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NEWSLIVE24x7 > Blog > Agriculture > VIDEO- मिल्क स्टोरीः क्या पानी के भाव खरीदा जा रहा है किसानों से दूध
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VIDEO- मिल्क स्टोरीः क्या पानी के भाव खरीदा जा रहा है किसानों से दूध

Rajesh Pandey
Last updated: October 28, 2021 10:12 pm
Rajesh Pandey
5 years ago
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  • राजेश पांडेय
उत्तराखंड सरकार पशुपालन को प्रोत्साहित करने का दावा करती है, पर सरकार के ही उपक्रम के साथ जुड़कर व्यापार करने वाला दुग्ध उत्पादक परेशान क्यों है। वो क्यों कहते हैं कि दुग्ध उत्पादन नो प्राफिट, नो लॉस का व्यवसाय हो गया। उनसे जिस रेट पर दूध खरीदा जा रहा है, उस पर बाजार में मट्ठा बिकता है। बाजार में पानी का भाव भी उनके दूध से ज्यादा है। दुग्ध उत्पादन में श्रम और लागत को नकारा जा रहा है।
अगर ऐसा नहीं है तो किसानों से गाय का दूध 50 रुपये प्रतिलीटर और भैंस का दूध 60 से 70 रुपये प्रति लीटर क्यों नहीं खरीदा जा रहा है। यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है क्योंकि किसान सहकारी संघों के माध्यम से हर मानक पर जांच कराकर ही दूध बेच रहे हैं।
यह बात सही है कि खरीदार और विक्रेता, दोनों के लिए उत्पाद की गुणवत्ता पर उपभोक्ताओं के हित में ध्यान देना आवश्यक है। जब खरीदार उत्पाद को शुद्धता की कसौटी पर परखने के बाद भी श्रम और लागत का सही मूल्यांकन नहीं करता है तो सवाल उठाना बनता है।
हमने दुग्ध उत्पादन से आय को जानने के लिए उन ग्रामीणों से मुलाकात की, जो दुग्ध संघ के माध्यम से सरकारी उपक्रम के साथ व्यवसाय करते हैं। हमने दुग्ध समितियों के कार्यों  तथा दूध में फैट की कमी के कारणों को किसानों से जानने का प्रयास किया।

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उत्तराखंड सरकार पशुपालन को प्रोत्साहित करने का दावा करती है, पर सरकार के ही उपक्रम के साथ जुड़कर व्यापार करने वाला दुग्ध उत्पादक परेशान क्यों है। वो क्यों कहते हैं कि दुग्ध उत्पादन नो प्राफिट, नो लॉस का व्यवसाय हो गया। उनसे जिस रेट पर दूध खरीदा जा रहा है, उस पर बाजार में मट्ठा बिकता है। बाजार में पानी का भाव भी उनके दूध से ज्यादा है। दुग्ध उत्पादन में श्रम और लागत को नकारा जा रहा है।अगर ऐसा नहीं है तो किसानों से गाय का दूध 50 रुपये प्रतिलीटर और भैंस का दूध 60 से 70 रुपये प्रति लीटर क्यों नहीं खरीदा जा रहा है। यह सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है क्योंकि किसान सहकारी संघों के माध्यम से हर मानक पर जांच कराकर ही दूध बेच रहे हैं।यह बात सही है कि खरीदार और विक्रेता, दोनों के लिए उत्पाद की गुणवत्ता पर उपभोक्ताओं के हित में ध्यान देना आवश्यक है। जब खरीदार उत्पाद को शुद्धता की कसौटी पर परखने के बाद भी श्रम और लागत का सही मूल्यांकन नहीं करता है तो सवाल उठाना बनता है।हमने दुग्ध उत्पादन से आय को जानने के लिए उन ग्रामीणों से मुलाकात की, जो दुग्ध संघ के माध्यम से सरकारी उपक्रम के साथ व्यवसाय करते हैं। हमने दुग्ध समितियों के कार्यों  तथा दूध में फैट की कमी के कारणों को किसानों से जानने का प्रयास किया।सुबह करीब पांच बजे से ग्रामीण क्षेत्रों में दुग्ध संघों एवं निजी व्यवसायियों के स्तर से दुग्ध एकत्रित करने का क्रम शुरू हो जाता है। सिमलास ग्रांट में दो दुग्ध उत्पादक समितियां हैं, जिनमें लगभग 20 से 30 सदस्य हैं।