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क्या कर्जे में फंसी है वन गुर्जरों की मिल्क इकोनॉमी

दुग्ध उत्पाद गुर्जरों को कम, उनसे दूध लेने वाली डेयरियों को ज्यादा लाभ

“अधिकतर वन गुर्जर दूध खरीदने वालों के कर्ज से दबे रहते हैं। वो कर्ज इसलिए लेते हैं, क्योंकि उनको पशुओं के लिए पुआल और आहार की जरूरत होती है, जिसके लिए उनके पास पैसा नहीं होता। वो कर्ज के बदले दूध बेचते हैं, जिसका रेट वर्षों से नहीं बढ़ा। रेट इसलिए भी नहीं बढ़ा पा रहे हैं, क्योंकि कर्ज देने वाला कहता है, पहले पूरा पैसा वापस करो, फिर दाम बढ़ाएंगे। दुख की बात यह है कि कर्ज कभी भी पूरा नहीं हो पाता,” खैरी निवासी युवा गुर्जर शबीर अहमद कहते हैं।

शबीर अहमद ने पौड़ी गढ़वाल के कुनाऊं में हो रहे गुर्जर उत्सव में आयोजित दूध का अर्थशास्त्र (Milk Economy) पर चर्चा में भाग लेते हुए यह खुलासा किया। वो कहते हैं, वन गुर्जर जंगलों में या फिर उन इलाकों में रहते हैं, जहां उनके पशुओं के लिए चारा-पानी आसानी से मिल सके। उनके डेरों तक बिजली नहीं है और दूध को ज्यादा समय तक नहीं रखा जा सकता, इसलिए दूध को खराब होने से बचाने के लिए कम दाम पर ही सही, बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है। यह सवाल आज भी अपनी जगह कायम है कि सैकड़ों पशुओं को पालने वाला दुग्ध उत्पादक कर्ज लेने को क्यों मजबूर है और उनसे लेकर उपभोक्ताओं तक दूध बेचने वाला क्यों धनी हो रहा है।

मिल्क इकोनॉमी पर चर्चा के दौरान शबीर अहमद। फोटो- राजेश पांडेय/newslive24x7.com

दूध में मिलावट नहीं करते, इसलिए डिमांड के अनुसार सप्लाई नहीं कर पाते
वन गुर्जर चोपड़ा बताते हैं, गर्मियों में बिजनौर के खादर क्षेत्रों और पहाड़ की ओर चले जाते हैं। गढ़वाल में ज्यादातर लोग बिजनौर के खादर क्षेत्र में हैं- जिनके दूध की मार्केट ऋषिकेश और हरिद्वार हैं। देहरादून के लिए दूध मोहंड और अन्य आसपास के इलाकों से पहुंचता है। वैसे, गैंडीखाता में ज्यादा दूध इकट्ठा होता है। गर्मियों में दूध कम हो जाता है।

“गुर्जर दूध में पानी तक नहीं मिलाता। वो एक समय में जितना दूध डेयरियों को देते हैं, उतना ही दे पाएंगे, इस आपूर्ति में भी कमी आ सकती है, पर हम ज्यादा दूध उपलब्ध नहीं करा पाते। हमारे पास मार्च से मई तक दूध की कमी होती है। हम अचानक होने वाली डिमांड के अनुसार दूध सप्लाई नहीं कर पाते, इसलिए हमारे दूध की मार्केट खराब हो रही है”,  चोपड़ा कहते हैं।

चोपड़ा बताते हैं, गुर्जरों के अलावा बाजार में दूध पहुंचा रहे दूसरे लोगों से डेयरी वाले एक कुंतल या दस कुंतल की डिमांड करेंगे तो वो उपलब्ध करा देंगे। सवाल यह है कि क्या पशु डिमांड के अनुसार दूध देते हैं। पशु उतने ही हैं, दूध पहले की ही तरह दे रहे हैं, अचानक उनका दूध कैसे बढ़ जाएगा। साफ सी बात है, दूध में कुछ न कुछ मिलाकर उसकी आपूर्ति बढ़ाई जा रही है।

