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पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा ने जब पेड़ों को बचाने के लिए जीवन दांव पर लगा दिया

  • प्रदीप बहुगुणा
  • लेखक श्री सुंदर लाल बहुगुणा के सुपुत्र एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।
श्रीनगर से 32 किमी दूर बडियारगढ़ में चीड़ के हरे पेड़ों को कटने से बचाने के लिए सुंदर लाल बहुगुणा (Sundar Lal Bahuguna) ने अपनी जान ही दांव पर लगा दी। आपदा की दृष्टि से संवेदनशील तीखे ढालों पर हर हालत में पेड़ काटने पर उतारू वन निगम को उसकी गलती का एहसास दिलाने के लिए सुंदर लाल बहुगुणा एक पेड़ को कटने से बचाने के लिए उसके नीचे ही उपवास पर बैठ गए।
पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर पहले टिहरी व फिर देहरादून जेल ले गयी। बहुगुणा ने अपना उपवास लोक नायक जय प्रकाश नारायण की अपील पर तब ही तोड़ा जब तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने वहां के जंगल को संरक्षित घोषित करने और हरे पेड़ों के कटान पर रोक लगाने का आश्वासन दिया।
  • बडियारगढ़ में चीड़ के हरे पेड़ों की कटाई के विरोध में सुंदर लाल बहुगुणा ने किया उपवास
  • 24 दिन लंबा उपवास टिहरी और देहरादून जेल में भी जारी रहा, समर्थन में उमड़े लोग
  • सरकार के पेड़ों की कटाई पर रोक के आश्वासन के बाद देहरादून जेल में तोड़ा उपवास
  • इसके बाद ही पर्वतीय इलाकों में हरे पेड़ों के कटान पर रोक के लिए वन संरक्षण अधिनियम बना
बडियारगढ़ के ढालढुंग गांव में 22-23 अगस्त 1978 की रात को रेड़े रवाड़े से भारी तबाही हुयी थी। दो मकान ध्वस्त हो गए थे और उनमें दो परिवारों के 5 लोग जिंदा ही दफन हो गए थे। उनकी लाशें तीन दिन बाद निकाली जा सकीं, जबकि 13 बकरियां, 3 भैंसें और 2 गायें मलबे में ही दबी रह गयीं।
वहां तब कार्यरत ग्राम सेवक नारयण सिंह और बडियार के जमन सिंह का कहना था कि गांव के ऊपर पहाड़ी पर वर्ष 1976-77 में हुए पेड़ कटान और तीखे ढालो पर लुढ़काए गए उनके गेलों की वजह से अतिवृष्टि ने गांव पर कहर बरपाया।
कोट गांव के गदेरे में आए मलबे से कई पनचक्कियां और खेत तबाह हो गए थे। धौड़गी गांव के ऊपर पहाड़ी में दरार पड़ गयी तो गांव के लोग डर के मारे कई दिन तक पंचायती भवन में रहे। घंडियालधर पटवार क्षेत्र में भी 8 मकान टूटे थे। ऐसे में मालगड्डी जंगल में फिर से वन निगम द्वारा पेड़ काटने की खबर से गांव वाले चिंतित होने लगे।
विश्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा जी की डायरी का पेज। साभार- प्रदीप बहुगुणा
बडियार क्षे़त्र में तबाही के बाद सुंदर लाल बहुगुणा ने इलाके का दौरा किया था। ऐसे में श्रीनगर में पढ़ रहे शांति लाल गैरोला ने गोचर बस से जा रहे सुंदर लाल बहुगुणा को पत्र लिख कर दिया कि बडियारगढ़ में फिर से तबाही लाने की तैयार हो रही है। वहां वन निगम बड़े पैमाने पर चीड़ के पेड़ कटवाने जा रहा है।
पत्र मिलते ही 24 दिसंबर 1978 को बहुगुणा अपने साथियों के साथ वहां पहुंच गए। उसी दिन वहां सभा कर तय किया गया कि स्थानीय लोग पेड़ कटने से बचाने के लिए चिपको आंदोलन चलाएंगे और एक भी पेड़ नहीं कटने देंगे। गोविंद सिंह पंवार की अध्यक्षता में हुयी बैठक में कीर्तिनगर के ब्लाॅक प्रमुख सत्ये सिंह भंडारी, धद्दी घंडियाल हाईस्कूल के प्रधानाचार्य राधाकृष्ण थपलियाल समेत काफी संख्या में स्थानीय लोग मौजूद थे।
विश्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा जी की डायरी का पेज। साभार- प्रदीप बहुगुणा
प्रधानाचार्य थपलियाल ने कहा कि चिपको आंदोलन के पीछे व्यक्तिगत नहीं सामूहिक भावना है। हमें देश के मुकुट को भी बचाना है। जिन लोगों का यह ख्याल है कि इस वन कटान का मैदान पर असर नहीं पड़ेगा, उनकी यह भूल है। हम अपने को ही नहीं बल्कि देश को भी बचाना चाहते हैं।
