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VIDEO: उत्तराखंड की राजनीति में महिलाएं कम क्यों?

  • राजेश पांडेय

देहरादून। उत्तराखंड में 2022 के विधान सभा चुनाव की तैयारियों में जुटे राजनीतिक दलों के मुद्दों में शामिल महिलाएं, उनकी रणनीति से बाहर क्यों हैं। दलों की जीत के समीकरणों का आधार जाति, धर्म, व्यवसाय, पहाड़-मैदान में तो बंटा है, पर महिलाओं को लेकर नहीं, जबकि राज्य में आधी आबादी ही नहीं लगभग आधी संख्या महिला मतदाताओं की है।

उत्तराखंड में बारी-बारी से सत्ता में रहे राजनीतिक दलों ने महिलाओं के हितों की पैरवी तो की, पर उनको राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने में हमेशा कंजूसी की।

पहले बात करते हैं, उत्तराखंड में महिलाओं की स्थिति की। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में महिलाओं की आबादी 49.48 लाख है, जबकि पुरुषों की संख्या 52.38 लाख है।

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राज्य की 71 फीसदी महिला आबादी गांवों में निवास करती है। राज्य की 65 फीसदी आबादी की आजीविका कृषि है। राज्य में 64 फीसदी महिलाएं अपने खेतों में कृषि करती हैं, वहीं 8.84 फीसदी महिलाएं दूसरों के खेतों में परिश्रम करती हैं।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने खेतों में परिश्रम करने वाली महिलाओं को श्रम का मूल्य नहीं मिल पाता। न तो उनका खेतों पर स्वामित्व है और न ही अपने ही खेतों में मेहनत करने का कोई श्रम लेती हैं। जबकि अधिकतर महिलाएं, उन कृषि क्षेत्रों में कार्य करती हैं, जो वर्षा जल पर आधारित हैं।

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जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर महिलाओं पर ही पड़ता है। जलस्रोत सूखने, कृषि उत्पादन प्रभावित होने, चारा नहीं मिलने, फल-सब्जियों की खेती प्रभावित होने से महिलाएं सबसे ज्यादा दिक्कत में आती हैं। समय पर बारिश नहीं होने से खेती पर प्रतिकूल असर भी महिलाओं के लिए किसी आपदा से कम नहीं होता। वहीं, भूस्खलन, बाढ़, सूखे से भी कृषि भूमि प्रभावित होती है।

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पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के साधन नहीं होने की वजह से पुरुष अपने घर-गांवों से पलायन करते हैं, तो घरों में रह रहीं महिलाओं पर परिवार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है। वो भी उस स्थिति में जब उनके पास न तो पर्याप्त अधिकार होते हैं और न ही वित्तीय स्वतंत्रता।

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यूएन एजेंसी खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की भूमि, टेक्नोलॉजी, वित्तीय सेवाओं तक पहुंच हो जाए तो कृषि उपज में 20 से 30 फीसदी तक बढोतरी हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व में कुल खाद्य उत्पादन के 50 फीसदी में महिलाओं का योगदान है। इससे कृषि में महिलाओं की शक्ति का पता चलता है। हमें इस तथ्य को उत्तराखंड के संदर्भ में भी समझना चाहिए।

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उत्तराखंड में असंगठित क्षेत्रों में काम कर रही महिलाओं को लेकर अभी तक कोई बेहतर कदम नहीं उठाए जा सके। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा को लेकर महिलाओं से जुड़ीं खबरें मीडिया में सुर्खियां बनती रही हैं।

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हालांकि, राज्य में महिलाओं के हितों में फैसले होते रहे हैं। पर, राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बिना उनके मुद्दों पर तेजी से कार्य होने की दरकार हमेशा बनी रहेगी।

अब हम बात करते हैं, महिलाओं की राजनीतिक में भागीदारी एवं प्रतिनिधित्व की। उत्तराखंड में 2017 के विधान सभा चुनाव के आंकड़ों से ही उनकी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। चुनाव आयोग के आंकड़ों पर गौर करें तो निम्न तथ्य सामने आते हैं।

उत्तराखंड में 2017 के विधानसभा चुनाव में-

70 सीटों में से मात्र 41 पर ही महिलाएं चुनाव मैदान में उतरीं।

  • कुल 62 महिलाओं ने चुनाव लड़ा, जिनमें से रायपुर विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक मात्र चार महिला उम्मीदवार थीं।
  • भाजपा ने पांच, कांग्रेस ने आठ, बसपा ने तीन, सपा ने पांच सीटों पर महिलाओं को उम्मीदवार बनाया। अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में 30 महिलाओं ने निर्दलीय चुनाव लड़ा।
  • चुनाव लड़ने वालीं 47 महिलाओं की उनके पक्ष में बहुत कम मतदान होने पर जमानत जब्त हो गई।
  • चुनाव में पांच महिलाओं ने विजय हासिल की, जिनमें भाजपा की तीन, कांग्रेस की दो प्रत्याशी शामिल हैं।

अब हम बात करते हैं, राज्य में महिला मतदाताओं की संख्या की। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कुल मतदाताओं की संख्या की लगभग 47 फीसदी (36,02,801) महिलाएं थीं, जबकि पुरुष मतदाता लगभग 53 फीसदी (39,90,044) थे।

इसके साथ उत्तराखंड में महिला मतदाताओं को लेकर एक और रोचक जानकारी है, जिसके अनुसार 2017 में देहरादून जिला में धर्मपुर सीट पर महिला मतदाताओं की संख्या राज्य की किसी अन्य सीट के मुकाबले सबसे ज्यादा 83,371 थी।

इसके बाद देहरादून में रायपुर सीट पर 77,042 तथा तीसरे नंबर में ऊधमसिंह नगर जिला की रुद्रपुर सीट पर 73,270 महिला वोटर थीं। वहीं सबसे कम महिला मतदाता उत्तरकाशी की पुरोला सीट पर थीं, जिनकी संख्या मात्र 32,256 दर्ज है।

साथ ही, राज्य में सात ऐसी विधानसभा क्षेत्र हैं, जहां 2017 में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा थी। ये सभी सीटें पर्वतीय जिलों में हैं।

इनमें केदारनाथ, पौड़ी, चौबट्टिया खाल, धारचूला, डीडीहाट, पिथौरागढ़, द्वाराहाट सीटें शामिल हैं। इनमें भी द्वाराहाट सीट पर पुरुष और महिला मतदाताओं की संख्या में सबसे अधिक अंतर 2726 पाया गया, इसके बाद डीडीहाट सीट पर यह अंतर 2621 रहा।

  • लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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