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हकीकत ए उत्तराखंडः इस आबादी का न तो कोई गांव है और न ही कोई शहर
पचास साल से भी ज्यादा वक्त गुजार दिया हमारे पूर्वजों ने जंगलों की परवरिश करने में, पर उन्हें क्या पता था कि उनकी पीढ़ियां इन्हीं जंगलों के बीच घिरकर वर्षों तकलीफें झेलेंगी। अभी भी नहीं मालूम कि कितने वर्ष लग जाएंगे, इस जंगल से बाहर आने में। न तो, ढंग से पानी मिल पाया और न ही, बिजली की कोई व्यवस्था है। पूरे देश में घर-घर शौचालय बन रहे, पर हम नहीं बना सकते। हमारी तरफ से सरकार ने भी नजरें फेर लीं, क्या हम इस देश के नागरिक नहीं हैं।

हरिद्वार जिला के बहादराबाद ब्लाक निवासी युवा किरणपाल, सवाल उठाते हैं। उनके पास सरकार से करने के लिए, बहुत सारे सवाल हैं। वो किसी एक राजनीतिक दल की सरकार से खफा नहीं हैं, उनके लिए तो किसी ने भी कुछ नहीं किया। चाहे वो भाजपा हो या फिर कांग्रेस।
किरणपाल, जहां परिवार के साथ रहते हैं, वो जगह न तो ग्राम पंचायत का हिस्सा है और न ही किसी शहरी निकाय का। यहां लगभग सवा सौ परिवार हैं, पर उनके लिए अपना मुखिया चुनने की मनाही है। कुल मिलाकर, वो उस व्यवस्था से बाहर हैं, जो पंचायत राज के नाम से पूरे देश में जानी जाती है।
लगभग छह सौ की आबादी की तकलीफों पर बात करने से पहले, हमें इसका अतीत जानना होगा। इस जगह का नाम है हजारा टोंगिया। उत्तराखंड में कई गांव ऐसे हैं, जो टोंगिया व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। हजारा टोंगिया को वन क्षेत्र से बाहर लाने के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहे श्यामलाल, हमें पूरी कहानी बताते हैं।
बकौल श्यामलाल, वर्ष 1932 में ब्रिटिश शासनकाल में हिमालयी क्षेत्रों में प्लांटेशन के लिए अलग-अलग क्षेत्रों से श्रमिकों को लाया गया था। इन श्रमिकों में उनके पूर्वज भी थे, जिनको इस क्षेत्र में पौधे लगाने और पेड़ बनने तक परवरिश की जिम्मेदारी दी गई थी। जंगल बनाने के लिए प्लांटेशन की व्यवस्था को टोंगिया नाम से पहचान मिली। यह जगह हजारा टोंगिया के नाम से जाना गया। यहां से कुछ दूरी पर हरिपुर टोंगिया भी है।

” हर व्यक्ति को हर वर्ष में दो एकड़ जमीन (12 बीघा) में पेड़ लगाने का काम सौंपा जाता था। मई-जून के महीने में 20-20 फीट की दूरी पर दो फुट गहरे व दो फुट चौड़े गड्ढे खोदे जाते थे। 15 दिन तक ये गड्ढे ऐसे ही छोड़ने पड़ते थे, ताकि इनमें धूप लग सके। बाद में, इनमें खैर, शीशम, साल, सागौन के बीज बोए गए।
कुछ दिनों बाद धागे जैसे पौधे अंकुरित होते थे। इन पौधों की देखभाल बहुत कठिन थी। इनके पास उगने वाली घास को हाथ से बहुत सावधानी से हटाया जाता था। पौधों पर नुकसान पहुंचने पर सजा भी मिलती थी। जब पौधा एक फीट व्यास (गोला) और दस से 12 फीट ऊंचा नहीं हो जाता, तब तक उनके पूर्वज देखरेख करते थे। आसपास जिस जंगल को देख रहे हैं, वो बड़ी मेहनत से उपजाया गया है, श्यामलाल धाराप्रवाह बोल रहे थे। ”

