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कबीले में चुनाव-16: प्रतिशोध की सियासत वाले अग्नि परीक्षा के पात्र नहीं हो सकते

सियासी,सियासी हो चुका हिरन इस बार फिर हांफता हुआ खरगोश के पास पहुंचा। आते ही बोला, खरगोश जी, खरगोश जी…।

खरगोश ने कहा, भाई पहले ढंग से सांसें ले लो। आराम से बैठो और फिर पूछो, क्या चाहते हो।

हिरन ने पूछा, यह बताओ…अग्नि परीक्षा क्या होती है। परीक्षा का मतलब तो मैं जानता हूं। जब शेर हम हिरनों के पीछे दौड़ लगाते हैं तो हम परीक्षा दे रहे होते हैं। थोड़ा सा ढीला पड़ने का मतलब है शेर का शिकार हो जाना। मैं सही कह रहा हूं न।

अभी खरगोश कुछ बोल पाता हिरन फिर बोला, अग्नि का मतलब तो आग से होता है न। आग तो वही होती है न, जो हमारे जंगल को हर वर्ष गर्मियों में नुकसान पहुंचाती है। जंगल के जीवों का बड़ा अहित करती है आग। इस आग से बच गए तो ठीक नहीं तो…क्या कर सकते हैं। हम जंगल के जीव तो हर वर्ष अग्नि परीक्षा देते हैं। यह कहते ही हिरन की आंखें नम हो जाती हैं, वो उदास हो जाता है।

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खरगोश ने पूछा, तुम अग्नि परीक्षा का अर्थ क्यों पूछ रहे हो।

हिरन ने कहा, मैं सियासत में अग्नि परीक्षा के मायने जानना चाहता हूं।

खरगोश ने पूछा, पर तुम सियासी लोगों और सियासत की अग्नि परीक्षा के बारे में क्यों जानना चाहते हो। क्या कोई सियासी घटना हुई है, जिसमें किसी सियासी शख्सियत को इस दौर से गुजरना पड़ रहा है। पर, जहां तक मुझे मालूम है, कबीले की सियासत में कोई अग्नि परीक्षा का सामना नहीं कर रहा।

हिरन बोला, मैंने सुना है, बड़े महाराज को उनके ही गुट में घेर लिया गया है। कबीले में चुनाव के बाद यदि उनका गुट विजय प्राप्त करता है तो उनको राज गद्दी तक पहुंचने के लिए जिस परीक्षा को देना होगा, उसकी तुलना अग्नि परीक्षा से की जा रही है।

खरगोश ने कहा, फुंकनी यंत्र ही कुछ समझाएगा, वही बड़े महाराज के मौन को मन लगाकर समझता है।

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फुंकनी यंत्र, क्या तुम हमारा वार्तालाप सुन रहे हो। क्या तुम्हारे पास कबीले की सियासत का भूत, भविष्य और वर्तमान है। क्या यहां कभी अग्नि परीक्षा हुई थी, क्या कभी किसी को इस दौर से गुजरना होगा, क्या वर्तमान में ऐसा हो रहा है, खरगोश ने पूछा।

फुंकनी यंत्र बोला, अग्नि परीक्षा का अर्थ अग्नि में कूदना या उसमें फंसना नहीं, बल्कि उस पर पार पाना है। अतीत में अग्नि परीक्षा देने वाले सफलता को प्राप्त हुए, क्योंकि वो अग्नि की तरह पावन, राग द्वेष से रहित थे। इसलिए उनको सदियां बीतने पर भी सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाता है। उनको जन्म जन्मांतर स्मरण किया जाता रहेगा।

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जहां तक तुम कबीले की राज गद्दी की अभिलाषा में लिप्त, आत्मकेंद्रित, तरह-तरह के प्रपंचों वाले प्रतिशोधियों की बात करते हो, तो इनमें से कोई भी अग्नि परीक्षा देने का पात्रता नहीं रखता। ये इसलिए भी पात्र नहीं हैं, क्योंकि इसमें ये सफलता के परिणाम को प्राप्त नहीं हो सकते। अग्नि परीक्षा ने सफलता को महत्व दिया है।

फुंकनी यंत्र बोला, मैं यह नहीं कहता, इनका किसी तपिश से संबंध नहीं है। इनको हमेशा झुलसे हुए अंगारों की तलाश रहती है। ये चिंगारियों को तब तक हवा देते हैं,जब तक कि उसमें किसी को झुलसाने, तपाने या जलाने की ताकत नहीं आ जाती। इस अनिष्ट में झुलसने वाले विरोधी हो या फिर इनकी बैसाखियां ही क्यों न हों।