कोआपरेटिव के तहत संचालित सरकारी उपक्रम आंचल ब्रांड राज्यभर में दूध एवं इससे बने पदार्थों की बिक्री करता है। देहरादून जिला की बात करें तो आंचल से जुड़े देहरादून दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ से 400 सोसाइटी जुड़ी हैं, जो 15252 सदस्यों के सहयोग से पूरी तरह संगठित रूप से संचालित होती हैं।ग्राम स्तर पर गठित दुग्ध उत्पादक संघों के सदस्यों से आंचल डेरी औसतन प्रतिदिन 11674 लीटर दूध की खरीदारी करती है, जबकि प्रतिदिन औसतन 11802 लीटर दूध की बिक्री होती है। राज्य के हर जिले की पूरी जानकारी आपको https://www.ucdfaanchal.org पर उपलब्ध हो जाएगी।हम दुग्ध उत्पादक समिति झड़ौंद के कलेक्शन सेंटर पर पहुंचे, वहां समिति के सचिव जगीर सिंह से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि समिति से 30 सदस्य जुड़े हैं और प्रतिदिन सुबह और शाम दूध इकट्ठा किया जाता है। दूध कलेक्शन की प्रक्रिया पूरी तरह साइंटिफिक है।किसानों के सामने ही उनके द्वारा लाए गए दूध में फैट और अन्य गुणवत्ता की कंप्यूटराइज जांच होती है। फैट के अनुसार ही दूध का मूल्य निर्धारित होता है। जांच के आधार पर वर्तमान में दूध के दाम सबसे कम 22 रुपये लीटर तक पहुंच जाते हैं। अधिकतम की बात करें तो यह रेट 35 रुपये प्रति लीटर भी हो जाता है। बताते हैं कि दूध में फैट की स्थिति मौसम एवं पशुओं को दिए जाने वाले आहार पर निर्भर करती हैं।दूध का रेट कम मिलने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कृषक भगवान सिंह कहते हैं कि संघ के माध्यम से दूध बेचना मजबूरी है, क्योंकि हम संघ को बनाए रखना चाहते हैं। यहां दूध का रेट 24 से 27 रुपये प्रति लीटर ही पड़ता है। जबकि खुले बाजार में प्रति लीटर दूध का दाम 32 से 35 रुपये तक है।आंचल के उत्पादों के दामों में बढ़ोतरी हुई है, पर किसानों से पहले से भी कम दाम पर दूध खरीदा जा रहा है।लॉकडाउन में ज्यादा दिक्कत हो गई है। हमसे उस रेट पर दूध खरीदा जा रहा है, जिस पर बाजार में मट्ठा बिकता है।पशुपालक इंद्र सिंह का कहना है कि दूध का रेट तो बाजार में मिल रहा है। यह हमारा रोजगार है, हम इसके सहारे हैं। पशुपालन के लिए चारा अपने खेतों में उगा लेते हैं, इसलिए दुग्ध उत्पादन हमारे लिए नो प्राफिट, नो लॉस है।समिति के सचिव जगीर सिंह स्पष्ट करते हैं कि पशुपालक को उनके श्रम एवं लागत के अनुसार दूध का मूल्य नहीं मिल पा रहा है। करीब छह माह से प्रति लीटर दूध पर तीन रुपये कम कर दिए गए। जब इसकी वजह पूछी तो जवाब मिला कि ज्यादा रेट नहीं दे सकते। सरकार है, उसकी बात तो माननी ही पड़ेगी।बताते हैं कि पहले किसानों को दूध का अच्छा मूल्य मिल जाता था, इसकी वजह फैट अधिक होना था। अब फैट में कमी से दूध के मूल्य में पहले 30 फीसदी तक कमी आ गई। समिति के 30 सदस्यों में से दो या तीन को ही ज्यादा फैट की वजह से प्रति लीटर दूध पर अधिकतम 35 रुपये मिल पा रहे हैं, अन्य किसानों को 20 से 22 रुपये के बीच ही रेट मिल पाता है।फैट क्यों कम है, के सवाल पर उनका मानना है कि यह क्लाइमेट में बदलाव होना, पशुओं को दी जाने वाले दवाइयों एवं आहार का असर हो सकता है. इसमें कई बातें हो सकती हैं। पशुओं के चारे की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। हमारे खेतों में खरपतवार को खत्म करने के लिए दवाइयों का छिड़काव किया जाता है। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो जीरों पर आ जाएंगे। कुल मिलाकर दवा के छिड़काव वाला चारा खाने से दुग्ध उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।