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खेतीबाड़ी पर बात करते हुए गीता की आंखें नम क्यों हो गईं

रोड कटिंग के मलबे से ही जाखन नदी से जुड़ा आठ दशक पुराना सिंचाई सिस्टम तबाह हो गया

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

गीता मनवाल का मायका आगराखाल में है और 23 साल पहले शादी होकर सेबूवाला गांव आई थीं। इन वर्षों में उन्होंने पहले कभी सेबूवाला की खेतीबाड़ी को इतने बड़े संकट का सामना करते नहीं देखा।

करीब दस दिन पहले ही गांव के पास जाखन नदी में मलबे के पहाड़ खड़े हो गए। नदी से उनके खेतों तक, जिन गूलों के जरिये पानी पहुंच रहा था, वो लगभग सात से आठ फीट मलबे में दब गईं। जाखन से खेतों तक पानी पहुंचाने का लगभग आठ दशक पुराना सिस्टम तबाह हो गया। इस तबाही पर बात करते हुए गीता की आंंखें नम हो जाती हैं। वो कहती हैं, हमारी खेती और मछली पालन बर्बाद हो रहे हैं। हमारे बच्चे इसी पर पल रहे हैं। हमारे पास आजीविका का कोई और साधन नहीं है।

देहरादून के सेबूवाला गांव से करीब एक किमी. पहले जाखन नदी में बनी झील। यह झील सड़क निर्माण के मलबे की वजह से बनी है। फोटो- राजेश पांडेय

गीता और उनके पति देवेंद्र मनवाल, हमें अपने घर से करीब डेढ़ किमी. दूर जाखन नदी में बनी लगभग सौ मीटर लंबी और तीन मीटर गहरी झील दिखाते हैं। गीता बताती हैं, पहले कभी यह झील नहीं देखी। यह करीब दस दिन पहले पहाड़ से आए मलबे से बनी है। ऊपर पहाड़ पर कालबन-इठारना सड़क बन रही है और उसी की कटिंग का मलबा नीचे फेंका जा रहा है, जो नदी में इकट्ठा हो गया।

सामाजिक कार्यकर्ता उर्मिला मनवाल, सेबूवाला की ही निवासी हैं। उर्मिला गांव की खेतीबाड़ी, मछली पालन को हुए नुकसान पर विस्तार से चर्चा करती हैं। उर्मिला, जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के सामने गांव का पक्ष मजबूती से रख रही हैं। उनका कहना है, रोड का मलबा डंपिंग जोन में डालने की बजाय सीधे पहाड़ से नीचे फेंका जा रहा है, जो बरसाती गदेरों से होता हुआ नदी में आ गया। नदी में जाकर देख सकते हैं, मलबे ने कितनी तबाही मचाई है। नदी का प्रवाह बाधित हो गया और नदी कई मीटर नीचे बह रही है। उनके गांव की इतनी सुंदर नदी को लापरवाही और अनदेखी ने बर्बाद कर दिया।

Video: कहानी सेबूवाला कीः बंद पड़ी सौ साल पुरानी घराट भी चलेगी और बिजली भी पैदा होगी

सेबूवाला और पास के ही कंडोली गांव की महिलाएं हमें जाखन नदी के पार उस स्थान पर ले जाते हैं, जहां रोड कटिंग के मलबे ने नदी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।

हमें सेबूवाला से दूसरी ओर जाने के लिए तेज वेग वाली जाखन नदी को पार करना पड़ा, जो मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।महिलाएं बताती हैं, नदी पार करके वो पशुओं के लिए घास, पत्तियां लेने जाती हैं। यह उनका रोज का कार्य है।

देहरादून के सेबूवाला गांव के पास सिंचाई गूल को जाखन नदी से जोड़ने वाला पूरा सिस्टम रोड कटिंग के मलबे की चपेट में आकर तहस नहस हो गया। अब नदी गूल से काफी नीचे बह रही है। फोटो- राजेश पांडेय
80 साल पुराने सिंचाई तंत्र को समझिए 

नदी पार करने के बाद ही, हम उस सिंचाई तंत्र (Irrigation System) को देख सकते थे, जो लगभग आठ दशक पुराना है और दस दिन पहले पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। यह सिस्टम इसलिए बनाया गया था, क्योंकि सेबूवाला के खेत काफी ऊंचाई पर हैं, जिन तक नदी के ऊंचाई वाले स्थान से ही पानी टेप करके पहुंचाया जा सकता था। यह व्यवस्था इतनी कारगर थी, कि नदी से काफी ऊंचाई पर होने के बाद भी सेबूवाला को आठ दशक में कभी पानी की कमी नहीं हुई। पर, अब जब नदी में मलबा फेंककर पूरे सिस्टम को तबाह कर दिया गया है, तब सेबूवाला पानी के लिए तरस रहा है।

