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देहरादून के चार सौ साल पुराने गांव का कुरुक्षेत्र से है एक रिश्ता

हरियाणा के थानेश्वर से आए परिवारों ने बसाया था गांव

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

देहरादून। कौत्स ऋषि के नाम पर लगभग चार सौ वर्ष पहले देहरादून जिले में एक गांव बसा था, जिसका नाम कौत्सपुरी रखा गया था। समय के साथ गांव का नाम कौत्सपुरी से कौड़सी हो गया। हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पास थानेश्वर या थानेसर से आए लोगों ने यह गांव बसाया था। यह हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिला स्थित ऐतिहासिक तीर्थ स्थल है। इस गांव को अब कौत्सपुरी की जगह कौड़सी के नाम से जाना जाता है। यह जानकारी देते हुए सेवानिवृत्त शिक्षक शरद काला बताते हैं, “काला उपनाम के लोग उनके पूर्वज, पौड़ी गढ़वाल के सुमाड़ी गांव से आकर यहां रहने लगे। सुमाड़ी में रहने वाले अधिकतर परिवार, जो राजा द्वारा चलाई जा रही बलि प्रथा का विरोध कर रहे थे, ने गांव छोड़ दिया था और यहां कौड़सी में आ गए थे, ऐसा अपने बुजुर्गों से सुनते आए हैं।”

गांव में लगभग दो सौ से ढाई सौ वर्ष पुरानी हवेली को दिखाते हुए, पूर्व प्रधान काला बताते हैं, इसको नागा साधुओं ने बनाया था। यह पूरा इलाका पहले टिहरी राजा के अधीन आता था। इस हवेली का इतिहास जितना रोचक है, उतनी ही इसके निर्माण से जुड़ी जानकारियां भीं। वर्तमान में यह श्री भरतमंदिर ऋषिकेश के अधीन है, जो इसकी देखरेख भी करते हैं। हवेली के ही एक हिस्से में कुछ वर्ष पहले व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र भी खोला गया था, जो छात्र संख्या कम होने की वजह से नहीं चल पाया।

“इस हवेली को बनाने के लिए विशेष प्रकार की ईंटों को गांव में ही बनाया गया था। अन्य निर्माण सामग्री हाथियों, ऊँटों व घोड़ों पर बाहर से लाई गईं। पहले इस पूरे इलाके में उड़द की दाल खूब होती थी। उड़द की दाल को पीसकर पिट्ठियां बनाई गईं, जिसको भवन निर्माण के मसाले में मिलाया गया।

उस समय कुंतलों दाल पिसी जाती थी, बड़ी संख्या में लोग इस काम में लगे होते थे। पिट्ठियों को सुर्खी (ईंट के टुकड़ों को पीसकर बना पाउडर) और चूने में मिलाकर ईंटों की चिनाई की जाती थी। इससे निर्माण मजबूत होता था। आज भी इस हवेली को लोहे के घन (हथोड़े) से भी नहीं तोड़ा जा सकता,” पूर्व प्रधान काला बताते हैं।

देहरादून जिला स्थित कौड़सी गांव में सैकड़ों वर्ष पुरानी हवेली की छत पर लगी लकड़ियां, जिनमें अब दीमक लग गया है। फोटो- सार्थक पांडेय

हवेली की छतों पर लगी लकड़ियां दिखाते हुए कहते हैं, रखरखाव नहीं होने से इसमें अब दीमक लग गया। इसमें बहुत मजबूत और टिकाऊ लकड़ियां लगाई गई थी। इस पूरी इमारत को संरक्षण की आवश्यकता है। एक बार तो श्री भरत मंदिर के महंतजी ने इसका जीर्णोद्धार कराया था। यहां चौकीदार भी रखा गया था। वो उनसे इस ऐतिहासिक इमारत के संरक्षण का अनुरोध करेंगे।

देहरादून जिला स्थित कौड़सी की वर्षो पुरानी हवेली में दूध गर्म करने के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। चित्र में अलमारी की तरह दिखाई दे रहे स्ट्रक्चर में दूध से भरा बर्तन रखा जाता था। इसके नीचे चूल्हा बनाया गया था। फोटो- सार्थक पांडेय

हवेली की रसोई में दूध गरम करने के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। एक बड़ी अलमारी की तरह दिखने वाला स्थान बनाया गया था, जिस पर खिड़की लगाई गई थी और इसके नीचे आग जलाने के लिए जगह चूल्हा था। हो सकता है, दूध को गरम करते समय किसी की नजर नहीं पड़नी चाहिए, उस समय ऐसा सोचा जाता होगा।

हर घर में एक गजेटेड अफसर

शरद काला बताते हैं, उनके पूर्व सुमाड़ी से यहां आए थे। इस गांव के अधिकतर परिवारों में से एक व्यक्ति गजेटेड अफसर है। यहां के अधिकतर लोग सरकारी या निजी सेवाओं में हैं। बड़ी संख्या में लोगों ने देहरादून, ऋषिकेश या अन्य शहरों में अपने मकान बना लिए हैं। उनके मकान यहां भी हैं। उनके बच्चे भी वहीं पढ़ते हैं। वो यहां आते रहते हैं। गांव में वर्तमान में बुजुर्ग लोग ही रहते हैं। कुछ युवा, जो बाहर रोजगार के लिए नहीं गए, वो खेती किसानी से जुड़े हैं। हालांकि खेती की लगभग आधी भूमि बंजर ही पड़ी है, इसका कारण जंगली जानवरों द्वारा फसल को नुकसान पहुंचाना है। अब यहां पहले जैसी खेती नहीं होती।

मैंने मिडिल (तब सातवीं कक्षा) तक की पढ़ाई भोगपुर स्थित बोर्डिंग स्कूल में की थी। उस समय देहरादून जिला में तीन मिडिल स्कूल बहुत प्रसिद्ध थे, जिनमें बाहर से भी बड़ी संख्या में छात्र पढ़ने आते थे। इनमें कालसी, राजपुर रोड और भोगपुर का स्कूल शामिल है। भोगपुर स्कूल में टिहरी, उत्तरकाशी तक के बच्चे पढ़ते थे।

कौड़सी गांव देहरादून जिला के भोगपुर गांव से लगभग दो किमी. दूर टिहरी गढ़वाल जिला की सीमा पर है। कौड़सी ग्राम पंचायत में तीन गांव है, जिनमें कौड़सी, फागसी और बडोगल हैं।

Rajesh Pandey

राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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