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जिम्मेदारियों का बोझ ढोतीं महिलाएं, नहीं मिलता मेहनत और महंगाई के हिसाब से पैसा

असंगठित क्षेत्र की श्रमिक 60 साल की आशा देवी के सामने परिवार को पालने की चुनौती

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

आशा देवी पहले घर पर रहती थीं, पर पति की मृत्यु के बाद बच्चों की परवरिश के लिए भवन निर्माण में मजदूरी करने लगीं। बताती हैं, साठ साल की उम्र हो गई है, अब इतनी मेहनत का काम नहीं होता। कभी कभी तो रेत ईंट पहुंचाने के लिए दो- तीन मंजिला भवन कई बार चढ़ना उतरना पड़ता है। तीन या चार दिन मजदूरी करने के बाद कुछ दिन छुट्टी लेनी पड़ती है। शरीर में दर्द रहता है। बुखार हो जाता है। कुछ दिन तक काम पर जाने का मन नहीं करता।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 20 किमी. दूर डोईवाला की घनी आबादी वाली केशवपुरी बस्ती में रहने वाली आशा देवी असंगठित क्षेत्र की श्रमिक हैं, जिनका न तो पारिश्रमिक निर्धारित है और न ही उनको मिलने वाली सुविधाएं। उनके पास श्रमिक कार्ड ( labour card) भी नहीं है।

सुबह छह बजे से उनकी दिनचर्या शुरू हो जाती है। बेटी की मदद से घर के कामकाज निपटाती हैं और फिर ठेकेदार द्वारा बताए गए निर्माण स्थल पर चली जाती हैं। शाम को करीब सात बजे तक घर पहुंच पाती हैं और फिर से घर के कामकाज निपटाने में बेटी का हाथ बंटाती हैं। सुबह उनके पास किसी से विस्तार से बात करने का समय नहीं होता, इसलिए हमने उनसे शाम साढ़े सात बजे मिलने का निर्णय लिया।

केशवपुरी निवासी आशा देवी, जो असंगठित क्षेत्र की श्रमिक हैं, ने शाम को घर लौटने पर मुलाकात की। फोटो- राजेश पांडेय/newslive24x7.com

डोईवाला के केशवपुरी और राजीवनगर से एक अनुमान के मुताबिक 90 फीसदी लोग, जिनमें महिलाओं की संख्या लगभग दो हजार के आसपास है, भवन निर्माण, खनन स्थलों तथा घरों व दुकानों में श्रम करते हैं। श्रमिक के रूप में पंजीकृत नहीं होने की वजह से ये सरकारी योजनाओं से लाभान्वित नहीं हो पाते। इनके पारिश्रमिक का सही तरह से निर्धारण भी नहीं हो पाता है।

शाम साढ़े सात बजे तक, अधिकतर लोग काम से वापस आ चुके हैं और केशवपुरी का चौक गुलजार है, यहां रोशनी ठीकठाक है। चौक से लगी एक गली, जिससे होकर सीधे सौंग नदी तट पर पहुंच सकते हैं, में घरों में जल रहे बल्ब ही अंधेरा दूर कर रहे हैं। गली में बच्चे दौड़ लगाते हुए खेल रहे हैं। लोग आ जा रहे हैं। दोनों ओर मकानों से घिरी संकरी गली में दोपहिया जाने लायक ही जगह है।

पुरुषों को ज्यादा दिहाड़ी, महिलाओं को क्यों नहीं
कुछ देर पहले ही घर पहुंचीं आशा देवी ने बताया, पुरुषों को महिलाओं से ज्यादा दिहाड़ी मिलती हैं, जबकि महिलाएं भी उनके बराबर मेहनत करती हैं। पुरुषों को उनसे सौ से डेढ़ सौ रुपये ज्यादा दिहाड़ी मिलती है। वो भी रेत छानती हैं, ईंट, रेत, बजरी को दो से तीन मंजिला तक सिर पर ढोकर पहुंचाती हैं।

