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मिर्च का स्वाद बनाए रखने के लिए भूटान का व्यावसायिक सफर

2016 में, जब खाद्य सुरक्षा के मुद्दे उठे और भूटान सरकार (Government of Bhutan) ने पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं से मिर्च के आयात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की, तो देश चकित रह गया। प्राचीन काल से भूटान के लोगों के आहार (Bhutanese diet) में मिर्च का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता रहा है, लेकिन अब तक, भूटान आयात पर बहुत अधिक निर्भर था। भूटान के अधिकतर कृषक समुदाय मिर्च उगाने के लिए तैयार नहीं थे, जलवायु और स्थलाकृति (Topography) ने अतिरिक्त चुनौतियों का सामना कराया।

फिर भी, करमालिंग (Karmaling) में किसानों का एक समूह, जो सबसे दूरस्थ गेवोग ( भूटान में गांवों का समूह) में से एक है, ने यह जानते हुए कि मिर्च उगाना न केवल उनकी खाना पकाने की परंपराओं के लिए अच्छा होगा, बल्कि इससे अतिरिक्त आय भी होगी और बाजार में इसकी कमी भी दूर होगी, इस दिशा में काम शुरू किया।

करमालिंग, भूटान के दक्षिण-पश्चिमी डगाना ज़ोंगखग (जिला) में, केवल उन कृषि की सड़कों से जुड़ा हुआ है, जिनका उपयोग बारिश और भूस्खलन के कारण गर्मियों के दौरान नहीं किया जा सकता।

गेवोग समुद्र तल से 120 से 570 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां उच्च तापमान और सापेक्ष आर्द्रता मिर्च के पौधों और किसानों दोनों के लिए कठिन हैं।

भूटान के कृषि विभाग (Bhutanese Department of Agriculture) के Senior Extension Supervisor सांगे दोरजी (Sangay Dorji) याद करते हैं, “हम कई असफल प्रयासों के बाद ही सफलता प्राप्त करने में सक्षम थे, जिसने हर बार हमें अपने तरीकों को संशोधित करने के लिए प्रेरित किया।”

करमालिंग के ओमचू गांव (Omchu village in Karmaling) के एक किसान सांचा बहादुर सुब्बा (Sancha Bahadur Subba) याद करते हैं, “हमें उम्मीद नहीं थी कि यहां मिर्च अच्छी तरह से बढ़ेगी, क्योंकि हमारे गांव में मिर्च उगाने का कोई इतिहास नहीं था।” “अब मैं बहुत खुश हूं क्योंकि हम अतिरिक्त उपज दूसरे ज़ोंगखगों (Dzongkhags) को भेज रहे हैं। दरअसल, हम मिर्च से अच्छी कमाई कर रहे हैं।”

नई और अप्रत्याशित स्थिति से आशंकित, किसान शुरू में अपने प्रयासों को जोखिम में नहीं डालना चाहते थे। पहले तो, Government extension officer केवल छह किसानों को कार्य के लिए मना पा रहे थे।

बहरहाल, खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादकता परियोजना (FSAPP- Food Security and Agriculture Productivity Project) नामक एफएओ समर्थित परियोजना (FAO-supported project) के तहत किसान मिर्च के बीजों से खेती करने लगे।

उन्हें जल्द ही, अपनी पहली बाधा का सामना करना पड़ा। क्षेत्र के उच्च तापमान और आर्द्रता के कारण नर्सरी में मिर्च के पौधे मरने लगे। तैयार ग्रीनहाउस में अतिरिक्त गर्मी मिर्च की खेती के लिए अनुपयुक्त थी।

समस्याओं के समाधान के लिए किसानों ने पोटिंग (potting) का दूसरा तरीका अपनाया। “इस नए परीक्षण में, हमने बेहतर और अच्छी तरह से तैयार पॉटिंग माध्यम वाले कपों का इस्तेमाल किया,” सांगे ने कहा।

“प्रत्येक पॉटेड कप को फिर एक बीज के साथ लगाया जाता है।” कुक्कुट या अन्य खतरों से बचाने के लिए पॉटेड रोपे को गलियारे या छत वाले शेड में रखा गया था।

अंकुर तैयार करने की इस तकनीक से, लगभग सभी पौधे बच गए, और इस विधि को कम जगह की आवश्यकता थी और इसने सीधे मिट्टी में बीज बोने की तुलना में बेहतर सुरक्षा प्रदान की।

इस सफलता से उत्साहित होकर, किसानों ने फसल की पैदावार में सुधार के लिए FSAPP द्वारा प्रदान की गई अन्य टिकाऊ तकनीकों का उपयोग करना शुरू कर दिया, जिसमें ड्रिप सिंचाई की सुविधा(drip irrigation facilities) और पौधों के लिए सुरक्षात्मक आवरण शामिल हैं।