सेबूवाला गांव के पास जाखन नदी में मलबे के पहाड़ जमा हो गए हैं, जिससे सेबूवाला गांव की गूल और उसका सिरा (Head) मलबे में करीब आठ फीट दब गए हैं। किसान देवेंद्र सिंह ने मौके पर ले जाकर हमें सिंचाई गूलों की दुर्दशा दिखाई। फोटो- राजेश पांडेय

नदी पार करके, हम उस स्थान पर पहुंच गए, जहां मलबे के पहाड़ खड़े थे। किसान देवेंद्र मनवाल, हमें नदी में वो स्थान दिखाते हैं, जहां से सेबूवाला के लिए पानी टैप किया जा रहा था। सिंचाई गूल करीब डेढ़ सौ मीटर तक मलबे में दब चुकी है। नदी से बाहर भी गूल के करीब 60-70 मीटर हिस्से पर आठ फीट मलबा इकट्ठा हो गया है।

नदी के ऊंचाई वाले इस स्थान से टैप किया पानी, गूल से होते हुए एक बड़े चैंबर में जमा हो रहा था। इस चैंबर को दो बड़े पाइपों से जोड़ा गया है। ये पाइप नदी के आरपार होकर सेबूवाला गांव के ऊंचाई वाले स्थान तक बिछे हैं। पाइपों से पहुंचने वाला पानी पूरे गांव के खेतों को सींच रहा था और मछलीपालन के तालाबों को भर रहा था।

देहरादून के सेबूवाला गांव तक नदी का इन पानी पाइप लाइन के जरिये आता है। यह इसलिए क्योंकि गांव के खेत नदी के स्तर से काफी ऊंचाई पर हैं। फोटो- राजेश पांडेय

इन पाइपों से गांव को 24 घंटे पानी मिल रहा था। नदी के आरपार पाइप बिछाकर गांव तक पानी पहुंचाने का यह सिस्टम इसलिए बनाया गया है, क्योंकि सेबूवाला के खेत नदी से ऊंचाई पर हैं। पर, इस समय भारी मलबा जमा होने से नदी काफी नीचे बह रही है और सिंचाई तंत्र खत्म हो गया।

टिहरी गढ़वाल से आ रही जाखन नदी में सेबूवाला गांव से कुछ पहले मलबे के पहाड़ जमा हो गए। तेज बारिश के समय गदेरे में बहकर आया मलबा, रोड कटिंग का बताया जाता है, जिसको डंपिंग जोन की बजाय पहाड़ से नीचे फेंक दिया गया। ऊपर पहाड़ पर रोड कटिंग हो रही है। फोटो- राजेश पांडेय

जाखन के प्रवाह क्षेत्र में मलबे के पहाड़

जाखन नदी के प्रवाह क्षेत्र में ही मलबे के कई छोटे बड़े पहाड़ पार करने के बाद, हम पहुंचते हैं उस स्थान पर जहां झील बन गई है। ये ढेर इतने ऊंचे हैं कि इन पर चढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं है। कंडोली गांव की पूनम रावत भी हमारे साथ झील तक पहुंची थीं। पूनम बताती हैं, पशुओं का चारा लेने के लिए यहां गांव की महिलाओं के साथ अक्सर आना लगा रहता है। उनका कहना है, मैंने पहली बार यहां झील बनते देखी है। यह रोड कटिंग के मलबे से बनी है। सविता रावत भी पूनम की बात का समर्थन करती हैं। उर्मिला मनवाल बताती हैं, क्षेत्रीय विधायक बृज भूषण गैरोला और अधिकारियों से इस पूरे प्रकरण की शिकायत की है। विधायक ने अधिकारियों के साथ, मौके का निरीक्षण करके गूलों का ठीक कराने का आश्वासन दिया है। अब देखना है, कितने समय में हमें राहत मिलती है।

धान के पौधे तैयार हैं, पर रोपाई के लिए पानी का संकट

उर्मिला हमें सेबूवाला के खेत दिखाती हैं, जहां धान की पौध रोपाई के लिए खेत में खड़ी है। उन्होंने बताया, धान की रोपाई के लिए खेतों में भरपूर पानी चाहिए। मोटर से इन खेतों तक पानी मुश्किल से ही पहुंच पाएगा।

विकल्प के तौर पर देवेंद्र मनवाल ने नदी से पानी खींचने के लिए मोटर लगाई है, लेकिन खेतों के लिए आवश्यक पानी की पूर्ति नहीं हो पा रही है। वहीं, बिजली का बिल भी खूब आएगा और बिजली चली गई तो सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था भी ठप हो जाएगी। उन्होंने धान वाले खेतों में मोटर से पानी पहुंचाया है, जो अपर्याप्त है। देवेंद्र बताते हैं, या तो मछली तालाब भर लें या फिर खेतों को पानी दे दें। अब तो उनकी खेती भी बारिश पर ही निर्भर हो गई।

