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हरीश रावत बोले, पलायन रोकने के लिए 100 उपाय हैं मेरे दिमाग में

देहरादून। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने उत्तराखंड में पलायन रोकने का एक उपाय साझा किया है। उनका कहना है कि पलायन के दंश से उत्तराखंड को बचाने के लिए करीब सौ उपाय मेरे दिमाग में हैं, उनमें एक उपाय यह भी अब जुड़ जाएगा।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के चलते राज्य में लगातार भ्रमण कर रहे रावत जहां भी जा रहे हैं, वहां के बारे में जानकारियां साझा कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में उन्होंने राज्य को पलायन से बचाने का उपाय बताया है।
रावत लिखते हैं,  जब हम हाईस्कूल के करीब पढ़ रहे थे तो बड़े-बूढ़ों को, गाँववालों को कहते सुनते थे कि फलां व्यक्ति कूड़ी-बाड़ी वाला है, तो कूड़ी-बाड़ी शब्द उत्तराखंड की अस्मिता से जुड़ा हुआ शब्द है।
आज पलायन से गाँव खाली हो रहे हैं, फिर भी कुछ लोग गाँव में मोर्चा लेकर घर को आबाद किए हुए हैं और खेती को भी आबाद कर रहे हैं। कूड़ी भी आबाद है और खेती भी आबाद है। बंदर, सूअर, भालू , नील गाय, लंगूर, ये सब उनके दुश्मन बन गए हैं, यहां तक की जड़ाऊ और काकड़ भी उनके दुश्मन बन गए हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री रावत के अनुसार, हमने जंगली जानवरों से खेती-बाड़ी को बचाने के बहुत सारे काम प्रारंभ किए थे। सूअर और नील गाय मारने की अनुमति भी प्राप्त की थी, बंदरबाड़े बनाए थे, हाथीरोधी दीवारें और खंदक बनाए थे, ऐसे वृक्षों आदि का रोपण किया था, जिन पर मधुमखियां आती हैं और हाथी उस एरिया से दूर चले जाते हैं। हमने इसलिए मौन पालन को भी बढ़ावा दिया था।
रावत के अनुसार, धीरे-धीरे हमने सूअररोधी दीवारें बनानी शुरू की थी, उसका काम भी बंद हो गया। हाथीरोधी दीवारें भी बननी बंद हो गई।
रावत, भाजपा की प्रदेश सरकार पर आरोप लगाते हुए कहते हैं, सत्ता ने उस पैसे का उपयोग, जो कैम्पा के अंदर राज्य को मिल रहा था, उसको अन्य कार्यों में खर्च किया। किसानों की तरफ नहीं देखा तो किसान मजबूर हो गया है कूड़ी-बाड़ी छोड़ने के लिए, पहले बाड़ी छोड़ रहा है, फिर कूड़ी छोड़ रहा है।
कहते हैं, हमने तय किया है कि 40 साल से ऊपर का जो भी परिवार गांव में अपनी कूड़ी को संभाल रहा है और अपनी बाड़ी को भी संभाल रहा है, तो हम उनके लिए एक निश्चित पेंशन राशि प्रोत्साहन स्वरूप देंगे।
इस पर पार्टी में विमर्श कर रहे हैं, कुछ विशेषज्ञों से भी बातचीत कर रहा हूँ, क्योंकि पलायन के दंश से उत्तराखंड को बचाने के लिए जो करीब 100 उपाय मेरे दिमाग में हैं, उन उपायों में एक उपाय ये भी अब जुड़ जाएगा।
वहीं, पलायन की रोकथाम के संबंध में, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है, हमारी योजना है कि 2025 तक उत्तराखंड के प्रत्येक गांव को लिंक मार्गों के माध्यम से बड़े राजमार्गों और ऑल वेदर रोड से जोड़ सकें, जिससे पहाड़ों पर औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा सके और पलायन की समस्या से उत्तराखंड को मुक्ति दिलाकर पहाड़ की जवानी को पहाड़ के काम लाया जा सके।
उत्तराखंड में पलायन की चिंताजनक स्थिति
एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन की गंभीरता का अनुमान इन तथ्यों से लगाया जा सकता है, कि वर्तमान में उत्तराखंड के नौ फीसदी गांव वास्तव में निर्जन हैं। राज्य के 16,793 गांवों (2011 की जनगणना के अनुसार) में से 1053 में आबादी नहीं है, जबकि 405 गांवों में जनसंख्या दस लोगों से भी कम है। इन गांवों की संख्या में विशेष रूप से वर्ष 2013 की आपदा के बाद वृद्धि हुई है।
इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2001 से 2015 के बीच उत्तराखंड के दस पर्वतीय जिलों में 2,80,615 घर खाली हो गए। इनमें सबसे कम 11,609 घर रुद्रप्रयाग और सबसे ज्यादा 38,764 घर पौड़ी गढ़वाल जिले में हैं।
राज्य के दस पर्वतीय जिलों में कृषि भूमि की क्षति पलायन होने तथा इस वजह से खेती योग्य भूमि को छोड़ने के कारण हुआ है। उत्तराखंड के पर्वतीय हिस्सों में कृषि भूमि छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण गरीब और सीमांत किसानों की आजीविका की सुरक्षा कमजोर हुई है।