उन्होंने हमारे (वन गुर्जर) दूध का रेट 40 रुपये प्रति लीटर है। दुकानदार पहले दूध बेचता है और फिर हमें पैसे देता है। महीने में दस तारीख को हिसाब होता है। मावा या फैट कम होने पर पैसे भी काटे है। फैट की टेस्टिंग करते हैं। पर, ऐसा बहुत कम बार होता है कि मावा या फैट कम हो जाए। हमारा दूध नंबर एक है। वो हमारा दूध 60 रुपये बेचते हैं और हमें 40 रुपये प्रति लीटर भुगतान करते हैं। पशुओं को हम पालते हैं। दूध उत्पादक हम हैं और हमारे दूध से दुकानदार को लाभ मिलता है।

एक सवाल यह उठता है कि गुर्जरों को प्रमुख डेयरियों आंचल, पराग को दूध बेचने में क्या दिक्कतें आती हैं। ये कोआपरेटिव सेक्टर की डेयरियां हैं, गुर्जर इनसे जुड़ सकते हैं। इस पर युवा अमानत बताते हैं, हमने कोशिश की थी, पर दिक्कत यह है कि इन संस्थाओं की गाड़ियां हमारे डेरों तक पहुंचने में काफी देर करती हैं। वन क्षेत्र तक सड़कें नहीं हैं, जो रास्ते हैं भी, उनकी हालत सही नहीं है। कभी कभी शाम भी हो जाती है। दूध को बहुत समय तक के लिए नहीं रखा जा सकता, गर्मियों में तो बिल्कुल भी नहीं।

गुर्जर सीधा उपभोक्ताओं तक पहुंचाएं दूध
वन गुर्जर सीधे उपभोक्ताओं को दूध क्यों नहीं बेचते ? चर्चा के दौरान यह सवाल उठा। जवाब था, वन गुर्जर भी सीधे उपभोक्ताओं तक दूध पहुंचाते हैं और इसमें उनको ज्यादा रेट मिलता है। पर, इनकी संख्या लगभग दस फीसदी ही है। वजह यह है कि उनके डेरे सड़क से बहुत दूर हैं। पहले सड़क और फिर उपभोक्ताओं तक दूध पहुंचाने में उनका पूरा दिन निकल जाएगा, ऐसे में पशुओं को चराने ले जाना, उनका ध्यान रखने का सवाल खड़ा हो जाएगा।

हरिद्वार में घर-घर जाकर दूध बेचने वाले शफी बताते हैं, 50 से 60 लीटर दूध बेचते हैं। हमारा दूध क्वालिटी वाला है, इसलिए रेट भी अच्छा मिलता है। पर, हमारे पास दूध की कोई लिमिट नहीं है यानी हमारे पास दूध की उपलब्धता निरंतर नहीं है। किसी दिन हमारे पास एक कुंतल दूध होता है, किसी दिन हो सकता है कि दस लीटर ही हो। घर- परिवार में शादी विवाह या किसी अन्य उत्सव में हम दूध बाजार में नहीं बेचते। हमारे पास दूध की उपलब्धता में उतार चढ़ाव होता रहता है। गर्मियों में दूध कम होता है, इसकी वजह जंगलों में चारा पत्ती मिल पाना है, जबकि सर्दियों में दूध उत्पादन ज्यादा होता है।

वो बताते हैं, हमारे पास दूध की बिक्री बढ़ाने के लिए कोई प्रचार माध्यम नहीं है। लोग दूध की गुणवत्ता की तारीफ करते हैं और ग्राहक बढ़ते हैं। हमारा दूध सबसे भारी होता है, इसमें मक्खन और मावा खूब होता है। वो कहते हैं, गुर्जर दूध में पानी नहीं मिलाते। एक या दो फीसदी गुर्जर ही पानी मिलाते होंगे।

कोरोना संक्रमण के समय ग्राहक सीधे डेरों पर पहुंचे दूध लेने
वन गुर्जर ट्राइबल युवा संगठन के सचिव फैजान बताते हैं, वनों में रहने वाले गुर्जरों के पशु जंगलों का चारा पत्ती खाते हैं। उनके दूध में जड़ी बूटियों की ताकत होती है। उनको शुद्ध पानी मिलता है। इसका दूध की गुणवत्ता पर अच्छी होती है। पर, मार्केट में पैकेट वाले दूध से उनके दूध की मार्केट डाउन हुई है।

