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अध्ययनः जंगल की आग से प्रभावित हो सकता है सौर ऊर्जा का उत्पादन

Rajesh Pandey
Last updated: April 28, 2022 4:30 pm
Rajesh Pandey
4 years ago
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जंगल में आग का चित्र। फोटो- JP Maithani
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नई दिल्ली। जंगल की आग, जो भारत के विभिन्न हिस्सों में खासतौर से गर्मी के मौसम में आफत बनकर आती है, भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन को कम करने में एक बड़ी भूमिका निभाती है। यह बात एक अध्ययन में सामने आई है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), भारत सरकार के तहत स्वायत्त अनुसंधान संस्थान, आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एआरआईईएस), नैनीताल और यूनान स्थित नेशनल ऑब्जर्वेटरी ऑफ एथेंस (एनओए) के शोधकर्ताओं के एक समूह ने यह अध्ययन किया है।

इस स्टडी के अनुसार, पश्चिमी / मध्य हिमालय और पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय इलाकों में प्राकृतिक और मानवजनित कारणों से भारत को हर साल बड़े पैमाने पर जंगल की आग का सामना करना पड़ता है। उत्तराखंड राज्य में 2021 में बड़े पैमाने पर जंगल की आग के कारण लगभग 1300 हेक्टेयर वन क्षेत्र जल गया था।

भारतीय वन सर्वेक्षण 2019 की रिपोर्ट के आधार पर कहा गया है, देशभर में 2004 से 2017 तक कुल 277,758 वन फायर प्वाइंट दर्ज किए गए और 2.56 लाख हेक्टेयर भूमि इन जंगल की आग से प्रभावित हुई।

नवंबर 2020 से जून 2021 तक ओडिशा (51,968), मध्य प्रदेश (47,795), छत्तीसगढ़ (38,106), महाराष्ट्र (34,025), झारखंड (21,713), उत्तराखंड (21,497), आंध्र प्रदेश (19,328),तेलंगाना (18,237), मिजोरम (12,864), असम (10,718), और मणिपुर (10,475) में बड़ी संख्या में जंगल की आग की सूचना मिली थी।

सर्दियों के महीनों (यानी, जनवरी-फरवरी 2021) के दौरान सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र पूर्वोत्तर भारत, मध्य भारत, भारत के पूर्वी तट और मध्य भारतीय हिमालय रहे। हालांकि, मार्च-अप्रैल 2021 के दौरान, सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र देश के उत्तरी भाग थे।

जंगल की आग के प्राकृतिक कारणों में बिजली, सूखे बांस का घर्षण, पेड़ों के तने और लुढ़कते पत्थर हैं। इन स्रोतों के अलावा, अनुकूल वायुमंडलीय परिस्थितियों, जैसे उच्च वायुमंडलीय तापमान और कम आर्द्रता से जंगल में आग लगने की आशंका अधिक होती है। भारत का उत्तरी भाग ज्यादातर बायोमास जलने से प्रभावित है। यह देखा गया है कि अधिकांश खोजे गए स्पॉट हिमालयी क्षेत्र भारत-गंगा के मैदान और देश के मध्य भाग में हैं।  देखें – पूरी रिपोर्ट

इंटरनेशनल पीयर-रिव्यूड जर्नल रिमोट सेंसिंग में यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है।  पता चला है कि अध्ययन अवधि (जनवरी से अप्रैल 2021) के दौरान एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ वैल्यू 1.8 तक थी, जिस दौरान बड़े पैमाने पर जंगल की आग की घटनाओं के कारण एक क्षैतिज सतह पर कुल सौर विकिरण में कमी आई और सूर्य से बिना बिखरे हुए शून्य से 45 फीसदी तक सौर विकिरण प्राप्त हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता करीब 40 गीगावाट(40 GW) है। अध्ययन अवधि जनवरी से अप्रैल 2021 में कुल सौर ऊर्जा उत्पादन 650 किलोवाट-घंटा प्रति वर्ग मीटर पाया गया था। इससे करीब 79.5 मिलियन (7.95 करोड़) रुपये का राजस्व मिला था। शोध के अनुसार, जनवरी और फरवरी की शुरुआत में तथा अप्रैल के अंत में ऊर्जा उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई थी, जिसके लिए कहीं न कहीं जंगलों में लगी आग भी जिम्मेदार थी।

