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उत्तराखंड में कीवी की बागवानी से लाखों की कमाई

डॉ. राजेंद्र कुकसाल

  • लेखक कृषि एवं औद्योनिकी विशेषज्ञ हैं
  • 9456590999

मध्यम पर्वतीय क्षेत्र (1200 से 2000 मीटर तक की ऊंचाई ) जहां ग्रीष्मकालीन तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं रहता हो, तेज हवाएं चलती हों तथा पाला न पड़ता हो, कीवी उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं।

अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों का न मिल पाना, तकनीकी जानकारी का अभाव तथा उचित विपणन व्यवस्था न होने के कारण कीवी उत्पादन राज्य में व्यवसायिक रूप नहीं ले पा रहा है।

राज्य के अधिकतर कृषक कीवी की अच्छी गुणवत्ता वाली पौधों के लिए डॉ. वाईएस परमार औद्यानिक एवं वानिकी, विश्वविद्यालय नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश) से लाइन में खड़े होकर लेते हैं।

कीवी फल (चायनीज गूजबैरी) का उत्पत्ति स्थान चीन है, पिछले कुछ दशक से यह फल विश्वभर में अत्यन्त लोकप्रिय हो गया है।

न्यूजीलैंड इस फल के लिए प्रसिद्ध है, क्योंकि इस देश ने कीवी फल को व्यावसायिक रूप दिया। इसका उत्पादन व निर्यात न्यूजीलैंड में बहुत अधिक है।

कीवी फल भारत में 1960 में सर्वप्रथम बंगलौर में लगाया गया था, लेकिन बंगलौर की जलवायु में पर्याप्त शीतकाल ( चिलिंग ) न मिल पाने के कारण सफलता नहीं मिली।

वर्ष 1963 में राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) क्षेत्रीय संस्थान के शिमला स्थित केन्द्र फागली में कीवी की सात प्रजातियों के पौधे आयतित कर लगाए गए, जहां पर इन पौधों से सफल उत्पादन प्राप्त किया गया।

उत्तराखंड में वर्ष 1984- 85 में भारत इटली फल विकास परियोजना के तहत राजकीय उद्यान मगरा टिहरी गढ़वाल में इटली के वैज्ञानिकों की देखरेख में इटली से आयतित कीवी की विभिन्न प्रजातियों के सौ पौधे रोपे गए, जिनसे कीवी का अच्छा उत्पादन आज भी प्राप्त हो रहा है।

वर्ष 1991-92 मेंं तत्कालीन उद्यान निदेशक डॉ. डीएस राठौर ने राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संसाधन, फागली शिमला हिमाचल प्रदेश से कीवी की विभिन्न प्रजातियों के पौधे मंगाकर प्रयोग के लिए विभिन्न उद्यान शोध केंद्रों चौबटिया रानीखेत (अल्मोड़ा), चकराता (देहरादून) , गैना/अंचोली ( पिथौरागढ़) , डुंडा (उत्तरकाशी)आदि स्थानों में लगाए गए, जिनसे उत्साहवर्धक उपज प्राप्त हुई।

राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) क्षेत्रीय केंद्र, निगलाट ,भवाली नैनीताल में भी 1991 – 92 से कीवी उत्पादन पर शोधकार्य हो रहे हैं। यह केन्द्र सीमित संख्या में कीवी फल पौधों का उत्पादन भी करता है, इस केन्द्र के सहयोग से भवाली के आसपास के क्षेत्रों में कीवी के कुछ बाग भी विकसित हुए हैं।

राज्य में कीवी बागवानी की सफलता को देखते हुए कई उद्यानपतियों ने बागवानी बोर्ड व उद्यान विभाग की सहायता से कीवी के बाग विकसित किए हैं।

उद्यान पंडित कुन्दन सिंह पंवार ने 1998 में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड देहरादून का पहला कीवी प्रोजेक्ट पाव नैनबाग जनपद टिहरी में लगाया।

कीवी फल अत्यन्त स्वादिष्ट एवं पौष्टिक हैं। इस फल में विटामिन सी काफी अधिक मात्रा में होता है। इसके अतिरिक्त इस फल में विटामिन बी, फास्फोरस, पोटिशियम व कैल्शियम तत्व भी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। डेंगू बुखार होने पर कीवी खाने की कई लोग सलाह देते हैं।

जलवायुः कीवी एक पर्णपाती ( पतझड़ ) पौधा है। राज्य में यह मध्यवर्ती क्षेत्रों में 1200 से 2000 मीटर की उँचाई तक सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। कीवी में फूल अप्रैल माह में आते हैं और उस समय पाले का प्रकोप फल बनने में बाधक होता है। इसलिए जिन क्षेत्रों में पाले की समस्या है वहां इस फल की बागवानी सफलतापूर्वक नहीं हो सकती।

