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Video- बातें स्वरोजगार की: मुर्गी पालन में कमाल कर दिया बीटेक पास उत्तराखंड के इस युवा ने

Rajesh Pandey
Last updated: November 16, 2021 1:36 pm
Rajesh Pandey
4 years ago
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  • राजेश पांडेय

उत्तराखंड के अधिकांश क्षेत्र में कृषि जोत छोटी व बिखरी होने के कारण खेतीबाड़ी बहुत चुनौतीपूर्ण है। आजीविका का प्रमुख विकल्प कृषि है, इसलिए कम जमीन पर खेती और उससे अधिक लाभ के विकल्पों पर विचार ही नहीं बल्कि पूरी मशक्कत के काम करने का समय है। यह चिंता का विषय है, क्योंकि हम अपने आसपास कृषि भूमि को आवासीय प्लाटिंग में बदलते देख रहे हैं।

यह भी पढ़ें- किसान की कहानीः खेती में लागत का हिसाब लगाया तो बैल बेचने पड़ जाएंगे !

Contents
उत्तराखंड के अधिकांश क्षेत्र में कृषि जोत छोटी व बिखरी होने के कारण खेतीबाड़ी बहुत चुनौतीपूर्ण है। आजीविका का प्रमुख विकल्प कृषि है, इसलिए कम जमीन पर खेती और उससे अधिक लाभ के विकल्पों पर विचार ही नहीं बल्कि पूरी मशक्कत के काम करने का समय है। यह चिंता का विषय है, क्योंकि हम अपने आसपास कृषि भूमि को आवासीय प्लाटिंग में बदलते देख रहे हैं।राज्य के ग्रामीण इलाकों की 70 फीसदी आबादी कृषि के साथ ही अन्य विकल्पों जैसे- उद्यानीकरण, दुग्ध उत्पादन, जड़ी बूटी उत्पादन, मत्स्य पालन, पशुपालन, जैविक कृषि, सगंध पादप, मौन पालन, सब्जी उत्पादन तथा इससे संबंधित अन्य लघु उद्यमों पर निर्भर करती है, ऐसा आर्थिक सर्वेक्षण की 2020-21 की रिपोर्ट में कहा गया है।इसमें एक रैपिड सर्वे का जिक्र करते हुए बताया गया है कि कोविड-19 के दौरान 25 फीसदी व्यक्तियों ने कृषि एवं सहवर्गीय क्षेत्रों में अपनी सहमति जताई है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रवासी कामगार, जो सामान्यतः शहरी क्षेत्रों में होटल, रेस्टोरेंट एवं आतिथ्य (Hospitality) क्षेत्र में कार्य करते थे, इस क्षेत्र में कार्य करने को तैयार हैं।हम उन किस्सों को जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं, जो चुनौतियों के दौर में उम्मीद दिखाते हैं। समन्वित कृषि का एक शानदार उदाहरण, देहरादून – ऋषिकेश रोड पर लिस्टराबाद गांव में है। यहां कृषक राजेंद्र सिंह सजवाण ने परंपरागत कृषि के साथ पोल्ट्री फार्म (देशी एवं बॉयलर दोनों), मछली पालन, बत्तख पालन, गाय पालन, वर्मी कम्पोस्ट, सब्जी एवं फल उत्पादन, बायो गैस प्लांट को जोड़ा है।रविवार (14 नवंबर,2021) की दोपहर रानीपोखरी-ऋषिकेश मुख्य मार्ग से करीब दो से तीन किमी. चलने के बाद 72 वर्षीय किसान राजेंद्र सिंह सजवाण की समन्वित कृषि को जानने का मौका मिला। पोल्ट्री फार्म में बॉयलर और देशी के लिए अलग-अलग हॉल बने हैं।बॉयलर का पूरा लॉट बिक्री होने के कारण उनके हॉल की सफाई चल रही थी। मुझे बॉयलर देखने को नहीं मिले, पर बताया गया कि अगले माह दिसंबर के पहले हफ्ते में 2000 चूजे लाए जाएंगे। इससे पहले इस हॉल को साफ किया जा रहा है। हॉल को कीटाणुओं एवं रोगाणुओं से मुक्त करने के लिए दवा का छिड़काव किया जाएगा।मैकेनिकल में बीटेक अमित भंडारी अपने नाना कृषक राजेंद्र सिंह सजवाण को समन्वित खेती में सहयोग करते हैं। युवा अमित बताते हैं कि बॉयलर 45 दिन में बिक्री के लिए तैयार हो जाता है। पहले लॉट से हॉल के फर्श पर बीट की मोटी परत जमा हो गई है, जिसे इकट्ठा करके खेतों में डाला जाएगा। खेती के लिए यह शानदार जैविक खाद है। इससे कृषि उत्पादन पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। वैसे हम फ्रेश बीट को मछलियों के तालाब में डालते हैं।