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Video: कालाबाजारी और कर्जे के दुष्चक्र में फंसा दुग्ध उत्पादन

  • राजेश पांडेय

हम अपने घर और बाहर अक्सर सुनते हैं कि दूध पीने से शरीर और बुद्धि का विकास होता है। घरों में बच्चों को दूध पीने के लिए प्रेरित किया जाता है। पर, क्या हमने इस तथ्य पर विचार किया है कि जिस दूध को पिलाने की पुरजोर पैरवी की जाती है, क्या वो शुद्ध और गुणवत्ता से भरपूर है। दूध को समझने के लिए हमें इसके उत्पादन के तौर तरीकों को समझना होगा, क्योंकि यह काफी हद तक दुधारू पशुओं की स्थिति पर भी निर्भर करता है। इसलिए पहले हम दूध की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कारकों पर बात करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, दुध की गुणवत्ता पशुओं के स्वास्थ्य, उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपायों, दूध दुहने से लेकर दूध को सुरक्षित रखने के प्रबंधन पर निर्भर करती है। पशु का स्वास्थ्य और उत्पादकता काफी हद तक सही चारा और पानी की उपलब्धता पर निर्भर है।

चारे और पोषक तत्वों की आवश्यकता पशुओं की शारीरिक अवस्था, दूध उत्पादन स्तर, आयु, लिंग, स्वास्थ्य, गतिविधि के स्तर, जलवायु और मौसम जैसे कारकों के अनुसार होती है।पशुओं के लिए चारा मौसमी उतार-चढ़ाव, वर्षा की स्थिति पर आश्रित होता है। पशुओं को भूख, प्यास और कुपोषण, बेचैनी, शरीर पर चोट लगने, दर्द आदि परेशानियां नहीं होनी चाहिए।

वहीं, जलवायु परिवर्तन, वायु एवं जल प्रदूषण, जल की कमी और जैव विविधता को नुकसान भी पशुपालन को प्रभावित करते हैं। कुल मिलाकर, दूध की गुणवत्ता पशुओं के खानपान, उनके प्रवास स्थल की स्थिति, उनकी मनोस्थिति, मूवमेंट समेत देखरेख और पर्यावरण पर निर्भर करती है।

बचपन से लेकर अब तक देखी जाने वाली दूध वितरण की प्रमुख व्यवस्थाओं का जिक्र करता हूं। बड़ी संख्या में पशुपालक व्यक्तिगत रूप से घरों में दूध आपूर्ति करते हैं। वहीं, दुग्ध व्यवसायी पशुपालकों से दूध इकट्ठा करके उपभोक्ताओं तक पहुंचाते हैं। कई कंपनियां दुग्ध उत्पादक समितियों से दूध संकलित करके ब्रांड नाम से पैकेटबंद या खुला दूध बेचती हैं। ब्रांड नाम से ही दूध को पाउडर की अवस्था में भी बेचा जाता है।

अब सवाल यह उठता है कि उपभोक्ता इस बात का पता कैसे लगाएंगे कि उन तक पहुंचने वाला दूध गुणवत्ता के सभी मानकों को पूरा कर रहा है या नहीं। यह बात जितना खुले रूप में मिलने वाले दूध पर लागू होती है, उतनी ही पैकेटबंद पर भी। इसके पीछे प्रमुख खाद्य पदार्थ दूध की गुणवत्ता को लेकर जागरूकता की कमी भी है।

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दूध में मिलावट का मुद्दा वर्षों से उठाया जा रहा है, आज भी साफतौर पर, खासकर स्रोत से उपभोक्ता तक विभिन्न माध्यमों से पहुंचने वाले दूध के बारे में साफ तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि यह वास्तव में शारीरिक और बौद्धिक विकास करेगा या नहीं।

यदि सीधे पशु से बिना किसी मिलावट के उपभोक्ता तक दूध पहुंचता है तो भी यह दावे से नहीं कहा जा सकता कि दूध शुद्ध है। यह बात चारे की गुणवत्ता से जुड़ी है। इस पर भी विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है।