देहरादून के सेबूवाला गांव में धान की रोपाई के लिए तैयार पौधे, पर खेतों को पर्याप्त पानी नहीं मिलने पर इनको रोपने का संकट खड़ा हो गया है। पौधे दिखाते हुए उर्मिला मनवाल बताती हैं, अभी तक इनकी रोपाई हो जाती। फोटो- राजेश पांडेय

“लगभग सात बीघा खेत में धान की रोपाई करनी है। गांव के कुछ लोगों को रोपाई के लिए बुलाया है, पर खेत में पानी बहुत कम है। मोटर से पानी खींचकर खेतों में भर रहा हूं, पर यह काफी मुश्किल काम है। काफी नीचे नदी से पानी खींचने से मोटर बार-बार बंद हो रही है। मोटर फुंकने का खतरा बना है। धान के पौधों को बालियां आने तक पानी चाहिए, यह कैसे संभव होगा, कुछ नहीं कह सकता। खेतीबाड़ी, मछलीपालन हमारी आजीविका के स्रोत हैं, जो इस समय संकट में हैं,” देवेंद्र कहते हैं।

देहरादून के सेबूवाला गांव में मछली पालन के तीन तालाबों की लगभग चार हजार से ज्यादा मछलियां एक ही तालाब में शिफ्ट करनी पड़ी। बाकी तालाब में पानी नहीं है।
मछलियों के तालाब में पानी भरना चुनौती

यहां मछलियों के चार तालाब हैं, जिनमें से तीन में लगभग चार हजार से अधिक मछलियां पल रही थीं। इन तालाबों में वर्षभर पानी चलता रहता था। पर, सिंचाई सिस्टम मलबे में दबने की वजह से इन तालाबों को भी पानी नहीं मिल रहा है। दो तालाब खाली करके मछलियों को अब एक ही तालाब में शिफ्ट करना पड़ गया है, जिसका पानी बदलने की जरूरत पड़ रही है। इस तालाब को मोटर से ही भरा जाएगा, जो चुनौती बना है।

85 वर्षीय बैसाखी देवी, का कहना है, उन्होंने पूरी जिंदगी जाखन नदी में किसी झील के बारे में नहीं सुना। नदी में सड़क निर्माण का मलबा फेंकने से उनके खेतों के लिए पानी मिलना मुश्किल हो गया। फोटो- राजेश पांडेय

सेबूवाला निवासी 85 वर्षीय बैसाखी देवी बताती हैं, सड़क बनाने वालों ने गांव के लिए आफत खड़ी कर दी। हमारा तो पूरा जीवन यहां बीत गया, पर नदी की ऐसी दुर्दशा कभी नहीं देखी। हमारे खेतों और तालाबों को पानी कब मिलेगा, नहीं मालूम।

कहां हैं सेबूवाला

सेबूवाला गांव, देहरादून जिला की सिंधवाला ग्राम पंचायत का हिस्सा है। टिहरी गढ़वाल से आने वाली जाखन नदी इस गांव के पास से होकर बहते हुए सूर्याधार झील (Suryadhar Lake) बनाती है और फिर इसकी एक धारा भोगपुर नहर के रूप में कई गांवों की कृषि भूमि सिंचित करती है। वहीं, जाखन नदी की मुख्यधारा भोगपुर, रानीपोखरी के नागाघेर, माजरीग्रांट क्षेत्र से होते हुए सौंग नदी में मिलकर गंगा में समाहित हो जाती है। सेबूवाला यहां तक जाने के लिए पहले सूर्याधार झील तक पहुंचना होगा, जहां से करीब डेढ़ किमी. आगे कंडोली गांव आना होगा। वहां से ढाल से होते हुए सेबूवाला गांव पहुंचेंगे। सेबूगांव में कृषि से लेकर पर्यटन की तमाम संभावनाएं हैं, पर इसके बावजूद यहां से कई परिवार पलायन कर गए। इसकी वजह यहां से कंडोली और फिर सूर्याधार झील से आगे सनगांव के पुल तक रास्ता बहुत खराब है। बच्चों की शिक्षा, रोजगार से जुड़े मुद्दों की वजह से लोग यहां से पलायन कर गए।

देहरादून जिला का सेबूवाला गांव, यह फोटो 15 फरवरी, 2022 का है। फोटो- राजेश पांडेय

देहरादून जिले के इस छोटे से गांव में संभावनाएं बड़ी हैं, जिनके आधार पर हम कह सकते हैं, स्वरोजगार, कृषि एवं पर्यटन गतिविधियों को लेकर इसको आदर्श गांव बनाया जा सकता है। इस गांव में तरक्की की बहुत सारी कहानियां हैं। पर, पलायन नहीं हुए परिवारों की खेती पर निर्भर आजीविका संकट में है।

मुगलों के जमाने से बसा हुआ गांव !