बताते हैं, देशी मुर्गी पालन करीब दो माह पहले शुरू किया था। ऋषिकेश पशुलोक से 220 चूजे खरीदे थे, जिनमें से 30 कड़कनाथ हैं। ये लगभग पांच माह में बिक्री के लिए तैयार हो जाएंगे। करीब चार माह में अंडे भी मिलने शुरू हो जाएंगे। तीन अंडों की एक ट्रे लगभग छह रुपये में बिक जाती है। हमने 30 रुपये के हिसाब से चूजे खरीदे थे। कड़कनाथ का रेट 35 रुपये प्रति चूजा है।अमित के अनुसार, इनकी देखरेख बड़ी चुनौती है। समय पर दाना-पानी और वैक्सीनेशन, दवाइयां अत्यंत आवश्यक हैं। इनको रोग से बचाना पहली प्राथमिकता होती है। इनके हॉल को गर्म रखने का प्रबंध किया गया है। पानी के लिए लिए पाइप लाइन को बर्तनों से जोड़ा गया है। इनके मूवमेंट को बनाए रखने की प्रॉपर व्यवस्था की गई है। आपको किसी भी दिक्कत में विशेषज्ञों के संपर्क में रहना चाहिए।देशी मुर्गियों की ग्रोथ में समय लगता है, जबकि बॉयलर तेजी से बढ़ता है। इसका मीट एवं अंडा हाई प्रोटीन एवं स्वास्थ्य के लिए बेहतर होता है। कड़कनाथ की काफी मांग होती है।अमित का कहना है कि पूरी सावधानियों एवं आवश्यकताओं को पूरा करते हुए पोल्ट्री फॉर्म का संचालन करते हैं तो यह लाभकारी है। आपको इन्फ्रा तो एक बार ही स्थापित करना है। हालांकि इनका आहार महंगा है, पर उस हिसाब से बिक्री भी लाभ का सौदा है।मार्केटिंग के संबंध में उनका कहना है, हमने जिनसे चूजे खरीदे थे, उन्होंने ही हमें मुर्गियां खरीदने वालों के कान्टेक्ट उपलब्ध कराए। आसपास से भी खरीदार आते हैं। मार्केटिंग कोई मुश्किल नहीं है। देशी की डिमांड अच्छी होती है। अभी हमने शुरुआत की है, पर इससे लाभ मिलने की उम्मीद है।कुक्कुट विकास कार्यक्रम के तहत राज्य में 2020-21 में छह राजकीय कुक्कुट प्रक्षेत्रों पर क्रायलर (Kuroiler) चूजों का उत्पादन कर 7.84 लाख चूजे कुक्कुट पालकों को वितरित किए जा चुके हैं।मदर पोल्ट्री योजना के अंतर्गत वर्ष 2017-18 से अभी तक प्रत्येक जिले तीन के हिसाब से 39 मदर पोल्ट्री यूनिट की स्थापना की जा चुकी है। अभी तक एक माह के 1.54 लाख चूजे कृषकों को आवंटित किए जा चुके हैं।इनोवेटिव कुक्कुट विकास योजना केंद्र सरकार के सहयोग से राज्य के अल्मोड़ा, उत्तरकाशी, बागेश्वर एवं टिहरी में संचालित की जा रही है।कड़कनाथ को ‘कलीमासी ‘ या काले मांस के नाम से जाना जाता है। कड़कनाथ की मांग अधिक है, इसमें पोषण विशेषज्ञों के अनुसार कम कोलेस्ट्रॉल, उच्च लौह सामग्री और कैंसर विरोधी गुण शामिल हैं। स्रोत- https://jhabua.nic.inकड़कनाथ मुर्गे के पौष्टिक गुण कड़कनाथ चिकन, प्रचुर मात्रा में पोषण का समृद्ध स्तर प्रदान करता है। कड़कनाथ काले मांस में एक तीव्र और विशिष्ट स्वाद होता है। सफेद चिकन (लगभग 18%) की तुलना में इसमें प्रोटीन (लगभग 25%) होता है।यह विटामिन बी1, बी2, बी6 से भरपूर, बी12, सी और ई, नियासिन, कैल्शियम, फास्फोरस और आयरन से भरपूर होता है। अन्य चिकन नस्लों की तुलना में इसमें वसा की मात्रा (0.73 से 1.03 फीसदी) तक होती है, जबकि अन्य चिकन नस्लों में लगभग 25 फीसदी तक वसा होती है।कड़कनाथ मीट में 18 अमीनो एसिड होते हैं, जिनमें से आठ मानव शरीर के लिए आवश्यक हैं। काला मांस स्वस्थ माना जाता है, क्योंकि इसमें 24 फीसदी लिनोलिक एसिड होता है, जबकि सफेद चिकन में 21 फीसदी होता है।कड़कनाथ मुर्गा में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा केवल प्रति सौ ग्राम में 184.75 मिलीग्राम होता है, जबकि चिकन की अन्य किस्मों में प्रति सौ ग्राम में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा 218.12 मिलीग्राम होती है। – अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें- कड़कनाथ के बारे में 