मेहनत और महंगाई के हिसाब से नहीं मिलती दिहाड़ी
आशा बताती हैं, करीब छह साल पहले जब उन्होंने दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम शुरू किया था, जब 300 रुपये रोजाना मिलते थे। 2017-18 तक 300 रुपये मिले, बाद में 350 और फिर 400 रुपये कर दिए। अब हमें 400 से 450 रुपये तक दिहाड़ी मिल जाती है, जिसमें आने-जाने का किराया भी शामिल है। निर्माण स्थल तक जाने के लिए ऑटो टैंपों का किराया भी बढ़ गया है। दूरी के हिसाब से टैंपोवाला दस, 15 या 25 रुपये तक एक तरफ का किराया लेता है। कई बार घर से बहुत दूर जाना पड़ता है, जहां तक टैंपो मिलता है वहां तक सही है, नहीं तो दो से तीन किमी. पैदल भी चलते हैं। मेहनत और बढ़ती महंगाई के हिसाब से दिहाड़ी नहीं है।

केशवपुरी निवासी आशा देवी ने महिला श्रमिकों की चुनौतियों पर बात की। फोटो- राजेश पांडेय / newslive24x7.com

महीनेभर में मुश्किल से 15 दिन काम, पांच हजार तक आय
” इस उम्र में शरीर ही साथ नहीं देता। तीन-चार दिन दिहाड़ी करने के बाद बदन दर्द, बुखार, थकान महसूस होती है, इसलिए पूरे माह में मुश्किल से 15 दिन ही दिहाड़ी पर जा पाती हूं। कई बार सोचती हूं, इतनी मेहनत कितने दिन कर पाऊंगी। अगर, इस काम को छोड़ दूंगी तो मेरे पास आय का कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं है। कोई ऐसा काम मिल जाए, जिससे बच्चों की जिम्मेदारी अच्छे से संभाल लूं।

एक बेटे और बेटी की जिम्मेदारी है, उसको भी तो निभाना है। महीना में चार से पांच हजार रुपये तक कमा पाती हूं, इस महंगाई में क्या बचेगा, बल्कि हमेशा कमी ही दिखाई देती है। किसी तरह जीवन चल रहा है, ” आशा देवी कहती हैं।

श्रम के अनुसार नहीं खा पाते पौष्टिक भोजन  
आशा देवी के बिना पलास्तर वाले एक कमरे में रोशनी देने भर को एक बल्ब जल रहा है, पर इसकी रोशनी पूरे कमरे में नहीं है। चूल्हे के पास पसरे अंधेरे को दूर करने के लिए मिट्टी तेल की ढिबरी जल रही है। रसोई के नाम पर मिट्टी का चूल्हा और उसके पास बैठने भर की जगह है। बहुत कम स्थान पर बने चूल्हे और बाथरूम को अलग करती लगभग ढाई-तीन फीट की दीवार है। इस दीवार पर कुछ सामान रखा है। जब हम आशा देवी के साथ, कमरे में दाखिले हुए, उस समय उनकी बेटी खुश्बू, जिसने पांचवीं तक की पढ़ाई के बाद स्कूल छोड़ दिया था, खाना बना रही है।

आशा देवी के बिना पलास्तर वाले एक कमरे में चूल्हे के पास पसरे अंधेरे को दूर करने के लिए मिट्टी तेल की ढिबरी जल रही है। फोटो- राजेश पांडेय/newslive24x7.com

लकड़ी से जल रहे चूल्हे का धुआं कमरे में फैल रहा है। कढ़ाई में बनाई जा रही सब्जी में लगाया छौंक आंखों में लग रहा है। खुश्बू ने बताया, आज मटर आलू की सब्जी बना रही हैं। मैंने कहा, मुझे मटर आलू की सब्जी बहुत पसंद है। उनका कहना था, खाना खाकर जाइए। मेहनत के अनुसार भोजन में पोष्टिकता के सवाल पर आशा का कहना है, खाने में वही दाल-रोटी, सब्जी और क्या होगा।

