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Video: एक दिन की दिहाड़ी 65 रुपये के लिए रोजाना 20 किमी. पैदल चलते हैं 65 साल के बुजुर्ग

राजेश पांडेय

“ हमारे पास एक समय में सौ पशु थे, जिनको चराने के लिए जंगल ले जाते थे। धीरे-धीरे संख्या कम होती गई और इस समय हमारे पास मात्र 13 पशु हैं, जिनके हर माह 300 रुपये प्रति पशु के हिसाब से मिलते हैं। हम दोनों भाइयों के पास पशु चराने के अलावा आमदनी का और कोई जरिया नहीं है। हमारे पास जमीन भी नहीं है। पर, हमें अपने इस काम से बहुत प्यार है। पशुओं से बहुत लगाव है, इनके साथ हमारी उम्र बीत गई। लगभग 50 साल से पशुओं को चरा रहे हैं।” लगभग 65 साल के चैत राम अपने बारे में कुछ जानकारियां देते हैं।

चैतराम और उनके भाई गोविंद राम (करीब 62 साल से कुछ ज्यादा उम्र के)  खत्ता गांव में रहते हैं। डोईवाला से उनका घर करीब तीन किमी. होगा। उनको स्थानीय लोग “पाली” कहकर पुकारते हैं। बताते हैं कि वो “ग्वाला” हैं, पर “पाली” नाम भी उनको पसंद है। गांव के लोग बहुत अच्छे हैं, जो अपने पशुओं को उनके साथ भेजते हैं। उनका हम पर वर्षों का विश्वास है।

डुगडुगी से बातचीत में चिंता व्यक्त करते हुए, चैतराम कहते है कि “अगर इन पशुओं के मालिकों ने हमें जवाब दे दिया (पशुओं को चराने न ले जाओ), तो ऐसी स्थिति में हम उनके सामने कुछ नहीं बोल सकते। तब हमारे जीवन को चलाने के लिए भगवान मालिक है”।

“करीब 15 साल की उम्र से पिता के साथ पशुओं को चराना शुरू किया तो उस समय हमारे पास काफी पशु थे। एक वक्त में सौ पशु थे,तब महीने की आय लगभग पंद्रह-सोलह सौ रुपये हो जाती थी। उस समय, पशुओं के मालिकों से उस समय के हिसाब से सही पैसे मिल जाते थे और महंगाई भी नहीं थी। गुजारा अच्छे से हो जाता था”।

वक्त के साथ पशु कम होते गए। कई वर्ष से उनके पास पशु बहुत कम हैं। अब गुजर बसर किसी तरह हो पाती है। उनको सरकार से वृद्धावस्था पेंशन भी मिलती है।

सोमवार( 2 अगस्त 2021) की शाम करीब छह बजे, चैतराम और गोविंदराम से मुलाकात के लिए पहुंचा। उस समय, वो पशुओं को लेकर जंगल से बाहर निकल ही रहे थे। पशु उनसे आगे-आगे और दोनों भाई पीछे पीछे गांव की ओर बढ़ रहे थे।

जब वो हमारे साथ, बात करने के लिए रुके, तब पशु भी वहीं रुके रहे। मानो, पशु भी उनके साथ ही आगे बढ़ने के आदी हो गए हों। ऐसा है भी, क्योंकि उनका इन पशुओं से वर्षों का रिश्ता है। इन पशुओं को हर सुबह इनका इंतजार होता है।

हमने उनसे पूछा, क्या आप किसी पशु को आवाज देकर अपने पास बुला सकते हैं। चैतराम ने तुरंत एक गाय को नाम लेकर बुलाया- “बडेर, बडेर…, यहां आ”। काले रंग की गाय ने उनकी आवाज सुन ली और पीछे मुड़कर देखा। गाय उनकी ओर बढ़ने लगी और उनके सामने आकर खड़ी हो गई।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि “बडेर” नाम से पुकारने पर वो गाय ही उनके पास पहुंची, जिसको प्यार से “बडेर” कहकर बुलाते हैं। किसी ओर गाय को बुलाने पर उन्होंने कहा, और कोई गाय नहीं आएगी। बताते हैं, “बडेर” नाम की गाय उनके साथ तब से जंगल जा रही है, जब से यह बछड़ी थी।