वो क्षेत्र जिनका तापमान गर्मियों में 35 डिग्री से कम रहता है तथा तेज हवाएं चलती हों, लगाने के लिए उपयुक्त हैं । कीवी के लिए सूखे महिनों मई-जून और सितम्बर- अक्टूबर में सिंचाई का पूरा प्रबंध होना चाहिए।

भूमि का चुनाव एवं मृदा परीक्षण- जीवांशयुक्त बलुई दोमट भूमि, जिसमें जल निकास की व्यवस्था हो सर्वोत्तम रहती है।

जिस भूमि में कीवी का उद्यान लगाना है, उसका मृदा परीक्षण अवश्य कराएं, जिससे मृदा में जैविक कार्बन , पीएच मान (पावर ऑफ हाइड्रोजन या पोटेंशियल हाइड्रोजन ) व चयनित भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों की जानकारी मिल सके।

अच्छी उपज के लिए मिट्टी में जैविक/जीवांश कार्बन 0.8 तक होना चाहिए, लेकिन अधिकतर स्थानों में यह बामुश्किल 0.25 – 0.35 प्रतिशत ही पाया जाता है।

कार्बन पदार्थ कृषि के लिए बहुत लाभकारी हैं, क्योंकि यह भूमि को सामान्य बनाए रखता है। यह मिट्टी को ऊसर, बंजर, अम्लीय या क्षारीय होने से बचाता है। जमीन में इसकी मात्रा अधिक होने से मिट्टी की भौतिक एवं रासायनिक ताकत बढ़ जाती है तथा इसकी संरचना भी बेहतर हो जाती है।

यदि भूमि में जैविक कार्बन की मात्रा कम हो तो जंगल की ऊपरी सतह की मिट्टी तथा गोबर/ कम्पोस्ट खाद का अधिक प्रयोग करें।

पीएच मान मिट्टी की अम्लीयता व क्षारीयता का एक पैमाना है, यह पौधों की पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित करता है। यदि मिट्टी का पीएच मान कम (अम्लीय) है तो मिट्टी में चूना मिलाएं।

यदि मिट्टी का पीएच मान अधिक (क्षारीय) है तो मिट्टी में कैल्सियम सल्फेट (जिप्सम) का प्रयोग करें।

भूमि के क्षारीय व अम्लीय होने से मृदा में पाए जाने वाले लाभदायक जीवाणुओं की क्रियाशीलता कम हो जाती है तथा हानिकारक जीवाणुओ /फंगस में बढ़ोतरी होती है।

साथ ही, मृदा में उपस्थित सूक्ष्म व मुख्य तत्वों की घुलनशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कीवी के लिए 6.5 पीएच मान वाली भूमि उपयुक्त रहती है।

किस्में : कीवी फल में नर व मादा दो प्रकार की किस्में होती है। एलीसन, मुतवा एवं तमूरी नर किस्में है। एवोट, एलीसन, ब्रूनो, हैवर्ड एवं मोन्टी मुख्य मादा किस्में हैं। इनमें हैवर्ड न्यूजीलैंड की सबसे अधिक उन्नत किस्में हैं। एलीसन व मोन्टी जिसकी मिठास सबसे अधिक है, उपयुक्त पाई गई है।

रेखांकन एवं पौधरोपण –

पौध लगाने से पहले खेत में रेखांकन करें। कीवी के पौधे 6 x 3 मीटर यानी लाइन से लाइन की दूरी तीन मीटर तथा लाइन में पौध से पौध की दूरी 6 मीटर रखें।

1x1x1मीटर आकार के गड्ढे तथा स्थान गर्मियों में खोदकर 15 से 20 दिन के लिए खुला छोड़ देना चाहिए, ताकि सूर्य की तेज गर्मी से कीड़े मकोड़े मर जाएं।

पौधों के लिए गड्ढे खोदते समय पहले ऊपर की 6″ तक की मिट्टी खोदकर अलग रख लेते हैं। इस मिट्टी में जीवांश अधिक मात्रा में होता है। गड्ढे भरते समय इस मिट्टी को पूरे गड्ढे की मिट्टी के साथ मिला देते हैं।

इसके बाद एक भाग अच्छी सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट, जिसमें ट्रायकोडर्मा मिला हुआ हो, को भी मिट्टी में मिलाकर गड्ढों को जमीन की सतह से लगभग 20 से 25 सेमी. ऊंचाई तक भर देना चाहिए, ताकि पौध लगाने से पूर्व गड्ढों की मिट्टी ठीक से बैठ कर जमीन की सतह तक आ जाए।

