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कबीले में चुनाव-12ः खुद के लिए मांगी मन्नतों को भूल रहे बड़े महाराज

मैदान की हरी घास चरने का आनंद उठा रहे खरगोश ने हिरन से कहा, बहुत दिन से हम सियासत पर नजर रख रहे हैं। इससे हमें क्या फायदा होगा।

हिरन बोला, बात तो तुम्हारी सही है दोस्त। हम तो दोस्त हैं, बस इतना जानते हैं कि तुम मेरे साथ हो और मैं तुम्हारे साथ हूं। हम तो सियासी बनने से रहे।

खरगोश ने कहा, बंद करते हैं यह सियासत की बातें। हमें क्या लेना बड़े महाराज से और बड़कू महाराज व गुरु महाराज से।

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तभी फुंकनी यंत्र बोला, तुम ये फालतू की बातें क्यों सोच रहे हो। हमें सभी को सियासी होना होगा, क्योंकि इसी से जीवन आगे बढ़ता है। यह बात ठीक है कि हमें अपने साथियों के साथ कोई चाल नहीं करनी चाहिए, पर गुटों में बंटे इंसानों में एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ है, उनको तो सियासत की चालों में ही आनंद आता है। तुम्हें एक मजेदार बात बताता हूं।

हिरन ने कहा, जल्दी बताओ, मैं तो कब से कुछ नया सुनने के लिए आतुर था।

खरगोश बोला, हम ये कहां फंस गए। जिनकी हम बातें करते हैं, वो एक दूसरे की चालों में फंसे हों या न हों, पर हमें चक्करघिन्नी बनने से कोई नहीं रोक सकता। बताओ, फुंकनी यंत्र जी।

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फुंकनी यंत्र बोला, कबीले में ही देख लो, इंसान तो देवताओं के साथ ही सियासत करने लगे हैं। बड़कू महाराज, गुरु महाराज सभी खेल कर रहे हैं। अभी तक देवता ही उनका उद्धार करते आते हैं। हमारे कबीले के चुनाव में ही उनको देवता का आसरा है।

प्रजा तो देवता को पूजती है, उनको मानती है। ये सियासी लोग प्रजा को बताने की पूरी कोशिश करते हैं कि हम देवता के सबसे बड़े पुजारी हैं।

अब बड़े महाराज की बात सुनो, एक दिन कहते हैं किसी और को राज गद्दी दिलाना चाहता हूं। मैं उनको राजा बनाना चाहता हूं, जो वर्षों से अपने अधिकारों से वंचित रहे हैं।

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वो देवताओं से तरह-तरह के आशीर्वाद मांग रहे हैं। वो देवता के दरबार में जाते हैं और क्षमा मांगते हैं अपने उन पुराने कार्यों के लिए जो प्रजा हित में नहीं किए गए। फिर उनसे कहते हैं, मुझे राज गद्दी पर विराजमान होने का आशीर्वाद दो। वो देवताओं के समक्ष जा रहे हैं।

बड़े महाराज जिस तरह प्रजा से किए वादों को भूल जाते हैं, उसी तरह देवता से मांगे आशीर्वाद को भी भूल गए। वो एक दिन फिर देवता के दरबार में जाते हैं और उनसे कहते हैं, मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहता। एक दिन फिर बहुत सारी प्रतिज्ञा लेते हैं।

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वो चाहते हैं कि प्रजा उनकी ओर देखे और कहे कि चुनाव के बिना ही हम आपको अपना राजा मानते हैं। आओ, आप गद्दी पर विराजमान होकर अपनी प्रतिज्ञाएं पूरी करो। जब तक आप अपनी प्रतिज्ञाएं पूरी नहीं करते, प्रजा आपको राजा की गद्दी पर ही बैठाकर रखेगी।

खरगोश बोला, ऐसा करके तो बड़े महाराज हम सभी, ओह… भूल गया, मेरा मतलब है कि प्रजा की सहानुभूति लेना चाहते हैं। मैंने सही कहा न… सहानुभूति शब्द सही है न।

हिरन ने पूछा, वाह… दोस्त सहानुभूति शब्द तो मैं पहली बार सुन रहा हूं।

फुंकनी यंत्र ने कहा, सियासत की बातें कर रहे हो, इस शब्द का तो सबसे पहले ज्ञान होना चाहिए। यहां सहानुभूति, क्षमा, वादा, घोषणा, मुद्दा, धन, यशगान, महिमा मंडन, अधिकारों का दुरुपयोग, सुरक्षा, लालच, भ्रष्ट आचरण, सभा, संवेदना, आंखें फेरना, भूलना-भुलाना, ध्यान नहीं है, क्रोध, हिंसा, दुर्व्यवहार, गिरगिट, घड़ियाल, धोखा, धर्म, जाति, दल बदलना, बागी, बगावत, जांच पर जांच, दोस्ती, दुश्मनी, पक्ष- विपक्ष, तोड़ना, गुटबाजी, अंतर्कलह, भितरघात, भ्रमण, हवाई दौरा, मौन, शांति, दंगा, आंखें पलटना, आंखें दिखाना, भय दिखाना, धमकाना, जुबानी जंग, प्रेम, सौहार्द्र, भाईचारा, इच्छा, अनिच्छा, महत्वकांक्षा, अतिमहत्वकांक्षा, सपने, हित, अहित जैसे बहुत सारे शब्द हैं, जिनका यहां मतलब है। ये सब किसलिए केवल प्रजा को दिखाने, बताने और जताने के लिए हैं।

खरगोश ने कहा, इतने भारी भरकम शब्द हैं सियासत में।

फुंकनी यंत्र ने कहा, ये शब्द दूसरों के सहारे लाभ हासिल करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। सभी के लिए इन शब्दों के मतलब अलग-अलग हैं।

खरगोश ने कहा हिरन भाई, अब कल मिलते हैं, किसी और सियासी बात के साथ।

हिरन ने कहा, ठीक है। यह कहते ही हिरन ने अपने ठिकाने के लिए लंबी छलांगे भर लीं।

* यह काल्पनिक कहानी है, इसका किसी से कोई संबंध नहीं है।

 

 

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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