चैतराम कहते हैं, “पशु उनकी बोली को समझते हैं। वो इशारों से पशुओं को नियंत्रित कर लेते हैं, इसी काम में जिंदगी बीत रही है। लेकिन कभी-कभी जंगल में जाकर पशु उनको छोड़कर आगे निकलने की कोशिश करते हैं, ऐसा वो हरी घास के लिए करते हैं ”।

 

बताते हैं, उनके पिता भी पशुओं को चराते थे। बाद में उन्होंने यह काम छोड़कर कास्तकारों के पास दिहाड़ी मजदूरी की।

दोनों भाई एक साथ रहते हैं। सुबह चार से पांच बजे के बीच उठ जाते हैं और फिर घर के काम निपटाकर करीब आठ बजे तक खैरी गांव पहुंच जाते हैं।

अपने गांव खत्ता से खैरी का करीब दो किमी. का रास्ता पैदल ही तय करते हैं। खैरी में पशुओं को घर-घर से इकट्ठा करके अपने साथ, जंगल ले जाते हैं।

बताते हैं कि पशुओं को उनका इंतजार रहता है। पशु उनको पहचानते हैं और उनके साथ गांव से होते हुए जंगल में प्रवेश करते हैं।

इन दिनों बारिश में भी, उनका काम जारी है। बरसात में दिक्कतें हैं, पर क्या करें, काम तो करना है, चाहे मौसम कुछ भी हो। चाहे बारिश हो, आंधी चले या फिर ओले ही क्यों न बरसें, हमें पशुओं के साथ ही रहना होता है।

बरसात में जंगल में गारा- कीचड़ बहुत होता है। हमारे पास सही जूते तक नहीं हैं। इनमें ही जंगल में गारे-पानी में घूमते हैं। घास में कीड़े या सांप का हमेशा खतरा रहता है।

गर्मियों में जंगल में पानी के स्रोत सूख जाते हैं। ऐसी स्थिति में हम पशुओं के मालिकों को बता देते हैं कि पशुओं को दोनों टाइम पानी पिलाओ या इनको अपने घरों में रखो, क्योंकि जंगल में पानी नहीं है।

जंगल में जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता है। कई बार जंगल के जानवर हमारे सामने से होकर गुजरे हैं। ऐसे में हमें बहुत घबराहट हो जाती है। हमारे लिए अपने पशुओं की सुरक्षा सबसे पहले हैं।

जंगल में हम अकेले होते हैं, किसी को मदद के लिए बुला भी नहीं पाते। हमारे पशुओं के साथ घटनाएं हुई हैं, जिनके प्रमाण हमें उनके मालिकों को देने होते हैं। कुछ बार तो ऐसा हुआ कि चरते हुए पशु की मुक्ति (जीवन समाप्त होना) हो गई।

बताते हैं, कभी- कभी पशु जंगल में काफी दूर तक निकल जाते हैं। इनको तलाश करना बड़ी चुनौती है। दो-दो घंटे तक इनको जंगल में तलाशते रहते हैं। क्योंकि, शाम को हमें हर पशु को उसके मालिक तक पहुंचाना है। कई बार ऐसा हुआ कि कोई पशु हमारे साथ जंगल से बाहर नहीं पहुंचा। उसको तलाशने के लिए फिर जंगल में गए। दिक्कतें तो हैं। पर, रात को जंगल में पशुओं को नहीं तलाश पाते।

क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया कि पशुपालन में सरकारी स्तर पर आपको भी मदद मिलनी चाहिए, के बारे में चैतराम कहते हैं, हमें तो कुछ पता नहीं चलता। पूरा समय इसी जंगल में बीता दिया। सरकार कोई मदद देगी तो हम स्वीकार कर लेंगे।

क्या कभी छुट्टी भी करते हैं, पर उन्होंने बताया कि, “हां”, स्वास्थ्य ठीक नहीं होने या बहुत जरूरी काम पर छुट्टी लेते हैं। छुट्टी के दिन पशुओं के मालिक उनको जंगल ले जाते हैं या फिर घर पर ही रखते हैं।

बुजुर्ग चैतराम बताते हैं कि “उनको अपने काम से फुर्सत ही नहीं मिलती। डोईवाला बाजार, तो करीब छह माह से नहीं गए होंगे”।

क्या आपको भी लगता है कि हम पूरा टाइम जंगल में रहते हैं। हमें भी औरों की तरह बाहर जाना चाहिए, पर चैतराम (हंसते हुए) जवाब देते हैं, हां ऐसा सोचा है। खाली बैठकर हमारा दिल भी नहीं लगता। हम तो जंगल में पशुओं के साथ खुश हैं।