वो बताते हैं, अंग्रेजों ने उनके पूर्वजों को यहीं बसा दिया था। उनको प्रति परिवार लगभग 12-12 बीघा भूमि दी गई थी, जिस पर खेती करते आ रहे हैं। वर्ष 1980 तक उन लोगों ने प्लांटेशन किया। यह वन क्षेत्र राजाजी राष्ट्रीय पार्क क्षेत्र के अधीन आ गया।
उनका कहना है कि वर्तमान में धौलखंड रेंज में आने वाला हजारा टोंगिया क्षेत्र टाइगर रिजर्व का हिस्सा है। यहां मानवीय गतिविधियों की मनाही है, पर हमारे परिवारों का पुनर्वास नहीं किया जा रहा है।

श्यामलाल ने बताया कि वर्ष 1988 में यहां रहने वाले सभी परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। हमें आधा-आधा बीघा भूमि बुग्गावाला के पास ही खानपुर रेंज के सिकरौड़ा ब्लाक में आवंटित कर दी गई। बताते हैं, हमें आवास बनाने के लिए धनराशि देने को कहा गया था, पर बाद में ऐसा नहीं हो सका।
उस समय से सभी परिवारों का पुनर्वास अधर में है, जबकि 126 परिवारों की लिस्ट तैयार है। इस लिस्ट में परिवारों के बच्चों तक के नाम अंकित किए गए थे। यह लिस्ट घर-घर जाकर तैयार की गई थी। अधिकारियों ने इसका सत्यापन भी किया था।

बताते हैं, हम सभी पुनर्वास चाहते हैं, हमें यहां रिजर्व एरिया में नहीं रहना। यहां हमारे लिए किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं है। यहां के लोग लोकसभा, विधानसभा के वोटर तो हैं, पर हम किसी ग्राम पंचायत का हिस्सा नहीं हैं।

ग्राम पंचायत स्तर की सुविधाएं, सेवाएं हमारे लिए नहीं हैं। यहां डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सहयोग से कक्षा पांचवीं तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए एक सेंटर बना है।

छठीं से 12वीं तक की पढ़ाई दूसरे गांवों में जाकर होती है। यहां सेंटर यानी स्कूल का पक्का निर्माण नहीं किया जा सकता, इसलिए पांचवीं तक के लिए लोहे- टीन का स्ट्रक्चर बनाया गया है।

यहीं रहने वाले विनोद, राजनीतिक दलों के साथ मीडिया से भी बहुत नाराज हैं। कहते हैं, कोई भी आ जाए, यहां के हालात नहीं सुधरने वाले। हमारी जिंदगी तो तभी सुधरेगी, जब हमें यहां से बाहर निकालकर बसाया जाएगा। कोई कुछ भी बन जाए, हमारे लिए कोई मतलब नहीं रह गया।

दिनेश हमें अपने घर ले जाते हैं, जिसमें दो परिवारों के 12 लोग रहते हैं। मिट्टी, लकड़ी और फूस से बने घर की खपरैल वाली छत, बारिश में टपक टपककर दम तोड़ रही है। बरसात में वो काफी डरे सहमे रहते हैं।

प्रतिबंधों के चलते घर की मरम्मत नहीं करा सकते। उन्हें नहीं लगता, कुछ माह बाद तक उनका घर रहने लायक रहेगा भी या नहीं।
यहीं रहने वाले युवा ब्रिजेश कुमार ने हजारा टोंगिया में पानी का कहानी बताई। बताते हैं, यह क्षेत्र अंधेरी रौ व बींज और धौलखंड नदी से घिरा है। इनमें मोहंड सहित आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में हुई बारिश का पानी आता है।
करीब 30 साल पहले की बात होगी, बहुत पानी आया। यहां का एक मात्र कुआं, बाढ़ में डूब गया। पानी कुएं से ऊपर से बह रहा था। उस समय यहां जिलाधिकारी ने दौरा किया था और गांव के लिए तीन हैंडपंप लगाने के निर्देश दिए थे, पर कोई लगाने नहीं आया।

उस बाढ़ के बाद से कुएं से आज तक पानी नहीं मिला। कुआं आज भी नदी में दिखता है, किसी ऊंची चट्टान की तरह। उसमें पानी की जगह रेत भरा है। बाद में यहां के लोगों ने मिलकर करीब 50 फीट गड्ढा खोदकर पानी निकाला, जिसके बाद हैंडपंप लगाया गया। यहां सभी परिवार हैंडपंप का पानी पीते हैं।