दूध के रेट कम होने पर नाराजगी होने के बाद भी, पशुपालन संघ से जुड़ने की वजह पर जगीर सिंह बताते हैं कि संघों से जुड़े पशुपालकों को दुग्ध उत्पादन के आधार पर सरकार की ओर से छूट पर पशु आहार मिलता है। पशुओं के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा में सहयोग मिलता है। समिति को सेंटर पर इकट्ठा होने वाले दूध की मात्रा के आधार पर निर्धारित परसेंटेज मिलता है। हालांकि बड़ी संख्या में उत्पादक 30 से 35 रुपये प्रति लीटर पर निजी व्यावसायियों को दूध बिक्री कर रहे हैं।प्रगतिशील कृषक एवं दुग्ध उत्पादक उमेद सिंह बोरा का कहना है कि सरकार ने दूध के दाम कम कर दिए गए, पर पशुआहार पर 50 रुपये बढ़ा दिए, यह तो दोहरी मार हुई। वहीं लॉकडाउन में लोगों ने इतना फायदा उठाया कि पशुआहार का जो बैग 900 रुपये का था, उसको 1200 रुपये कर दिया। इस पर कोई नियंत्रण नहीं है।किसान के हित की बात नहीं हो रही है। दूध में फैट में कमी बात को स्वीकार करते हुए उनका कहना है कि इसके बहुत सारे कारक हैं, जैसे क्लाइमेट चेंज होना, पर्यावरण, चारा की गुणवत्ता प्रभावित होना आदि, पर सरकार को दूध के रेट तय करते समय इतना ध्यान तो देना होगा कि पशुपालकों को नुकसान न हो। उनके श्रम और पशुपालन में लागत को देखते हुए रेट तय करने चाहिए। इस समय सरकार किसानों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करे ताकि उनका मनोबल न टूटे। उनका कहना है कि किसान को गाय के दूध पर 50 रुपये प्रति लीटर तथा भैंस के दूध पर 60 से 70 रुपये प्रति लीटर मिलने चाहिए।कहते हैं कि किसानों को पशुपालन के लिए चारा खेतों से मिल जाता है। वहीं पशुओं के गोबर से खेतों के लिए खाद मिल जाती है। रही बात दुग्ध समितियों से जुड़ने की, तो पशुओं का निशुल्क उपचार हो जाता है और सरकार की योजनाओं में प्राथमिकता एवं ऋण मिल जाता है। इसलिए समितियों से जुड़ना किसानों की मजबूरी है।दुग्ध संघों से अलग, निजी रूप से दूध की खरीद एवं बिक्री करने वाले संजय बताते हैं कि लॉकडाउन की वजह से दूध की मांग कम हुई है। किरायों के घरों में रहने वाले काफी संख्या में लोग यहां से चले गए। बहुत से लोगों ने कोरोना संक्रमण की वजह से दूध खरीदना बंद कर दिया। डिमांड कम होने की वजह से वो भी ग्रामीणों से पहले की तुलना में कम दूध ले रहे हैं। जिनसे दस लीटर दूध लेते थे, उनसे सात या आठ लीटर ही ले रहे हैं।संजय बंजारावाला में डेयरी के माध्यम से दूध बिक्री करते हैं। गांवों से इकट्ठा किया गया दूध गलियों एवं मोहल्लों में घर-घर आपूर्ति करते हैं। वो स्वयं भी पशुपालन करते हैं। बताते हैं कि लॉकडाउन में पशुआहार के दाम बढ़ा दिए गए। पूछने पर कहा जाता है कि ऊपर से ही इतना आ रहा है। पशुओं को आहार खिलाना ही है, इसलिए महंगे में भी खरीदना पड़ता है।दूध की कहानी जारी रहेगी, अगली बार आपसे करेंगे गुर्जरों की दिक्कतों पर बात।Keywords: Milk Story, Cost of milk, Milk Unions, Uttarakhand Co-operative Dairy Federation, UCDF, Milk Producers, Animal welfare, Animal Husbandry in Uttarakhand, Aanchal Milk, Aanchal Products, How to check Milk quality, दूध की क्वालिटी कैसे जांचें, दूध की शुद्धता की जांच, दुग्ध उत्पादन में लाभ या नुकसान, कैसे शुरू करें पशुपालन, पशुपालन आय का स्रोत कैसे, पशुपालन में आय, पशुआहार के रेट पर नियंत्रण
सुबह करीब पांच बजे से ग्रामीण क्षेत्रों में दुग्ध संघों एवं निजी व्यवसायियों के स्तर से दुग्ध एकत्रित करने का क्रम शुरू हो जाता है। सिमलास ग्रांट में दो दुग्ध उत्पादक समितियां हैं, जिनमें लगभग 20 से 30 सदस्य हैं।