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खरगोश बोला, ये प्रतिशोधी कैसे हो सकते हैं, प्रतिशोध तो अतीत की घटनाओं से संबंध रखता है। कबीले की सियासत में अतीत से लेकर वर्तमान तक बहुत सारी घटनाएं हुई हैं। सियासत में दुश्मनी दोस्ती और दोस्ती दुश्मनी में बदलती रही है। यहां कल तक जो साथी थे, आज विरोधी हो गए हैं। जो विरोधी थे, वो साथी हो गए।

संबंधों में परस्पर बदलाव से बहुत सारी बातों के अर्थ भी बदल गए हैं। क्या प्रतिशोध की भावना स्नेह और सहयोग में नहीं बदली होगी।

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फुंकनी यंत्र ने कहा, घटनाएं सदियों पुरानी हों या फिर कुछ वर्ष पहले की, इनमें प्रतिशोध राख में छिपे अंगारे की तरह होता है। यहां राख को खाक समझने वाले अंगारे की तपिश का अंदाजा नहीं लगा पाते। यही नासमझी उनको झुलसाती है, सताती है। यह सियासत है, यहां राख और खाक में मौजूद हर तत्व को समझने की आवश्यकता है।

फुंकनी यंत्र ने कहा, क्या तुमने शकुनि का नाम सुना है।

खरगोश ने कहा, नहीं… मैं नहीं जानता उनको। क्या यह कबीले की सियासत में कोई नया नाम है।

फुंकनी यंत्र बोला, नहीं… इस नाम का तो नहीं पर इनके जैसे काम करने वालों की यहां कमी नहीं है। शकुनि का मतलब छल, प्रपंच, षड्यंत्र, प्रतिशोध है।

हिरन बोला, बातों में उलझाओ मत। साफ-साफ समझाओ।

फुंकनी यंत्र ने कहा, तुम जैसे भोले जीव सियासत में इसलिए भी नहीं आते, क्योंकि वो उलझ जाते हैं। थोड़ा दिमाग तो लगाना पड़ेगा। प्रतिशोध और सियासत में इसलिए भी कोई खास अंतर नहीं है, क्योंकि ये दोनों ही दिमाग से काम लेने पर जोर देते हैं। यहां क्रिया, प्रतिक्रिया या निर्णय… हृदय एवं भावना के वशीभूत नहीं होते। प्रतिशोध के लिए दुश्मनी आवश्यक नहीं है, यह दोस्त बनकर भी लिया जा सकता है।

प्रतिशोध के वशीभूत शकुनि अपनी बहन गांधारी के पुत्र दुर्योधन व कौरवों के साथ दिखता तो है, पर वास्तव में उनके साथ नहीं होता। वह तो हितैषी बनकर हस्तिनापुर को तबाही की ओर ले जाता है। यह सियासत है, जो प्रपंच और षड्यंत्र के बिना पूरी नहीं होती।

हिरन ने कहा, बड़े महाराज के ही गुट के देव इंद्र महाराज ने घोषणा कर दी कि यह आवश्यक नहीं कि विजय मिलने पर बड़े महाराज को ही गद्दी सौंपी जाए। क्या इसका अर्थ यह समझूं, कि कर्म करने वाले को फल का अधिकार नहीं होना चाहिए।

अपने गुट को विजय दिलाने के लिए दिनरात परिश्रम करने वाले, पहाड़ से मैदान, मैदान से पहाड़ दौड़ने वाले, देवताओं के दरबार में बार-बार मत्था टेकने वाले, गुणी महाराज और उनके वजीरों से हमेशा घिरे रहने का कष्ट झेलने वाले, विरोधियों को भयभीत करने वाले बड़े महाराज को क्या मीठे फल चखने का भी अधिकार नहीं है।

खरगोश बोला, उनके गुट के लिए फल मीठे होंगे या कड़ुवे या फीके… यह अभी नहीं कहा जा सकता। किसको क्या फल खिलाने हैं, प्रजा ही निर्णय लेगी। पर, बड़े महाराज का सम्मान तो बनता है।

फुंकनी यंत्र ने कहा, किसको सम्मान मिलना चाहिए, किसको राज गद्दी पर बैठाना चाहिए… इसकी सलाह हम क्यों दें। उनके गुट वाले जाने, वो ही बेहतर जानेंगे।

हिरन बोला, देव इंद्र महाराज के बोल पर बड़े महाराज मौन क्यों हैं।

फुंकनी यंत्र ने कहा, वो जानते हैं मौन में शक्ति होती है। शक्ति का प्रयोग समय पर ही करना चाहिए। वैसे उनका मौन बहुत कुछ कहता है। वो शक्ति बटोर रहे हैं, ताकि सही समय पर सही उत्तर दिया जा सके।

अभी तक के लिए इतना ही… कल मिलते हैं।

खऱगोश और हिरन भी काफी दिमागी कसरत कर चुके हैं। उनको थोड़ा आराम चाहिए, इसलिए वो अपने ठिकानों के लिए एक दूसरे से विदा लेते हैं।

*यह कहानी काल्पनिक है। इसका किसी से कोई संबंध नहीं है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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