Uttarakhand Sebuwala village disaster: आपदा से जूझे गीता और देवेंद्र मनवाल क्या पलायन नहीं करने की पीड़ा भुगत रहे?
15 सितम्बर 2025 की भारी बारिश वाली अंधेरी रात जल प्रलय से ढहा मकान, कई दिन तक बाढ़ में फंसा रहा दंपति, अब खुले में बीत रहे दिन-रात
Uttarakhand Sebuwala village disaster
राजेश पांडेय, 27 अक्तूबर, 2025
“लगभग 25 साल पहले मैं इस गांव में शादी होकर आई, तभी से यहां हूं। हमने खेतीबाड़ी करके अपने बच्चों को पाला। हम यहां से कहीं नहीं गए, पर आपदा ने हमारा सबकुछ तबाह कर दिया। यह सब तबाही कालबन मोटर मार्ग का मलबा नदी में गिराने से हुई। पहले कभी, मैंने और परिवार ने यहां नदी से इतना बड़ा नुकसान नहीं देखा। अब तो सरकार से यही मांग है कि हमें यहां से विस्थापित करने की कृपा करे।”
गीता मनवाल, देहरादून जिला के सेबूवाला गांव में पति देवेंद्र मनवाल के साथ रहती हैं। तीनों बच्चे देहरादून में पढ़ाई करते हैं। देवेंद्र और गीता की आजीविका पशुपालन और कृषि पर निर्भर है। उनके भाई- भाभी परिवार के साथ भोगपुर में रहते हैं। अक्सर घर आते रहते हैं। उनका वर्षों पुराना 12 कमरों का मकान 15 सितम्बर, 2025 की आपदा में ध्वस्त हो गया। मकान का जो हिस्सा बचा है, वो रहने लायक नहीं है। इन दिनों 55 वर्षीय देवेंद्र और गीता टीनशेड के नीचे रह रहे हैं, जो तीन ओर से खुला है। उनके पास दो बैल, एक भैंस व कटड़ी को पालने की भी जिम्मेदारी है।
Uttarakhand Sebuwala village disaster

करीब 50 वर्षीय गीता मनवाल 15 सितम्बर 2025 की रात आई आपदा की आपबीती को newslive24x7.com से साझा करती हैं। बताती हैं, “हमने गांव में ही रहकर खेती को बंजर होने से बचाया। हमने कभी नहीं सोचा था कि यहां से कहीं जाएंगे। जबकि, यहां रहना बहुत कठिन है। हम पलायन नहीं चाहते, पर आपदा ने हमें मजबूर किया। सरकार को हमारी सुरक्षा और मदद करनी चाहिए।”
देवेंद्र बताते हैं, “उस रात साढ़े दस बजे बारिश बहुत तेज थी। सोने से पहले मैंने घर के आसपास एक चक्कर लगाया। नदी में पानी बढ़ गया था, पर ऐसा अक्सर हो जाता था। करीब दो बजे के आसपास नदी का शोर बढ़ गया। हमने पानी बढ़ते देखा तो कुछ सामान और पशुओं को, जो घर के आंगन में ही बंधे रहते थे, को सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दिया। यह सब बहुत जल्दी में किया। समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करें? ”
यह भी पढ़ें- Video: सूर्याधार झील से आगे बढ़कर है एक गांव, जिसकी हैं बहुत सारी कहानियां
यह भी पढ़ें- Video: यहां उगने वाली हर फसल जैविक है, पर बिकती जैविक में नहीं
यह भी पढ़ें- पहाड़ों से घिरे गांव में बारिश की बूंदे, धान की रोपाई और लोकगीत गुनगुनातीं महिलाएं
“उस समय अंधेरा छाया था। रात करीब दो-ढाई बजे देखते ही देखते मकान का एक बड़ा हिस्सा ध्वस्त हो गया, जिसमें दो परिवारों का सामान, जिसमें अनाज, बर्तन, कपड़े, जेवर, टीवी, जो भी कुछ एक घर में रखा रहता है, नदी में बिखर गया। पानी काफी ऊपर तक बढ़ गया था। नदी की आवाज बहुत तेज थी, उसमें लुढ़कते हुए पत्थरों को शोर सुनाई दे रहा था। बिजली चली गई थी, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। यहां हम किसी को मदद के लिए भी नहीं पुकार सकते थे। यहां आसपास कोई नहीं रहता। ”

” उस जल प्रलय के समय, घर में हम दो लोग ही थे। हम घबरा गए थे, हमारे सामने सिर्फ और सिर्फ जिंदा रहने का प्रश्न था। शुक्र है, हम बच गए। मकान से करीब 30 मीटर दूर पशुओं की छानी बनी है, हम दोनों उसमें पहुंच गए। पशु हमारे साथ थे। सुबह होने का इंतजार कर रहे थे। सुबह हमने खुद को बर्बाद होता देखा। क्या करें, शुक्र हैं…हमारी जान बच गई।”

