकता। चलो मान लिया कि हम सियासत की बातें करते-करते सियासी हो रहे हैं, पर हम मन में कड़वापन नहीं रखते। हमारा मन तो साफ रहता है। वहां किसी की हिम्मत नहीं है, कुछ उल्टा सीधा प्रयोजन साध सके।खरगोश बोला, बात तुम्हारी सही है, पर मैं जो सुनकर आया हूं, वो तुम्हें बताता हूं। ध्यान से सुनो…।लोग कह रहे थे कि कबीले के चुनाव में दो बातें बड़ी खास हो रही हैं- एक तो, सियासत करने वाले कुछ लोग जुबान को नीम के घोल में डुबोकर चला रहे हैं। यह घोल इतना कड़वा हो जाता है कि खुद उनकी जुबान लड़खड़ा रही है। उनको पता ही नहीं चलता कि इस कड़वेपन से प्रजा असहज हो रही है।दूसरे वो लोग हैं, जो चाहते हैं कि सामने वाला इतना कड़वा हो जाए कि प्रजा को असहज कर दे। यहां दोनों तरफ से प्रजा को असहज किया जा रहा है। ये वो प्रजा है, जिसके लिए सियासत में बड़े बड़े गुटों को छोटे-छोटे खेमों में बांटा जा रहा है।मेरा प्रश्न है कि, जिस प्रजा के लिए तुम यह सबकुछ कर रहे हो, उसी को दुखी क्यों करते हो।हिरन ने कहा, फुंकनी यंत्र बताएगा, उसको आवाज लगाओ।खरगोश बोला, फुंकनी यंत्र तुम मुझे सुन रहे हो, क्या तुम मुझे सुन रहे हो।कोई जवाब नहीं मिलने पर खरगोश बोला, लगता है यह मौन उपवास पर चला गया। यह भी हो सकता है, मेरे लगातार उल्टियां करने से आसपास बहुत कड़वा होगा और यह छोटा सा यंत्र गश खा गया। यह कहते ही खरगोश की हंसी छूट गई।हिरन ने कहा, यह भी क्या करे। सियासत करने वाले बार-बार रंग बदलेंगे तो इसको चक्कर नहीं आएंगे तो क्या होगा। यहां क्या कहते हैं, उसको हां… याद आया, गिरगिट के पास भी इतने रंग नहीं हैं, जितने सियासी मुखौटों के बदलते हैं। ऐसा करते हैं वटवृक्ष के पास चलते हैं।दोनों वट वृक्ष को प्रणाम करके उनके सामने बैठ जाते हैं।वटवृक्ष शांत हवाओं से बात रहे हैं और उनसे पूछ रहे हैं कि जंगल में सबकुछ ठीक ठाक चल रहा है न। हवाएं कह रही हैं, अभी तक तो सबकुछ ठीक है।पर, बड़बोले महाराज के बोल प्रजा पर तोहमत गढ़ रहे हैं। वो तो कह रहे हैं प्रजा को अपनी तरक्की पसंद नहीं है। प्रजा अपना ख्याल रखने वालों को पसंद नहीं करती। कबीले के चुनाव के केंद्र में रहकर जिसको निर्णय सुनाना है, उसके बारे में यह बातें हम हवाओं को भी पसंद नहीं आईं।वटवृक्ष ने खरगोश और हिरन से पूछा, क्या जानना चाहते हो। क्या तुमने हवा की बातें सुनी हैं।खरगोश बोला, हम भी यही जानने आए थे। क्या प्रजा के पास जाकर मीठी मीठी बातें, अच्छे अच्छे वादे करने से पहले कड़वा नीम चबाना चाहिए।वटवृक्ष ने कहा, नीम तो स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। लगता है, उन्होंने कभी नीम या उस जैसी वस्तु का स्वाद नहीं लिया। उन्होंने कुछ ऐसा चखा होगा, जिसने बेचैनी बढ़ा दी। इसलिए यही सब सबके सामने परोस रहे हैं। जो भोजन आपको अच्छा नहीं लगता, आप उसको दूसरों को कैसे परोस सकते हैं। यदि आप ऐसा करते हैं तो स्पष्ट है आप किसी को दुखी करना चाहते हैं। उसका जायका खराब करना चाहते हो। उसको बीमार करना चाहते हो।