पौधों को शीतकाल के बाद जनवरी-फरवरी या बसंत के शुरू में लगाया जाता है।

पौधों की चारों ओर की मिट्टी भली भांति दबाएं। पौध लगाने पर सिंचाई अवश्य करें।

कीवी के पौधे एक लिंगी होते हैं, जिसमें मादा और नर फूल पृथक पृथक पौधों पर आते हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि मादा पौधों की एक निश्चित संख्या के बीच में परागण के लिए एक नर पौधा भी लगा होष इसके लिए 1:6, 1:8 या 1:9 के अनुपात से पौधों को लगाना चाहिए।

नर ओर मादा पौधों की रोपण योजना इस प्रकार है-

O O O O O O

O X O O X O

O O O O O O

O O O O O O

O X O O X O

O O O O O O

मादा पौधा -O, नर पौधा -X

देखभाल-

खादः कीवी फल के पौधों की वृद्धि और उत्पादन उर्वरकों की सही मात्रा पर निर्भर करता है।

सिंचाईः सूखे महीनों मई-जून और सितम्बर- अक्टूबर में सिंचाई का पूरा प्रबन्ध होना चाहिए। अगर इस समय सिंचाई नहीं हो तो पौधों की वृद्धि तथा उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है।

सिधाई और काट छांटः कीवी की लताओं को सीधा रखने की आवश्यकता होती है लताओं को सीधा रखने का अभिप्राय पौधों को आधार व आकार प्रदान करना है।

शुरू में पौधों को लकड़ी के डंडों के सहारे ऊपर चलाते हैं, यदि लताएं डंडे पर लिपटती हैं तो उन्हें छुड़ाकर सीधा करें तथा सुतली से बांध कर ऊपर चढ़ाएं।

पौधों की सिधाई टी- बार ,ट्रेलिस, या परगोला विधि के अनुसार की जाती है।

पहले वर्ष पौधे को लगभग भूमि से 30 सेमी की ऊंचाई से काटा जाता है। बाद में, एक ही शाखा को ट्रेलिस पर चढ़ा दिया जाता है। इस मुख्य शाखा में से दो शाखाएं निकाली जाती हैं, जिन पर दो फीट की दूरी पर अनेक शाखाओं को तारों पर फैला देते हैं।

इस प्रकार की विधि 4-5 साल तक करनी पड़ती है और उसके बाद पौधे फल देने लगता है। तारों पर फैले हुईं शाखाओं को तीसरी व छठीं आंख तक काटते हैं और इन ही शाखाओं पर जो शाखाएं निकली हैं, उन्हीं पर फल लगते हैं।

ज्यादा फल लेने के लिए पौधों की परगोला विधि से सिधाई करनी चाहिए, इससे फल धूप तथा पक्षियों द्वारा खराब नहीं होते।

फलों की तुड़ाई उपज व विपणन- कीवी के फलों की उपज औसतन 50-100 किलो प्रति पौधा पाई गई है। फलों को सही परिपक्व स्थिति पर ही तोड़ना चाहिए, जो कि अक्टूबर-नवंबर में आती है।

फलों की परिपक्वता का पता फलों के बाह्य आवरण के रोओं से किया जा सकता है। परिपक्व फलों के रोएं हाथ फेरने पर आसानी से फल से अलग हो जाते हैं।

जिस समय कीवी फल तैयार होता है, उन दिनों बाजार में ताजे फलों के अभाव के कारण किसान काफी आर्थिक लाभ उठा सकता है। इसे शीतगृहों मे चार महीने तक आसानी से सुरक्षित रखा जा सकता है।

फलों को दूर भेजने में भी कोई हानि नही होती, क्योंकि कीवी के फल अधिक टिकाऊ हैं। कमरे के तापमान पर इसे एक माह तक रखा जा सकता है। इन्ही कारणों से बाजार में इसको लम्बे समय तक बेचकर अधिक लाभ कमाया जा सकता है। इसके विपणन के लिए गत्ते के 3 से 5 किलो के डिब्बे प्रयोग में लाने चाहिए।

विदेशी पर्यटकों में यह फल अधिक लोकप्रिय होने के कारण दिल्ली व अन्य बड़े शहरों मे इसे आसानी से अच्छे दामों पर बेचा जा सकता है।

राज्य के आमजन में कीवी फल की स्वीकार्यता अभी नहीं बन पाई है, जिस कारण स्थानीय बाजार में यह फल कम ही बिक पाता है। बाहर भेजने के लिए इतना उत्पादन नहीं हो पाता कि उत्पादन बाहर भेजा जा सके या बाहर का आढ़ती यहां पर आएं।

