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कबीले में चुनाव-2ः भट्टी पर खाली बर्तन चढ़ाकर छोंक लगा रहे बड़े महाराज

खरगोश और हिरन की दूसरे दिन की मुलाकात होती है।

हिरन बोला, आज कुछ नया।

खरगोश ने कहा, नया क्या, वही बगावत, बगावत का शोर मचा है कबीले में।

हिरन ने पूछा, बगावत का कबीले के चुनाव का क्या मतलब। सुना है, यह तो बहुत साल पहले हुई थी।

पहले की कहानी जरूर पढ़ें- कबीले में चुनाव-1ः सत्ता, सियासत और बगावत

खरगोश बोला, वो बड़े महाराज हैं न, उन्होंने ही यह शोर मचाया है। कभी कहते हैं, अपने गुट में नहीं आने दूंगा, कभी बोलते हैं इन उनका स्वागत है और कभी कहते हैं पहले जांचूंगा कि मेरे किस काम के हो।

खरगोश बोलता जा रहा था, और हिरन उसे बड़े ध्यान से सुन रहा था।

“बड़े महाराज की यह क्या बात हुई, जब तुम बागियों से नाराज हो तो उनकी बात करना क्यों नहीं बंद कर देते। उनके बारे में क्यों इतना सोच रहे हो।

मुझे तो लगता है, बड़े महाराज को बागियों की जरूरत है। इसलिए उनको बार-बार याद कर रहे हैं। इनमें से कुछ बागी ऐसे हैं, जहां से चुनाव लड़ेंगे, वहां से जीत जाएंगे” खरगोश बोला।

हिरन ने कहा, यह बागियों से इतना नाराज क्यों हैं और उनको बार-बार याद क्यों करते हैं।

खरगोश बोला, पिछली बार जब बड़े महाराज यहां के राजा थे, तब उनके नौ साथियों, जिनमें बिज्जू महाराज, बड़बोले महाराज भी थे, ने बगावत कर दी। ये सभी विरोधी गुट में शामिल हो गए थे। बड़े महाराज की राजा वाली गद्दी डोल गई। बाद में, किसी तरह वो गद्दी पर लौट पाए।

तभी से बड़बोले महाराज, इनको पसंद नहीं करते। हमेशा राजा बने रहने की सोचने वाले बड़े महाराज, भी तो कम नहीं हैं। उन्होंने भी तो बिज्जू महाराज की गद्दी खिसकाई थी।

हिरन बोला, अब समझ में आया। मैंने सुना है, चुनाव की वजह से बड़े महाराज ने झपकियां लेना तक बंद कर दिया। उम्र में सबसे बड़े हैं, पर दिनभर दौड़ लगाते हैं कबीले में। राजा को चैन से काम नहीं करने देंगे।

बड़बोले महाराज और इनके बीच क्या पक रहा है, हिरन ने खरगोश से पूछा।

खरगोश बोला, अभी तो मुझे नहीं लग रहा कि कुछ पक रहा होगा। पर, बड़े महाराज पका जरूर देंगे। उनको तो खाली बरतन को भी भट्टी पर चढ़ाकर उसमें छोंक लगाने में महारत है।

एक बात बताओ, बड़बोले महाराज आपके बारे में जो मन में आता है, बोल रहे हैं। पर, आप हैं कि बार-बार कह रहे हैं, उनको अपने गुट में नहीं आने दूंगा। जब वो आपके यहां आने की बात ही नहीं कर रहे हैं, तो आप किसको रोकने के लिए गेट पर चौकीदारी कर रहे हैं।

हिरन ने कहा, बात तो तुम्हारी सही है। पर, मुझे लगता है कि बड़े महाराज को राजा बनना है। वो देवता के सामने भी मत्था टेककर राजा बनने की इच्छा जता रहे हैं। इसलिए वो चाह रहे हैं कि गुणी महाराज वाले गुट से कुछ दमदार लोगों को अपने यहां बुला लें। उनको बगावत वाले बड़बोले महाराज में ज्यादा संभावना दिख रही है, इसलिए उनको कभी हां, कभी न करके हिला रहे हैं।

तुम तो जानते हो, जब किसी पेड़ को उखाड़ना होता है, तो कबीले वाले रस्सी बांधकर इसको पहले अपनी ओर खींचते हैं और फिर दूसरी ओर धक्का मारते हैं। कभी इधर, कभी उधर होते -होते पेड़ जड़ों से अलग होने लगता है।