आपके प्रश्न का उत्तर है- जिन सियासी व्यक्तित्व की आप बात कर रहे हैं, वो अपनी प्रजा से सहयोग मांगने के लिए एक बार ही जाते हैं। पांच वर्ष बाद, वो अपनी प्रजा को भी बदल देते हैं। प्रजा बदलने का मतलब आप जानते हो या नहीं। पर मैं बता देता हूं, इसका मतलब होता है वहां से चुनाव नहीं लड़ते, जहां से पहले विजयी हुए थे। उन्होंने अधिकतर बार ऐसा किया है।जहां तक प्रजा और मेरी समझ में आता है, वो इसलिए क्योंकि वहां उनको अपनी विजय पर संदेह रहता है। यह संदेह इसलिए भी है, क्योंकि आप प्रजा को भुला चुके हैं और प्रजा आपको भूल चुकी है।वटराज बताते हैं, उनके बारे में तो यह बात भी सही है कि वो उस गुट को भी छोड़ देते हैं, जिसके पास अगली बार राज गद्दी नहीं होने का, जरा भी संदेह रहता हो। इनको तो हर गुट के राज में वजीर बनने की नजीर माना जाता है।इसलिए ये हमेशा कबीले में चुनाव से पहले दोराहे पर आकर खड़े हो जाते हैं और आकलन करते हैं कि कहां जाना है गुणी महाराज या फिर बड़े महाराज। ये आजकल  इसी आकलन में लगे हैं। आकलन सही होने की संभावना होते ही निर्णय कर लेंगे।खरगोश ने पूछा, ये गुणी महाराज के साथ कार्य करते हैं और उन्हीं के कार्यों पर सवाल उठाते हैं। गुणी महाराज कहते हैं काम ज्यादा, बातें कम। पर ये संदेश देना चाहते हैं कि बातें ज्यादा, काम कम। यह तो नाव पर सवार होकर नाविक की सोच के विपरीत दिशा में जोर लगाने जैसी बात हो गई। ऐसे में नाव आगे कैसे बढ़ेगी। वो तो एक ही जगह पर गोल-गोल घुमने लगेगी या फिर स्थिर हो जाएगी या फिर पलट जाएगी।तभी हिरन बोला, ऐसा भी हो सकता है कि नाव में बैठे नाविक के साथी विरोध कर दें और खतरे में डालने वाले को ही नाव से बाहर करा दें। बाहर का मतलब जानते हो, वहां पानी के सिवाय दूर दूर तक कुछ और नहीं दिखेगा। यह बात अलग है कि उनको वापस उसी नाव में जाने का अवसर मिल जाए, जहां से वो बागी का खिताब लेकर आए थे। वैसे सियासत में बागी होना किसी खिताब जैसा ही है। सियासी लोगों को यह शब्द ‘गौरवान्वित’ करता होगा।वटराज ने कहा, बहुत समझदार हो तुम खरगोश जी। क्या उदाहरण दिया है आनंद की अनुभूति हो रही है। आपने एक उदाहरण से पूरी सत्ता की चाल और चरित्र को प्रस्तुत कर दिया। आप जैसा छोटा सा जीव, यह सब बातें कितनी आसानी से समझ गया। प्रजा भी सब जानती है। उसका निर्णय नदी पार करा देता है या फिर नाव को ही डुबो देता है।अब आपको राजगद्दी के लिए सियासी चाल समझ में आ गई होगी। फिर मिलते हैं…।खरगोश और हिरन वापस लौट गए। खरगोश ने तो कान पकड़ लिए कि वो किसी भी नये फल को खाने से पहले उसके बारे में जानकारी लेगा।*यह काल्पनिक कहानी है। इसका किसी से कोई संबंध नहीं है।