वो सीधे उपभोक्ताओं तक दूध पहुंचाने की पैरवी करते हुए कहते हैं, इससे लाभ मिलेगा और इकोनॉमी में सुधार आएगा। वो बताते हैं कोरोना संक्रमण के दौर में उपभोक्ता सीधे गुर्जरों के पास दूध लेने पहुंचे। कुछ गुर्जर परिवार ऐसे हैं, जो शहरों के आसपास रहते हैं। उस समय लोगों ने घर-घर दूध बिक्री करने वालों के एक ही बरतन से दूध सप्लाई करने पर एतराज जताया। पास ही गुर्जरों का डेरा था और कुछ महिलाएं उनके डेरों पर दूध लेने जाने लगीं। उनको पहले से बेहतर दूध मिलने लगा। फैजान बताते हैं, उन्होंने हरिद्वार व लालकुआं में ऐसा मौके पर जाकर देखा। पास ही के इंडस्ट्रीयल एरिया में रहने वाले परिवार गुर्जरों के घरों से दूध उठाते हैं। दोपहर ढाई-तीन बजे डेरों पर लाइन लग जाती हैं, जब तक गुर्जर दूध निकालने का काम पूरा कर पाते हैं, उनका दूध बिक जाता है। सीधा उपभोक्ताओं को बेचने से दूध का दाम पहले से अच्छा 50 रुपये प्रति लीटर तक मिल रहा है। कुछ परिवार 60 रुपये प्रति लीटर तक ले रहे हैं, क्योंकि वो दूध की गुणवत्ता के बारे में जानते हैं।

एक किलो दूध में मावा और फैट का हिसाब
क्या अन्य रोगों के समय गुर्जरों के पास दूध की डिमांड होती है, के सवाल पर एक युवा बताते हैं, जिनकी हरिद्वार के किसी गांव में डेयरी है। वो अपने डेरे से दूध लाकर गांव की दुकान पर मावा, पनीर, दही बनाकर बेचते हैं। बताते हैं, बकरी के दूध का बीमारी में इस्तेमाल होता है। पर, भैंस के दूध के बारे में ऐसा नहीं सुना है।

उन्होंने बताया, होली या दीपावली में मावे, पनीर की डिमांड को हम पूरा नहीं कर पाते। इस डिमांड का कारण क्वालिटी है। बताते हैं, जंगल में रहने वाले गुर्जरों की भैंसों के दूध की गुणवत्ता उनके आहार पर निर्भर करती है। एक किलो दूध में 270-80 ग्राम मावा, 65 से 85 तक फैट तथा 225 ग्राम तक पनीर हासिल कर सकते हैं।

वो बताते हैं प्योर दूध बेचने वालों के सामने एक समस्या आती है, लोग कहते हैं, इसमें पाउडर मिलाया है। यह इसलिए क्योंकि लोग एकदम शुद्ध दूध कम ही देखते हैं। शहर में प्योर दूध नहीं मिलता। प्योर दूध गाढ़ा होने पर वो समझते हैं कि इसमें कुछ मिलाया है।

बाजार में ‘गोजरी ब्रांड’ लेकर आएं गुर्जर
करनाल से आए डीके सडाना गुर्जरों की मिल्क इकोनोमी को बढ़ाने के लिए सुझाव देते हैं, गुर्जरों का सालाना पलायन जरूरी है। इससे उनके पशुओं को घास मिलती है और पहाड़ पर उपलब्ध घास का उपयोग होता है। सरकार को वन गुर्जरों की दिक्कतों को दूर करके उनकी मदद करनी चाहिए। गुर्जरों के पास गोजरी नस्ल की भैंसें होती हैं। गुर्जर गुणवत्तापूर्ण दूध के उत्पादक हैं, उनको खुद के मिल्क ब्रांड को बाजार में लाना चाहिए। उन्होंने इस ब्रांड का नाम गोजरी ब्रांड सुझाया।

घुमंतू जीवन अच्छा है पर दूध का मार्केट कैसे मिलेगा

वन गुर्जर उत्सव में विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के कई सत्र आयोजित किए गए। फोटो- राजेश पांडेय /newslive24x7.com

वन गुर्जर बताते हैं, पहाड़ में मार्केट नहीं है। पहले अधिकतर परिवार पहाड़ की ओर माइग्रेशन करते थे, पर अब बिजनौर के खादर वाले इलाकों में जाते हैं। वहां ज्यादा बिक्री होती है, वैसे अब स्थिर होने से फायदा है। हम उत्तरकाशी में मावा बेचते थे। टिहरी शिमला में मावे की भट्टी दूर थी,  मक्खन निकालकर घी बेचते थे। आमदनी ज्यादा थी, खर्चे कम थे। अब पहले जैसेी मार्केट नहीं है।