कोआपरेटिव के तहत संचालित सरकारी उपक्रम आंचल ब्रांड राज्यभर में दूध एवं इससे बने पदार्थों की बिक्री करता है। देहरादून जिला की बात करें तो आंचल से जुड़े देहरादून दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ से 400 सोसाइटी जुड़ी हैं, जो 15252 सदस्यों के सहयोग से पूरी तरह संगठित रूप से संचालित होती हैं।
ग्राम स्तर पर गठित दुग्ध उत्पादक संघों के सदस्यों से आंचल डेरी औसतन प्रतिदिन 11674 लीटर दूध की खरीदारी करती है, जबकि प्रतिदिन औसतन 11802 लीटर दूध की बिक्री होती है। राज्य के हर जिले की पूरी जानकारी आपको https://www.ucdfaanchal.org पर उपलब्ध हो जाएगी।
हम दुग्ध उत्पादक समिति झड़ौंद के कलेक्शन सेंटर पर पहुंचे, वहां समिति के सचिव जगीर सिंह से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि समिति से 30 सदस्य जुड़े हैं और प्रतिदिन सुबह और शाम दूध इकट्ठा किया जाता है। दूध कलेक्शन की प्रक्रिया पूरी तरह साइंटिफिक है।
किसानों के सामने ही उनके द्वारा लाए गए दूध में फैट और अन्य गुणवत्ता की कंप्यूटराइज जांच होती है। फैट के अनुसार ही दूध का मूल्य निर्धारित होता है। जांच के आधार पर वर्तमान में दूध के दाम सबसे कम 22 रुपये लीटर तक पहुंच जाते हैं। अधिकतम की बात करें तो यह रेट 35 रुपये प्रति लीटर भी हो जाता है। बताते हैं कि दूध में फैट की स्थिति मौसम एवं पशुओं को दिए जाने वाले आहार पर निर्भर करती हैं।
दूध का रेट कम मिलने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कृषक भगवान सिंह कहते हैं कि संघ के माध्यम से दूध बेचना मजबूरी है, क्योंकि हम संघ को बनाए रखना चाहते हैं। यहां दूध का रेट 24 से 27 रुपये प्रति लीटर ही पड़ता है। जबकि खुले बाजार में प्रति लीटर दूध का दाम 32 से 35 रुपये तक है।
आंचल के उत्पादों के दामों में बढ़ोतरी हुई है, पर किसानों से पहले से भी कम दाम पर दूध खरीदा जा रहा है।लॉकडाउन में ज्यादा दिक्कत हो गई है। हमसे उस रेट पर दूध खरीदा जा रहा है, जिस पर बाजार में मट्ठा बिकता है।
पशुपालक इंद्र सिंह का कहना है कि दूध का रेट तो बाजार में मिल रहा है। यह हमारा रोजगार है, हम इसके सहारे हैं। पशुपालन के लिए चारा अपने खेतों में उगा लेते हैं, इसलिए दुग्ध उत्पादन हमारे लिए नो प्राफिट, नो लॉस है।
समिति के सचिव जगीर सिंह स्पष्ट करते हैं कि पशुपालक को उनके श्रम एवं लागत के अनुसार दूध का मूल्य नहीं मिल पा रहा है। करीब छह माह से प्रति लीटर दूध पर तीन रुपये कम कर दिए गए। जब इसकी वजह पूछी तो जवाब मिला कि ज्यादा रेट नहीं दे सकते। सरकार है, उसकी बात तो माननी ही पड़ेगी।
बताते हैं कि पहले किसानों को दूध का अच्छा मूल्य मिल जाता था, इसकी वजह फैट अधिक होना था। अब फैट में कमी से दूध के मूल्य में पहले 30 फीसदी तक कमी आ गई। समिति के 30 सदस्यों में से दो या तीन को ही ज्यादा फैट की वजह से प्रति लीटर दूध पर अधिकतम 35 रुपये मिल पा रहे हैं, अन्य किसानों को 20 से 22 रुपये के बीच ही रेट मिल पाता है।
फैट क्यों कम है, के सवाल पर उनका मानना है कि यह क्लाइमेट में बदलाव होना, पशुओं को दी जाने वाले दवाइयों एवं आहार का असर हो सकता है. इसमें कई बातें हो सकती हैं। पशुओं के चारे की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। हमारे खेतों में खरपतवार को खत्म करने के लिए दवाइयों का छिड़काव किया जाता है। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो जीरों पर आ जाएंगे। कुल मिलाकर दवा के छिड़काव वाला चारा खाने से दुग्ध उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
