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वन गुर्जर की सफलता की कहानीः डंगरों के संग चलता रहा, किताबों को पढ़ता रहा

वन गुर्जर के बेटे का उत्तराखंड पुलिस में सिपाही पद पर चयन हुआ

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

महज 19 साल के शौकत शाम छह बजे जंगल से भैंसों के साथ घर पहुंच रहे हैं। उनका सबसे पहले काम भैसों को बाड़े में ले जाना और फिर उनको चारा डालना है। वन गुर्जर शौकत, घर से कोचिंग और वहां से घर और फिर जंगल में भैंसों को चराने के लिए जाते हैं। रोजाना 25 किमी. पैदल चलते हैं। जंगल में पलने बढ़ने वाले शौकत के संघर्ष के बीच एक खुशखबरी है, वो यह कि उनका उत्तराखंड पुलिस (Uttarakhand Police) में सिपाही पद पर चयन हुआ है। इस डेरे को लगभग, 50 साल से पहले बसी इस बस्ती में, शौकत पहले शख्स हैं, जिनका सरकारी सेवा में स्थाई रूप से चयन हुआ है।

देहरादून जिले के डोईवाला ब्लाक मुख्यालय (Doiwala Block) से लगभग आठ किमी. दूर खैरी गांव (Khairi Gaon) स्थित वन क्षेत्र में गुर्जर बस्ती (Gurjar Basti) है, जिसको खैरी वनबाह क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यहां सभी परिवार पशुपालन और खेती करते हैं। 1975 के आसपास बसी इस बस्ती में अभी तक बिजली और पानी के कनेक्शन नहीं है। इसकी वजह, इस इलाके का वन क्षेत्र में होना बताई जाती है। यह बस्ती दो भागों में बंटी है, जिसमें शौकत रहते हैं, वहां नौ घर हैं।

शौकत अली के पिता मोहम्मद अली डोईवाला चीनी मिल (Doiwala Sugar Mill) में संविदा पर सेवारत हैं। परिवार का मुख्य व्यवसाय पशुपालन और कृषि है। पशुओं को चराने के लिए जंगल में ले जाना और दुग्ध उत्पादन से परिवार के खर्चे चलते हैं।

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चार भाइयों में सबसे छोटे शौकत ने 2019 में हाईस्कूल और फिर 2021 में इंटरमीडिएट की परीक्षा 70 फीसदी अंकों से अधिक से पास की। उन्होंने डोईवाला डिग्री कॉलेज (Degree College Doiwala) में बीएससी (BSc) में दाखिला  लिया और एनसीसी सी सर्टिफिकेट (NCC C Certificate) भी हासिल किया।

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शौकत बताते हैं, “वो डोईवाला पब्लिक इंटर कॉलेज (PIC Doiwala) में पढ़ते थे, जो घर से लगभग आठ किमी. दूर है। साधन नहीं होने की वजह से पैदल ही स्कूल आते जाते रहे। लगभग 11 महीने पुलिस आरक्षी परीक्षा (Uttarakhand Police Constable Recruitment Exam ) की कोचिंग ली। हिन्दी का कोर्स पूरा नहीं हो पाया था, बाकी कोर्स हमने यू ट्यूब (YouTube Video) वीडियो से पूरा किया। घर में इंटरनेट स्पीड (Internet Speed) बहुत कम है, इसलिए वीडियो डाउनलोड करने के लिए सामने रेलवे ट्रैक के पास जाना पड़ता है। ऐसा कई बार करना पड़ा।”

देहरादून के डोईवाला ब्लाक स्थित खैरी बनवाह क्षेत्र में वन गुर्जर परिवार के युवा शौकत अली उत्तराखंड पुलिस में आरक्षी पद पर चयनित हुए हैं। फोटो- राजेश पांडेय

“सुबह चार बजे उठकर पढ़ाई और फिर पशुओं को जंगल में छोड़ने जाना। घर से लगभग नौ किमी. दूर कोचिंग संस्थान जाना और फिर वापस लौटना। घर पहुंचकर खाना खाने के बाद सीधा जंगल में डंगरों ( गाय भैंसों को स्थानीय बोली में डंगर कहा जाता है) के साथ। जंगल में कोई व्यवधान नहीं होता, बल्कि शांत होकर पढ़ाई करता था। कभी मोबाइल फोन लेकर जाता, तो कभी कॉपी-किताब। शौकत कहते हैं, मैं डंगरों के साथ चलता रहता, किताबों को पढ़ता रहता।”

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बताते हैं, “हम तीनों भाइयों ने एक साथ मिलकर तैयारी की। कोचिंग इंस्टीट्यूट के साथ यूट्यूब पर भी पढ़ाई की।”

शौकत का कहना है, “मैं जब घर से स्कूल, स्कूल से घर आता जाता था, तो सोचता था कि हम इतना पैदल क्यों चल रहे हैं। अगर हम शिक्षा पाकर जीवन में कामयाब नहीं हो पाए तो यह सब व्यर्थ जाएगा। मैं इस संघर्ष को व्यर्थ नहीं जाने दूंगा, इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive Exam) की तैयारी में जी जान से जुट गया। अब जब सफलता मिल जाती है, तो अपने संघर्ष को बताते हुए अच्छा लगता है और हम अपने कष्टों को भूलने लगते हैं।”

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“विज्ञान विषय के साथ, बारहवीं की पढ़ाई के दौरान ट्यूशन पढ़ने जाता था। वहां से लौटते हुए अंधेरा हो जाता था। रेलवे की पटरियों की किनारे-किनारे चलता था। एक दिन मैं अकेले ही अंधेरे में घर आ रहा था, पीछे से ट्रेन आने लगी। ट्रेन की रोशनी में मुझे अपने से कुछ ही दूरी पर पटरी पर बैठा हुआ गुलदार दिखाई दे गया।

मैं काफी घबरा गया था, पर घबराने से क्या होगा, ऐसा सोचकर वहीं सहम कर खड़ा रहा। ट्रेन गुजरने पर गुलदार भी भाग गया। ऐसा कई बार हुआ, जब हाथियों की चिंघाड़ सुनी। यह पूरा इलाका जंगल का है, इसलिए यहां जंगली जानवर घूमते रहते हैं।”

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बताते हैं, “ग्रेजुएशन के लिए प्राइवेट फॉर्म भरेंगे और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जारी रखेंगे। अभी कुछ एग्जाम देने हैं, जिसकी तैयारी चल रही है। पुलिस भर्ती का रिजल्ट आने के बाद भी, पढ़ाई जारी है, हम उसी तरह पढ़ाई कर रहे हैं, जैसा कि पहले कर रहे थे।”

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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