एफएओ से एफएसएपीपी को तकनीकी सहायता प्रदान करने के साथ, वैश्विक कृषि और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम( Global Agriculture and Food Security Program) से वित्त पोषण प्रदान किया और भूटान के कृषि और वन मंत्रालय (Bhutan’s Ministry of Agriculture and Forests) ने विश्व बैंक के मार्गदर्शन में परियोजना को लागू किया।

एफएसएपीपी ने चार प्रमुख सिंचाई चैनलों को भी वित्त पोषित किया है, ताकि गांवों को फसल उगाने के लिए पर्याप्त पानी मिले। कृषि में सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रदान करना, पोषण पर क्षमताओं को मजबूत करना और किसानों को अपने उत्पादों को बेचने के लिए स्कूलों या बाजारों से जोड़ना, ये सभी मिर्च उत्पादन के लिए भी बेहद उपयोगी साबित हुए।

मल्चिंग (Mulching) का अभ्यास करने और ड्रिप सिंचाई प्रणाली (Drip Irrigation Systems) को नियोजित करने के अलावा,करमालिंग किसानों ने एक अन्य नवीन तकनीक स्थानीय रूप से विकसित मल्च पंचिंग मशीनों (Mulch Punching Machines) का भी उपयोग किया।

पंचिंग टूल (The punching tool) मिट्टी की सतह पर छोटे-छोटे छेद करता है, जो खाद से भर जाते हैं। छेदों में प्रत्यारोपित होने के बाद युवा अंकुर, खुद को बेहतर ढंग से स्थापित करने में सक्षम होते हैं।

सांगे बताते हैं, “हमने पाया कि इस तरह की तकनीक ने पोषक तत्वों की आपूर्ति सुनिश्चित की और युवा अंकुरों के लिए पानी के भंडार के रूप में काम किया।”

करमालिंग में पहला व्यावसायिक मिर्च उत्पादन (Commercial chilli production in Karmaling) 2018 में 14 मीट्रिक टन के शुद्ध उत्पादन के साथ शुरू हुआ। जैसे-जैसे कमोडिटी की राष्ट्रीय मांग बढ़ी, 2020 में उत्पादन लगातार बढ़कर 28 मीट्रिक टन हो गया। 2020 के अंत तक, अकेले करमालिंग से मिर्च की खेती देश की राजधानी थिम्पू सहित 6 जोंगखग* में बाजारों में बेची गई।

“मुझे मिर्च की खेती का कोई अनुभव नहीं था। हम परियोजना के लिए आभारी हैं, क्योंकि मेरे सभी घरेलू खर्च मिर्च की बिक्री से पूरे होते है, “सेंचुमथांग गांव की महिला मिर्च उत्पादकों में से एक गंगा माया मोंगर उत्साहित होते हुए कहती हैं।

“मैंने इस साल केवल मिर्च की बिक्री के माध्यम से लगभग 140,000 बीटीएन (यूएसडी 2000) कमाया। यह हमारे लिए बहुत बड़ी आय है। मैं अब आने वाले सीजन में अपनी खेती को 0.70 एकड़ तक बढ़ा रहा हूं।”

वाणिज्यिक मिर्च की खेती ने अंततः गेवोग में 70 प्रतिशत परिवारों की आय में सुधार किया है। गेवोग के कुल 291 घरों में से 198 मिर्च उत्पादक हैं। इनमें 22 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। Karmaling Gewog अब देश में मिर्च के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं में से एक के रूप में गर्व से खड़ा है।

किसानों ने अपने संघर्ष के शुरुआती दिनों में कभी नहीं सोचा था कि मिर्च का उत्पादन इस हद तक बढ़ जाएगा। सांगे ने निष्कर्ष निकाला, “हमें यह महसूस करने में बहुत खुशी होती है कि हमारी कड़ी मेहनत का भुगतान हुआ है और हमने न केवल अपने समुदाय की आजीविका में सुधार करने के लिए बल्कि हमारे देश को थोड़ा और आत्मनिर्भर बनाने में भी योगदान दिया है।”

*ज़ोंगखग भूटान के प्राथमिक उपखंड हैं। इनके पास भूटान के संविधान के तहत कई शक्तियां और अधिकार हैं, जैसे वाणिज्य को विनियमित करना, चुनाव कराना और स्थानीय सरकारें बनाना।
# हिन्दी में अनुवादित इस लेख को मूल रूप से यहां प्रकाशित किया गया है।
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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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