गैस कनेक्शन नहीं, लकड़ी का एक गट्ठर लाने में लगता पूरा दिन
आशा बताती हैं, उनके पास गैस कनेक्शन नहीं है। महीने में दो-तीन बार जंगल से लकड़ी लाते हैं, तभी चूल्हा जलता है। कुल मिलाकर आशा देवी को तीन दिहाड़ी यानी लगभग 1200 रुपये का काम छोड़कर लकड़ी लानी होती है। उनके श्रम के मूल्य के अनुसार, तीन गट्ठर लकड़ी की कीमत 1200 रुपये है। आज दो अप्रैल, 2022 की तिथि में रसोई गैस के सिलेंडर के दाम 969 रुपये से हिसाब लगाया जाए तो उनकी रसोई में ईंधन का खर्चा ज्यादा है। वहीं चूल्हे से निकलने वाले धुएं से स्वास्थ्य प्रभावित होने, लकड़ियों का बोझ लेकर कई किमी. चलने, कमरे की दीवारें काली होने की समस्या है। रसोई गैस के इस्तेमाल से इन दिक्कतों से बचा जा सकता है।

खाने का सामान महंगा हो गया
“खाने का सामान बहुत महंगा हो गई। तेल, दाल, चीनी, मसाले और हरी सब्जी के रेट बढ़ने से हम जैसे कम आय वाले लोगों को दिक्कत होती है, ” आशा कहती हैं। आशा पेट्रोल या डीजल के रेट बढ़ने का जिक्र नहीं करतीं, क्योंकि वो प्रत्यक्ष रूप से इनसे वास्ता नहीं रखतीं।

कहती हैं, हम बिहार के दरभंगा जिला से वर्षों पहले यहां आ गए थे। मैं अपने बच्चों को अच्छा भविष्य देना चाहती हूं। मैंने पढ़ाई नहीं, मेरे माता पिता के पास इतना पैसा नहीं था। हमारा जीवन बहुत गरीबी में बीता। हम नहीं चाहते है, जैसा समय हम काट रहे हैं, वैसा बच्चों को सहना पड़े।

केशवपुरी चौराहे पर दुकानदार अजय कुमार बताते हैं, केशवपुरी, राजीवनगर में 90 फीसदी लोग भवन निर्माण, खनन स्थलों, दुकानों और घरों में कार्यों से जुड़े हैं। यहां लगभग डेढ़ हजार महिलाएं भवन निर्माण स्थलों, खनन कार्यों, घरों और दुकानों में कार्य करती हैं।

रोटी कपड़ा बैंक के संचालक मनीष उपाध्याय। फोटो- राजेश पांडेय/newslive24x7.com

रोटी कपड़ा बैंक के संचालक मनीष कुमार उपाध्याय बताते हैं, उनका जन्म यहीं हुआ है। वो बताते हैं कि बचपन से महिलाओं को सौंग नदी में रेत छानने का कार्य करते हुए देखा है। यहां महिलाएं भी पुरुषों के समान कार्य करते हुए परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। वो बताते हैं, अनुमान है कि लगभग दो हजार महिलाएं भवन निर्माण स्थलों पर श्रम करती हैं। इनके अतिरिक्त बड़ी संख्या में महिलाएं नजदीकी इंडस्ट्रीयल एरिया मेें, घरों और दुकानों में कार्य कर रही हैं। उनका कहना है कि महिलाएं कठिन श्रम करती हैं, यह कार्य एक उम्र तक संभव हो सकता है। अधिक आयु की महिलाओं के सामने जीवन को आगे बढ़ाने की चुनौतियां होती हैं। कई परिवार तो ऐसे हैं, जहां महिलाओं पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी है।

देशभर में 93 फीसदी कार्यबल असंगठित क्षेत्र में
असंगठित श्रमिक शब्द को असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 के तहत परिभाषित किया गया है।  असंगठित क्षेत्र के कामगार देश के कुल कार्यबल का लगभग 93 प्रतिशत हैं। सरकार कुछ व्यावसायिक समूहों के लिए कुछ सामाजिक सुरक्षा उपायों को लागू कर रही है, लेकिन कवरेज बहुत कम है। अधिकतर श्रमिक अभी भी बिना किसी सामाजिक सुरक्षा कवरेज के हैं। इन श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार ने संसद में एक विधेयक पेश किया है।

असंगठित कर्मकारों के हितों के लिए सरकार की व्यवस्थाएं-

 

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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