By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Reading: हेडिंग में तुकबंदी से नौकरी पर संकट
Share
Notification Show More
Font ResizerAa
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
Font ResizerAa
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Advertise
  • Advertise
© 2022 Foxiz News Network. Ruby Design Company. All Rights Reserved.
NEWSLIVE24x7 > Blog > Blog Live > हेडिंग में तुकबंदी से नौकरी पर संकट
Blog LiveFeatured

हेडिंग में तुकबंदी से नौकरी पर संकट

Rajesh Pandey
Last updated: September 19, 2021 10:02 am
Rajesh Pandey
5 years ago
Share
SHARE
बहुत बार खबरों की हेडिंग ही उनको पढ़ने के लिए विवश करती हैं। मैं अखबारों की हेडिंग की बात कर रहा हूं, न कि किसी पोर्टल की। अखबार की हेडिंग सीमित शब्दों की होती हैं और इनका फोंट साइज किसी भी पेज पर ऊपर से नीचे तक आते आते कम होता जाता है। बॉटम के हेडिंग का साइज थोड़ा ज्यादा होता है। कुछ अखबारों में बॉटम का फोंट अलग दिखता है। अखबारों में खबरों के लिए निर्धारित फार्मेट होता है और इससे बाहर आने की मनाही होती है।
वहीं पोर्टल पर हेडिंग लंबे हो सकते हैं, उनको कुछ इस तरह लिखा जाता है कि कोई लिंक को क्लिक करके खबर तक पहुंच जाए। पोर्टल यूनिक विजिटर्स के आधार पर अपनी रेटिंग करते हैं और इसके लिए वो गूगल का एनालिटिक्स अपनी वेबसाइट से जोड़े रखते हैं। पोर्टल रियल टाइम में यह जान सकते हैं कि उनकी किन किन खबरों को कितने लोग किन स्थानों पर पढ़ रहे हैं। उनको यह तक पता चल जाता है कि उनके पाठक किस आयु वर्ग हैं।