चर्चा के दौरान सवाल पूछा गया, अब अधिकतर परिवार मैदानों में रहते हैं। यहां चार- पत्तियां सीजनल मिलती हैं। मैदानों में चारागाह नहीं हैं। पानी के स्रोत मार्च में सूख जाते हैं।  गर्मियों में डेरों में चारे-पानी की कमी हो रही है। 80 से 90 फीसदी लोग पहाड़ पर जाना नहीं चाह रहे। जानवर बढ़ रहे है, चारा बाहर से खिलाना पड़ रहा है। पशुओं के लिए घास चाहिए, दूध के लिए अच्छे दाम देने वाली मार्केट की जरूरत है।  क्या ऐसी स्थिति में उनको नुकसान नहीं उठाना पड़ रहा है।

इस सवाल का जवाब था, घुमंतू जीवन ज्यादा अच्छा है, वहां पशुओं के लिए पर्याप्त चारा मिल जाता है। हमारे वो पशु भी भरपूर चारा खा पाते हैं, जो दुधारू नहीं होते। वैसे भी, उनके पशुओं में एक समय में मुश्किल से 25 फीसदी दुधारू होते हैं, बाकि पशुओं को भी पूरा चारा खिलाना होता है, जिनमें कटड़े- कटड़ियां भी शामिल हैं। इन सबके बाद भी वर्तमान में यह आर्थिकी को मजबूत करने लिहाज से सही प्रतीत नहीं होता, क्योंकि वहां न तो दूध बिक पाता है और न ही दूध से बने पदार्थ। सरकार पहाड़ पर प्रवास के दौरान दूध और दूध से बनने वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री की व्यवस्था करा दे। ऐसा कोई तो विकल्प होगा, जिससे हमारा घुमंतू जीवन भी बरकरार रहे और आर्थिक सुरक्षा भी मिल जाए। गुर्जरों को पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी, कम ब्याज पर ऋण एवं आहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था सरकारी स्तर पर होनी चाहिए।

उत्तराखंड में वन गुर्जर को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिले 
वन गुर्जर ट्राइबल युवा संगठन के संस्थापक अमीर हमजा का कहना है, उत्तराखंड के हरिद्वार, देहरादून, पौड़ी, उत्तरकाशी, टिहरी में गुर्जर परिवार निवास करते हैं। माइग्रेशन के लिए टिहरी और रुद्रप्रयाग के ऊंचाइ वाले इलाकों में चले जाते हैं। कुमाऊं के नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिलों में भी गुर्जर परिवार रहते हैं। राज्य में वन गुर्जरों की आबादी लगभग 75 हजार है।

उन्होंने बताया, केंद्र सरकार के निर्देश पर राज्य में हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र  विभाग (Anthropology Department) ने सर्वेक्षण किया था, जिसमें पता चला कि उत्तराखंड में रहने वाले वन गुर्जर पूर्ण रूप से अनुसूचित जाति का दर्जा रखते हैं और उनको अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलना चाहिए। इस रिपोर्ट को शासन के पास सचिवालय में भेज दिया। इस मामले को लगभग एक वर्ष हो गया है, लेकिन अभी तक कार्यवाही नहीं हुई।

“स्वतंत्र भारत में बनाया गया हर कानून सही है, पर ब्रिटिश काल में बनाया गया कोई भी कानून, चाहे पुलिस एक्ट हो या फॉरेस्ट एक्ट हो, सही नहीं है। ब्रिटिश शासन के समय बनाया गया वन संरक्षण अधिनियम, 1927 को सही नहीं है, इसमें तमाम बाधाएं हैं। स्वतंत्र भारत में बनाए गए कानून को सही तरह से धरातल पर नहीं उतारा जा रहा है,” अमीर हमजा कहते हैं।

उनके अनुसार, जनजातीय समुदायों के संरक्षण, संवर्धन, मान्यताओंं को मान सम्मान देने वाला कानून, वनाधिकार कानून 2006 है, जिसमें स्पष्ट लिखा है कि आजाद भारत से पूर्व से रहने वाले इन वनवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। वनाधिकार कानून में यदि हमारे अधिकार निर्धारित हो जाते हैं, तो हमारी संस्कृति एवं मान्यताएं बच जाएंगे।

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यूट्यूब चैनल- डुगडुगी, फेसबुक- राजेश पांडेय

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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