
हरीश रावत ने इस घटना पर चिंता जताई और सरकार को दिए सुझाव
जंगल का गुलदार भूखा है, जंगल में उसको शिकार नहीं मिल रहा हैः रावत
देहरादून। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार को पलायन रोकने और जंगली जानवरों के हमले रोकने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं। उनका कहना है कि जंगल का गुलदार भूखा है, जंगल में उसको शिकार नहीं मिल रहा है, इसलिए वो इंसानों पर हमले कर रहा है। पूर्व सीएम ने पौड़ी जिले के पाबौ ब्लॉक के भट्टी गांव की घटना का जिक्र करते हुए कहा, 75 वर्ष की समुद्रा देवी को गुलदार ने मार दिया। दिन में घर में घुसा गुलदार समुद्रा देवी को घसीटते हुए जंगल ले गया। जंगल में उनका आधा खाया हुआ शव मिला।
रावत ने सोशल मीडिया पर पाबौ की घटना पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा, इस तरीके की वीभत्स घटनाएं आम हो गई हैं, यहां तक कि शहरों के नजदीक भी जंगल में लकड़ी घास के लिए जाने वाली महिला सुरक्षित नही हैं। अकेला व्यक्ति गाँव में चाहे वो महिला हो या पुरुष सुरक्षित नहीं है। छोटे बच्चे मां की गोद में सुरक्षित नहीं हैं। जंगल का गुलदार भूखा है, जंगल में उसका स्वाभाविक शिकार नहीं मिल रहा है, घुरड़, जड़ाऊ, सूअर आदि गांव के खेतों में आ गए हैं, क्योंकि जंगल की हरी घास चीड़ के पत्तों से दब गई है। झाड़ियां आदि, जंगल में आग लगने से करीब समाप्त हो गई हैं। गाँव में खेती हो नहीं रही है, इसलिए बैल है नहीं, गाँव में लोग भी कम हैं, इसलिए कुत्ते भी नहीं हैं, गुलदार पगला गया है और मनुष्य का डर उसके मन से निकल गया है।
उन्होंने कहा, पाबौ की यह घटना भले ही सारे राज्य के अंदर कहीं न कहीं, हर 15- 20 दिन में घटित हो रही है। लेकिने घर के अंदर से महिला को खींच ले जाने की घटनाएं कुछ ही हुई हैं। ये घटनाएं गांव से पलायन को और बढ़ाएंगी। जंगलों में आग लगने की घटनाओं के साथ अब जंगली जानवरों का डेरा गांव के चीड़ के पेड़ों और झाड़ियों के झुरमुट हो गए हैं। इस स्थिति को कैसे बदला जाए, यह एक बड़ी डिबेट का प्रश्न है।
रावत ने कहा, उन्होंने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में कुछ समाधान पर काम किया था। बन्दर बाड़े बनाने, सुअर मारने की अनुमति के अतिरिक्त लैपर्ड_सफारी की कार्ययोजना बनाई। ऐसी एक सफारी हरिद्वार में शुरू की। हमारा लक्ष्य था, राज्य की कुल गुलदार आबादी के 30 प्रतिशत को इन सफ़ारीज में रखना ,इनकी संतति को पैदा करने की क्षमता को नियंत्रित करना तथा इनके लिए लैपर्ड सफारी में भोजन की व्यवस्था करना।
पूर्व सीएम के अनुसार, लैपर्ड के बच्चों को चोर कर खाने वाला लाल पूँछ वाला सियार लगभग गायब हो गया है। लुप्त पर्याय लाल पूंछ वाली लोमड़ी, बाघ ओर सुअर के बच्चों को चोरने में सिद्धहस्त होती है। हमने उसके चार उत्पादन केंद्र स्थापित करने का निर्णय लिया था। प्रत्येक वन डिवीजन में एक हिरन व खरगोश प्रजनन केंद्र खोला, ताकि वन के हिंसक पशुओं के लिए जंगल में समुचित आहार उपलब्ध हो सके। इस योजना को अल्मोड़ा के डालमोड़ि रेंज से शुरू किया गया।
उनका कहना है, चीड़ की पत्तियों के कारण जंगल की मुलायम घास भी ध्वस्त होती जा रही है, इसलिए जंगलों में मंडुआ, झंगोरा, कौणी और भट्ट के बीजों का छिड़काव करना एकमात्र उपाय है, जिससे जंगली जानवरों को चारा जमीनों में सरलता से उपलब्ध हो सके। इसके आदेश वन विभाग को भी दिए गए। वहीं, मैदान के घने जंगलो में, अंदर गांव से काफी दूर ,बांस, रिंगाल सहित हाथी आदि जानवरों के प्रिय पौधों और वनस्पति के उत्पाद को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ावा देना चाहिए। जंगलों में, जिनमें तराई के जंगल भी सम्मिलित हैं, जल कुंडों का निर्माण व ट्रेंचेस बनाकर बरसाती पानी को रोकना तथा हरियाली पैदा करना चाहिए।
उन्होंने बताया, जंगलों में आम ,आंवला, जामुन ,मेहलू, मालू, काफल आदि के बीजों का छिड़काव करना तथा फल आदि की उपलब्धता को बढ़ाना भी एक व्यावहारिक उपाय है। इसके अतिरिक्त उनकी सरकार ने जंगलों की स्वाभाविकता को बढ़ाने के लिए धीरे धीरे लुप्त हो रहीं छोटी छोटी झाड़ियों, लताओं की नर्सरी खड़ी कर उनके प्लांटेशन को बढ़ावा देने के निर्देश दिए थे। इनमें घिंघारू, मेहलू, किन्गोड़, हिसालु ,रतबेरी, मालू आदि शामिल हैं।
रावत बताते हैं, ग्राम प्रहरियों की संख्या व मानदेय बढ़ाया गया। वन विभाग को वन्यजीवों के नियंत्रण आदि के लिए उत्तरदायी बनाया गया तथा जंगलों के नजदीक के गाँव को डमी फायरआर्म्स उपलब्ध कराना हमारा लक्ष्य रहा था। व्यापक कार्य योजना बनाकर ही इस दिशा में कदम उठाए थे, जिसमे आग नियंत्रण हेतु प्रत्येक वन डिवीजन के लिए कार्ययोजना ओर कार्ययोजना के क्रियान्वयन के लिए कार्यबल तैयार किया गया था।
पूर्व सीएम रावत कहते हैं, मुझे दुःख है कि 2017 के बाद से इन कदमों को एक दो साल के अंदर बिल्कुल विस्मृत कर दिया गया। हमने जंगलों के नजदीक के गाँवों में हाथी व सुअर रोधी सुरक्षा दीवारें ,हाथी को दूर रखने के लिए मधुमक्खी पालन और मधुमक्खियों के लिए सदाबहार वृक्षों जैसे करीपत्ता आदि का प्लांटेशन, लो वोल्टेज सोलर फेंसिंग आदि उपायों को अमल में लाने का प्रयास किया, लेकिन दुर्भाग्यवश एक दो साल बाद ही ये नीतिगत प्रयास वन विभाग की प्राथमिकता से बाहर कर दिए गए। शहरों ओर गांव के लिए सतत कार्ययोजना बनाना ओर क्रियान्वित करना आवश्यक हो। उत्तराखंड जैसे 70 प्रतिशत से अधिक वनाच्छादित राज्य के लिए भी सतत योजना बनाना व क्रियान्वित करना आवश्यक है, अन्यथा पौड़ी में गुलदार जलाए जाने जैसी घटनाएं रोकनी संभव नही होंगी।|













