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हेडिंग में तुकबंदी से नौकरी पर संकट

बहुत बार खबरों की हेडिंग ही उनको पढ़ने के लिए विवश करती हैं। मैं अखबारों की हेडिंग की बात कर रहा हूं, न कि किसी पोर्टल की। अखबार की हेडिंग सीमित शब्दों की होती हैं और इनका फोंट साइज किसी भी पेज पर ऊपर से नीचे तक आते आते कम होता जाता है। बॉटम के हेडिंग का साइज थोड़ा ज्यादा होता है। कुछ अखबारों में बॉटम का फोंट अलग दिखता है। अखबारों में खबरों के लिए निर्धारित फार्मेट होता है और इससे बाहर आने की मनाही होती है।
वहीं पोर्टल पर हेडिंग लंबे हो सकते हैं, उनको कुछ इस तरह लिखा जाता है कि कोई लिंक को क्लिक करके खबर तक पहुंच जाए। पोर्टल यूनिक विजिटर्स के आधार पर अपनी रेटिंग करते हैं और इसके लिए वो गूगल का एनालिटिक्स अपनी वेबसाइट से जोड़े रखते हैं। पोर्टल रियल टाइम में यह जान सकते हैं कि उनकी किन किन खबरों को कितने लोग किन स्थानों पर पढ़ रहे हैं। उनको यह तक पता चल जाता है कि उनके पाठक किस आयु वर्ग हैं।

पाठकों में महिलाएं अधिक हैं या पुरुष। किन कैटेगरी की खबरों को ज्यादा पसंद किया गया। गूगल एनालिटिक्स में सुविधा उपलब्ध है, ताकि पोर्टल इन डाटा के आधार पर अपनी खबरों को व्यवस्थित कर सकें तथा गूगल एड सेंस के अनुसार, विज्ञापनों की कैटेगरी सेलेक्ट कर सकें।
वैसे आपको एक बात तो स्पष्ट कर दूं कि अधिकतर पोर्टल को अपनी खबरों की हेडिंग और कंटेंट को शालीनता के दायरे में लाने की जरूरत है। इस पर भी चर्चा करेंगे, फिलहाल अखबारों के हेडिंग पर बात करते हैं। जर्नलिज्म की पढ़ाई में हमें हेडिंग के प्रकार बताए गए। अच्छी बात है, जानकारी होनी चाहिए, पर डिजीटल युग में यह सब बदल गए। अब तो हेडिंग के फोंट साइज भी याद नहीं करने। उसके लिए आपको पेज पर सुविधा दी जाती है, बस क्लिक करते ही हेडिंग लीड, सेकेंड लीड, डबल कॉलम, सिंगल कॉलम, फ्लायर, बॉटम के साइज में आ जाती है।

कभी कभी किसी खबर का हेडिंग लगाना दिमागी कसरत हो जाता है। हालांकि रिपोर्टर अपनी खबरों में हेडिंग, क्रासर लिखकर देते हैं। बहुत बार उनके हेडिंग सही होते हैं और डेस्क थोड़ा बहुत परिवर्तन करके उनको ही इस्तेमाल कर लेती है।
कभी पेज पर परिस्थितियों के अनुसार, हेडिंग बदलनी पड़ती है। कभी हेडिंग फिट नहीं बैठती, यानी लंबी हो जाती है। उसको संपादित करने की जरूरत होती है। ऐसे में उनको कन्डेंशड यानी पिचका दिया जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि फोंट अपने साइज में रहता है, पर उसके अक्षरों के बीच की दूरी सामान्य से कभी कभी तो 15 से 20 फीसदी तक कम हो जाती है। इससे अक्षर की बनावट पर असर पड़ जाता है। ऐसा अक्सर उस समय किया जाता है, जब जल्दबाजी में दिमाग पर जोर डालने से बचना होता है। हालांकि यह गलत है।

अक्सर बताया जाता है कि खबरों के हेडिंग सपाट और अपीलिंग होने चाहिए। उसमें हेडिंग में सामान्य तौर पर साहित्यिक प्रयोग, मुहावरों और तुकबंदियों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। साहित्यिक गतिविधियों की खबरों की हेडिंग में साहित्यिक प्रयोग किया जाए तो अच्छा प्रभाव पड़ता है।
किसी परिस्थिति या घटना को सुनकर या देखकर बोला गया वाक्य भी हेडिंग के बहुत करीब होता है। इसमें उस स्थान का नाम इस्तेमाल करें तो संबंधित स्थान के पाठकों का ज्यादा ध्यान जाएगा।
अक्सर, हेडिंग में शहरों, मोहल्लों और कॉलोनियों के नाम लिखे जाते हैं। माना जाता है कि हेडिंग में मेहनत कर ली जाए, तो खबर आकर्षित करती है। हेडिंग किसी गतिविधि या सूचना के महत्व को दर्शाती है। इनमें किसी जगह के नाम, संस्था या संगठन के नाम के अतिरिक्त उन महत्वपूर्ण शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, जो ध्यान खींचते हैं। यह कुछ प्रयोग हैं, जो होने आवश्यक हैं।