जैसा कि पहले भी जिक्र किया है कि दूध की गुणवत्ता के लिए पशुओं के स्वास्थ्य, उनके आहार की गुणवत्ता एवं उपलब्धता, पर्याप्त पानी, प्रदूषण रहित वातावरण, उनके रहने के स्थान, मूवमेंट आदि की महत्वपूर्ण भूमिका है।

पशुपालन के लिए ढांचागत एवं आधारभूत आवश्यकताओं तथा बुनियादी सुविधाओं के अभाव में श्रेष्ठ गुणवत्ता वाले दूध की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। पशुपालक को दुग्ध बिक्री से श्रम का सही मूल्य मिले, इस दिशा में प्रभावी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

अब हम बात करते हैं कि उभोक्ताओं तक पहुंचने वाले खुले दूध के बड़े उत्पादक वन गुर्जर समुदाय की। गुर्जर समुदाय का वनों से गहरा नाता है और उनके समक्ष पशुओं के लिए हरे एवं पौष्टिक चारे की समस्या नहीं आती, ऐसा आमतौर पर माना जाता है। उनके दुधारू पशुओं, जिनमें प्रमुख रूप से भैंस शामिल हैं, डेरे से लेकर वनों तक आवागमन करते हैं।

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उनके हर समय एक स्थान पर बंधे रहने की समस्या भी नहीं है, जैसा कि कस्बों एवं शहरों में कम स्थान वाली डेयरियों एवं घरों में बनी गौशाला में देखा जाता है।

वन गुर्जर गायों को भी पालते हैं, पर इतनी ज्यादा संख्या में नहीं। उनके पास इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर जंगलों में या जंगलों व नदियों के किनारों पर पशुओं के बाड़े होते हैं, जिनमें एक साथ बड़ी संख्या में पशु रहते हैं।

पशुओं को रखने के स्थान पर वेंटीलेशन की आवश्यक शर्त इन बाड़े में लागू होती दिखती है। वन गुर्जर पशुओं को खुला रखते हैं। उनके पशु जंगल से अपने बाड़े तक स्वच्छंदता से मूवमेंट करते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि वन गुर्जरों के पास घी-दूध की कोई कमी नहीं रहती है, पर यह बात हर मौसम में लागू नहीं होती। गर्मियों में वनों में चारे और पानी की कमी देखी गई है।

उनके सामने पशुओं को चारे के साथ आहार, दाना, खली, चौकर एवं अन्य खाद्य पदार्थ खिलाने की चुनौती है, जिनसे प्राकृतिक तरीके से दुग्ध उत्पादन को बढ़ाया जा सके।

डोईवाला के पास खैरी वनबाह क्षेत्र में गुलाम रसूल से  कृषि एवं पशुपालन से जुड़े हैं। उनका कहना है कि गर्मियों में दुग्ध उत्पादन में लगभग आधे का अंतर का आ जाता है। अब इसमें पड़ता नहीं खाता। दूध 30-40 रुपये किलो है और जानवरों को खिलाए जाने वाला आहार 50-60 रुपये प्रति किलो हो गया। हमें कर्जा लेकर जानवरों के लिए आहार खरीदना पड़ रहा है।

वर्तमान में लॉकडाउन की वजह से दूध की खपत कम हो गई है और वैसे दूध कम ही हो रहा है। पिछले दिनों पशुओं को रोग लगने से भी उत्पादन पर असर पड़ा है। चारा महंगा हो गया है, दुकानदार से पूछते हैं तो वो कहते हैं कि आहार बाहर से ही नहीं आ रहा है।

दूध देने वाले एक पशु पर प्रतिदिन 200 से 300 रुपये का खर्चा आता है। पशु ज्यादा दूध नहीं दे रहे हैं तो नुकसान तो होगा ही। नुकसान की भरपाई एक या दो पशुओं को बेचकर करनी पड़ती है।

बताते हैं कि पशु पास ही जंगल, घास के मैदानों व नदियों के किनारे चरने जाते हैं, पर गर्मियों में घास सूख जाती है। सूखी पत्तियां खाने वाले पशुओं से पहले की तरह ज्यादा उत्पादन की उम्मीद नहीं कर सकते। नदी में पानी नहीं है। डेरे के पास से होकर बहने वाली नहर भी सूखी है।