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खरगोश ने पूछा, क्या करना जल्दी से बताओ। मेरा तो दम ही निकल रहा है। आह! क्या करूं। हे देवता जी, अब तो तुम्हारा ही आसरा है।
हिरन ने कहा, कुछ मीठा खा लो, तुम्हारे पेट में जो भी कड़वा है, उसका असर कुछ कम हो जाएगा। ऐसा लगा रहता है, उल्टी होने से पेट में मौजूद जो भी विकार हैं, बाहर निकल जाएंगे। तुम्हें केवल एक काम करना है, खूब पानी पियो। हो सके तो कुछ खट्टे मीठे फल खा लो।
खरगोश को हिरन की सलाह पसंद आ गई और उसने आसपास मौजूद खट्टे मीठे फल खाए और खूब पानी पीया। करीब एक घंटा भी नहीं लगा, जीभ से लेकर पेट तक घुला कड़वापन खत्म हो गया।

यह भी पढ़ें- कबीले में चुनाव-5ः देवता के यहां भी सियासत कर आए अक्कड़ महाराज

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खरगोश बोला, हिरन भाई दोस्त तो दोस्त होता है, तुमने दोस्ती वाली सलाह दी। मैं एक दम फिट हो गया। सारा कड़वापन खत्म हो गया, यहां तक कि मन में घुला भी।
हिरन ने पूछा, मन में कड़वापन, क्या बात करते हो। तुम्हारे मन में कड़वापन, मैं नहीं मान सकता। चलो मान लिया कि हम सियासत की बातें करते-करते सियासी हो रहे हैं, पर हम मन में कड़वापन नहीं रखते। हमारा मन तो साफ रहता है। वहां किसी की हिम्मत नहीं है, कुछ उल्टा सीधा प्रयोजन साध सके।
खरगोश बोला, बात तुम्हारी सही है, पर मैं जो सुनकर आया हूं, वो तुम्हें बताता हूं। ध्यान से सुनो…।
लोग कह रहे थे कि कबीले के चुनाव में दो बातें बड़ी खास हो रही हैं- एक तो, सियासत करने वाले कुछ लोग जुबान को नीम के घोल में डुबोकर चला रहे हैं। यह घोल इतना कड़वा हो जाता है कि खुद उनकी जुबान लड़खड़ा रही है। उनको पता ही नहीं चलता कि इस कड़वेपन से प्रजा असहज हो रही है।
दूसरे वो लोग हैं, जो चाहते हैं कि सामने वाला इतना कड़वा हो जाए कि प्रजा को असहज कर दे। यहां दोनों तरफ से प्रजा को असहज किया जा रहा है। ये वो प्रजा है, जिसके लिए सियासत में बड़े बड़े गुटों को छोटे-छोटे खेमों में बांटा जा रहा है।

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यह भी पढ़ें- कबीले में चुनाव-12ः खुद के लिए मांगी मन्नतों को भूल रहे बड़े महाराज

मेरा प्रश्न है कि, जिस प्रजा के लिए तुम यह सबकुछ कर रहे हो, उसी को दुखी क्यों करते हो।
हिरन ने कहा, फुंकनी यंत्र बताएगा, उसको आवाज लगाओ।
खरगोश बोला, फुंकनी यंत्र तुम मुझे सुन रहे हो, क्या तुम मुझे सुन रहे हो।
कोई जवाब नहीं मिलने पर खरगोश बोला, लगता है यह मौन उपवास पर चला गया। यह भी हो सकता है, मेरे लगातार उल्टियां करने से आसपास बहुत कड़वा होगा और यह छोटा सा यंत्र गश खा गया। यह कहते ही खरगोश की हंसी छूट गई।
हिरन ने कहा, यह भी क्या करे। सियासत करने वाले बार-बार रंग बदलेंगे तो इसको चक्कर नहीं आएंगे तो क्या होगा। यहां क्या कहते हैं, उसको हां… याद आया, गिरगिट के पास भी इतने रंग नहीं हैं, जितने सियासी मुखौटों के बदलते हैं। ऐसा करते हैं वटवृक्ष के पास चलते हैं।
दोनों वट वृक्ष को प्रणाम करके उनके सामने बैठ जाते हैं।

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वटवृक्ष शांत हवाओं से बात रहे हैं और उनसे पूछ रहे हैं कि जंगल में सबकुछ ठीक ठाक चल रहा है न। हवाएं कह रही हैं, अभी तक तो सबकुछ ठीक है।
पर, बड़बोले महाराज के बोल प्रजा पर तोहमत गढ़ रहे हैं। वो तो कह रहे हैं प्रजा को अपनी तरक्की पसंद नहीं है। प्रजा अपना ख्याल रखने वालों को पसंद नहीं करती। कबीले के चुनाव के केंद्र में रहकर जिसको निर्णय सुनाना है, उसके बारे में यह बातें हम हवाओं को भी पसंद नहीं आईं।
वटवृक्ष ने खरगोश और हिरन से पूछा, क्या जानना चाहते हो। क्या तुमने हवा की बातें सुनी हैं।
खरगोश बोला, हम भी यही जानने आए थे। क्या प्रजा के पास जाकर मीठी मीठी बातें, अच्छे अच्छे वादे करने से पहले कड़वा नीम चबाना चाहिए।

