By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Reading: हकीकत ए उत्तराखंडः सचिवालय में लड़वाकोट का पत्थर रख दें तो क्या सचिवालय लड़वाकोट हो जाएगा
Share
Notification Show More
Font ResizerAa
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
Font ResizerAa
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Advertise
  • Advertise
© 2022 Foxiz News Network. Ruby Design Company. All Rights Reserved.
- Advertisement -
Ad imageAd image
NEWSLIVE24x7 > Blog > Analysis > हकीकत ए उत्तराखंडः सचिवालय में लड़वाकोट का पत्थर रख दें तो क्या सचिवालय लड़वाकोट हो जाएगा
AnalysisBlog LiveFeaturedstudyUttarakhand

हकीकत ए उत्तराखंडः सचिवालय में लड़वाकोट का पत्थर रख दें तो क्या सचिवालय लड़वाकोट हो जाएगा

Rajesh Pandey
Last updated: September 2, 2021 9:16 pm
Rajesh Pandey
5 years ago
Share
लड़वाकोट गांव से करीब चार किमी. पहले लगा मील का पत्थर, जिसके अनुसार लड़वाकोट गांव यही है, जहां तक सड़क बनी है।
SHARE

उत्तराखंड का सरकारी सिस्टम इतना गजब का है कि अगर लड़वाकोट को सचिवालय और सचिवालय को लड़वाकोट के पास लाना हो तो मिनट नहीं लगाएगा। अब आप पूछोगे कि लड़वाकोट क्या है, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह देहरादून से मात्र 40 किमी. दूर स्थित एक गांव है, जहां से हर चुनाव सड़क का वादा करके वोट इकट्ठे किए जाते हैं।

पर, यह देखने कोई नहीं आता कि गांव से बीमार व्यक्ति को अस्पताल कैसे ले जाते हैं, आठवीं के बाद की पढ़ाई के लिए बेटियां रोजाना 16 किमी. कैसे आती हैं, और भी बहुत सारे सवाल हैं, जिनके जवाब सरकारी सिस्टम और जनप्रतिनिधियों के पास नहीं मिलेंगे। हकीकत ए उत्तराखंड के भाग 2 को कवर करने हम इस गांव में जा रहे हैं, यहां की कहानी को आपसे साझा करने के लिए…

लड़वाकोट ग्राम पंचायत देहरादून जिला के रायपुर ब्लाक में आता है। इसका राजस्व गांव लड़वाकोट थानो से बडेरना को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग से थोड़ा हटकर है। यह अपर तलाई और धारकोट ग्राम पंचायत के पास है। लड़वाकोट को दूरस्थ गांव इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यहां तक सड़क नहीं पहुंची। यहीं नहीं, इसी ग्राम पंचायत के एक और गांव पलेड तक भी सड़क नहीं पहुंची। पलेड़ की व्यथा पर विस्तार से अगली श्रृंख्ला में बात करेंगे।

थानो से धारकोट तक रास्ता बन गया। इस रूट पर अच्छा लगता है आगे बढ़ना। एक तरफ हरियाली और दूसरी तरफ बहुत गहराई में विस्तार लेती विधालना नदी। बरसात में विधालना पहाड़ों से बहुत सारा पानी इकट्ठा करते आगे बढ़ रही है, कितना अच्छा लगता है एक नदी को ऊँची पहाड़ियों से देखना।

हमें लड़वाकोट जाना था, पर बाईं ओर धारकोट की ओर जाते रास्ते पर गाड़ी आगे बढ़ाने का मोह नहीं छोड़ पाए। कुछ ही दूरी पर, जहां से धारकोट के स्कूलों का रास्ता जाता है, वहां से घाटी में देहरादून के नथुवावाला, बालावाला को बार-बार देखने का मन करता है। पर, सुबह करीब दस बजे, बारिश की वजह से छाई धुंध ने हमें निराश किया। धारकोट पर प्रकृति ने खूब मेहरबानी की है, पर जल संकट यहां बहुत परेशान करता है।

वापस बढेरना वाले रास्ते पर आगे बढ़े। यहां से आगे सड़क सही नहीं है। कुछ दूरी बाद, बाई ओर मुड़े और अपर तलाई ग्राम पंचायत के ऊपरी हिस्से पर पहुंच गए। इस रास्ते से अपर तलाई गांव दिखता है, जो अभी तक घूमे गए गांवों में सबसे अच्छा लगा। इस गांव से आगे बढ़ेंगे तो ऊबड़ खाबड़ जंगली रास्तों से होते हुए चित्तौर पहुंच जाएंगे। चित्तौर के तो कहने ही क्या। इसे देखकर, आप दोहराओगे, भारत की आत्मा गांवों में बसती है।

लड़वाकोट जाते हुए फिर वही सवाल दिमाग को सुन्न कर देता है कि पहाड़ के इन इलाकों में सड़क क्यों नहीं बनाई जा रही है। बड़ी मुश्किल से कार पहाड़ चढ़ रही थी। एक घुमाव पर स्थित पहाड़ के पास पत्थरों का ढेर लगा है। यहां किसी के लिए कुछ देर रुकना भी खतरे से खाली नहीं है। पास में ही शहर से आए कुछ युवा, प्राकृतिक नजारों के साथ शांत ठंडी हवा का लुत्फ उठाते मिले। हमने उनको वहां से दूर जाने की सलाह दी।