भैंसों को पानी में बैठने की आदत होती है, इससे वो गर्मी से बचाव करती हैं, पर अब कहां बैठें। घरों पर हैंडपंप से ड्रम भरते हैं, सभी बारी-बारी ड्यूटी लगाकर हैंडपंप से जानवरों के लिए पानी भरते हैं। बड़ा कठिन काम है यह, बहुत समय लग जाता है कि जानवरों को पानी पिलाने में।

डोईवाला के पास खैरी वनबाह क्षेत्र में गुर्जर समुदाय के दो डेरे हैं, जिनमें लगभग 20 परिवार रहते हैं, जिनका प्रमुख व्यवसाय दुग्ध उत्पादन और कृषि है। ये परिवार लगभग 45 साल से इसी जगह पर रह रहे हैं।

राजाजी पार्क क्षेत्र में रहने वाले परिवारों को वनों से बाहर आने के लिए प्रेरित करते हुए सरकार की ओर से कृषि एवं पशुपालन के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई थी।

वन गुर्जरों में घूमंतू परिवार भी हैं, जो गर्मियों में पर्वतीय और सर्दियों में मैदानी इलाकों में डेरा जमाते हैं। इनके पास घर परिवार का सामान ढोने के लिए खच्चर होते हैं और दुधारू पशुओं का बेड़ा इनके मूवमेंट में साथ रहता है।

अब वन गुर्जर समुदायों के परिवारों के डेरे स्थाई हो गए हैं। पशुपालन के साथ आजीविका के लिए कौशल विकास नई राह बनकर सामने आया है।

23 वर्ष के युवा शबीर अहमद, वन गुर्जर समुदाय से हैं, पर उनका परिवार डेरे पर नहीं रहता। शबीर कहते हैं कि वक्त के साथ हमें बदलाव लाना होगा।

यह ठीक है कि पशुपालन एवं कृषि आजीविका के स्रोत हैं, पर हमें स्वरोजगार एवं रोजगार के लिए अन्य विकल्पों पर भी ध्यान देना चाहिए। कौशल विकास से आजीविका के नए स्रोत पैदा होंगे।

शबीर बताते हैं, उन्होंने घरों व दुकानों में एल्युमिनियम के स्ट्रक्चर से पार्टिशन करने, किचन बनाने सहित कई काम सीखे हैं। डेरे से कुछ दूरी पर खैरी गांव में उनका घर है और वो चाहते हैं गुर्जर समुदाय के युवा स्किल डेवलपमेंट के माध्यम से आजीविका के लिए कुछ नया करें।

अब वन गुर्जरों ने बच्चों की शिक्षा पर ध्यान दिया है। डेरे से लगभग दो- तीन किमी. पैदल चलकर बच्चे राजकीय विद्यालयों में पढ़ रहे हैं।

उधऱ, कोरोना संक्रमण के कारण लॉकडाउन के चलते राज्यभर में दूध और इससे बने उत्पादों की बिक्री करने वाली दुकानें बंद हो गईं। कई संस्थानों, दफ्तरों एवं छात्रावासों में दूध की मांग नहीं हो रही।

कोरोना संक्रमितों के घरों, कोरोना संक्रमित कैंटोनमेंट जोन में भी दूध की आपूर्ति ठप हो गई। कुल मिलाकर दूध और उसके उत्पादों का बाजार प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ।

इस बीच सवाल यह भी उठा कि क्या बाजार में मांग कम होने से उत्पादकों के पास दूध बच रहा है, क्योंकि दूध उस तरह का उत्पादन नहीं है, जिसको बाजार की मांग के अनुरूप बहुत कम या बहुत अधिक किया जा सके।

पशुओं से प्रतिदिन की तरह दूध निर्धारित से थोड़ा कम या थोड़ा ज्यादा तो लिया जा सकता है, पर एक दिन के अंतराल में दुग्ध उत्पादन में बहुत ज्यादा अंतर नहीं हो सकता।

पर, वन गुर्जर लियाकत अली बताते हैं कि दुग्ध उत्पादन लगभग आधे से भी कम हो गया। इन दिनों हमें दूध का रेट ज्यादा मिलना चाहिए था, पर हमसे दूध ले जाने वाले कह रहे हैं कि खपत कम हो गई है और पहले से भी कम रेट दे रहे हैं। वर्तमान में 40 रुपये प्रति किलो का रेट चल रहा है। पशुओं पर खर्चा तो पहले की ही तरह है।