राजनीति की खबर की हेडिंग पर ज्यादा काम होता है। इनमें संकेत देने की कोशिशें अधिक होती हैं। अधिकतर बार, इनकी हेडिंग सीधी सपाट होने की बजाय डिफेंसिंग होती हैं। कुल मिलाकर, अखबारों में खबरों का उनके हेडिंग से सीधा संबंध दिखता है, लेकिन अधिकतर पोर्टल पर हेडिंग अपनी खबरों से लगभग न के बराबर वास्ता रखते हैं। कई बार हेडिंग किसी गतिविधि या घटना को वास्तविकता से बड़ा दर्शाने की कोशिश करती दिखती है। ऐसा पाठकों को खबर तक ले जाने के लिए किया जाता है।
कुल मिलाकर कहना है कि खबर को पढ़ाना है तो हेडिंग को आम बोलचाल वाला होना चाहिए। हेडिंग सिर खुजलाकर समझने वाला सस्पेंस पैदा न करें। हेडिंग एक ही वाक्य में धारा प्रवाह बोलने वाली होनी चाहिए। हेडिंग को समझने के लिए दो या तीन बार पढ़ने की जरूरत न हो। हेडिंग कोई गीत या मुहावरा नहीं होती।
यह किसी खबर का एक लाइन में सार भी हो सकती है। हेडिंग खबर क्या है, को बताती है। कई बार पेज पर लगी हेडिंग्स में दो या तीन बार एक ही शब्द रीपिट होता दिखता है, जो सही प्रभाव नहीं डालता। इसके लिए आपको अपने पेज के सभी हेडिंग बोलकर पढ़ने चाहिएं, न कि मन ही मन में।
अब एक किस्सा बताता हूं, जब डेस्क के एक साथी ने हेडिंग में खेल करके जबर्दस्त तुकबंदी कर दी। वो बहुत सज्जन व्यक्ति हैं, हमने उनको कभी किसी से तेज आवाज में बोलते नहीं देखा था। चुप रहकर खबरों के संपादन में व्यस्त रहते थे। एक दिन उन्होंने एक खबर के हेडिंग में तुकबंदी कर दी।
उस समय उन्होंने या किसी ने भी नहीं सोचा कि यह हेडिंग किसी की नौकरी को खतरे में डाल सकती है। कुछ लोगों ने इसे द्विअर्थी हेडिंग समझ लिया और फिर बड़े अधिकारी के समक्ष अपनी समझ की व्याख्या कर डाली। यह उनकी समझ थी, उसका क्या किया जा सकता है।
डेस्क के साथी ने यह हेडिंग लगाकर अपने से चार पद सीनियर को दिखाया था, जिस पर हेडिंग को जबर्दस्त बताकर उनकी तारीफ की गई थी। उन सीनियर ने कहा था, वाह… यह हेडिंग पढ़ा जाएगा। वो साथी खुश हो गए थे।

इसी हेडिंग के साथ समाचार अखबार में प्रकाशित हुआ और फिर दूसरे दिन शाम को डेस्क के साथियों के बीच बड़े अधिकारी अखबार लेकर पहुंचे और पूछा, यह हेडिंग किसने लगाया। सभी चुप, मानो डेस्क ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो, जिसकी सजा पर फैसला होना था।
उन्हीं वरिष्ठ अधिकारी ने उन साथी की ओर इशारा करते हुए, इन्होंने लगाया है। बस फिर क्या था, उस साथी को बहुत सुननी पड़ी। लेकिन वरिष्ठ अधिकारी ने उनकी पैरवी नहीं की और न ही यह बताने का साहस किया कि वो इस हेडिंग की जमकर तारीफ कर चुके हैं।
अगर यह हेडिंग गलत थी, तो इसको पेज पर चिपकाने में उन वरिष्ठ अधिकारी का भी तो योगदान था। उन्होंने यह हेडिंग उसी समय क्यों नहीं बदलवाया। पेज पर कोई गलती न जाएं, खबरों में कंटेंट संबंधी किसी परेशानी के हल के लिए उनको यह वरिष्ठ पद और वेतन मिल रहा था।
जरा जरा सी गलतियों पर पूरा पेज तुड़वाने वाले, नजर अंदाज की जाने वाली गलतियों पर शोर मचाकर जूनियर्स को फटकारने वाले उन अधिकारी ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया। अगर उनकी नजर में वो हेडिंग सही थी तो बड़े अधिकारी के सामने मजबूती से पक्ष रखते।

पर ऐसा नहीं हुआ और कुछ समय बाद एक जरा सी गलती पर डेस्क के उन साथी को नौकरी से बाहर होना पड़ा। मुझे वो साथी आज भी मिलते हैं। जब भी उनसे मिलता हूं तो वो वाकया याद आ जाता है।
जूनियर के पेज चेक करते हैं, उसमें किसी गलती के लिए सीनियर स्वयं की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते। सीनियर्स को तनख्वाह तो जिम्मेदारी की मिलती है। अगर मेहनत के आधार पर तनख्वाह दी जाती है तो सबसे ज्यादा पैसा अखबारों में जूनियर्स, स्ट्रिंगर्स, फोटोग्राफर्स व ट्रेनियों को मिलना चाहिए। बड़े अधिकारियों को तो बिल्कुल भी नहीं।
हो सकता है, हेडिंग के बारे में किन्हीं और का ज्ञान बहुत ज्यादा हो। पर, मैंने जो महसूस किया, वो साझा कर दिया। कल एक बार फिर उन ट्रेनियों पर बात करेंगे, जो अपने काम से ज्यादा दूसरों के कंप्यूटरों की स्क्रीन पर ज्यादा ध्यान देते हैं। एक बार किसी बड़े अधिकारी का खास ट्रेनी उस खबर को संपादित करने बैठ गया, जिसको लिखने के लिए कहने पर इधर, उधर हो गया था। संपादन के नाम पर उस खबर में क्या किया गया, आपसे कल जिक्र करेंगे। तब तक के लिए बहुत सारा धन्यवाद।

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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