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Video: यहां उगने वाली हर फसल जैविक है, पर बिकती जैविक में नहीं

सेबूवालाः डेढ़ किमी. सड़क के इंतजार में उम्मीदों को पंख नहीं लगा पा रहे

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

अभी तक सेबूवाला गांव में जिस तरह के स्वरोजगार पर बात कर रहे थे, उसको पंख तभी लग पाएंगे, जब गांव तक सड़क होगी। यहां जैविक खेती, मछली पालन एवं पर्यटन की संभावनाएं हैं, पर सड़क के बिना यह सब कठिन है। सड़क नहीं होने से गांव से पलायन हो गया, क्योंकि शिक्षा दूर हो गई थी, रोजगार के सिलसिले में लोगों को बाहर जाना पड़ गया। सेबूवाला में वर्तमान में दो परिवार ही रहते हैं।

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बच्चों की शिक्षा के लिए भोगपुर में रहने के बाद भी मेहर सिंह मनवाल अपने गांव से नियमित रूप से जुड़े रहे। भोगपुर से रोजाना गांव आकर खेतीबाड़ी और मत्स्यपालन को जारी रखा। कठिन परिस्थितियों का सामना किया, पर गांव से पलायन नहीं किया। उन्होंने गांव में रहकर स्वरोजगार की उम्मीद को कभी नहीं खोया।

मनवाल बताते हैं, उन्होंने अभी तक खेतों में यूरिया या किसी भी तरह के कैमिकल का इस्तेमाल नहीं किया। खेतों में गोबर की खाद इस्तेमाल करते हैं। जाखन नदी से स्वच्छ पानी खेतों की सींचता है। आबोहवा बहुत अच्छी है, भूमि उपजाऊ है। बैलों की मदद से खेती करते हैं। वो भी पावर ट्रिलर से खेती कर सकते हैं, पर बैलों को इसलिए चुना है, क्योंकि इनके गोबर से खाद बनती है। पशुओं के बिना जैविक खेती संभव नहीं है।

सेबूवाला का आलू स्वाद और पौष्टिकता में भरपूर

“बाजार से खरीदे आलू और हमारे खेतों में उपजे आलू को खाओ, दोनों में जमीन आसमान का अंतर पाओगे। यहां जो भी कुछ उगता है, जैविक है। यहां उपजा आलू स्वाद में अच्छा होगा और पौष्टिकता से भरपूर होगा। हमारे खेतों की फसल सेहत के लिए अच्छी है। यहां अन्य जगहों की तरह शहरभर की गंदगी ढो रही नहरों का पानी इस्तेमाल नहीं होता,” मनवाल कहते हैं।

देहरादून जिला के सेबूवाला गांव में खेती। फोटो- डुगडुगी

सड़क के बिना फसल को बाजार तक पहुंचाना सबसे बड़ी दिक्कत

कृषक मेहर सिंह बताते हैं, उन्होंने मटर, आलू, गेहूं, प्याज, लहसुन, धनिया, मिर्च बोए हैं। कहते हैं, हम खेती से संतुष्ट है, इसमें अपने लिए बचाकर जो बचता है, वो बिक्री कर देते हैं। पर, बाजार में उनकी फसल को जैविक वाला मूल्य नहीं मिल पाता। इसकी वजह यह भी हो सकती है, हमारे पास बिक्री के लिए ज्यादा उत्पाद नहीं होता। थोड़ा बहुत उत्पाद लेकर जैविक बिक्री केंद्र कहां तलाशें, इसलिए उसको सामान्य की तरह बेचना पड़ता है।

देहरादून के सेबूवाला गांव तक जाने का रास्ता। फोटो- डुगडुगी

सबसे बड़ी दिक्कत यहां से उत्पाद को शहर तक ले जाने की है। यहां से कुछ ले जाना है तो उसको डेढ़ किमी. पैदल ढोकर ले जाओ और कंडोली से बाइक से भोगपुर या देहरादून भेजो। बहुत झंझट है, जितने की उपज नहीं, उससे ज्यादा किराये में खर्च होगा। परिवहन और श्रम लगाकर उपज का जो दाम लगेगा, उस पर कोई खरीदने को तैयार नहीं होगा।

सेबूवाला गांव में जैविक उत्पादों को सर्टिफिकेशन एवं मार्केटिंग की आवश्यकता है। यहां आसपास के गांवों से जैविक उत्पाद खरीदकर बाजार में बिकवाने तक के लिए किसी सुदृढ़ तंत्र की आवश्यकता है। ताकि जैविक उगाने वाले किसानों को उत्पाद का जैविक मूल्य मिल सके।

देहरादून के सेबूवाला गांव में रानीपोखरी निवासी नितिन चौहान। फोटो- डुगडुगी

रानीपोखरी निवासी नितिन चौहान, सेबूवाला गांव अक्सर आते हैं। उनका कहना है, सेबूवाला ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड में ऐसे बहुत सारे गांव हैं, जहां स्वरोजगार की बहुत सारी संभावनाएं हैं। हम अपने गांवों में ही स्थानीय संसाधनों पर आधारित आजीविका से आय अर्जित कर सकते हैं। चुनौतियां कहां नहीं हैं, उन शहरों में भी दिक्कतें हैं, जहां हम रोजगार के सिलसिले में अपने घर-गांव छोड़कर जाते हैं। यह बात सही है कि गांवों तक सड़कें और अन्य सुविधाएं पहुंचाने की जिम्मेदारी सरकार की है। सुविधाएं मिलने पर हम आजीविका के संसाधन विकसित कर सकते हैं। चौहान कहते हैं, सेबूवाला में पानी की कोई कमी नहीं है, खेतों में जो भी कुछ उगता है, वो जैविक है। जरूरत है तो सड़क और उपज को बाजार उपलब्ध कराने में सहयोग की।

देहरादून के सेबूवाला गांव में जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए बनाया गया ओड़ा, जिसमें बैठकर जानवरों को खेतों से भगाया जाता है। फोटो- डुगडुगी
जंगली जानवरों के डर से खेतों को खाली नहीं छोड़ सकते

सेबूवाला गांव निवासी उर्मिला मनवाल का कहना है, उत्तराखंड के लगभग सभी गांवों में फसलों को जंगली जानवर नुकसान पहुंचा रहे हैं। हमारे गांव में जंगली जानवर खेतों में घुस जाते हैं, पर इनके भय से हम खेती करना नहीं छोड़ सकते। यहां बारहसिंघा, जंगली सूअर खेतों में घुसते हैं। जानवरों को खेतों से भगाने के लिए हम बारी-बारी से ड्यूटी लगाते हैं। खेतों की सुरक्षा के लिए ओड़ा( टांड या मचान) लगाकर उसमें बैठते हैं। जानवरों को शोर मचाकर भगाते हैं। पर, हम अपने ही खेतों में फसल उगाना नहीं छोड़ेंगे। वो अपने सभी खेतों में फसल उगाते हैं।

बारह महीने स्रोत से मिलता है पीने का पानी

किसान मेहर सिंह घर के आंगन में लगे नल से पानी भरकर पिलाते हैं। कहते हैं, इसका स्वाद अच्छा लगेगा। सीधे डेढ़ किमी. दूर स्थित स्रोत से आ रहा है। लगभग छह-सात दशक से हम इसी स्रोत का पानी पी रहे हैं। आज तक पानी में कोई शिकायत नहीं मिली। पाइप लाइन वैसी ही है, जैसी पहले थी। यहां पानी, बिजली की कोई दिक्कत नहीं है, वो हंसते हुए कहते हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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