देहरादून जिला के थानो से लड़वाकोट जाने का रास्ता। फोटो- डुगडुगी

हम वहां तक पहुंच गए, जहां से लड़वाकोट का पैदल रास्ता नापना था, वो भी चार किमी. का। वरिष्ठ पत्रकार योगेश राणा ने मेरी तरफ देखा और बोले, राजेश तैयार हो। मेरा जवाब था, जब यहां पहुंच ही गए तो देखा जाएगा। हम अभी-अभी तो पलेड की तीन किमी. की ऊंचाई नाप कर पहुंचे थे। पलेड तक पहुंचने में मेरी सांसें उखड़ने लगी थीं। पूरा किस्सा बताऊंगा, पहले अभी लड़वाकोट।

लड़वाकोट से लगभग चार किमी. पहले लगा यह पत्थर बताता है यहां से धारकोट 4 किमी. दूर है। फोटो- डुगडुगी

हमारी नजर,    मील के पत्थर पर पड़ी, जिस के एक तरफ लिखा था, लड़वाकोट जीरो (0) किमी।  मैंने राणा जी से कहा, लड़वाकोट तो हम आ गए, अब आगे कहां जाना है। पत्थर के दूसरी तरफ देखो, इस पर लिखा है धारकोट 4 किमी.। आपको गलतफहमी हो गई, लड़वाकोट तो यहीं है, जहां हम खड़े हैं, यहां से धारकोट चार किमी. है, जिसे हम पीछे छोड़ आए हैं। मुझे मालूम था कि यह पत्थर हमारे सरकारी सिस्टम की कारगुजारी है, जो उन ग्रामीणों की पीड़ा को नहीं समझता, जिनको हर मौसम उबड़ खाबड़ रास्तों पर चलने का जोखिम उठाना पड़ता है।

राणा जी ने तपाक से जवाब दिया, अगर यही पत्थर उत्तराखंड के सचिवालय के बाहर लगा दिया जाए, तो क्या सचिवालय लड़वाकोट में हो जाएगा। सचिवालय का बोर्ड यहां लगा दें तो क्या सचिवालय यहां हो जाएगा। इसी तरह की हकीकत से  रू-ब-रू कराने के लिए ही तो हम पहाड़ के जोखिमभरे रास्तों पर चल रहे हैं।

ग्राम प्रधान शिवानी देवी के प्रतिनिधि सैन सिंह पुंडीर, जो वहां पहले से मौजूद थे, का कहना है कि जिस स्थान पर यह पत्थर लगा है, वो अपर तलाई ग्राम पंचायत का हिस्सा है। अपर तलाई में पत्थर लगाकर यहीं पर लड़वाकोट घोषित कर दिया गया, जबकि लड़वाकोट यहां से चार किमी. आगे है। उनको अंदेशा है कि कहीं, इस पत्थर को आधार बनाकर कागजों में यह घोषित तो नहीं कर दिया गया कि लड़वाकोट तक सड़क बन गई है।

लड़वाकोट निवासी जितेंद्र कंडारी ने हमें अपना गांव दिखाने के लिए यूटिलिटी के ड्राइवर वाले केबिन में बैठा लिया। बाकी लोग, पिछले हिस्से में खड़े होकर लड़वाकोट के सफर पर हमारे साथ थे। हम बार-बार उछलती यूटीलिटी में झटके महसूस कर रहे थे। इस रास्ते पर किसी अस्वस्थ व्यक्ति को कैसे अस्पताल ले जा सकते हैं। यह रास्ता तो हड्डियों के बने बनाए जोड़ खोलने के लिए काफी है। किसी व्यक्ति को आपरेशन के बाद, इस रास्ते से घर नहीं ले जा सकते। किसी महिला को प्रसव के लिए इस रास्ते से ले जाने का मतलब है, जानबूझकर जान को जोखिम में डालना।

यहां यूटीलिटी चलाने के लिए कुशल ड्राइवर ही चाहिए। जितेंद्र बताते हैं कि हमारे गांव में एक-दो युवाओं के पास यूटिलिटी है, जो गांव के लोगों को थानो तक ले जाते हैं, पर वहां इसके लिए टाइम फिक्स है। सुबह आठ बजे से यहां से और शाम चार बजे थानो से, गाड़ी चलती है। एक तरफ का किराया 50 रुपये है। यहां किसी और गांव की तरह, जब मन किया या कोई काम पड़ा, गाड़ी उठाकर चल दिए, ऐसा नहीं हो सका।  बरसात में यह रास्ता मलबे से बंद हो जाता है। इस रास्ते में सामने से कोई यूटीलिटी आ गई तो बड़ी मुश्किल हो जाती है। जगह ही नहीं है।