Contents
बहुत बार खबरों की हेडिंग ही उनको पढ़ने के लिए विवश करती हैं। मैं अखबारों की हेडिंग की बात कर रहा हूं, न कि किसी पोर्टल की। अखबार की हेडिंग सीमित शब्दों की होती हैं और इनका फोंट साइज किसी भी पेज पर ऊपर से नीचे तक आते आते कम होता जाता है। बॉटम के हेडिंग का साइज थोड़ा ज्यादा होता है। कुछ अखबारों में बॉटम का फोंट अलग दिखता है। अखबारों में खबरों के लिए निर्धारित फार्मेट होता है और इससे बाहर आने की मनाही होती है।वहीं पोर्टल पर हेडिंग लंबे हो सकते हैं, उनको कुछ इस तरह लिखा जाता है कि कोई लिंक को क्लिक करके खबर तक पहुंच जाए। पोर्टल यूनिक विजिटर्स के आधार पर अपनी रेटिंग करते हैं और इसके लिए वो गूगल का एनालिटिक्स अपनी वेबसाइट से जोड़े रखते हैं। पोर्टल रियल टाइम में यह जान सकते हैं कि उनकी किन किन खबरों को कितने लोग किन स्थानों पर पढ़ रहे हैं। उनको यह तक पता चल जाता है कि उनके पाठक किस आयु वर्ग हैं।पाठकों में महिलाएं अधिक हैं या पुरुष। किन कैटेगरी की खबरों को ज्यादा पसंद किया गया। गूगल एनालिटिक्स में सुविधा उपलब्ध है, ताकि पोर्टल इन डाटा के आधार पर अपनी खबरों को व्यवस्थित कर सकें तथा गूगल एड सेंस के अनुसार, विज्ञापनों की कैटेगरी सेलेक्ट कर सकें।वैसे आपको एक बात तो स्पष्ट कर दूं कि अधिकतर पोर्टल को अपनी खबरों की हेडिंग और कंटेंट को शालीनता के दायरे में लाने की जरूरत है। इस पर भी चर्चा करेंगे, फिलहाल अखबारों के हेडिंग पर बात करते हैं। जर्नलिज्म की पढ़ाई में हमें हेडिंग के प्रकार बताए गए। अच्छी बात है, जानकारी होनी चाहिए, पर डिजीटल युग में यह सब बदल गए। अब तो हेडिंग के फोंट साइज भी याद नहीं करने। उसके लिए आपको पेज पर सुविधा दी जाती है, बस क्लिक करते ही हेडिंग लीड, सेकेंड लीड, डबल कॉलम, सिंगल कॉलम, फ्लायर, बॉटम के साइज में आ जाती है।कभी कभी किसी खबर का हेडिंग लगाना दिमागी कसरत हो जाता है। हालांकि रिपोर्टर अपनी खबरों में हेडिंग, क्रासर लिखकर देते हैं। बहुत बार उनके हेडिंग सही होते हैं और डेस्क थोड़ा बहुत परिवर्तन करके उनको ही इस्तेमाल कर लेती है।कभी पेज पर परिस्थितियों के अनुसार, हेडिंग बदलनी पड़ती है। कभी हेडिंग फिट नहीं बैठती, यानी लंबी हो जाती है। उसको संपादित करने की जरूरत होती है। ऐसे में उनको कन्डेंशड यानी पिचका दिया जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि फोंट अपने साइज में रहता है, पर उसके अक्षरों के बीच की दूरी सामान्य से कभी कभी तो 15 से 20 फीसदी तक कम हो जाती है। इससे अक्षर की बनावट पर असर पड़ जाता है। ऐसा अक्सर उस समय किया जाता है, जब जल्दबाजी में दिमाग पर जोर डालने से बचना होता है। हालांकि यह गलत है।अक्सर बताया जाता है कि खबरों के हेडिंग सपाट और अपीलिंग होने चाहिए। उसमें हेडिंग में सामान्य तौर पर साहित्यिक प्रयोग, मुहावरों और तुकबंदियों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। साहित्यिक गतिविधियों की खबरों की हेडिंग में साहित्यिक प्रयोग किया जाए तो अच्छा प्रभाव पड़ता है।किसी परिस्थिति या घटना को सुनकर या देखकर बोला गया वाक्य भी हेडिंग के बहुत करीब होता है। इसमें उस स्थान का नाम इस्तेमाल करें तो संबंधित स्थान के पाठकों का ज्यादा ध्यान जाएगा।अक्सर, हेडिंग में शहरों, मोहल्लों और कॉलोनियों के नाम लिखे जाते हैं। माना जाता है कि हेडिंग में मेहनत कर ली जाए, तो खबर आकर्षित करती है। हेडिंग किसी गतिविधि या सूचना के महत्व को दर्शाती है। इनमें किसी जगह के नाम, संस्था या संगठन के नाम के अतिरिक्त उन महत्वपूर्ण शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, जो ध्यान खींचते हैं। यह कुछ प्रयोग हैं, जो होने आवश्यक हैं।राजनीति की खबर की हेडिंग पर ज्यादा काम होता है। इनमें संकेत देने की कोशिशें अधिक होती हैं। अधिकतर बार, इनकी हेडिंग सीधी सपाट होने की बजाय डिफेंसिंग होती हैं। कुल मिलाकर, अखबारों में खबरों का उनके हेडिंग से सीधा संबंध दिखता है, लेकिन अधिकतर पोर्टल पर हेडिंग अपनी खबरों से लगभग न के बराबर वास्ता रखते हैं। कई बार हेडिंग किसी गतिविधि या घटना को वास्तविकता से बड़ा दर्शाने की कोशिश करती दिखती है। ऐसा पाठकों को खबर तक ले जाने के लिए किया जाता है।कुल मिलाकर कहना है कि खबर को पढ़ाना है तो हेडिंग को आम बोलचाल वाला होना चाहिए। हेडिंग सिर खुजलाकर समझने वाला सस्पेंस पैदा न करें। हेडिंग एक ही वाक्य में धारा प्रवाह बोलने वाली होनी चाहिए। हेडिंग को समझने के लिए दो या तीन बार पढ़ने की जरूरत न हो। हेडिंग कोई गीत या मुहावरा नहीं होती।