खरगोश बोला, वैसे बड़बोले महाराज काफी अस्थिर हो चुके हैं। वो कबीले के मंत्री हैं, पर खुद को निराश बताते हैं। ऐसा कहकर वो चुनाव की तैयारियों में जी जान से जुटे राजा के लिए ही संकट खड़ा कर रहे हैं। मैं तो यह कह रहा हूं, वो कहीं के नहीं रहेंगे।

हिरन ने कहा, कबीले में पांच साल में चुनाव होते हैं। बड़बोले महाराज, ठीक चुनाव से पहले कह रहे हैं, उनका काम निराशा वाला है। इतनी सी बात समझने में उनको बहुत समय लग गया। सही कह रहे हो, छोटी सी बात देर से समझने वाले निराश ही करते हैं।

“अच्छा यह बताओ, गुणी महाराज के क्या हाल हैं। क्या वो घेरे से बाहर आ गए,” हिरन ने पूछा।

खरगोश बोला, गुणी महाराज को बड़े महाराज से कम, अपनों से ज्यादा खतरा है। बड़े महाराज के खेल साफ दिखते हैं। पर, अपने गुट वाले भी तो उनके साथ कम खेल नहीं कर रहे।

हिरन ने कहा, मैं कुछ समझा नहीं।

खरगोश ने कहा, यह सबकुछ समझने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़ेगा। बात यह है, जब राजा को बदलना था, तो गुणी महाराज का नाम दूर दूर तक नहीं था। अचानक से उनका नाम पुकारा गया और उनको राजा बना दिया गया।

वो राजा क्या बने, उनके विरोधियों की संख्या बढ़ गई, ये बाहर वाले विरोधी नहीं हैं, बल्कि अपने आसपास अपने गुट वाले ही हैं।

इनमें एक हैं ढोलन महाराज, जो इस कबीले से लेकर बड़े कबीले तक की दौड़ में व्यस्त रहते हैं। वहां उनके अच्छे संबंध बताए जाते हैं। उनको गुणी महाराज की तरक्की में अपना अहित दिख रहा है।

वो समझ रहे हैं कि अगर अगले चुनाव में हमारा गुट जीता तो फिर से गुणी महाराज को गद्दी मिल जाएगी। गुणी महाराज को गद्दी मिलने का मतलब है, पूरे पांच वर्ष गद्दी को दूर से ही देखना पड़ेगा। इसलिए वो नहीं चाहते कि गुणी महाराज के गुण बड़े कबीले में भी गाए जाएं।

बड़े कबीले से इसी गुट के एक और खिलाड़ी हैं, जिनको सब मास्टर जी कहते हैं, वैसे उनका नाम खिलाड़ी महाराज है। वो कभी बड़े कबीले से तो कभी हमारे कबीले से जुड़ जाते हैं। पहले इस कबीले के राजा रह चुके हैं। वो बड़े महाराज की टक्कर के हैं।

उनके खेल का तोड़ सिर्फ बड़े महाराज के पास हो सकता है। पता नहीं चलेगा, कब किसकी सियासत को हवा कर दें। पता चला है, वो भी बड़े कबीले से यहीं लौटने का मन बना रहे हैं।

रही बात, बड़े महाराज की, तो वो अपनी यंत्र से ऐसी ऐसी ध्वनियां निकालेंगे, जिनसे गुणी महाराज के गुट के लोग अस्थिर हो सकते हैं। इस तरह हलचल पैदा करके वो कबीले के लोगों को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं, कि गुणी महाराज के यहां तो भगदड़ मच रही है।

भगदड़ वही मचती है, जहां कोई दिक्कत आ रही है। ऐसा करके वो यह साबित करना चाहते हैं कि चुनाव से पहले ही विरोधी गुट के लोगों को हार दिखाई देने लगी है।

उधर, कबीले के पुराने राजा अक्कड़ महाराज ने बड़बोले महाराज को चुनौती दे दी है। उनको तो पहले से ही नहीं बन रही। उन्होंने बड़बोले महाराज को फड़फड़ाने वाला सूखा पत्ता बता दिया। कहां से लाते हैं ये इतना दिमाग।

हिरन बोला, खरगोश जी, इतनी सारी जानकारी कहां से ला रहे हो।

खरगोश ने कहा, मेरे पास फुंकनी जैसा यंत्र है, जो लक्कड़बग्घे से मिला है। मैं इस यंत्र से लक्कड़बग्घे से बात करता हूं। कभी कभी फुंकनी यंत्र में अजीब से आवाज आने लगती है। लगता है, यह आवाजें कबीले में सियासत करने वालों के मन से आती हैं। उनका मन में जो चल रहा होता है, वो मुझे सुनाई देता है।…जारी

*यह एक काल्पनिक कहानी है, इसका किसी से कोई संबंध नहीं है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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