बरसात का पानी सोखने को भी पेड़ों को बचाना जरूरी है जिसे बाढ़ की रोकथाम हो सके। बाद में बडियार से धद्दी के बीच मोटर रोड पर:- क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी पानी और बयारआज हिमालय जागेगा,क्रूर कुल्हाड़ा भागेगा और पेड़ गिराने वालों सोचो, धरती मां की खाल न नोचो। जैसे नारों के साथ जुलूस भी निकाला गया।
विश्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा जी की डायरी का पेज। साभार- प्रदीप बहुगुणा
इस बीच वन निगम ने 150 मजदूर मालगड्डी जंगल में उतार दिए। अगले दिन 25 दिसंबर को लोग ढोलबाजों के साथ मालगड्डी के जंगल पहुंचे और कटने के लिए अंकित पेड़ों पर चिपक कर अपनी भावना को उजागर किया। वे नारे लगा रहे थेः- पेड़ों पर हथियार उठेंगे, हम भी उसके साथ कटेंगे
उधर पेड़ कटान के खिलाफ एकजुट हुए लोगों को तोड़ने के लिए वन निगम के अधिकारियों ने हर तरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए। ग्रामीणों को डराया गया कि उन्होंने पेड़ नहीं कटने दिए तो उन्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी। निगम के सीएलओ ने मालगड्डी गांव के लिए पानी का हौज बनाकर देने का लालच दिया। यही नहीं वहां के तीन लड़कों को भी निगम में नौकरी दे दी। प्राइवेट हाईस्कूल को अनुदान देने की बात भी की गयी। हाईस्कूल का एक कमरा निगम ने किराये पर ले लिया।
विश्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा जी की डायरी का पेज। साभार- प्रदीप बहुगुणा
गांव के लोगों से कहा गया कि चीड़ के पेड़ों से उन्हें कोई फायदा नहीं है। उनसे खेतों में छाया होती है और उनकी पत्तियों से लोगों और मवेशियों के फिसलने का खतरा रहता है। लोगों डराने के लिए धद्दी घंडियाल हाईस्कूल में अस्थाई पुलिस थाना भी खोल दिया गया।
ऐसे में बहुगुणा और उनके सहयोगी धूम सिंह नेगी, कुंवर प्रसून, विजय जड़धारी घर-घर जाकर लोगों को समझाने लगे। बहुगुणा 27 दिसंबर की रात को 3 किमी पैदल चलकर मैताब सिंह के घर पहुंचे और चिपको के संबंध में उनकी भ्रांतिया दूर कीं।
28 को तड़के बहुगुणा उस घर में पहुंचे जहां कुंवर प्रसून और विजय जड़धारी ठहरे थे उन्होंने दोनों को जगाया तो वे हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने बहुगुणा को बताया कि कांडा के बचन सिंह ने उन्हें जानकारी दी है धद्दी घंडियाल में 12 साल बाद होने वाली जात में हजारों लोग जुटने वाले हैं।
3 जनवरी से जंगल में पेड़ काटने की शुरुआत होते ही लोग पेड़ों पर चिपक गए और पेड़ नहीं कटने दिए। इस बीच लोक कवि घनश्याम सैलानी और हेंवलघाटी से दयाल भाई भी बडियारगढ़ पहुंच गए। सैलानी के गीतों ने आंदोलन में नई जान फूंक दी। वे भी घर-घर जाकर लोगों से आंदोलन में जुड़ने का आह्वान करने लगे। बहुगुणा के बेटे राजीव बहुगुणा उनके साथी उम्मेद सिंह और हरगोविंद भी घर-घर जाकर लोगों को आंदोलन से जोड़ने के लिए एक-एक मुट्ठी अनाज या एक-एक रोटी मांगने लगे।
पेड़ काटने के खिलाफ लोगों के एकजुट होते ही वन निगम ने अपनी रणनीति बदल दी। जंगल से गांव दूर था ऐसे में मजदूर रात में और बहुत सुबह पेड़ काटने लगे। जंगल में सुंदर लाल बहुगुणा एक झोपड़ी में अकेले ही थे। ऐेसे में उन्होंने विरोध स्वरूप 9 जनवरी को अपने जन्मदिन से उपवास शुरू कर दिया। वे श्रमिकों के पांव छू कर उनसे पेड़ न काटने का आग्रह करते। मजदूर नहीं मानते तो बहुगुणा अकेले ही पेड़ से चिपक जाते।
एक दिन बाद ही पेड़ कटवाने वालों ने उस झोपड़ी में आग लगा दी जिसमें बहुगुणा रह रहे थे तो बहुगुणा खुले आसमान के नीचे ही अपना आसन जमा लिया। लोगों को जब इसका पता चला तो बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए।