यह किसी खबर का एक लाइन में सार भी हो सकती है। हेडिंग खबर क्या है, को बताती है। कई बार पेज पर लगी हेडिंग्स में दो या तीन बार एक ही शब्द रीपिट होता दिखता है, जो सही प्रभाव नहीं डालता। इसके लिए आपको अपने पेज के सभी हेडिंग बोलकर पढ़ने चाहिएं, न कि मन ही मन में।अब एक किस्सा बताता हूं, जब डेस्क के एक साथी ने हेडिंग में खेल करके जबर्दस्त तुकबंदी कर दी। वो बहुत सज्जन व्यक्ति हैं, हमने उनको कभी किसी से तेज आवाज में बोलते नहीं देखा था। चुप रहकर खबरों के संपादन में व्यस्त रहते थे। एक दिन उन्होंने एक खबर के हेडिंग में तुकबंदी कर दी।उस समय उन्होंने या किसी ने भी नहीं सोचा कि यह हेडिंग किसी की नौकरी को खतरे में डाल सकती है। कुछ लोगों ने इसे द्विअर्थी हेडिंग समझ लिया और फिर बड़े अधिकारी के समक्ष अपनी समझ की व्याख्या कर डाली। यह उनकी समझ थी, उसका क्या किया जा सकता है।डेस्क के साथी ने यह हेडिंग लगाकर अपने से चार पद सीनियर को दिखाया था, जिस पर हेडिंग को जबर्दस्त बताकर उनकी तारीफ की गई थी। उन सीनियर ने कहा था, वाह… यह हेडिंग पढ़ा जाएगा। वो साथी खुश हो गए थे।इसी हेडिंग के साथ समाचार अखबार में प्रकाशित हुआ और फिर दूसरे दिन शाम को डेस्क के साथियों के बीच बड़े अधिकारी अखबार लेकर पहुंचे और पूछा, यह हेडिंग किसने लगाया। सभी चुप, मानो डेस्क ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो, जिसकी सजा पर फैसला होना था।उन्हीं वरिष्ठ अधिकारी ने उन साथी की ओर इशारा करते हुए, इन्होंने लगाया है। बस फिर क्या था, उस साथी को बहुत सुननी पड़ी। लेकिन वरिष्ठ अधिकारी ने उनकी पैरवी नहीं की और न ही यह बताने का साहस किया कि वो इस हेडिंग की जमकर तारीफ कर चुके हैं।अगर यह हेडिंग गलत थी, तो इसको पेज पर चिपकाने में उन वरिष्ठ अधिकारी का भी तो योगदान था। उन्होंने यह हेडिंग उसी समय क्यों नहीं बदलवाया। पेज पर कोई गलती न जाएं, खबरों में कंटेंट संबंधी किसी परेशानी के हल के लिए उनको यह वरिष्ठ पद और वेतन मिल रहा था।जरा जरा सी गलतियों पर पूरा पेज तुड़वाने वाले, नजर अंदाज की जाने वाली गलतियों पर शोर मचाकर जूनियर्स को फटकारने वाले उन अधिकारी ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया। अगर उनकी नजर में वो हेडिंग सही थी तो बड़े अधिकारी के सामने मजबूती से पक्ष रखते।पर ऐसा नहीं हुआ और कुछ समय बाद एक जरा सी गलती पर डेस्क के उन साथी को नौकरी से बाहर होना पड़ा। मुझे वो साथी आज भी मिलते हैं। जब भी उनसे मिलता हूं तो वो वाकया याद आ जाता है।जूनियर के पेज चेक करते हैं, उसमें किसी गलती के लिए सीनियर स्वयं की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते। सीनियर्स को तनख्वाह तो जिम्मेदारी की मिलती है। अगर मेहनत के आधार पर तनख्वाह दी जाती है तो सबसे ज्यादा पैसा अखबारों में जूनियर्स, स्ट्रिंगर्स, फोटोग्राफर्स व ट्रेनियों को मिलना चाहिए। बड़े अधिकारियों को तो बिल्कुल भी नहीं।हो सकता है, हेडिंग के बारे में किन्हीं और का ज्ञान बहुत ज्यादा हो। पर, मैंने जो महसूस किया, वो साझा कर दिया। कल एक बार फिर उन ट्रेनियों पर बात करेंगे, जो अपने काम से ज्यादा दूसरों के कंप्यूटरों की स्क्रीन पर ज्यादा ध्यान देते हैं। एक बार किसी बड़े अधिकारी का खास ट्रेनी उस खबर को संपादित करने बैठ गया, जिसको लिखने के लिए कहने पर इधर, उधर हो गया था। संपादन के नाम पर उस खबर में क्या किया गया, आपसे कल जिक्र करेंगे। तब तक के लिए बहुत सारा धन्यवाद।
पाठकों में महिलाएं अधिक हैं या पुरुष। किन कैटेगरी की खबरों को ज्यादा पसंद किया गया। गूगल एनालिटिक्स में सुविधा उपलब्ध है, ताकि पोर्टल इन डाटा के आधार पर अपनी खबरों को व्यवस्थित कर सकें तथा गूगल एड सेंस के अनुसार, विज्ञापनों की कैटेगरी सेलेक्ट कर सकें।
वैसे आपको एक बात तो स्पष्ट कर दूं कि अधिकतर पोर्टल को अपनी खबरों की हेडिंग और कंटेंट को शालीनता के दायरे में लाने की जरूरत है। इस पर भी चर्चा करेंगे, फिलहाल अखबारों के हेडिंग पर बात करते हैं। जर्नलिज्म की पढ़ाई में हमें हेडिंग के प्रकार बताए गए। अच्छी बात है, जानकारी होनी चाहिए, पर डिजीटल युग में यह सब बदल गए। अब तो हेडिंग के फोंट साइज भी याद नहीं करने। उसके लिए आपको पेज पर सुविधा दी जाती है, बस क्लिक करते ही हेडिंग लीड, सेकेंड लीड, डबल कॉलम, सिंगल कॉलम, फ्लायर, बॉटम के साइज में आ जाती है।

