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यूपी में चुनावः उत्तराखंड में मसूरी सीट पर सबसे ज्यादा वोटर और राजनीति की बड़ी शख्सियतें

1957 में अस्तित्व में आई ऋषिकेश तक फैली मसूरी सीट के पहले विधायक बने गुलाब सिंह

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

देहरादून। मसूरी एक्सप्रेस दिल्ली से चलती है पर मसूरी नहीं पहुंचती, क्योंकि देहरादून ही आखिरी रेलवे स्टेशन है और इससे आगे पटरियां नहीं बिछी हैं। पर मसूरी विधानसभा ने जिन शख्सियतों को अपना प्रतिनिधि बनाया, उन्होंने देश और प्रदेश की राजनीति में नाम रोशन किया। शांति प्रपन्न शर्मा ने चकराता, मसूरी और हरिद्वार से चुनाव लड़ा और हर बार विजयी हुए।

मसूरी विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के समय में 1957 के चुनाव में अस्तित्व में आई। उत्तराखंड राज्य गठन से पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री ब्रह्मदत्त, उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे शांति प्रपन्न शर्मा व गुलाब सिंह के साथ ही राज्य निर्माण आंदोलन से जुड़े रणजीत सिंह वर्मा, किशोरी लाल सकलानी, राजेंद्र शाह मसूरी का प्रतिनिधित्व किया था। तब मसूरी देहरादून जिले के ऋषिकेश से लेकर मसूरी तक फैली थी। वर्ष 1993 यानी लगभग 26 साल पहले यहां मतदाताओं की संख्या 2,98,081 थी, जो कि उस समय मौजूदा उत्तराखंड की किसी भी विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा थी। यह मसूरी सीट पर मतदाताओं की कुल संख्या 1,25,342 से दोगुना ज्यादा है।

जिस सीट पर भी चुनाव लड़े, वहीं जीते शांति प्रपन्न शर्मा

1974 में मसूरी सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी शांति प्रपन्न शर्मा ने रिकार्ड मतों से जीत हासिल करके भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के कुशल पाल सिंह को हराया। उनको 33,854 वोट मिले, जबकि बीकेडी प्रत्याशी को 6295 मत ही मिल पाए। शांति प्रपन्न शर्मा उत्तर प्रदेश विधानसभा के 1951-52 के पहले चुनाव में चकराता कम वेस्टर्न दून (नार्थ) सीट पर विधायक निर्वाचित हुए थे। उन्होंने निर्दलीय गुलाब सिंह को हराया था। बाद में गुलाब सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए थे और मसूरी सीट पर लगातार जीत हासिल की।

शान्ति प्रपन्न शर्मा हरिद्वार सीट पर 1957, 1962, 1969 में लगातार तीन बार निर्वाचित हुए। उत्तर प्रदेश सरकार में परिवहन, उद्योग व ऊर्जा मंत्री पदों पर रहे और ऋषिकेश में आईडीपीएल की स्थापना का सुझाव तत्कालीन केन्द्र सरकार को उन्होंने ही दिया था।

मसूरी में 1977 का सीधी टक्कर वाला रोमांचक चुनाव 

1977 में मसूरी सीट पर वोटर्स की संख्या 1,00,754 थी और सीधी टक्कर में जनता पार्टी के रणजीत सिंह वर्मा औऱ कांग्रेस के किशोरी लाल सकलानी चुनाव मैदान में थे। सकलानी मात्र 42 वोटों से चुनाव हार गए। निर्वाचित रणजीत सिंह वर्मा को 25,399 और किशोरी लाल सकलानी को 25,357 वोट मिले थे। उस वर्ष जनता पार्टी की लहर थी, उत्तराखंड में 22 में से 18 सीटे जनता पार्टी के उम्मीदवारों ने जीती थीं। हल्द्वानी, टिहरी, काशीपुर, देवप्रयाग सीट पर लहर का असर नहीं हो सका। इसके बाद, एक बार फिर 1989 में मसूरी सीट पर रणजीत सिंह वर्मा ने किशोरीलाल सकलानी को हराया।

ब्रह्मदत्त पहले यूपी में मंत्री, फिर सांसद बनकर केंद्र सरकार में मंत्री बने

1980 में मसूरी सीट पर कांग्रेस (आई) के उम्मीदवार ब्रह्मदत्त ने जनता पार्टी (सेक्युलर) चौधरी चरण सिंह के उम्मीदवार कुशल पाल सिंह को पराजित किया।  भाजपा के रामानंद बधानी तीसरे स्थान पर रहे। इस चुनाव में ब्रह्मदत्त को कुल मतदान के 57.14 फीसदी वोट मिले थे। ब्रह्म दत्त ने 1980-84 में यूपी में योजना, बिजली और वित्त मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद आठवीं लोकसभा 1984-89 के लिए टिहरी गढ़वाल सीट से निर्वाचित होकर 1986 से 1989 तक केंद्र सरकार में केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और वाणिज्य और वित्त राज्य मंत्री रहे। ब्रह्मदत्त टिहरी लोकसभा के पहले सांसद थे, जिनको केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली। ब्रह्मदत्त विधान परिषद में भारतीय लोकदल से 1975 में जनवरी से फरवरी तक, मार्च 1976 से फरवरी 1977 तक तथा कांग्रेस आई से 1977 से 1980 तक नेता विरोधी दल रहे। कांग्रेस आई नेता ब्रह्मदत्त ने विधान परिषद में जून 1980 से से अगस्त 1982 तक नेता सदन की जिम्मेदारी निभाई।