राज्य के ग्रामीण इलाकों की 70 फीसदी आबादी कृषि के साथ ही अन्य विकल्पों जैसे- उद्यानीकरण, दुग्ध उत्पादन, जड़ी बूटी उत्पादन, मत्स्य पालन, पशुपालन, जैविक कृषि, सगंध पादप, मौन पालन, सब्जी उत्पादन तथा इससे संबंधित अन्य लघु उद्यमों पर निर्भर करती है, ऐसा आर्थिक सर्वेक्षण की 2020-21 की रिपोर्ट में कहा गया है।

इसमें एक रैपिड सर्वे का जिक्र करते हुए बताया गया है कि कोविड-19 के दौरान 25 फीसदी व्यक्तियों ने कृषि एवं सहवर्गीय क्षेत्रों में अपनी सहमति जताई है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रवासी कामगार, जो सामान्यतः शहरी क्षेत्रों में होटल, रेस्टोरेंट एवं आतिथ्य (Hospitality) क्षेत्र में कार्य करते थे, इस क्षेत्र में कार्य करने को तैयार हैं।

हम उन किस्सों को जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं, जो चुनौतियों के दौर में उम्मीद दिखाते हैं। समन्वित कृषि का एक शानदार उदाहरण, देहरादून – ऋषिकेश रोड पर लिस्टराबाद गांव में है। यहां कृषक राजेंद्र सिंह सजवाण ने परंपरागत कृषि के साथ पोल्ट्री फार्म (देशी एवं बॉयलर दोनों), मछली पालन, बत्तख पालन, गाय पालन, वर्मी कम्पोस्ट, सब्जी एवं फल उत्पादन, बायो गैस प्लांट को जोड़ा है।

देहरादून जिला के लिस्टराबाद गांव स्थित पोल्ट्री फॉर्म में कृषक राजेंद्र सिंह सजवाण। फोटो- डुगडुगी

रविवार (14 नवंबर,2021) की दोपहर रानीपोखरी-ऋषिकेश मुख्य मार्ग से करीब दो से तीन किमी. चलने के बाद 72 वर्षीय किसान राजेंद्र सिंह सजवाण की समन्वित कृषि को जानने का मौका मिला। पोल्ट्री फार्म में बॉयलर और देशी के लिए अलग-अलग हॉल बने हैं।