अध्ययन अवधि के दौरान बादलों के कारण ऊर्जा उत्पादन में 116 किलोवाट घंटा प्रति वर्ग मीटर का नुकसान हुआ था, वहीं एयरोसोल की उपस्थिति में यह लगभग 63 किलोवाट घंटा प्रति वर्ग मीटर थी। एयरोसोल की उपस्थिति के कारण 80 लाख रुपये का नुकसान हुआ था, वहीं बादलों की वजह से होने वाला नुकसान करीब 1.4 करोड़ रुपये था।

हाल ही में, भारत जैसे विकासशील देशों में सौर ऊर्जा उत्पादन का व्यापक रूप से उपयोग किया गया है, जिनके पास विभिन्न स्रोतों से पर्याप्त सौर संसाधन हैं। हालांकि, बादल, एरोसोल और प्रदूषण जैसे कई कारक सौर किरणित ऊर्जा मान को सीमित करते हैं, जिससे फोटोवोल्टिक और केंद्रित सौर ऊर्जा संयंत्र प्रतिष्ठानों के कार्य-निष्पादन के लिए समस्याएं पैदा होती हैं।

इसी बात ध्यान में रखते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), भारत सरकार के तहत स्वायत्त अनुसंधान संस्थान, आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एआरआईईएस), नैनीताल और यूनान स्थित नेशनल ऑब्जर्वेटरी ऑफ एथेंस (एनओए) के शोधकर्ताओं के एक समूह ने सौर ऊर्जा उत्पादन को कम करने वाले कारकों का पता लगाने की कोशिश की। उन्होंने पाया कि बादलों और एरोसोल के अलावा, जंगल की आग सौर ऊर्जा उत्पादन को कम करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

एआरआईईएस के वैज्ञानिक डॉ. उमेश चंद्र दुमका ने अनुसंधान का नेतृत्व किया। इस शोध से क्षेत्र में सौर ऊर्जा उत्पादन पर एरोसोल और बादलों के प्रभाव की व्यापक जांच-पड़ताल मिली। वर्तमान अध्ययन के निष्कर्ष से देश स्तर पर ऊर्जा प्रबंधन और योजना पर जंगल की आग के प्रभाव के बारे में निर्णय लेने वालों के बीच काफी जागरूकता बढ़ेगी। इसके अलावा, यह शोध जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को कम करने की प्रक्रियाओं और नीतियों एवं सतत विकास पर इसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों का समर्थन कर सकता है।

जनवरी से अप्रैल 2021 के दौरान उत्पादित सौर ऊर्जा पर एरोसोल, धूल और बादल के प्रभावों का वित्तीय विश्लेषण। प्रभाव को दैनिक औसत और कुल ऊर्जा हानि, वित्तीय नुकसान और सौर ऊर्जा क्षमता के संदर्भ में निर्धारित किया गया था।

शोधकर्ताओं के अनुसार, दैनिक ऊर्जा और वित्तीय नुकसान का यह विश्लेषण ग्रिड ऑपरेटरों को आग की अवधि के दौरान बिजली उत्पादन और आपूर्ति की योजना बनाने और शेड्यूल करने में मदद कर सकता है। वर्तमान अध्ययन के निष्कर्ष, अक्षय ऊर्जा उत्पादन पर जंगल की आग के अप्रत्यक्ष प्रभावों के बारे में भारत में  नीति निर्माताओं के बीच जागरूकता में काफी वृद्धि करेंगे। अग्नि शमन में वृद्धि के साथ-साथ हवा में कार्बन उत्सर्जन और ग्रीनहाउस गैसों में कमी को बढ़ावा देने में मदद करेंगे।

 

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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