उत्तराखंड में कीवी फल उत्पादन का भविष्य दिखाई देता है, लेकिन राज्य बनने 21 वर्ष में भी उद्यान विभाग समय पर अच्छी गुणवत्ता वाली कीवी फल पौध उपलब्ध नहीं करा पाया।

इसी वजह से प्रगतिशील उद्यानपतियों को कीवी की पौध के लिए डॉ. वाईएस परमार औद्यानिक एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश) से लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है।

तकनीकी जानकारी का अभाव और स्थानीय बाजार में कीवी फलों के उचित दाम नहीं मिल पाने तथा उचित विपणन व्यवस्था नहीं होने के कारण आज भी राज्य में कीवी फल उत्पादन व्यावसायिक रूप नहीं ले पाया।

कीवी के संबंध में आवश्यक जानकारी के लिए संपर्क कर सकते हैं-

1. राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संसाधन ब्यूरो क्षेत्रीय केंद्र निगलाट भवाली नैनीताल।

0594222002, 0594220020, 9685515598

2. उद्यान पंडित श्री कुन्दन सिंह पंवार- 9411313306

3. राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड 74/B फेज 2 पंडितवाड़ी राजपुर रोड देहरादून

01352774272, 01352762767

4. सम्बन्धित जिले के जिला उद्यान अधिकारी।

5. डॉ. दिनेश चौरसिया फार्म मैनेजर, कृषि विज्ञान केन्द्र गैना पिथौरागढ़।

7351255604, 94119 23603

कीवी उत्पादन के लिए प्रोजेक्ट बनाने तथा अनुदान लेने के लिए राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से सम्पर्क कर सकते हैं। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड उद्यान विभाग के सहयोग से 40 फीसदी तक का अनुदान देता है।

आय व्यय विवरण-

श्री केवलानन्द तिवारी जी द्वारा कीवी फल के पौधों का आय व्यय विवरण दिया गया है, जो इस प्रकार है-

कीवी की खेती हमारे पहाड़ के लिए एक वरदान से कम नहीं होगी, बशर्ते लोगों के पास उनकी जमीन एक साथ चकों में हो !!!

इसका बगीचा एक बार स्थापित हो जाने से 60-70 वर्षों के लिए प्रति पौध कम से कम 50 किलो मिलने से भी 100 रुपये किलो के हिसाब से प्रति पौध 5000 रुपये की आमदनी निश्चित है !!!

एक नाली जमीन में सात पौधे उगाए जा सकते हैं, जिनमें एक नर होने पर 6 पौधों से 5000 रुपये प्रति पौध के हिसाब से 30 हजार की आमदनी कीवी फल से हो सकती है।

इसके साथ ही, पौधों के बीच की खाली जगहों में मौसमी सब्जियाँ, दालें-मसाले आदि के सांथ-सांथ एक दुधारू गाय तथा मधुमक्खियों के कुछ बक्सों से शहद आदि मिला कर लगभग 25-30 हजार रुपये की और आमदनी हो सकती है। कुल मिलाकर 55-60 हजार रुपये प्रतिनाली प्रतिवर्ष की आमदनी होगी। लगभग 25-30 हजार रुपये श्रमिक का खर्चा/मजदूरी निकाल देने से 30 हजार का बैंक बैलेंस !!!

यही जमीन यदि एक सांथ 10 नाली होती है तो व्यय का अनुपात लगभग दोगुना कम होगा तथा आय का अनुपात दोगुना से भी ज्यादा होकर किसान लगभग 8-9 लाख रुपये साल का बचाएंगे।

 

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Working Experience –25 Years of experience in Mass Media and content writing in Hindi.     Literary work- Two books in Hindi. One of them is Jungle mei Tak Dhinaa Dhin, which is a compilation  of 18 stories based on wildlife. Another one is Zindagi ka Tak Dhinaa Dhin. This book is with 7 Stories. These Stories presents the Human lifestyle and the entire system, where we live. Both books are copyright from copyright office Government of India. I am also working on the other two books and short stories. Blog writing and real-time coverage is my passion.    Initiative- Initiate a storytelling platform Tak Dhinaa Dhin. We are working in slums and Government schools. Our aim is to motivate children to write stories. We believe that imagination is must to reach near reality. We are motivating children on our digital platform also. Dugdugi is an other initiative for Creative Kids and Youth. Conducting a pathshaala for Slum's Children. Qualification- B.Sc. (Physics, Chemistry, Math), Bachlor of Journalism and LLB  Core competence- Content writing, Reporting and Editing.

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