कभी कभी किसी खबर का हेडिंग लगाना दिमागी कसरत हो जाता है। हालांकि रिपोर्टर अपनी खबरों में हेडिंग, क्रासर लिखकर देते हैं। बहुत बार उनके हेडिंग सही होते हैं और डेस्क थोड़ा बहुत परिवर्तन करके उनको ही इस्तेमाल कर लेती है।
कभी पेज पर परिस्थितियों के अनुसार, हेडिंग बदलनी पड़ती है। कभी हेडिंग फिट नहीं बैठती, यानी लंबी हो जाती है। उसको संपादित करने की जरूरत होती है। ऐसे में उनको कन्डेंशड यानी पिचका दिया जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि फोंट अपने साइज में रहता है, पर उसके अक्षरों के बीच की दूरी सामान्य से कभी कभी तो 15 से 20 फीसदी तक कम हो जाती है। इससे अक्षर की बनावट पर असर पड़ जाता है। ऐसा अक्सर उस समय किया जाता है, जब जल्दबाजी में दिमाग पर जोर डालने से बचना होता है। हालांकि यह गलत है।

अक्सर बताया जाता है कि खबरों के हेडिंग सपाट और अपीलिंग होने चाहिए। उसमें हेडिंग में सामान्य तौर पर साहित्यिक प्रयोग, मुहावरों और तुकबंदियों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। साहित्यिक गतिविधियों की खबरों की हेडिंग में साहित्यिक प्रयोग किया जाए तो अच्छा प्रभाव पड़ता है।
किसी परिस्थिति या घटना को सुनकर या देखकर बोला गया वाक्य भी हेडिंग के बहुत करीब होता है। इसमें उस स्थान का नाम इस्तेमाल करें तो संबंधित स्थान के पाठकों का ज्यादा ध्यान जाएगा।
अक्सर, हेडिंग में शहरों, मोहल्लों और कॉलोनियों के नाम लिखे जाते हैं। माना जाता है कि हेडिंग में मेहनत कर ली जाए, तो खबर आकर्षित करती है। हेडिंग किसी गतिविधि या सूचना के महत्व को दर्शाती है। इनमें किसी जगह के नाम, संस्था या संगठन के नाम के अतिरिक्त उन महत्वपूर्ण शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, जो ध्यान खींचते हैं। यह कुछ प्रयोग हैं, जो होने आवश्यक हैं।