पशु आहार में 1000 रुपये की चीज 1300 रुपये की मिल रही है। दुकानदार कहते हैं कि ऊपर से ही महंगा आ रहा है। उनके अनुसार एक पशु पर 300 रुपये प्रतिदिन का खर्चा है। नुकसान हो रहा है। अभी तो जितना पैसा मिल रहा है, उसी के हिसाब से पशुओं को खिला रहे हैं। उम्मीद है कि सर्दियों में दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा।

पशुपालक मोहम्मद इब्राहिम कहते हैं कि मांग कम होने पर दस में से पांच लीटर दूध ही बिक रहा है। बचा दूध घर पर इस्तेमाल हो रहा है या आसपास के गांवों में पता करके आधे दाम पर बेच रहे हैं। कभी कभी दूध खिंडाना पड़ रहा है या जानवरों को पिला देते हैं। जबकि पहले दूध की मांग ज्यादा थी।

बताते हैं कि हमें भूसा खरीदने के लिए उन लोगों से कर्जा लेना पड़ता है, जिनको रोजाना दूध बेचते हैं।धीरे धीरे करके उनका कर्जा दूध बेचकर उतारते हैं। चौकर पहले 950 का 45 किलो का मिलता था, अब 1250 रुपये का मिल रहा है। खल के प्रति बैग में 400 रुपये तक बढ़ गए। दूध की लागत बढ़ गई, पर दूध घर में पड़ा है।

हमने बशीर अहमद से मुलाकात की, जो पशुपालन में सरकार से सुविधाएं चाहते हैं। बताते हैं कि पिछले दिनों जानवरों के खुरपका हो गया, पर पशुपालन विभाग से कोई सहयोग नहीं मिला।

दवाइयां नहीं मिली और न ही कोई देखने आया। एक दिन में भैंस की खुराक रोजाना 250 रुपये है, दूध से आय 100 रुपये हो जाएगा, बाकी 150 रुपये तो कर्जा ही बैठ रहा। कर्जा दूध की कीमत से चुकाते हैं।

खर्चे बहुत हैं। यहां ऐसा जंगल नहीं है, जहां चारा मिला। जंगल में प्लांटेशन हो रखा है, इसलिए वहां पशुओं को नहीं ले जा सकते।

पानी के लिए कोई ट्यूबवैल नहीं है, सरकार से कोई सहयोग नहीं मिला। हैंडपंप चलाकर पानी पिलाते हैं। जानवरों के बैठने के लिए जेसीबी से खुदाई करके तालाब बनाया। दोनों डेरों पर लगभग 400 पशु हैं, पर कोई सुविधा नहीं।

पशु अस्पताल में डॉक्टर कहते हैं कि बजट नहीं है। पर्चा लिखकर बाजार से दवाइयां खरीदने को कहा जाता है। 35, 36 व 37 से ऊपर दूध का रेट नहीं है। तीन साल से रेट नहीं बढ़ा। अब लॉकडाउन बताकर रेट नहीं बढ़ाए जा रहे। हम घी बनाने के लिए भट्टियां नहीं लगा सकते।

वन गुर्जरों द्वारा बड़े स्तर पर किए जा रहे पशुपालन के लिए आवश्यक सुविधाओं एवं संसाधनों के लिए सरकार के सहयोग की आवश्यकता है। पशु आहार की बेलगाम कीमतों पर नियंत्रण की जरूरत है।

आजीविका के बड़े स्रोत पशुपालन व दुग्ध उत्पादन को व्यवस्थित एवं लोक कल्याणकारी बनाना आवश्यक होगा। ऐसा नहीं हुआ तो असंगठित रूप कार्य कर रहे अधिक संख्या में लोगों को पशुपालन में अपने श्रम व लागत को पाने के लिए कर्ज और बिचौलियों के दुष्चक्र में फंसने की मुश्किलों का सामना करना पड़ता रहेगा।

वन गुर्जर समुदायों के युवाओं को कौशल विकास से जोड़कर आजीविका के लिए नई राह तैयार बनाना भी व्यवस्था की ही जिम्मेदारी है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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