क्या कभी आपने सोचा कि पशुपालन में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका है, के सवाल पर चैतराम कहते हैं, हमारा ध्यान इस बात पर कभी नहीं गया।

दोनों बुजुर्ग मुश्किलों में बिता रहे हैं जीवन

जब मैं वापस लौट रहा था, उसी समय चैत राम जी, पैदल ही अपने घर खत्ता जाते हुए मिले। उनके भाई गोविंद राम पशुओं को लेकर उनसे आगे निकल चुके थे। मैंने  चैतराम जी को अपनी बाइक से उनके घर छोड़ने को कहा। उन्होंने कहा, आप मेरा घर भी देख लेना। वास्तव में जंगल से उनका घर काफी दूर है।

डोईवाला से करीब तीन किमी. दूर खत्ता गांव में बुजुर्ग चैतराम और गोविंदराम का घर। घर के बाहर चैतराम। फोटो- डुगडुगी

खत्ता गांव में खेतों के बीच में पक्के मकान और आसपास कुछ कच्चे मकान (मिट्टी और टीन से बने) दिखे। चैतराम जी घर पहुंचे। कमरे पर लगा ताला खोला। उन्होंने अपना कमरा व रसोई दिखाए। उनके पास पंखा भी नहीं है।

उनके पास टीन, लकड़ी और गारे से बना पुराना कच्चा घर यानी एक कमरा है, जिसकी हालत काफी खराब है। रस्सी के सहारे कपड़े टंगे थे। एक खाट बिछी थी। रसोई के नाम पर, एक कोठरी सी है, जिसमें बारिश का पानी घुसता है।

बुजुर्ग चैतराम जी और उनके भाई गोविंद राम जी को सहयोग की आवश्यकता है। जब हमने उनसे पूछा, तो उनके पास यह जानकारी भी नहीं थी कि मदद किससे और कैसे मिलेगी।

उनको सहयोग की बात, इसलिए कह रहे हैं कि उनके पास पशुओं की संख्या कम होने से आय कम हो रही है। एक उम्र पर शारीरिक क्षमताएं जवाब देने लगती हैं, ऐसी स्थिति में उनकी गुजरबसर कैसे होगी, यह उनके लिए बड़ी चिंता की बात है।

सम्मान एवं प्रोत्साहन मिले चैतराम और गोविंद राम को

जीवन के 50 साल से अधिक पशुओं के साथ बिताने वाले चैतराम और गोविंद राम के पशुपालन में योगदान एवं पशुओं के प्रति उनके प्रेम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनको पशुपालन में प्रोत्साहन के लिए सरकार एवं सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से सहयोग एवं सम्मान मिलना ही चाहिए।

दुग्ध उत्पादन एवं पशुओं का स्वास्थ्य

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट अनुसार, दुध की गुणवत्ता पशुओं के स्वास्थ्य, उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपायों, दूध दुहने से लेकर दूध को सुरक्षित रखने के प्रबंधन पर निर्भर करती है। पशु का स्वास्थ्य और उत्पादकता काफी हद तक सही चारा और पानी की उपलब्धता पर निर्भर है।

चारे और पोषक तत्वों की आवश्यकता पशुओं की शारीरिक अवस्था, दूध उत्पादन स्तर, आयु, लिंग, स्वास्थ्य, गतिविधि के स्तर, जलवायु और मौसम जैसे कारकों के अनुसार होती है।

पशुओं के लिए चारा मौसमी उतार-चढ़ाव, वर्षा की स्थिति पर आश्रित होता है। पशुओं को भूख, प्यास और कुपोषण, बेचैनी, शरीर पर चोट लगने, दर्द आदि परेशानियां नहीं होनी चाहिए।

जलवायु परिवर्तन, वायु एवं जल प्रदूषण, जल की कमी और जैव विविधता को नुकसान भी पशुपालन को प्रभावित करते हैं।

कुल मिलाकर, दूध की गुणवत्ता पशुओं के खानपान, उनके प्रवास स्थल की स्थिति, उनकी मनोस्थिति, मूवमेंट समेत देखरेख और पर्यावरण पर निर्भर करती है। जंगल में चरने से पशुओं की कई तरह की दिक्कतें दूर हो जाती हैं। वहां वो स्वछंद होकर चरते हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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