लड़वाकोट के रास्ते पर सफाई करते स्थानीय युवा। फोटो- डुगडुगी

रास्ते में युवा राकेश से मुलाकात हुई, जो अपने साथियों के साथ रास्ते को सही कर रहे हैं। बताते हैं कि बरसात में रास्ते से होते हुए पानी बहता है। सड़क पहले से ज्यादा उबड़ खाबड़ हो जाती है। किनारों पर उगी झाड़ियां बढ़ जाती हैं। समय-समय पर रास्ता सही करते रहते हैं। कहीं पहाड़ से मिट्टी खिसक जाती है, तो वो भी हटानी पड़ती है। ये सारे काम गांववाले ही करते हैं। यहां कोई कर्मचारी नहीं आता। राकेश इस बात पर जोर डालते हैं कि सड़क के बिना विकास कैसा।

युवा सुनील सिंह बताते हैं कि उनके गांव में अदरक, हल्दी, बीन्स सहित कई उपज होती हैं। यहां खच्चर नहीं हैं, फसल को थानो तक कैसे ले जाएं। यूटीलिटी से फसल ले जाते हैं तो दाम बढ़ जाता है। संजय सिंह बताते हैं कि यह रास्ता भी गांववालों ने ही बनाया है। सरकार ने तो वहीं तक सड़क बनाई है, जहां उन्होंने लड़वाकोट का पत्थर लगाया है।

देहरादून जिला के लड़वाकोट के कच्चे रास्ते पर दिखता है जल संग्रह का उपाय। फोटो- डुगडुगी

लड़वाकोट गांव तक पहुंचने का रास्ता ऊबड़ खाबड़ भले ही है, पर नजारे मन को मोह लेने वाले हैं। पहाड़ में भ्रमण के दौरान अक्सर यही सोचता हूं कि प्रकृति के पास रहकर आप स्वस्थ रहेंगे, आपका खानपान शुद्ध होगा, मन आनंदित होगा, पर जब यहां की चुनौतियों को जानता हूं तो तुरंत समझ में आता है कि यहां जीवन उतना सरल नहीं है, जितना हम जैसे लोगों, जो कुछ दिन के लिए यहां आते हैं, को लगता है।

लड़वाकोट जाने वाला रास्ता, जोखिम से भरा है। फोटो- डुगडुगी

आखिरकार हम पहुंच ही गए उस लड़वाकोट में, जहां आने की इच्छा थी। पुराने और नये भवनों वाला यह गांव, वर्षा आधारित होने के बाद भी खेतीबाड़ी में समृद्ध दिखता है। यहां पानी है, बिजली है, पर सड़क नहीं है।

देहरादून जिला के लड़वाकोट गांव में वरिष्ठ पत्रकार योगेश राणा। फोटो- डुगडुगी

खेतीबाड़ी इस गांव की शक्ति है, पर इसको और मजबूत बनाने में सरकारी मदद की दरकार है। यह मदद भी तभी उपयोगी हो सकती है, जब सड़क बन जाए, ऐसा गांववालों का मानना है।

देहरादून जिला के लड़वाकोट के निवासियों सैन सिंह कंडारी, राजपाल मनवाल व विक्रम सिंह कंडारी के साथ वरिष्ठ पत्रकार योगेश राणा। फोटो- डुगडुगी

स्वीकृति के बाद 900 मीटर सड़क रोक दी

” लड़वाकोट गांव को उसकी जगह से चार किमी. पहले ही घोषित कर दिया गया।  यह कितना बड़ा करप्शन है। उस पत्थर से आगे लड़वाकोट ग्राम पंचायत में प्रवेश करते हुए 900 मीटर रोड पहले से स्वीकृत है, पर बनाई नहीं गई। इससे पहले भी जो चार किमी. सड़क बनी है, वो तलाई ग्राम पंचायत में है। अगर इसमें वन विभाग का कोई पेंच फंसा होता तो हमें वो लोग, जिनसे हमारी वार्ता हो रही है, वो कहते कि अभी एनओसी मिलनी बाकी है। हमें लगता है, सब कुछ हो रखा है। सरकारी सिस्टम हम सभी को गुमराह कर रहा है। पंद्रह साल से तो हम लगातार सड़क के लिए दौड़ लगा रहे हैं”, क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता राजपाल मनवाल बताते हैं।

लड़वाकोट गांव के कच्चे रास्ते पर लकड़ियों का बोझ लेकर आती एक महिला। बरसात में यह रास्ता चलने लायक नहीं होता। फोटो- डुगडुगी

मनवाल कहते हैं कि अगर वन विभाग से एनओसी का मामला है तो सरकार क्या कुछ नहीं कर सकती। वो सवाल उठाते हैं, शहरों में हाईवे बनाने के लिए, बिल्डिंग्स बनाने के लिए तुरंत एनओसी क्यों मिल जाती है? वहां इन सभी निर्माण से फायदा होता है, गांव की सड़क बनाने से उनको क्या मिलेगा।