हवा में लटके कमरों का टूटा हुआ लेंटर देखते देवेंद्र मनवाल। फोटो- राजेश पांडेय”सुबह भाई का फोन आया, उनको सूचना दी। हालात यह थे, हम तीन ओर से पानी से घिरे थे। पहाड़ की तरफ से आगे भी बढ़ेंगे तो भी नदी और बरसाती गदेरे को पार नहीं कर पाते। वैसे भी, हम अपने पशुओं को छोड़कर कहीं नहीं जाते। वो हमारे लिए अमूल्य हैं। हम सात दिन तक पानी में घिरे रहे। बीच में एसडीआरएफ ने फोन पर संपर्क किया था, वो हमें सुरक्षित बाहर निकालने आए थे, पर हमनें खुद मना कर दिया। भैंस ब्याहने को थी, सभी पशु हम पर निर्भर थे, इसलिए कहीं जाने का सवाल ही नहीं था।”

“हम कई दिन तक घर से थोड़ा दूर एक कमरे में ही रहे। सातवें दिन पानी कुछ कम हो पाया। भाई और परिवार के लोग तारों के सहारे खुद को जोखिम में डालकर हम तक पहुंचे। हमारे पास राशन और जरूरी सामान पहुंचाया। अब हम तो सुरक्षित हैं, पर हमारी लगभग 11 बीघा जमीन नदी में मिल गई। मछली पालन के चार तालाब, सिंचाई के पानी की वर्षों पुरानी पाइप लाइन भी ध्वस्त हो गए। वैसा मकान बनाने की अब हमारी हिम्मत नहीं है।”

कहां है यह गांव, कैसा था यह गांव
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से लगभग 40 किमी. दूर सेबूवाला गांव रायपुर ब्लॉक की सिंधवाल ग्राम पंचायत में आता है। सूर्याधार झील से आगे बेहद सुंदर और संभावनाओं से भरा यह गांव संकट में है। तीनों और हरेभरे पहाड़ से घिरे सेबूवाला की खूबसूरती जिस जाखन नदी की वजह से बनती थी, उसी जाखन नदी ने इसके सौंदर्य को बिगाड़ दिया। आर्गेनिक फार्मिंग, इको टूरिज्म, मछली पालन की संभावनाओं वाले गांव को फिर से संवारने की जरूरत महसूस की जा रही है।
2022 में ही गई थी आपदा की शुरुआत (Uttarakhand Sebuwala village disaster)

Uttarakhand Sebuwala village disaster: जून 2022 तक सबकुछ ठीक चल रहा था, पर जाखन नदी में मलबे के पहाड़ खड़े हो गए। नदी से खेतों तक, जिन गूलों के जरिये पानी पहुंच रहा था, वो लगभग सात से आठ फीट मलबे में दब गईं। जाखन से खेतों तक पानी पहुंचाने का लगभग आठ दशक पुराना सिस्टम तबाह हो गया।

गीता मनवाल के घर से करीब एक से डेढ़ किमी. दूर जाखन नदी में गहरी झील बन गई। गीता बताती हैं, पहले कभी यह झील नहीं दखी थी। ऊपर पहाड़ पर कालबन-इठारना सड़क की कटिंग का मलबा नीचे फेंकने से यह झील बनी थी, ऐसा ग्रामीणों का मानना है।
यह भी पढ़ें-खेतीबाड़ी पर बात करते हुए गीता की आंखें नम क्यों हो गईं
देवेंद्र बताते हैं, “सड़क बनाना अच्छी बात है, पर मलबे के डंपिंग जोन भी बनाए जाने चाहिए थे। 15-16 सितम्बर 2025 की आपदा की वजह भी यही मलबा था, नहीं तो आज तक हमने ऐसी बाढ़ इस नदी में नहीं देखी। इस मलबे की वजह से नदी में कई जगह बंधे बन गए थे, जो उस तेज बारिश में आई बाढ़ से टूटे और पानी हमारे मकान के पीछे जोरदार टक्कर मारता रहा। आखिर में, उसने पूरे मकान को ध्वस्त कर दिया।”

देवेंद्र बताते हैं, “हम दोनों भाइयों को सरकारी मदद के तौर पर ढाई- ढाई लाख रुपये मिले हैं, जबकि हमारा नुकसान बहुत ज्यादा है। हमारे पास अब रहने के लिए मकान नहीं हैं। वर्तमान में हम सुरक्षित बचे एक हिस्से में, जो खुला है, जिस पर कुछ महीने पहले ही टीन शेड डाला था, ही बचा है। हम वहीं रह रहे हैं, चाहें रात में कितनी भी ठंड हो।”

यह पहले वाला सेबूवाला तो नहीं
Uttarakhand Sebuwala village disaster: आपदा से पहले जब भी हम सेबूवाला गांव गए, वहां प्राकृतिक नजारे हमेशा संभावनाओं से भरे रहे। इन नजारों को हमने हर बार क्लिक किया। आपदा ने मनवाल परिवार को भारी नुकसान पहुंचाया। उनके रोजगार को तहस नहस कर दिया। अपना गांव नहीं छोड़ने वाले देवेंद्र मनवाल और गीता अब पलायन करने पर विचार कर रहे हैं। यहां सवाल उठता है, क्या सरकार पलायन से खाली हो गए गांव के अंतिम परिवार को रोक पाएगी?, क्योंकि सरकार हमेशा पलायन रोकने के लिए हरसंभव कदम उठाने का दावा करती रही है।