दूध के रेट कम होने पर नाराजगी होने के बाद भी, पशुपालन संघ से जुड़ने की वजह पर जगीर सिंह बताते हैं कि संघों से जुड़े पशुपालकों को दुग्ध उत्पादन के आधार पर सरकार की ओर से छूट पर पशु आहार मिलता है। पशुओं के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा में सहयोग मिलता है। समिति को सेंटर पर इकट्ठा होने वाले दूध की मात्रा के आधार पर निर्धारित परसेंटेज मिलता है। हालांकि बड़ी संख्या में उत्पादक 30 से 35 रुपये प्रति लीटर पर निजी व्यावसायियों को दूध बिक्री कर रहे हैं।
प्रगतिशील कृषक एवं दुग्ध उत्पादक उमेद सिंह बोरा का कहना है कि सरकार ने दूध के दाम कम कर दिए गए, पर पशुआहार पर 50 रुपये बढ़ा दिए, यह तो दोहरी मार हुई। वहीं लॉकडाउन में लोगों ने इतना फायदा उठाया कि पशुआहार का जो बैग 900 रुपये का था, उसको 1200 रुपये कर दिया। इस पर कोई नियंत्रण नहीं है।
किसान के हित की बात नहीं हो रही है। दूध में फैट में कमी बात को स्वीकार करते हुए उनका कहना है कि इसके बहुत सारे कारक हैं, जैसे क्लाइमेट चेंज होना, पर्यावरण, चारा की गुणवत्ता प्रभावित होना आदि, पर सरकार को दूध के रेट तय करते समय इतना ध्यान तो देना होगा कि पशुपालकों को नुकसान न हो। उनके श्रम और पशुपालन में लागत को देखते हुए रेट तय करने चाहिए। इस समय सरकार किसानों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करे ताकि उनका मनोबल न टूटे। उनका कहना है कि किसान को गाय के दूध पर 50 रुपये प्रति लीटर तथा भैंस के दूध पर 60 से 70 रुपये प्रति लीटर मिलने चाहिए।
कहते हैं कि किसानों को पशुपालन के लिए चारा खेतों से मिल जाता है। वहीं पशुओं के गोबर से खेतों के लिए खाद मिल जाती है। रही बात दुग्ध समितियों से जुड़ने की, तो पशुओं का निशुल्क उपचार हो जाता है और सरकार की योजनाओं में प्राथमिकता एवं ऋण मिल जाता है। इसलिए समितियों से जुड़ना किसानों की मजबूरी है।
दुग्ध संघों से अलग, निजी रूप से दूध की खरीद एवं बिक्री करने वाले संजय बताते हैं कि लॉकडाउन की वजह से दूध की मांग कम हुई है। किरायों के घरों में रहने वाले काफी संख्या में लोग यहां से चले गए। बहुत से लोगों ने कोरोना संक्रमण की वजह से दूध खरीदना बंद कर दिया। डिमांड कम होने की वजह से वो भी ग्रामीणों से पहले की तुलना में कम दूध ले रहे हैं। जिनसे दस लीटर दूध लेते थे, उनसे सात या आठ लीटर ही ले रहे हैं।
संजय बंजारावाला में डेयरी के माध्यम से दूध बिक्री करते हैं। गांवों से इकट्ठा किया गया दूध गलियों एवं मोहल्लों में घर-घर आपूर्ति करते हैं। वो स्वयं भी पशुपालन करते हैं। बताते हैं कि लॉकडाउन में पशुआहार के दाम बढ़ा दिए गए। पूछने पर कहा जाता है कि ऊपर से ही इतना आ रहा है। पशुओं को आहार खिलाना ही है, इसलिए महंगे में भी खरीदना पड़ता है।
दूध की कहानी जारी रहेगी, अगली बार आपसे करेंगे गुर्जरों की दिक्कतों पर बात।
Keywords: Milk Story, Cost of milk, Milk Unions, Uttarakhand Co-operative Dairy Federation, UCDF, Milk Producers, Animal welfare, Animal Husbandry in Uttarakhand, Aanchal Milk, Aanchal Products, How to check Milk quality, दूध की क्वालिटी कैसे जांचें, दूध की शुद्धता की जांच, दुग्ध उत्पादन में लाभ या नुकसान, कैसे शुरू करें पशुपालन, पशुपालन आय का स्रोत कैसे, पशुपालन में आय, पशुआहार के रेट पर नियंत्रण

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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