Contents
उत्तराखंड का सरकारी सिस्टम इतना गजब का है कि अगर लड़वाकोट को सचिवालय और सचिवालय को लड़वाकोट के पास लाना हो तो मिनट नहीं लगाएगा। अब आप पूछोगे कि लड़वाकोट क्या है, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह देहरादून से मात्र 40 किमी. दूर स्थित एक गांव है, जहां से हर चुनाव सड़क का वादा करके वोट इकट्ठे किए जाते हैं।पर, यह देखने कोई नहीं आता कि गांव से बीमार व्यक्ति को अस्पताल कैसे ले जाते हैं, आठवीं के बाद की पढ़ाई के लिए बेटियां रोजाना 16 किमी. कैसे आती हैं, और भी बहुत सारे सवाल हैं, जिनके जवाब सरकारी सिस्टम और जनप्रतिनिधियों के पास नहीं मिलेंगे। हकीकत ए उत्तराखंड के भाग 2 को कवर करने हम इस गांव में जा रहे हैं, यहां की कहानी को आपसे साझा करने के लिए…लड़वाकोट ग्राम पंचायत देहरादून जिला के रायपुर ब्लाक में आता है। इसका राजस्व गांव लड़वाकोट थानो से बडेरना को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग से थोड़ा हटकर है। यह अपर तलाई और धारकोट ग्राम पंचायत के पास है। लड़वाकोट को दूरस्थ गांव इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यहां तक सड़क नहीं पहुंची। यहीं नहीं, इसी ग्राम पंचायत के एक और गांव पलेड तक भी सड़क नहीं पहुंची। पलेड़ की व्यथा पर विस्तार से अगली श्रृंख्ला में बात करेंगे।थानो से धारकोट तक रास्ता बन गया। इस रूट पर अच्छा लगता है आगे बढ़ना। एक तरफ हरियाली और दूसरी तरफ बहुत गहराई में विस्तार लेती विधालना नदी। बरसात में विधालना पहाड़ों से बहुत सारा पानी इकट्ठा करते आगे बढ़ रही है, कितना अच्छा लगता है एक नदी को ऊँची पहाड़ियों से देखना।हमें लड़वाकोट जाना था, पर बाईं ओर धारकोट की ओर जाते रास्ते पर गाड़ी आगे बढ़ाने का मोह नहीं छोड़ पाए। कुछ ही दूरी पर, जहां से धारकोट के स्कूलों का रास्ता जाता है, वहां से घाटी में देहरादून के नथुवावाला, बालावाला को बार-बार देखने का मन करता है। पर, सुबह करीब दस बजे, बारिश की वजह से छाई धुंध ने हमें निराश किया। धारकोट पर प्रकृति ने खूब मेहरबानी की है, पर जल संकट यहां बहुत परेशान करता है।वापस बढेरना वाले रास्ते पर आगे बढ़े। यहां से आगे सड़क सही नहीं है। कुछ दूरी बाद, बाई ओर मुड़े और अपर तलाई ग्राम पंचायत के ऊपरी हिस्से पर पहुंच गए। इस रास्ते से अपर तलाई गांव दिखता है, जो अभी तक घूमे गए गांवों में सबसे अच्छा लगा। इस गांव से आगे बढ़ेंगे तो ऊबड़ खाबड़ जंगली रास्तों से होते हुए चित्तौर पहुंच जाएंगे। चित्तौर के तो कहने ही क्या। इसे देखकर, आप दोहराओगे, भारत की आत्मा गांवों में बसती है।लड़वाकोट जाते हुए फिर वही सवाल दिमाग को सुन्न कर देता है कि पहाड़ के इन इलाकों में सड़क क्यों नहीं बनाई जा रही है। बड़ी मुश्किल से कार पहाड़ चढ़ रही थी। एक घुमाव पर स्थित पहाड़ के पास पत्थरों का ढेर लगा है। यहां किसी के लिए कुछ देर रुकना भी खतरे से खाली नहीं है। पास में ही शहर से आए कुछ युवा, प्राकृतिक नजारों के साथ शांत ठंडी हवा का लुत्फ उठाते मिले। हमने उनको वहां से दूर जाने की सलाह दी।हम वहां तक पहुंच गए, जहां से लड़वाकोट का पैदल रास्ता नापना था, वो भी चार किमी. का। वरिष्ठ पत्रकार योगेश राणा ने मेरी तरफ देखा और बोले, राजेश तैयार हो। मेरा जवाब था, जब यहां पहुंच ही गए तो देखा जाएगा। हम अभी-अभी तो पलेड की तीन किमी. की ऊंचाई नाप कर पहुंचे थे। पलेड तक पहुंचने में मेरी सांसें उखड़ने लगी थीं। पूरा किस्सा बताऊंगा, पहले अभी लड़वाकोट।हमारी नजर,    मील के पत्थर पर पड़ी, जिस के एक तरफ लिखा था, लड़वाकोट जीरो (0) किमी।  मैंने राणा जी से कहा, लड़वाकोट तो हम आ गए, अब आगे कहां जाना है। पत्थर के दूसरी तरफ देखो, इस पर लिखा है धारकोट 4 किमी.। आपको गलतफहमी हो गई, लड़वाकोट तो यहीं है, जहां हम खड़े हैं, यहां से धारकोट चार किमी. है, जिसे हम पीछे छोड़ आए हैं। मुझे मालूम था कि यह पत्थर हमारे सरकारी सिस्टम की कारगुजारी है, जो उन ग्रामीणों की पीड़ा को नहीं समझता, जिनको हर मौसम उबड़ खाबड़ रास्तों पर चलने का जोखिम उठाना पड़ता है।राणा जी ने तपाक से जवाब दिया, अगर यही पत्थर उत्तराखंड के सचिवालय के बाहर लगा दिया जाए, तो क्या सचिवालय लड़वाकोट में हो जाएगा। सचिवालय का बोर्ड यहां लगा दें तो क्या सचिवालय यहां हो जाएगा। इसी तरह की हकीकत से  रू-ब-रू कराने के लिए ही तो हम पहाड़ के जोखिमभरे रास्तों पर चल रहे हैं।