पशुओं को भी हैंडपंप का पानी पिलाते हैं। सवा सौ परिवारों के लिए छह-सात हैंडपंप हैं, जिनमें से कुछ में गंदला पानी आता है। एक-दो बहुत कम पानी देते हैं।

बिजली के नाम पर, सौर ऊर्जा के पैनल व बैटरियां हैं। नदियों से घिरे इस क्षेत्र में गर्मी भी बहुत पड़ती है। पंखे भी बड़ी मुश्किल से चलते हैं। हैंडपंप, सोलर पैनल कुछ संस्थाओं से मिले हैं।

विनोद बताते हैं, यहां पक्का निर्माण नहीं किया जा सकता। शौचालय और बाथरूम नहीं हैं। लोग किसी तरह दिन काट रहे हैं। हमारे दिन तो गुजर गए, पर आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा।

क्षेत्रवासी बताते हैं, यहां आने के लिए कोई सड़क नहीं है। नदी पार करके पहुंचना होता है। बरसात में नदियां उफान पर होती हैं, तो आवागमन बाधित हो जाता है। अस्वस्थ व्यक्ति को ऐसी स्थिति में बुग्गावाला स्थित स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं ले जा सकते। बच्चे भी स्कूल नहीं जा पाते।
बताया गया कि, यहां रहने वालों के जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र रेंज दफ्तर से बनते हैं। परिवार रजिस्टर भी उन्हीं के पास है। आय, निवास के प्रमाण पत्र नहीं बन पाते। सरकार की अटल आवास योजना यहां लागू नहीं हो सकती, हालांकि पेंशन योजना का लाभ मिलता है।

हमने मोहब्बत सिंह को रेडियो पर गाने सुनते हुए देखा। वो प्रधानमंत्री के मन की बात कार्यक्रम को बहुत ध्यान से सुनते हैं। रविवार को भी उन्होंने यह कार्यक्रम सुना था। बताते हैं, प्रधानमंत्री जी, ने नदियों की रक्षा करने की बात कही। मोहब्बत ने हमें रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के बारे में बताया और फिर कहने लगे, हमारे मन की बात कौन सुनेगा। हमारे इस क्षेत्र की बात कौन सुनेगा, हम तो हर सरकार के पास जाते हैं, अपनी बात कहने, पर कोई सुनता ही नहीं।

यहां के अधिकतर परिवार खेती करते हैं, पर जंगली जानवर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। मक्का, गेहूं, तिल, मूंगफली की खेती होती है।

सब्जियां भी उगाई जाती हैं। हमने रास्ते में नदी के पास कद्दू की खेती देखी, जिसको चारों तरफ सफेद चादर से ढंका था। फसल को जानवरों से बचाने के लिए यह उपाय किया है।

श्यामलाल कहते हैं, बड़े अधिकारी, जनप्रतिनिधि चाहें तो हमारे क्षेत्र के पुनर्वास की फाइल तेजी से घूमने लगेगी। हम यहां के प्रतिबंधों से बाहर आकर बिजली, पानी, सड़क, शौचालय की सुविधा पा सकेंगे। खेतीबाड़ी और अन्य कार्यों से आजीविका चला सकेंगे, पर हमारी सुनवाई कहीं नहीं हो रही। हमारे लिए जमीन आवंटित है। हम भी वहां बसना चाहते हैं, फिर देर क्यों की जा रही है, हमारी समझ से बाहर है। हमें घर बनाने के लिए सरकार की योजनाओं से मदद दी जा सकती है।
यहां रहने वाले अधिकतर परिवार इस बार चुनाव में वोट नहीं देने की बात कहते हैं। उनका कहना है कि उनके लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों दल एक जैसे ही हैं। उनकी बात किसी ने नहीं सुनी। उनको बिजली, पानी, आवास, शौचालय और रोजगार, स्वरोजगार चाहिए, पर अब उम्मीद लगभग टूटती जा रही है।