बॉयलर का पूरा लॉट बिक्री होने के कारण उनके हॉल की सफाई चल रही थी। मुझे बॉयलर देखने को नहीं मिले, पर बताया गया कि अगले माह दिसंबर के पहले हफ्ते में 2000 चूजे लाए जाएंगे। इससे पहले इस हॉल को साफ किया जा रहा है। हॉल को कीटाणुओं एवं रोगाणुओं से मुक्त करने के लिए दवा का छिड़काव किया जाएगा।

देहरादून जिला के लिस्टराबाद में बीटेक अमित भंडारी अपने नाना राजेंद्र सिंह सजवाण को पोल्ट्री फार्म एवं कृषि गतिविधियों में सहयोग करते हैं। फोटो- डुगडुगी

मैकेनिकल में बीटेक अमित भंडारी अपने नाना कृषक राजेंद्र सिंह सजवाण को समन्वित खेती में सहयोग करते हैं। युवा अमित बताते हैं कि बॉयलर 45 दिन में बिक्री के लिए तैयार हो जाता है। पहले लॉट से हॉल के फर्श पर बीट की मोटी परत जमा हो गई है, जिसे इकट्ठा करके खेतों में डाला जाएगा। खेती के लिए यह शानदार जैविक खाद है। इससे कृषि उत्पादन पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। वैसे हम फ्रेश बीट को मछलियों के तालाब में डालते हैं।

यह भी पढ़ें- सिलस्वाल जी से कीजिए, मछली पालन से समृद्धि पर बात

बताते हैं, देशी मुर्गी पालन करीब दो माह पहले शुरू किया था। ऋषिकेश पशुलोक से 220 चूजे खरीदे थे, जिनमें से 30 कड़कनाथ हैं। ये लगभग पांच माह में बिक्री के लिए तैयार हो जाएंगे। करीब चार माह में अंडे भी मिलने शुरू हो जाएंगे। तीन अंडों की एक ट्रे लगभग छह रुपये में बिक जाती है। हमने 30 रुपये के हिसाब से चूजे खरीदे थे। कड़कनाथ का रेट 35 रुपये प्रति चूजा है।

अमित के अनुसार, इनकी देखरेख बड़ी चुनौती है। समय पर दाना-पानी और वैक्सीनेशन, दवाइयां अत्यंत आवश्यक हैं। इनको रोग से बचाना पहली प्राथमिकता होती है। इनके हॉल को गर्म रखने का प्रबंध किया गया है। पानी के लिए लिए पाइप लाइन को बर्तनों से जोड़ा गया है। इनके मूवमेंट को बनाए रखने की प्रॉपर व्यवस्था की गई है। आपको किसी भी दिक्कत में विशेषज्ञों के संपर्क में रहना चाहिए।

जरूर पढ़ें- इंटीग्रेटेड फार्मिंगः सिमलास ग्रांट में आकर देखिए स्वरोजगार की राह

देशी मुर्गियों की ग्रोथ में समय लगता है, जबकि बॉयलर तेजी से बढ़ता है। इसका मीट एवं अंडा हाई प्रोटीन एवं स्वास्थ्य के लिए बेहतर होता है। कड़कनाथ की काफी मांग होती है।

देहरादून जिला के लिस्टराबाद में मुर्गियों को पानी पिलाने के लिए हॉल में पाइप लाइन बिछाई गई हैं और इन बर्तनों में पानी रखा जाता है। फोटो- डुगडुगी

अमित का कहना है कि पूरी सावधानियों एवं आवश्यकताओं को पूरा करते हुए पोल्ट्री फॉर्म का संचालन करते हैं तो यह लाभकारी है। आपको इन्फ्रा तो एक बार ही स्थापित करना है। हालांकि इनका आहार महंगा है, पर उस हिसाब से बिक्री भी लाभ का सौदा है।

