
Agro-Geo Textiles for hill farming: पहाड़ में एग्रो-जियो टेक्सटाइल्स और संरक्षण कृषि से बढ़ेगी पैदावार
Agro-Geo Textiles for hill farming:देहरादून, 20 जनवरी, 2026ः भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR-IISWC) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रमन जीत सिंह ने रेडियो केदार के साथ एक साक्षात्कार में यह स्पष्ट किया कि एग्रो-जियो टेक्सटाइल्स और संरक्षण कृषि (Conservation Agriculture) पर्वतीय खेती के लिए बहुत महत्वपूर्ण पहल साबित होगी। यदि पर्वतीय किसान पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को साथ जोड़ लें, तो पलायन रोकने में काफी मदद मिल सकती है। खेतों की मिट्टी नहीं बहेगी और खेती मुनाफे का सौदा होगी।
एग्रो-जियो टेक्सटाइल्स: बेकार घास से सोने जैसी पैदावार
Agro-Geo Textiles for hill farming:डॉ. सिंह ने अपनी शोध यात्रा के बारे में बताते हुए एक क्रांतिकारी तकनीक एग्रो-जियो टेक्सटाइल्स (भू-वस्त्र) का जिक्र किया। इस तकनीक में स्थानीय स्तर पर मिलने वाली ‘नरकुल’ या ‘अरुंडोडक्स’ जैसी घास, जिसे पशु भी नहीं खाते, उससे एक चटाईनुमा ‘भू-वस्त्र’ तैयार किया जाता है। इसे ढलान वाले खेतों में बिछाया जाता है। यह बारिश की सीधी बूंदों के प्रहार से मिट्टी को बचाता है। इस तकनीक के प्रयोग से खेतों में मिट्टी का कटाव लगभग शून्य हो जाता है। वहीं, बारिश का पानी मिट्टी के भीतर समाने (Infiltration), से रबी के सीजन (सर्दियों) में फसलों को पर्याप्त नमी मिलती है। इस तकनीक की बदौलत किसान मक्का और गेहूं के बीच मटर की अतिरिक्त फसल ले सकते हैं। शोध के अनुसार, मटर की पैदावार में 122% और गेहूं में 36% तक की वृद्धि देखी गई है।
संरक्षण कृषि: ‘हल कम चलाएं, लाभ अधिक पाएं’
Agro-Geo Textiles for hill farming:पहाड़ों की नाजुक पारिस्थितिकी के लिए डॉ. सिंह ने संरक्षण कृषि को अनिवार्य बताया। उन्होंने इसके तीन मुख्य स्तंभ साझा किए:
- न्यूनतम जुताई (Minimum Tillage): डॉ. सिंह के अनुसार, “जितना ज्यादा हल चलता है, मिट्टी की संरचना उतनी ही टूटती है।” उन्होंने ढलान के विपरीत जुताई करने और बरसात के मौसम में सीधी बुवाई (Direct Seeding) की सलाह दी ताकि उपजाऊ मिट्टी बहने से बच सके।
- स्थायी आच्छादन (Permanent Soil Cover): खेत को कभी खाली न छोड़ें। फसल के अवशेष (जैसे मक्का के डंठल या गेहूं का भूसा) को खेत में ही गलने दें। यह मल्चिंग का काम करता है और मिट्टी के ‘जीवांश पदार्थ’ (Organic Carbon) को बढ़ाता है।
- फसल विविधीकरण (Crop Rotation): केवल अनाज (मक्का-गेहूं) पर निर्भर न रहें। इनके बीच में दलहन (दालें) जरूर उगाएं। दालें प्राकृतिक रूप से वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी को उर्वर बनाती हैं।
मृदा स्वास्थ्य: ‘मिट्टी की जांच और गोबर की खाद का सही प्रबंधन’
डॉ. सिंह ने किसानों द्वारा की जाने वाली एक बड़ी गलती की ओर ध्यान दिलाया। अक्सर किसान मई-जून की चिलचिलाती धूप में गोबर की खाद को खेतों में ढेरी बनाकर छोड़ देते हैं।
- नुकसान: इससे खाद की नाइट्रोजन उड़ जाती है और उसमें ‘गोबरेला’ जैसे कीड़े अंडे दे देते हैं, जो बाद में ‘सफेद लट’ (White Grub) बनकर फसल की जड़ों को चट कर जाते हैं।
- वैज्ञानिक तरीका: खाद को हमेशा ढके हुए गड्ढे में तैयार करें और बुवाई से ठीक पहले उसे मिट्टी में मिलाएं।
- जांच: उन्होंने किसानों को हर 3 साल में मिट्टी की जांच कराने की सलाह दी। उन्होंने ‘उल्टा V’ (Reverse V) विधि से मिट्टी का नमूना लेने का तरीका भी विस्तार से समझाया।
जलवायु परिवर्तन और माइग्रेशन: चुनौतियां और समाधान
डॉ. सिंह ने स्वीकार किया कि जलवायु परिवर्तन एक बड़ी वास्तविकता है। बारिश के दिन कम हो रहे हैं, लेकिन उनकी तीव्रता (Intensity) बढ़ गई है, जिससे आपदाएं बढ़ रही हैं। उन्होंने ‘पहाड़ का पानी पहाड़ में’ रोकने के लिए चाल-खाल बनाने और जल संचयन के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऑफ-सीजन सब्जियां (जैसे अगस्त में प्याज की पौध लगाना) और फलदार वृक्षों की ओर मुड़ना चाहिए। डॉ. सिंह ने युवाओं से अपील की कि वे ‘विक्रेता’ (Marketer) बनें। सोशल मीडिया का उपयोग करके अपने ब्रांड (जैसे ‘पहाड़ी हल्दी’ या ‘जैविक घी’) को सीधे शहरी उपभोक्ताओं तक पहुँचाएं।
उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि वे वैज्ञानिकों से डटकर सवाल पूछें, अपनी समस्याएं बताएं और सरकारी योजनाओं (जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना) का लाभ उठाएं।”मिट्टी और जल का संरक्षण ही पहाड़ों के भविष्य का आधार है। यदि हम अपनी धरती माता की रक्षा करेंगे, तो वह हमें कभी भूखा नहीं रहने देगी।”
वैज्ञानिक परिचय: डॉ. रमन जीत सिंह (एग्रोनॉमी विशेषज्ञ)
भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR-IISWC), देहरादून में वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत डॉ. रमन जीत सिंह कृषि विज्ञान, विशेषकर ‘एग्रोनॉमी’ के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित नाम हैं। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली से पूर्ण की और ऑस्ट्रेलियन सरकार की प्रतिष्ठित पोस्ट-डॉक्टरेट फेलोशिप के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध अनुभव प्राप्त किया। डॉ. सिंह की मुख्य विशेषज्ञता हिमालयी क्षेत्रों की ढलान वाली कृषि भूमि के संरक्षण और वर्षा आधारित खेती की उत्पादकता बढ़ाने पर केंद्रित है। उनके नाम 40 से अधिक शोध पत्र और तीन पुस्तकें दर्ज हैं। कृषि के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें ‘यंग सॉइल कंजर्वेशनिस्ट अवार्ड 2017’ और ‘बेस्ट यंग साइंटिस्ट अवार्ड 2017’ जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने के कारण, डॉ. सिंह के शोध का मूल उद्देश्य प्रयोगशाला की आधुनिक तकनीकों को सीधे किसानों के खेतों तक पहुँचाकर उनकी आय में वृद्धि करना है।













