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उत्तराखंड में गांवों से सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि, फिर भी वहां दिक्कतें कम नहीं

  • राजेश पांडेय

देहरादून। उत्तराखंड राज्य की 70 फीसदी जनता ग्रामीण इलाकों में निवास करती है, पर यहां के बड़ी संख्या में गांवों की दशा वैसी ही है, जैसा कि राज्य बनने से पहले थी। गांवों में लोग उन सुविधाओं की कमी झेल रहे हैं, जिनके बिना शहरों में एक दिन भी नहीं रहा जा सकता, बल्कि जनप्रतिनिधियों और अफसरों तक की बेचैनी बढ़ जाती।

हम उन आंकड़ों पर बात करते हैं, जिनके आधार पर उत्तराखंड को गांवों का प्रदेश कहा जा सकता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तराखंड की कुल आबादी 1.08 करोड़ में से 70.36 लाख ग्रामीण तथा 30.49 लाख शहरी है। या यह कहें, उत्तराखंड में शहरी आबादी 30.23 फीसदी तथा ग्रामीण आबादी 69.76 फीसदी है।

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 में राज्य की 70 सीटों पर 75,92,996 वोटर थे। चुनाव के लिए 10,854 पोलिंग स्टेशन बनाए गए थे, जिनमें से 8497 (78.3 फीसदी) पोलिंग स्टेशन ग्रामीण क्षेत्रों और 2357 (21.7 फीसदी) शहरी क्षेत्रों के लिए थे।

2017 में राज्य की 13 विधानसभा सीटों के सभी पोलिंग स्टेशन ग्रामीण इलाकों में थे। इनको पूरी तरह ग्रामीण विधानसभा सीटें माना जा सकता है।

राज्य में सबसे ज्यादा 216 पोलिंग स्टेशन चकराता विधानसभा क्षेत्र में थे। ये सभी ग्रामीण इलाकों में हैं।

सभी पोलिंग स्टेशन ग्रामीण इलाकों वाली सीटें इस प्रकार हैं-

1. चकराता (216 पोलिंग स्टेशन), 2. जागेश्वर (173), 3. कपकोट (172), 4. धनोल्टी (167), 5. चौबट्टाखाल (157), 6. हरिद्वार ग्रामीण (153), 7. घनसाली (152)          8. द्वाराहाट (144), 9. प्रतापनगर (143), 10. ज्वालापुर (143), 11. सोमेश्वर (139), 12. नानकमत्ता (136), 13. सल्ट (134)

2017 के विधान सभा चुनाव में सभी पोलिंग स्टेशन शहरी क्षेत्रों वाली सीटें-

1. हरिद्वार (175 पोलिंग स्टेशन), 2. हल्द्वानी (163), 3. राजपुर रोड (150), 4. देहरादून कैंट (137)

सौ से अधिक शहरी पोलिंग स्टेशन वाली सीटें-

1. धर्मपुर( 123 शहरी पोलिंग स्टेशन), 2. रायपुर (109), 3. राजपुर रोड (150), 4. मसूरी (111), 5. देहरादून कैंटोनमेंट(137), 6. हरिद्वार (175), 7. बीएचईएल रानीपुर (109), 8. रुड़की (125), 9. हल्द्वानी (163), 10. रुद्रपुर (127)

सौ से अधिक ग्रामीण पोलिंग स्टेशन वाली सीटें-

1. चकराता, 2. जागेश्वर, 3. कपकोट, 4. धनोल्टी, 5. चौबट्टाखाल, 6. हरिद्वार ग्रामीण,7. घनसाली 8. द्वाराहाट, 9. प्रतापनगर, 10. ज्वालापुर, 11. सोमेश्वर, 12. नानकमत्ता, 13. सल्ट, 14. पुरोला, 15. यमुनोत्री, 16. गंगोत्री, 17. बद्रीनाथ, 18. थराली, 19. कर्णप्रयाग, 20.केदारनाथ, 21. रुद्रप्रयाग, 22. देवप्रयाग, 23. नरेंद्रनगर, 24. टिहरी, 25. विकासनगर, 26. सहसपुर, 27. डोईवाला, 28. ऋषिकेश, 29. भगवानपुर, 30. झबरेड़ा, 31. खानपुर, 32. लक्सर, 33. यमकेश्वर, 34. पौड़ी, 35. श्रीनगर, 36. लैंसडौन, 37. धारचूला, 38. डीडीहाट, 39. गंगोलीहाट, 40. बागेश्वर, 41. कालाढुंगी, 42. रानीखेत, 43.अल्मोड़ा, 44. किच्छा, 45. लोहाघाट, 46. चंपावत, 47. लालकुआं, 48. भीमताल, 49. नैनीताल, 50. खटीमा, 51.बाजपुर, 52.गदरपुर

उत्तराखंड की विधानसभा में अधिकतर जनप्रतिनिधि ग्रामीण क्षेत्रों से चुनकर आते हैं, पर ग्रामीण इलाकों के हाल किसी से छिपे नहीं हैं। वहीं आज भी सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा से जुड़े मुद्दे वर्षों बाद भी हल नहीं हो सके।

ग्रामीण इलाकों की तस्वीर नीचे दिए लिंक से स्पष्ट हो जाएगी। ये ग्रामीण इलाके देहरादून राजधानी से ज्यादा दूर के नहीं हैं।

  1. हकीकत ए उत्तराखंडः इस आबादी का न तो कोई गांव है और न ही कोई शहर
  2. हकीकत ए उत्तराखंडः मैं सच में नहीं जानती, नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को !
  3. हम शर्मिंदा हैंः इसलिए बच्चों के साथ बैग लेकर स्कूल तक आठ किमी. पैदल चले
  4. हाल ए हल्द्वाड़ीः “बचपन से सुन रहे हैं कि हमारे गांव तक रोड आएगी, रोड आएगी…,पर यह कब आएगी”
  5. पलेड की चढ़ाई ने मेरी सांसें फुला दीं, बच्चे तो 16 किमी. रोज चलते हैं
  6. हकीकत ए उत्तराखंडः पानी की दौड़ में महिलाओं के पास अपने लिए समय कहां है
  7. हकीकत ए उत्तराखंडः किसान भगवान भरोसे, सिस्टम से उठा विश्वास
  8. हकीकत ए उत्तराखंडः खेतू के खेतों में ही सड़ गई अदरक, सरकार को नहीं देता सुनाई
  9.  चकराता के खनाड़ का दलदल वाला रास्ता, किसानों की मुश्किलें, वर्षों पुराने भवन
  10. Video: एक दिन की दिहाड़ी 65 रुपये के लिए रोजाना 20 किमी. पैदल चलते हैं 65 साल के बुजुर्ग
  11. इन परिवारों को बहुत डराती हैं बारिश वाली रातें
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  15. अपर तलाई का चित्तौरः संभावनाओं की घाटी और चुनौतियों के पहाड़

 

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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