राजनीति की खबर की हेडिंग पर ज्यादा काम होता है। इनमें संकेत देने की कोशिशें अधिक होती हैं। अधिकतर बार, इनकी हेडिंग सीधी सपाट होने की बजाय डिफेंसिंग होती हैं। कुल मिलाकर, अखबारों में खबरों का उनके हेडिंग से सीधा संबंध दिखता है, लेकिन अधिकतर पोर्टल पर हेडिंग अपनी खबरों से लगभग न के बराबर वास्ता रखते हैं। कई बार हेडिंग किसी गतिविधि या घटना को वास्तविकता से बड़ा दर्शाने की कोशिश करती दिखती है। ऐसा पाठकों को खबर तक ले जाने के लिए किया जाता है।
कुल मिलाकर कहना है कि खबर को पढ़ाना है तो हेडिंग को आम बोलचाल वाला होना चाहिए। हेडिंग सिर खुजलाकर समझने वाला सस्पेंस पैदा न करें। हेडिंग एक ही वाक्य में धारा प्रवाह बोलने वाली होनी चाहिए। हेडिंग को समझने के लिए दो या तीन बार पढ़ने की जरूरत न हो। हेडिंग कोई गीत या मुहावरा नहीं होती।
यह किसी खबर का एक लाइन में सार भी हो सकती है। हेडिंग खबर क्या है, को बताती है। कई बार पेज पर लगी हेडिंग्स में दो या तीन बार एक ही शब्द रीपिट होता दिखता है, जो सही प्रभाव नहीं डालता। इसके लिए आपको अपने पेज के सभी हेडिंग बोलकर पढ़ने चाहिएं, न कि मन ही मन में।
अब एक किस्सा बताता हूं, जब डेस्क के एक साथी ने हेडिंग में खेल करके जबर्दस्त तुकबंदी कर दी। वो बहुत सज्जन व्यक्ति हैं, हमने उनको कभी किसी से तेज आवाज में बोलते नहीं देखा था। चुप रहकर खबरों के संपादन में व्यस्त रहते थे। एक दिन उन्होंने एक खबर के हेडिंग में तुकबंदी कर दी।
उस समय उन्होंने या किसी ने भी नहीं सोचा कि यह हेडिंग किसी की नौकरी को खतरे में डाल सकती है। कुछ लोगों ने इसे द्विअर्थी हेडिंग समझ लिया और फिर बड़े अधिकारी के समक्ष अपनी समझ की व्याख्या कर डाली। यह उनकी समझ थी, उसका क्या किया जा सकता है।
डेस्क के साथी ने यह हेडिंग लगाकर अपने से चार पद सीनियर को दिखाया था, जिस पर हेडिंग को जबर्दस्त बताकर उनकी तारीफ की गई थी। उन सीनियर ने कहा था, वाह… यह हेडिंग पढ़ा जाएगा। वो साथी खुश हो गए थे।

इसी हेडिंग के साथ समाचार अखबार में प्रकाशित हुआ और फिर दूसरे दिन शाम को डेस्क के साथियों के बीच बड़े अधिकारी अखबार लेकर पहुंचे और पूछा, यह हेडिंग किसने लगाया। सभी चुप, मानो डेस्क ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो, जिसकी सजा पर फैसला होना था।
उन्हीं वरिष्ठ अधिकारी ने उन साथी की ओर इशारा करते हुए, इन्होंने लगाया है। बस फिर क्या था, उस साथी को बहुत सुननी पड़ी। लेकिन वरिष्ठ अधिकारी ने उनकी पैरवी नहीं की और न ही यह बताने का साहस किया कि वो इस हेडिंग की जमकर तारीफ कर चुके हैं।
अगर यह हेडिंग गलत थी, तो इसको पेज पर चिपकाने में उन वरिष्ठ अधिकारी का भी तो योगदान था। उन्होंने यह हेडिंग उसी समय क्यों नहीं बदलवाया। पेज पर कोई गलती न जाएं, खबरों में कंटेंट संबंधी किसी परेशानी के हल के लिए उनको यह वरिष्ठ पद और वेतन मिल रहा था।
जरा जरा सी गलतियों पर पूरा पेज तुड़वाने वाले, नजर अंदाज की जाने वाली गलतियों पर शोर मचाकर जूनियर्स को फटकारने वाले उन अधिकारी ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया। अगर उनकी नजर में वो हेडिंग सही थी तो बड़े अधिकारी के सामने मजबूती से पक्ष रखते।