वहीं, उत्तराखंड में 2001 और 2015 के बीच कृषि भूमि का 10.32 फीसदी हिस्सा खत्म हुआ है। देहरादून में खेती का 22.43 फीसदी, हरिद्वार में 3.42 फीसदी और ऊधम सिंह नगर में 7.05 फीसदी हिस्सा शहरी करण और औद्योगिकीकरण में चला गया। पर्वतीय जिला चंपावत में कृषि भूमि को 36.07 फीसदी नुकसान दर्ज किया गया है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार, उत्तराखंड राज्य के पर्वतीय जिलों के ग्रामीण इलाकों से पलायन एक बड़ी समस्या बन गई है, जिसके परिणामस्वरूप कई निर्वासित बस्तियों या गाँव ऐसे हैं, जिनकी आबादी में भारी गिरावट आई है। राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन की समस्या आर्थिक असमानताओं के साथ-साथ कई अन्य चुनौतियाँ भी प्रकट कर रही है। जिसमें कृषि में गिरावट, गिरती ग्रामीण आय तथा तनावग्रस्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रमुख है।
उत्तराखंड सरकार ने राज्य के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन की जानकारी एवं गम्भीरता का आकलन करने के लिए आयोग स्थापित करने का फैसला किया और 25 अगस्त, 2017 को पलायन आयोग का गठन किया। पलायन आयोग का मुख्य कार्य उत्तराखंड में पलायन की समस्या के कारण तथा उसका समाधान व रोकथाम तथा ग्रामीण आंचलों में बेहतर आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए उत्तराखंड सरकार को सुझाव देना है।
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है, वर्ष 2001 तथा वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों की तुलना करने पर जनपद अल्मोड़ा तथा पौड़ी गढ़वाल में नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि ज्ञात हुई है।
पिछले 10 वर्षों के दौरान 6338 ग्राम पंचायतों से कुल 3,83,726 व्यक्ति अस्थायी आधार पर तथा 3946 ग्राम पंचायतों से 118981 लोग स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं। सभी जिलों में 26 से 35 वर्ष आयु वर्ग के व्यक्तियों द्वारा अधिकतम पलायन किया गया है, जिसका औसत प्रतिशत 42.25 है।
राज्य से पलायन करने वाले कुल लोगों में से रोजगार की तलाश के कारण 50.16 फीसदी (अधिकतम), 15.21 लोगों ने शिक्षा सुविधाओं में कमी, 8.83 प्रतिशत लोगों ने स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी, 5.61 प्रतिशत लोगों ने जंगली जानवरों के आतंक, 5.44 फीसदी लोगों ने कृषि उत्पादन में कमी, 3.74 फीसदी लोगों ने बुनियादी सेवाओं में कमी के कारण पलायन किया। वहीं 8.48 प्रतिशत लोगों ने अन्य कारणों से पलायन किया।
यहां पलायन आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है, पौड़ी गढ़वाल में सबसे ज्यादा 186 गांव आबादी विहीन हैं। इसके बाद बागेश्वर में 77, पिथौरागढ़ में 75, उत्तरकाशी में 70 गांव आबादी विहिन बताए गए। रिपोर्ट में कहा गया है, पिछले 10 वर्षों में कुल आबादी में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी वाले गाँवों / तोक / मजरों की संख्या 564 है।
राज्य में पौड़ी गढ़वाल जिले के निर्जन गाँवों में ऐसा ही रूझान देखने को मिला है। 112 ऐसे गाँव / तोक / मजरों की आबादी में 50 प्रतिशत से अधिक गिरावट के साथ पौड़ी जिले में ऐसे गाँवों की संख्या सर्वाधिक है और इसके बाद 80 गाँवों के साथ अल्मोड़ा का स्थान है।
ये आंकड़ें उत्तराखंड के पर्वतीय और मैदानी जिलों के बीच असमानताओं को दर्शाते हैं। उत्तराखंड में बाहर की ओर प्रवासन का मुद्दा बहुत ही महत्वपूर्ण बन गया है और क्षेत्र में प्रवास को रोकने के लिए सक्रिय कदम उठाने की आवश्यकता है, ऐसा रिपोर्ट में कहा गया है।
उत्तराखंड में पलायन की यह तस्वीर बहुत चिंताजनक है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य गठन के बाद से पलायन की रोकथाम के लिए समय -समय पर कांग्रेस एवं भाजपा की सरकारों ने कितनी चिंता व्यक्त की। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनावी यात्रा के दौरान ग्रामीण इलाकों से पलायन को रोकने के उपायों पर बात करने के साथ, अपने कार्यकाल में किए गए कार्यों की जानकारी दे रहे हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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