ग्राम प्रधान शिवानी देवी के प्रतिनिधि सैन सिंह पुंडीर, जो वहां पहले से मौजूद थे, का कहना है कि जिस स्थान पर यह पत्थर लगा है, वो अपर तलाई ग्राम पंचायत का हिस्सा है। अपर तलाई में पत्थर लगाकर यहीं पर लड़वाकोट घोषित कर दिया गया, जबकि लड़वाकोट यहां से चार किमी. आगे है। उनको अंदेशा है कि कहीं, इस पत्थर को आधार बनाकर कागजों में यह घोषित तो नहीं कर दिया गया कि लड़वाकोट तक सड़क बन गई है।लड़वाकोट निवासी जितेंद्र कंडारी ने हमें अपना गांव दिखाने के लिए यूटिलिटी के ड्राइवर वाले केबिन में बैठा लिया। बाकी लोग, पिछले हिस्से में खड़े होकर लड़वाकोट के सफर पर हमारे साथ थे। हम बार-बार उछलती यूटीलिटी में झटके महसूस कर रहे थे। इस रास्ते पर किसी अस्वस्थ व्यक्ति को कैसे अस्पताल ले जा सकते हैं। यह रास्ता तो हड्डियों के बने बनाए जोड़ खोलने के लिए काफी है। किसी व्यक्ति को आपरेशन के बाद, इस रास्ते से घर नहीं ले जा सकते। किसी महिला को प्रसव के लिए इस रास्ते से ले जाने का मतलब है, जानबूझकर जान को जोखिम में डालना।यहां यूटीलिटी चलाने के लिए कुशल ड्राइवर ही चाहिए। जितेंद्र बताते हैं कि हमारे गांव में एक-दो युवाओं के पास यूटिलिटी है, जो गांव के लोगों को थानो तक ले जाते हैं, पर वहां इसके लिए टाइम फिक्स है। सुबह आठ बजे से यहां से और शाम चार बजे थानो से, गाड़ी चलती है। एक तरफ का किराया 50 रुपये है। यहां किसी और गांव की तरह, जब मन किया या कोई काम पड़ा, गाड़ी उठाकर चल दिए, ऐसा नहीं हो सका।  बरसात में यह रास्ता मलबे से बंद हो जाता है। इस रास्ते में सामने से कोई यूटीलिटी आ गई तो बड़ी मुश्किल हो जाती है। जगह ही नहीं है।रास्ते में युवा राकेश से मुलाकात हुई, जो अपने साथियों के साथ रास्ते को सही कर रहे हैं। बताते हैं कि बरसात में रास्ते से होते हुए पानी बहता है। सड़क पहले से ज्यादा उबड़ खाबड़ हो जाती है। किनारों पर उगी झाड़ियां बढ़ जाती हैं। समय-समय पर रास्ता सही करते रहते हैं। कहीं पहाड़ से मिट्टी खिसक जाती है, तो वो भी हटानी पड़ती है। ये सारे काम गांववाले ही करते हैं। यहां कोई कर्मचारी नहीं आता। राकेश इस बात पर जोर डालते हैं कि सड़क के बिना विकास कैसा।युवा सुनील सिंह बताते हैं कि उनके गांव में अदरक, हल्दी, बीन्स सहित कई उपज होती हैं। यहां खच्चर नहीं हैं, फसल को थानो तक कैसे ले जाएं। यूटीलिटी से फसल ले जाते हैं तो दाम बढ़ जाता है। संजय सिंह बताते हैं कि यह रास्ता भी गांववालों ने ही बनाया है। सरकार ने तो वहीं तक सड़क बनाई है, जहां उन्होंने लड़वाकोट का पत्थर लगाया है।लड़वाकोट गांव तक पहुंचने का रास्ता ऊबड़ खाबड़ भले ही है, पर नजारे मन को मोह लेने वाले हैं। पहाड़ में भ्रमण के दौरान अक्सर यही सोचता हूं कि प्रकृति के पास रहकर आप स्वस्थ रहेंगे, आपका खानपान शुद्ध होगा, मन आनंदित होगा, पर जब यहां की चुनौतियों को जानता हूं तो तुरंत समझ में आता है कि यहां जीवन उतना सरल नहीं है, जितना हम जैसे लोगों, जो कुछ दिन के लिए यहां आते हैं, को लगता है।आखिरकार हम पहुंच ही गए उस लड़वाकोट में, जहां आने की इच्छा थी। पुराने और नये भवनों वाला यह गांव, वर्षा आधारित होने के बाद भी खेतीबाड़ी में समृद्ध दिखता है। यहां पानी है, बिजली है, पर सड़क नहीं है।खेतीबाड़ी इस गांव की शक्ति है, पर इसको और मजबूत बनाने में सरकारी मदद की दरकार है। यह मदद भी तभी उपयोगी हो सकती है, जब सड़क बन जाए, ऐसा गांववालों का मानना है।स्वीकृति के बाद 900 मीटर सड़क रोक दी” लड़वाकोट गांव को उसकी जगह से चार किमी. पहले ही घोषित कर दिया गया।  यह कितना बड़ा करप्शन है। उस पत्थर से आगे लड़वाकोट ग्राम पंचायत में प्रवेश करते हुए 900 मीटर रोड पहले से स्वीकृत है, पर बनाई नहीं गई। इससे पहले भी जो चार किमी. सड़क बनी है, वो तलाई ग्राम पंचायत में है। अगर इसमें वन विभाग का कोई पेंच फंसा होता तो हमें वो लोग, जिनसे हमारी वार्ता हो रही है, वो कहते कि अभी एनओसी मिलनी बाकी है। हमें लगता है, सब कुछ हो रखा है। सरकारी सिस्टम हम सभी को गुमराह कर रहा है। पंद्रह साल से तो हम लगातार सड़क के लिए दौड़ लगा रहे हैं”, क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता राजपाल मनवाल बताते हैं।तीन बार हो चुका है सर्वेसेवानिवृत्त शिक्षक राय सिंह का कहना है कि तीन बार सर्वे हो चुका है। पेड़ों पर निशान लगा दिए गए। 2022 के चुनाव के बाद भी सड़क बनती है या नहीं बनती, कुछ नहीं मालूम। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल सरकार में रहने के बाद भी हमारी ओऱ नहीं देख रहे। जैसा कि आज तक टालमटोल की जाती रही है, उसके हिसाब से नहीं लगता कि सड़क बन जाएगी। पेड़ों पर छपान हो गया, अभी तक सड़क बनाने का काम शुरू हो जाता। पुरानी यादें ताजा करते हुए कहते हैं, पढ़ाई के दौरान हम लोग यहां से थानो तक पैदल जाते थे। वहां से देहरादून की बस मिलती थी। सड़क नहीं बनने से परेशानियां बहुत हैं। बेटियों ने छोड़ दिया स्कूलयहां आठवीं कक्षा के बाद बच्चों और अभिभावकों के सामने नौवीं के लिए धारकोट के स्कूल तक रोजाना 16 किमी. चलने की चुनौती होती है। धारकोट का स्कूल आठ किमी. दूर है, वहां जाना-आना पैदल ही होता है। बताते हैं कि पूर्व में कुछ बेटियों ने इतनी दूर जाने की बजाय पढ़ाई छोड़ दी थी। राय सिंह, विक्रम सिंह इस बात की पुष्टि करते हैं।क्षेत्रवासी विक्रम सिंह कंडारी कहते हैं कि हम पूर्व में मुख्यमंत्री रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास दो बार गए। उन्होंने बताया था कि यहां वन विभाग का पेंच है। वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी आए थे, उन्होंने इस मार्ग का सुधारीकरण कराने की बात कही थी, लेकिन लोक निर्माण विभाग सुधारीकरण वाले मानक को नहीं मानता। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा था कि वन विभाग और लोक निर्माण विभाग की बैठक बुलाई जाएगी, पर आज तक इस संबंध में कोई बैठक नहीं हो सकी।एक महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं, यह पीडब्ल्यूडी की रोड नहीं है, न ही यह आरटीए से पास है। इस ऊबड खाबड़ रास्ते पर कोई अपना वाहन लाने को तैयार नहीं है। सरकारी कर्मचारी यहां वाहन नहीं लाएंगे।कहां गई 900 मीटर सड़क, जांच होकंडारी, सवाल उठाते हैं कि अपरतलाई ग्राम पंचायत क्षेत्र लड़वाकोट तक पांच किमी. सड़क का निर्माण किया जाना था, पर इसमें से 900 मीटर सड़क नहीं बनाई गई। इसका पैसा कहां गया। इसकी जांच होनी चाहिए।” मैं इस रास्ते के खराब होने की वजह से करीब छह माह से देहरादून नहीं गई। किसी तीज त्योहार पर शहर जाने की सोचने से पहले ही डर जाते हैं, कैसे जाएंगे और कैसे हम आएंगे। जब साधन नहीं हैं तो यहां से कैसे जाना, ” शांति देवी कहती हैं।क्षेत्रवासी बाला देवी बताती हैं कि किसी का स्वास्थ्य खराब हो जाए तो इसी रास्ते से होकर थानो या देहरादून जाना पड़ता है, जो बहुत मुश्किल है।बाला देवी बताती हैं कि धारकोट तक पैदल जाने में लगभग तीन घंटे लग जाते हैं। पहले खराब सड़क पर चलो और फिर आगे जाने के लिए वाहन का इंतजार करो।ग्रामीण सुरेश कंडारी बताते हैं कि यहां से कोई भी जब मन किया या जब जरूरत पड़ी, शहर नहीं जा पाता। युवा मोटर साइकिलों पर जाते हैं, पर जोखिम उठाकर। यूटिलिटी, लोडर से आवागमन किया जाता है, पर उनका समय निर्धारित है। किसी आपात स्थिति में थानो तक लोडर ले जाने के लगभग एक हजार रुपये किराया होता है।स्कूल भवन बनना गांव के लिए सुखद ग्राम प्रधान प्रतिनिधि सैन सिंह कंडारी ने बताया कि गांव में प्राथमिक एवं जूनियर हाईस्कूल हैं। कुछ माह पहले देहरादून के जिलाधिकारी गांव आए थे। उनसे गुजारिश की गई थी, तब स्कूल भवन बना। पहली बार कोई अधिकारी गांव आए थे। हालांकि आठवीं के बाद बच्चे धारकोट इंटर कालेज जाते हैं, जो यहां से लगभग आठ किमी. दूर होगा।सड़क नहीं तो वोट नहींलड़वाकोट की ग्राम प्रधान शिवानी कंडारी कहती हैं कि सड़क बन जाए, तो गांव आर्थिक रूप से मजबूत हो जाएगा। स्थानीय युवाओं के लिए खेतीबाड़ी से आजीविका के स्रोत विकसित होंगे। इस बार तो गांव में यह बात उठ रही है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में किसी को भी वोट नहीं दिया जाए। हम चुनाव के बहिष्कार का निर्णय लेंगे। हमारे गांव को हर राजनीतिक दल ने ठगा है। हर बार सड़क का वादा होता है, पर फिर भुला दिया जाता है।ग्रामीणों ने संवाद में स्पष्ट किया कि इस बार वोट नहीं, क्योंकि हमें सड़क नहीं मिली। जब सड़क बन जाए तो वोट लेने आ जाना। हालांकि हमने उनसे आग्रह किया कि आप मताधिकार का प्रयोग कीजिए।आने वाले समय में ग्रामीण वर्षों से अधर में पड़ी सड़क के निर्माण के लिए क्या रणनीति बनाते हैं, यह तो भविष्य के गर्त में है। फिलहाल, ग्रामीणों से वार्ता के बाद हम देहरादून लौट आए…।
लड़वाकोट गांव में हकीकत ए उत्तराखंड की टीम से संवाद करते ग्रामीण। फोटो- डुगडुगी