मसूरी के सबसे पहले विधायक गुलाब सिंह

यूपी विधानसभा 1957 के चुनाव में मसूरी विधानसभा सीट पर सबसे पहले विधायक गुलाब सिंह निर्दलीय निर्वाचित हुए। उन्होंने कांग्रेस के सूरत सिंह को पराजित किया था। इसी सीट पर 1962 में गुलाब सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार बारू दत्त को हराकर जीत हासिल की। उनको 21,105 यानी की कुल मतदान के 53.97 फीसदी मत हासिल हुए थे। 1967 में गुलाब सिंह तीसरी बार विधायक चुने गए, इस बार उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के डी. दत्त को हराया। 1969 में गुलाब सिंह को कांग्रेस के टिकट पर चौथी बार मसूरी का प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्राप्त हुआ। इस बार उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के ब्रह्मदत्त को हराया।

1974 में गुलाब सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर मसूरी विधानसभा सीट की बजाय चकराता से चुनाव लड़ा और वहां निर्दलीय शूरवीर सिंह को पराजित किया। उनको 27,088 वोट हासिल हुए और निकटतम निर्दलीय प्रतिद्वंद्वी शूरवीर सिंह को 24,436 वोट मिले थे। जबकि, 1977 में चकराता सीट पर जनता पार्टी की लहर में गुलाब सिंह जनता पार्टी के उम्मीदवार शूरवीर सिंह से चुनाव हार गए। 1980 में चकराता सीट पर गुलाब सिंह ने शूरवीर सिंह को हराया। शूरवीर सिंह जनता पार्टी (सेक्युलर) चौधरी चरण सिंह के उम्मीदवार थे।

गुलाब सिंह चकराता में निर्विरोध निर्वाचित

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति लहर थी। 1985 में चकराता सीट पर गुलाब सिंह निर्विरोध निर्वाचित हुए। हालांकि उनके खिलाफ पूर्व विधायक शूरवीर सिंह ने नामांकन कराया था, लेकिन बाद में उन्होंने नाम वापस ले लिया था। 1989 में चकराता में कांग्रेस के गुलाब सिंह ने जनता दल के शूरवीर सिंह को पराजित किया। गुलाब सिंह उत्तर प्रदेश में 1971 से 1989 तक लोक निर्माण विभाग, वन, पर्यटन, पंचायतीराज, खेल, पर्वतीय विकास आदि विभागों के राज्यमंत्री रहे। गुलाब सिंह चार बार चकराता से और चार बार मसूरी सीट पर विजयी हुए।

1985 में ही, मसूरी सीट पर कांग्रेस के टिकट पर किशोरी लाल सकलानी ने लोकदल के विनोद बड़थ्वाल को हराया। किशोरी लाल सकलानी को कुल मतदान के 67.46 फीसदी वोट मिले थे। हालांकि, उत्तराखंड में छह सीटों पर कांग्रेस की लहर का असर नहीं पड़ा। लक्सर, रुड़की और कर्णप्रयाग सीटों से लोकदल के प्रत्याशी क्रमशः नरेंद्र सिंह, काजी मोहिउद्दीन व शिवानंद नौटियाल तथा डीडीहाट से निर्दलीय काशी सिंह व पिथौरागढ़ सीट पर जनता पार्टी के कमल कृष्ण पांडेय ने जीत हासिल की थी।

भाजपा के राजेंद्र शाह मसूरी से तीन बार विधायक 

1991 में मसूरी सीट पर भाजपा की एंट्री हुई और राजेंद्र सिंह शाह ने कांग्रेस के किशोरी लाल सकलानी को हराया। इस चुनाव में इस सीट पर 18 प्रत्याशी जोर आजमा रहे थे। जनता दल के टिकट पर लड़ रहे रंजीत सिंह तीसरे स्थान पर रहे। उधर, चकराता में जनता दल के मुन्ना चौहान ने कांग्रेस प्रत्याशी प्रीतम सिंह को हराया।

1993 में भाजपा के राजेंद्र सिंह एक बार फिर विधायक निर्वाचित हुए। कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री ब्रह्मदत्त हार गए। सपा नेता विनोद बड़थ्वाल तीसरे स्थान पर रहे। प्रत्याशियों की संख्या 20 थी। उधर, चकराता सीट पर कांग्रेस के प्रीतम सिंह ने जनता दल के मुन्ना चौहान को मात्र 500 वोटों के अंतर से हरा दिया। प्रीतम को 36,503 और मुन्ना चौहान को 36,003 वोट मिले थे।

1996 में भाजपा के राजेंद्र सिंह तीसरी बार विधायक बने। उन्होंने आल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) के प्रत्याशी नवप्रभात को हराया। राजेंद्र सिंह को 75,253 वोट मिले थे, जो कि कुल मतदान का 49.38 फीसदी था। वहीं निकटतम प्रतिद्वंद्वी नवप्रभात को 36,263 वोट मिले थे। उस समय मसूरी सीट पर 2,98,081 वोटर थे, जिनमें से 51.82 फीसदी मतदान हुआ था।

यूपी के समय में पांच गुना वोटर थे मसूरी सीट पर

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद मसूरी विधानसभा सीट का नये सिरे से परिसीमन हुआ और 2002 के चुनाव में यहां वोटर की संख्या 63,120 हो गई। मसूरी सीट पर 14,384 वोट पाकर कांग्रेस के जोत सिंह विधायक बने। 2007 में कांग्रेस के जोत सिंह गुनसोला, 2012 में भाजपा के गणेश जोशी व 2017 में फिर गणेश जोशी मसूरी विधायक निर्वाचित हुए। जोशी उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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