एक पूर्व सैनिक ने रहने के लिए बहुगुणा को रहने के लिए अपनी झोपड़ी दे दी। उपवास के बाद जब तक बहुगुणा के शरीर मे चलने-फिरने की ताकत रही, वे गांव से लोेगों के आने तक अकेले ही पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उनसे चिपकते रहे। आंदोलन की शुरुआत में संकोच के मारे महिलाएं शामिल नहीं हुईं।
कुछ दिन बाद बहुगुणा की पत्नी विमला बहुगणा केमर से 4 महिलाओं मंगसीरी देवी, नंदा देवी, भुरी देवी और सत्येश्वरी देवी को लेकर बडियारगढ़ पहुंच गईं। अब तो उनके साथ बड़ी संख्या में महिलाएं भी पेड़ बचाने के आंदोलन में कूद पड़ीं।
कुमाऊं से दीक्षा बहन भी महिलाओं का उत्साह बढ़ाने वहां पहुंच गईं। पेड़ बचाने के आंदोलन में 8 साल का नरेंद्र और 84 साल के चंद्र सिंह तक शामिल थे। 22 जनवरी को अंधेरे में ही 4 बजे सुंदर लाल बहुगुणा को गिरफ्तार कर टिहरी जेल भेज दिया गया। उस वक्त झोपड़ी में बहुगुणा की पत्नी विमला बहुगुणा और 5 महिलाएं ही थीं।
उन्हें बताया गया कि बहुगुणा को स्वास्थ्य परीक्षण के लिए कीर्तिनगर ले जाया जा रहा है। बहुगुणा को ले जाने आई पुलिस के साथ एक डाॅक्टर भी था। दिन में जब लोगों को पता चला कि बहुगुणा को गिरफ्तार कर लिया गया है तो आंदोलन ने और जोर पकड़ लिया। उसके बाद तमाम कोशिशों के बाद मालगड्डी के जंगल में पेड़ नहीं कट पाए।
उधर, टिहरी में सुंदर लाल बहुगुणा को 23 जनवरी को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया, लेकिन बहुगुणा ने इनकार कर दिया। उधर बहुगुणा को रिहा करने की मांग को लेकर टिहरी में जुलूस प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया तो 27 जनवरी की रात 12 बजे उन्हें देहरादून जेल शिफ्ट करा दिया गया। पर उनकी गिरफ्तारी के विरोध में देहरादून में भी आंदोलन शुरू हो गया। छात्र नेता विवेक खंडूड़ी ने उसकी कमान संभाल ली।
इस बीच गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति ने देश के नाम अपने संदेश में हिमालय में वन विनाश पर चिंता व्यक्त की। केंद्रीय गृह मंत्री एचएम पटेल ने पहाड़ में वन कटान पर दुख जताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि पेड़ कटान पर पाबंदी लगाने से उसे जो घाटा होगा उसकी पूर्ति केंद्र सरकार से करने को वे कहेंगे।
उधर, दूसरी ओर बहुगुणा की गिरफ्तारी के बाद मालगड्डी में क्षेमानंद शास्त्री ने भागवत कथा शुरू कर दी। इसमें बड़ी संख्या में लोग जुटने लगे तो ग्रामीणों को डराने के लिए राजस्व पुलिस ने बड़ी संख्या में उनको नोटिस थमाने शुरू कर दिए। कथा सुनने जाते लोगों को पटवारी और कानूनगो रोक-रोक कर नोटिस थमाने लगे कि उन्हें भी अब जेल भेजा जाएगा पर लोग विचलित नहीं हुए, उल्टे 28 जनवरी को नारायण सिंह जयाड़ा की अध्यक्षता में हुई धद्दी घंडियाल हाईस्कूल प्रबंध समिति की बैठक में वन निगम से स्कूल का कमरा खाली करने का प्रस्ताव पारित कर उसे खाली करा दिया गया।
आंदोलन के चलते वन निगम के गिरानी मजदूर तो वापस लौट गए लेकिन रोके गए 93 चिरानी मजदूरों से निगम कटे पेड़ों का चिरान भी नहीं करा पाया। ग्रामीणों का तर्क था कि पिछले 5 साल से उन्हें पीडी की लकड़ी नहीं मिली है और उसका उपयोग ग्रामीण करेंगे।
साथ ही दो महीने तक खाली बैठे मजदूरों को बिना मजदूरी दिए बिना लौटाने का ग्रामीणों ने डट कर विरोध किया और उन्हें 12 रुपये 60 पैसे की दर से मजदूरी दिलवायी। 1 फरवरी को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वहां हरे पेड़ों के कटान पर रोक की घोषणा के बाद 24 दिन बाद देहरादून जेल में दक्षिण के सर्वोदयी नेता एस जगन्नाथन के हाथों सुंदर लाल बहुगुणा ने अपना उपवास तोड़ दिया, लेकिन आंदोलन के डर से उनकी न्यायिक हिरासत 14 दिन के लिए और बढ़ा दी गई।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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