तीन बार हो चुका है सर्वे

सेवानिवृत्त शिक्षक राय सिंह का कहना है कि तीन बार सर्वे हो चुका है। पेड़ों पर निशान लगा दिए गए। 2022 के चुनाव के बाद भी सड़क बनती है या नहीं बनती, कुछ नहीं मालूम। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल सरकार में रहने के बाद भी हमारी ओऱ नहीं देख रहे। जैसा कि आज तक टालमटोल की जाती रही है, उसके हिसाब से नहीं लगता कि सड़क बन जाएगी। पेड़ों पर छपान हो गया, अभी तक सड़क बनाने का काम शुरू हो जाता। पुरानी यादें ताजा करते हुए कहते हैं, पढ़ाई के दौरान हम लोग यहां से थानो तक पैदल जाते थे। वहां से देहरादून की बस मिलती थी। सड़क नहीं बनने से परेशानियां बहुत हैं।

 

बेटियों ने छोड़ दिया स्कूल

यहां आठवीं कक्षा के बाद बच्चों और अभिभावकों के सामने नौवीं के लिए धारकोट के स्कूल तक रोजाना 16 किमी. चलने की चुनौती होती है। धारकोट का स्कूल आठ किमी. दूर है, वहां जाना-आना पैदल ही होता है। बताते हैं कि पूर्व में कुछ बेटियों ने इतनी दूर जाने की बजाय पढ़ाई छोड़ दी थी। राय सिंह, विक्रम सिंह इस बात की पुष्टि करते हैं।

उत्तराखंड के देहरादून जिला के रायपुर ब्लाक में स्थित लड़वाकोट गांव, जो राजधानी से मात्र 40 किमी. दूर है। फोटो- डुगडुगी

क्षेत्रवासी विक्रम सिंह कंडारी कहते हैं कि हम पूर्व में मुख्यमंत्री रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास दो बार गए। उन्होंने बताया था कि यहां वन विभाग का पेंच है। वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी आए थे, उन्होंने इस मार्ग का सुधारीकरण कराने की बात कही थी, लेकिन लोक निर्माण विभाग सुधारीकरण वाले मानक को नहीं मानता। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा था कि वन विभाग और लोक निर्माण विभाग की बैठक बुलाई जाएगी, पर आज तक इस संबंध में कोई बैठक नहीं हो सकी।

एक महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं, यह पीडब्ल्यूडी की रोड नहीं है, न ही यह आरटीए से पास है। इस ऊबड खाबड़ रास्ते पर कोई अपना वाहन लाने को तैयार नहीं है। सरकारी कर्मचारी यहां वाहन नहीं लाएंगे।