सेबूवाला गांव को मुगलों के जमाने से बसा हुआ बताया जाता है, पर इस तथ्य के प्रमाण के तौर पर इतना ही कहा जाता है कि मुगलों के जुल्म से तंग आकर उस समय कुछ परिवार दिल्ली से आकर यहां बस गए थे। जिस जगह पर यह गांव है, वहां कभी घना जंगल था और उसमें शेर रहते थे। सैकड़ों वर्ष पहले आए लोगों ने जंगल काटकर रहने के लिए यहां बस्ती बनाई। ग्रामीण मेहर सिंह मनवाल बताते हैं, हो सकता है, तब इस बस्ती को शेरोंवाला कहा जाता हो। बाद में समय के साथ-साथ शेरोंवाला नाम सेबोवाला और फिर सेबूवाला में तब्दील हो गया हो। फिलहाल तो हम यही जानते हैं, टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित पहाड़ की तलहटी में बहने वाली नदी के किनारे बसे गांव का नाम सेबूवाला (Sebuwala) है।

देहरादून के सेबूवाला गांव में खेती का यह फोटो फरवरी, 2022 का है। फोटो- राजेश पांडेय
छोटा सा गांव, खेतीबाड़ी में बहुत आगे

सेबूवाला में लगभग 60 से 70 बीघा में जैविक खेती होती है। किसान मेहर सिंह मनवाल बताते हैं, उन्होंने अभी तक खेतों में यूरिया या किसी भी तरह के कैमिकल का इस्तेमाल नहीं किया। खेतों में गोबर की खाद इस्तेमाल करते हैं। जाखन नदी से स्वच्छ पानी खेतों की सींचता है। आबोहवा बहुत अच्छी है, भूमि उपजाऊ है। बैलों की मदद से खेती करते हैं। वो भी पावर ट्रिलर से खेती कर सकते हैं, पर बैलों को इसलिए चुना है, क्योंकि इनके गोबर से खाद बनती है। पशुओं के बिना जैविक खेती संभव नहीं है। बाजार से खरीदे आलू और हमारे खेतों में उपजे आलू को खाओ, दोनों में जमीन आसमान का अंतर पाओगे। यहां जो भी कुछ उगता है, जैविक है। यहां उपजा आलू स्वाद में अच्छा होगा और पौष्टिकता से भरपूर होगा। यहां, गेहूं, धान सहित मटर, आलू, प्याज, लहसुन, धनिया, मिर्च सबकुछ होता है।

जल्द से जल्द खेतों तक पहुंचेगा पानीः विधायक

इस पूरे मसले पर डोईवाला क्षेत्र के विधायक बृजभूषण गैरोला, जिन्होंने सिंचाई विभाग और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के अधिकारियों को साथ लेकर मौके का निरीक्षण किया था, का कहना है, जल्द से जल्द गूलों को दुरुस्त करके सेबूवाला तक पुराने सिस्टम से पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जाएगी। फिलहाल, अधिकारियों से कहा गया है कि पास ही मौजूद दूसरी गूल, जिसका काफी हिस्सा सही है, की मरम्मत करके नदी का पानी उसमें टैप किया जाए। इससे गांव तक पानी पहुंचाने की वैकल्पिक व्यवस्था हो सकेगी। नदी में मोटर लगाकर पानी अपलिफ्ट करने का काम भी जल्द शुरू हो जाएगा, क्योंकि धान की रोपाई के लिए खेतों को तत्काल पानी चाहिए। सेबूवाला में मछली पालन के तालाबों को भी पानी की जरूरत है। यह कार्य हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता में है।

जाखन में इकट्ठा मलबा रोड कटिंग का हैः गैरोला

“जाखन नदी में इकट्ठा मलबा कालबन-इठारना रोड कटिंग का है। डंपिंग जोन में डालने की बजाय इसको पहाड़ से नीचे फेंका गया, जिससे बरसात में यह जाखन नदी में इकट्ठा हो गया। मलबे से ब्लाक हुई नदी में बाढ़ आ गई और वर्षों पुराना सिंचाई सिस्टम डैमेज हो गया।  जबकि, होना यह था कि सड़क निर्माण करने वाली एजेंसी डंपिंग जोन में ही मलबा फेंकती। पीएमजीएसवाई के अधिकारियों की गलती से ऐसे हालात बने हैं। संबंधित अधिकारियों को जल्द से जल्द व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने को कहा गया है”, डोईवाला विधायक बृजमोहन गैरोला बताते हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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