सितंबर, 2025 की आपदा के बाद, हम विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि क्या हम उसी सेबूवाला में आए हैं, जिसके खूबसूरत नजारे हमें यहां बार-बार आने के लिए प्रेरित करते थे। देखिए बीते रविवार के फोटो उसी जगह के, जो ऊपर फोटो में दिखते हैं।


एक पुल की मरम्मत नहीं करा पाए प्रशासन और जनप्रतिनिधि
कंडोली से सेबूवाला जाते समय जाखन नदी को पार करने के लिए बना पुल पिछले साल ध्वस्त हो गया था। पुल ध्वस्त होने के बाद भी प्रशासन का ध्यान इस तरफ नहीं गया।



सबकुछ तबाह हो गया आपदा मेंः मेहर सिंह
Uttarakhand Sebuwala village disaster: आपदा से पीड़ित 61 साल के मेहर सिंह मनवाल बताते हैं, हमारी लगभग 11 बीघा जमीन जाखन नदी में मिल गई, जिस पर अब रेत बजरी, बड़े पत्थर जमा हैं। चार तालाब खत्म हो गए। मकान भी ध्वस्त हो गया। रहने लायक एक भी कमरा नहीं बचा। हमें दोबारा ने मकान बनाना होगा। हम इस स्थिति में नहीं हैं कि मकान बना सकें। सरकार से मिली सहायता नुकसान से बहुत कम है। अगर, सड़क निर्माण का मलबा नदी में नहीं गिराया जाता, तो नदी में बाढ़ का इतना घातक असर नहीं होता।

बताते हैं, हमारा मकान दादाजी से भी पहले का है। दादा जी का 90 साल की आयु में देहांत हुआ था। हमारे पूर्वज इस जमीन पर लगभग डेढ़ सौ साल पहले आकर बसे थे। उन्होंने मेहनत करके इस जमीन को उपजाऊ बनाया, इस गांव को रहने लायक बनाया। हमने कभी अपने दादा जी और पिता जी से यहां इतनी भारी आपदा के बारे में नहीं सुना। हमारा मकान तो नदी से लगभग 30 फीट से अधिक ऊँचाई पर था।
खरक गांव से नीचे उतरकर रस्सियों के सहारे पहुंचे थे घर तक
वो बताते हैं, 16 सितम्बर 2025 की सुबह भोगपुर से सेबूवाला आने का रास्ता कई जगह बंद था। सनगांव पुल के पास काफी पानी था। हम लोग भोगपुर नहर के सहारे चलते हुए कंडोली और खरक गांव पहुंचे। खरक गांव सेबूवाला के समानांतर ऊंचाई पर बसा गांव है। वहां से नीचे उतरकर नदी है, पर वहा तक पहुंचना खतरे से खाली नहीं था। हमने वहां से देवेंद्र और गीता को सुरक्षित देखा तो ईश्वर का शुक्रिया किया। पानी कम होने पर हम रस्सियों के सहारे नदी पार करके इन तक पहुंचे। जरूरी सामान पहुंचाया। वैसे, बिजली तीसरे दिन बहाल हो गई थी, फोन पर बात होने लगी थी।
विस्थापित करे सरकार, पुश्ता बनाकर करें सुरक्षा
मनवाल कहते हैं, सरकार हमें विस्थापित करे, साथ ही हमारी भूमि को नदी से बचाने के लिए पुश्तों का निर्माण कराए। वो कहते हैं, यदि यही हालात रहे तो पूरा गांव पलायन होने के बाद भी सेबूवाला गांव में रह रहे देवेंद्र और गीता भी यहां से पलायन करने को मजबूर हो जाएंगे।
“आपदा से खत्म हो रहे गांव को बचाए और संभावनाएं साकार करे सरकार”
ग्रामयात्री मोहित उनियाल रविवार को सेबूवाला गांव पहुंचे और प्रभावित परिवार से मुलाकात की। उनियाल बताते हैं, “वो पहले भी कई बार इस गांव में आए। यह गांव संभावनाओं से भरा हुआ बेहद सुंदर गांव रहा है। पिछली बार हम धान की पौध लगाने के अवसर पर यहां आए थे। मनवाल दंपति ने यहां की भूमि को बहुत सहेज कर रखा था। पूरा हरभरा इलाका था यह, आपदा में सबकुछ तबाह हो गए। मनवाल परिवार बड़े संकट में है।”

उनियाल ने मनवाल परिवार को तत्काल उचित मुआवजा दिलाने, पुनर्वास कराने तथा उनकी भूमि को बाढ़ से बचाने के लिए पुश्ते बनाने पर जोर दिया। उनियाल कहते हैं, “सरकार देहरादून के पास से भी पलायन को नहीं रोक पा रही है। जो परिवार पलायन नहीं करके अपने गांव को हराभरा बना रहे हैं, उनको हर आयाम पर सुरक्षा दी जानी चाहिए। इस गांव को फिर से पुराने अस्तित्व में लाना बहुत आवश्यक है।”