कहां गई 900 मीटर सड़क, जांच हो

कंडारी, सवाल उठाते हैं कि अपरतलाई ग्राम पंचायत क्षेत्र लड़वाकोट तक पांच किमी. सड़क का निर्माण किया जाना था, पर इसमें से 900 मीटर सड़क नहीं बनाई गई। इसका पैसा कहां गया। इसकी जांच होनी चाहिए।

” मैं इस रास्ते के खराब होने की वजह से करीब छह माह से देहरादून नहीं गई। किसी तीज त्योहार पर शहर जाने की सोचने से पहले ही डर जाते हैं, कैसे जाएंगे और कैसे हम आएंगे। जब साधन नहीं हैं तो यहां से कैसे जाना, ” शांति देवी कहती हैं।

लड़वाकोट में हकीकत ए उत्तराखंड की टीम से संवाद करती महिलाएं। फोटो- डुगडुगी

क्षेत्रवासी बाला देवी बताती हैं कि किसी का स्वास्थ्य खराब हो जाए तो इसी रास्ते से होकर थानो या देहरादून जाना पड़ता है, जो बहुत मुश्किल है।

बाला देवी बताती हैं कि धारकोट तक पैदल जाने में लगभग तीन घंटे लग जाते हैं। पहले खराब सड़क पर चलो और फिर आगे जाने के लिए वाहन का इंतजार करो।

ग्रामीण सुरेश कंडारी बताते हैं कि यहां से कोई भी जब मन किया या जब जरूरत पड़ी, शहर नहीं जा पाता। युवा मोटर साइकिलों पर जाते हैं, पर जोखिम उठाकर। यूटिलिटी, लोडर से आवागमन किया जाता है, पर उनका समय निर्धारित है। किसी आपात स्थिति में थानो तक लोडर ले जाने के लगभग एक हजार रुपये किराया होता है।

स्कूल भवन बनना गांव के लिए सुखद 

ग्राम प्रधान प्रतिनिधि सैन सिंह कंडारी ने बताया कि गांव में प्राथमिक एवं जूनियर हाईस्कूल हैं। कुछ माह पहले देहरादून के जिलाधिकारी गांव आए थे। उनसे गुजारिश की गई थी, तब स्कूल भवन बना। पहली बार कोई अधिकारी गांव आए थे। हालांकि आठवीं के बाद बच्चे धारकोट इंटर कालेज जाते हैं, जो यहां से लगभग आठ किमी. दूर होगा।

लड़वाकोट की ग्राम प्रधान शिवानी कंडारी। फोटो- डुगडुगी

सड़क नहीं तो वोट नहीं

लड़वाकोट की ग्राम प्रधान शिवानी कंडारी कहती हैं कि सड़क बन जाए, तो गांव आर्थिक रूप से मजबूत हो जाएगा। स्थानीय युवाओं के लिए खेतीबाड़ी से आजीविका के स्रोत विकसित होंगे। इस बार तो गांव में यह बात उठ रही है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में किसी को भी वोट नहीं दिया जाए। हम चुनाव के बहिष्कार का निर्णय लेंगे। हमारे गांव को हर राजनीतिक दल ने ठगा है। हर बार सड़क का वादा होता है, पर फिर भुला दिया जाता है।

ग्रामीणों ने संवाद में स्पष्ट किया कि इस बार वोट नहीं, क्योंकि हमें सड़क नहीं मिली। जब सड़क बन जाए तो वोट लेने आ जाना। हालांकि हमने उनसे आग्रह किया कि आप मताधिकार का प्रयोग कीजिए।

देहरादून जिला के लड़वाकोट गांव से वापस आते हुए।

आने वाले समय में ग्रामीण वर्षों से अधर में पड़ी सड़क के निर्माण के लिए क्या रणनीति बनाते हैं, यह तो भविष्य के गर्त में है। फिलहाल, ग्रामीणों से वार्ता के बाद हम देहरादून लौट आए…।

Keywords:- Villages of Uttarakhand, Most Beautiful Village of Uttarakhand, Ladvakot Village, Haqikat e Uttarakhand, Uttarakhand2022, Uttarakhand election 2022, #Uttarakhand2022, #2022  

 

You Might Also Like

Video: एलेक्जेंडर की दिलकश आवाज का दीवाना रहा है दून
कोविड प्रभावित बच्चों के लिए केंद्र सरकार की योजना
परवादून जिला कांग्रेस का किसान संघों के राष्ट्रव्यापी बंद को समर्थन 
चन्‍द्रयान-2 का चन्‍द्रमा की कक्षा में प्रवेश
फिर भी
TAGGED:#Uttarakhand20222022Haqikat e UttarakhandLadvakot VillageMost Beautiful Village of UttarakhandUttarakhand Election 2022Villages of Uttarakhand
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp Email Copy Link Print
ByRajesh Pandey
Follow:
newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
Previous Article एक साथ तीन दलों के लिए काम करने वाला रिटायर्ड नौकरशाह कौन है?
Next Article कृषक संघों के उत्पादों की बिक्री के लिए ‘ग्राम्य श्री’ का लोकार्पण
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

https://newslive24x7.com/wp-content/uploads/2026/04/CM-Dhami-4-Year-Journey-2026-2-Min-1.mp4

Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun
Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun Doiwala, PIN- 248140
9760097344
© 2026 News Live 24x7| Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?