पर ऐसा नहीं हुआ और कुछ समय बाद एक जरा सी गलती पर डेस्क के उन साथी को नौकरी से बाहर होना पड़ा। मुझे वो साथी आज भी मिलते हैं। जब भी उनसे मिलता हूं तो वो वाकया याद आ जाता है।
जूनियर के पेज चेक करते हैं, उसमें किसी गलती के लिए सीनियर स्वयं की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते। सीनियर्स को तनख्वाह तो जिम्मेदारी की मिलती है। अगर मेहनत के आधार पर तनख्वाह दी जाती है तो सबसे ज्यादा पैसा अखबारों में जूनियर्स, स्ट्रिंगर्स, फोटोग्राफर्स व ट्रेनियों को मिलना चाहिए। बड़े अधिकारियों को तो बिल्कुल भी नहीं।
हो सकता है, हेडिंग के बारे में किन्हीं और का ज्ञान बहुत ज्यादा हो। पर, मैंने जो महसूस किया, वो साझा कर दिया। कल एक बार फिर उन ट्रेनियों पर बात करेंगे, जो अपने काम से ज्यादा दूसरों के कंप्यूटरों की स्क्रीन पर ज्यादा ध्यान देते हैं। एक बार किसी बड़े अधिकारी का खास ट्रेनी उस खबर को संपादित करने बैठ गया, जिसको लिखने के लिए कहने पर इधर, उधर हो गया था। संपादन के नाम पर उस खबर में क्या किया गया, आपसे कल जिक्र करेंगे। तब तक के लिए बहुत सारा धन्यवाद।

 

Keywords:- Newspaper Printing, Layout of a newspaper, Print Media, Social Media, History of Journalism, Ethics of Reporting, Editing checklist, Editorial and Management in News paper, What is caricature, Internet Journalism, Web Journalism, Circulation, Heading of News, Heading of Article, अखबार और सोशल मीडिया, क्या सोशल मीडिया खबरों के स्रोत हैं, पत्रकारिता में सोशल मीडिया का योगदान, अखबारों में ग्राफिक डिजाइनिंग, संपादक के कार्य, रिपोर्टिंग के नियम, खबरों के हेडिंग कैसे हों

You Might Also Like

हल्द्वानी में ₹ 778.14 करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास व लोकार्पण
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर श्रद्धासुमन अर्पित किए
बड़ी आंत और मलाशय के कैंसर के बारे में एम्स ऋषिकेश ने दी यह खास जानकारी
श्रीकेदारनाथ धाम में अब तक दो लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने किए दर्शन
खबरें तो बढ़ा चढ़ाकर पेश की जाती हैं, कैसे विश्वास करें मीडिया पर
TAGGED:CirculationEditing checklistEditorial and Management in News paperEthics of ReportingHeading of ArticleHeading of NewsHistory of JournalismInternet JournalismLayout of a newspaperNewspaper PrintingPrint Mediasocial mediaWeb JournalismWhat is caricatureअखबार और सोशल मीडियाअखबारों में ग्राफिक डिजाइनिंगक्या सोशल मीडिया खबरों के स्रोत हैंखबरों के हेडिंग कैसे होंपत्रकारिता में सोशल मीडिया का योगदानरिपोर्टिंग के नियमसंपादक के कार्य
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp Email Copy Link Print
ByRajesh Pandey
Follow:
newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
Previous Article युवाओं के लिए प्रेरणा हैं हिमालय पुत्र और जलधारा
Next Article लाल-हरी गंधारी, सुनसुनिया, मुचरी, फुटकल, पोई, बेंग हैं पोषण का खजाना
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun
Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun Doiwala, PIN- 248140
9760097344
© 2026 News Live 24x7| Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?