मार्केटिंग के संबंध में उनका कहना है, हमने जिनसे चूजे खरीदे थे, उन्होंने ही हमें मुर्गियां खरीदने वालों के कान्टेक्ट उपलब्ध कराए। आसपास से भी खरीदार आते हैं। मार्केटिंग कोई मुश्किल नहीं है। देशी की डिमांड अच्छी होती है। अभी हमने शुरुआत की है, पर इससे लाभ मिलने की उम्मीद है।

देहरादून जिला के ग्राम लिस्टराबाद में पोल्ट्री फार्म के संचालक उमराव सिंह भंडारी, जिन्होंने हमें पोल्ट्री फार्म की व्यवस्थाओं के बारे में बताया। फोटो- डुगडुगी

सरकार की कुक्कुट पालन योजना- राज्य में इस योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के इच्छुक लाभार्थियों का चयन करके एक दिन के 50-50 चूजों की यूनिट निशुल्क स्थापित की जाती है। प्रत्येक लाभार्थी को 50 चूजे, एक माह का राशन तथा जाली निशुल्क दिए जाते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण की 2020-21 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020-21 में राज्य में 1619 इकाइयां स्थापित की गईं।

कुक्कुट विकास कार्यक्रम के तहत राज्य में 2020-21 में छह राजकीय कुक्कुट प्रक्षेत्रों पर क्रायलर (Kuroiler) चूजों का उत्पादन कर 7.84 लाख चूजे कुक्कुट पालकों को वितरित किए जा चुके हैं।

मदर पोल्ट्री योजना के अंतर्गत वर्ष 2017-18 से अभी तक प्रत्येक जिले तीन के हिसाब से 39 मदर पोल्ट्री यूनिट की स्थापना की जा चुकी है। अभी तक एक माह के 1.54 लाख चूजे कृषकों को आवंटित किए जा चुके हैं।

इनोवेटिव कुक्कुट विकास योजना केंद्र सरकार के सहयोग से राज्य के अल्मोड़ा, उत्तरकाशी, बागेश्वर एवं टिहरी में संचालित की जा रही है।

कड़कनाथ को ‘कलीमासी ‘ या काले मांस के नाम से जाना जाता है। कड़कनाथ की मांग अधिक है, इसमें पोषण विशेषज्ञों के अनुसार कम कोलेस्ट्रॉल, उच्च लौह सामग्री और कैंसर विरोधी गुण शामिल हैं। स्रोत- https://jhabua.nic.in

देहरादून जिला के लिस्टराबाद पोल्ट्री फार्म में कड़कनाथ।

कड़कनाथ मुर्गे के पौष्टिक गुण
कड़कनाथ चिकन, प्रचुर मात्रा में पोषण का समृद्ध स्तर प्रदान करता है। कड़कनाथ काले मांस में एक तीव्र और विशिष्ट स्वाद होता है। सफेद चिकन (लगभग 18%) की तुलना में इसमें प्रोटीन (लगभग 25%) होता है।

यह विटामिन बी1, बी2, बी6 से भरपूर, बी12, सी और ई, नियासिन, कैल्शियम, फास्फोरस और आयरन से भरपूर होता है। अन्य चिकन नस्लों की तुलना में इसमें वसा की मात्रा (0.73 से 1.03 फीसदी) तक होती है, जबकि अन्य चिकन नस्लों में लगभग 25 फीसदी तक वसा होती है।

कड़कनाथ मीट में 18 अमीनो एसिड होते हैं, जिनमें से आठ मानव शरीर के लिए आवश्यक हैं। काला मांस स्वस्थ माना जाता है, क्योंकि इसमें 24 फीसदी लिनोलिक एसिड होता है, जबकि सफेद चिकन में 21 फीसदी होता है।

कड़कनाथ मुर्गा में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा केवल प्रति सौ ग्राम में 184.75 मिलीग्राम होता है, जबकि चिकन की अन्य किस्मों में प्रति सौ ग्राम में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा 218.12 मिलीग्राम होती है। – अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें- कड़कनाथ के बारे में 

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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