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वटवृक्ष ने कहा, नीम तो स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। लगता है, उन्होंने कभी नीम या उस जैसी वस्तु का स्वाद नहीं लिया। उन्होंने कुछ ऐसा चखा होगा, जिसने बेचैनी बढ़ा दी। इसलिए यही सब सबके सामने परोस रहे हैं। जो भोजन आपको अच्छा नहीं लगता, आप उसको दूसरों को कैसे परोस सकते हैं। यदि आप ऐसा करते हैं तो स्पष्ट है आप किसी को दुखी करना चाहते हैं। उसका जायका खराब करना चाहते हो। उसको बीमार करना चाहते हो।
आपके प्रश्न का उत्तर है- जिन सियासी व्यक्तित्व की आप बात कर रहे हैं, वो अपनी प्रजा से सहयोग मांगने के लिए एक बार ही जाते हैं। पांच वर्ष बाद, वो अपनी प्रजा को भी बदल देते हैं। प्रजा बदलने का मतलब आप जानते हो या नहीं। पर मैं बता देता हूं, इसका मतलब होता है वहां से चुनाव नहीं लड़ते, जहां से पहले विजयी हुए थे। उन्होंने अधिकतर बार ऐसा किया है।
जहां तक प्रजा और मेरी समझ में आता है, वो इसलिए क्योंकि वहां उनको अपनी विजय पर संदेह रहता है। यह संदेह इसलिए भी है, क्योंकि आप प्रजा को भुला चुके हैं और प्रजा आपको भूल चुकी है।
वटराज बताते हैं, उनके बारे में तो यह बात भी सही है कि वो उस गुट को भी छोड़ देते हैं, जिसके पास अगली बार राज गद्दी नहीं होने का, जरा भी संदेह रहता हो। इनको तो हर गुट के राज में वजीर बनने की नजीर माना जाता है।
इसलिए ये हमेशा कबीले में चुनाव से पहले दोराहे पर आकर खड़े हो जाते हैं और आकलन करते हैं कि कहां जाना है गुणी महाराज या फिर बड़े महाराज। ये आजकल  इसी आकलन में लगे हैं। आकलन सही होने की संभावना होते ही निर्णय कर लेंगे।
खरगोश ने पूछा, ये गुणी महाराज के साथ कार्य करते हैं और उन्हीं के कार्यों पर सवाल उठाते हैं। गुणी महाराज कहते हैं काम ज्यादा, बातें कम। पर ये संदेश देना चाहते हैं कि बातें ज्यादा, काम कम। यह तो नाव पर सवार होकर नाविक की सोच के विपरीत दिशा में जोर लगाने जैसी बात हो गई। ऐसे में नाव आगे कैसे बढ़ेगी। वो तो एक ही जगह पर गोल-गोल घुमने लगेगी या फिर स्थिर हो जाएगी या फिर पलट जाएगी।
तभी हिरन बोला, ऐसा भी हो सकता है कि नाव में बैठे नाविक के साथी विरोध कर दें और खतरे में डालने वाले को ही नाव से बाहर करा दें। बाहर का मतलब जानते हो, वहां पानी के सिवाय दूर दूर तक कुछ और नहीं दिखेगा। यह बात अलग है कि उनको वापस उसी नाव में जाने का अवसर मिल जाए, जहां से वो बागी का खिताब लेकर आए थे। वैसे सियासत में बागी होना किसी खिताब जैसा ही है। सियासी लोगों को यह शब्द ‘गौरवान्वित’ करता होगा।
वटराज ने कहा, बहुत समझदार हो तुम खरगोश जी। क्या उदाहरण दिया है आनंद की अनुभूति हो रही है। आपने एक उदाहरण से पूरी सत्ता की चाल और चरित्र को प्रस्तुत कर दिया। आप जैसा छोटा सा जीव, यह सब बातें कितनी आसानी से समझ गया। प्रजा भी सब जानती है। उसका निर्णय नदी पार करा देता है या फिर नाव को ही डुबो देता है।
अब आपको राजगद्दी के लिए सियासी चाल समझ में आ गई होगी। फिर मिलते हैं…।
खरगोश और हिरन वापस लौट गए। खरगोश ने तो कान पकड़ लिए कि वो किसी भी नये फल को खाने से पहले उसके बारे में जानकारी लेगा।
*यह काल्पनिक कहानी है। इसका किसी से कोई संबंध नहीं है।

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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