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बर्फ के फाहे की तरह दिखने वाले कीट हैं सेब के बड़े दुश्मन

रस चूसने वाले कीट से पौधों को बचाने के उपाय बता रहे उद्यान विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र कुकसाल

डॉ. राजेंद्र कुकसाल
  • लेखक कृषि एवं औद्योनिकी विशेषज्ञ हैं
  • 9456590999
ऊली एफिड (Woolly apple aphid) कीट, जिसे रूईया या ऊलिया कीट के नाम से भी जाना जाता है, सेब के पौधों को सबसे अधिक हानि पहुंचाता है। यह रस चूसने वाला कीट है, जो सेब की टहनियों पर रूई या बर्फ के फाहे की तरह सफेद पदार्थ के रूप में दिखाई देता है।
रूई को हटाने पर अन्दर गहरे लाल और भूरे रंग के छोटे-छोटे कीट दिखाई देते हैं, जिनको दबाने पर लाल खून जैसा तरल पदार्थ निकलता है।
ऊली एफिड कीट पेड़ की छाल तना और शाखाओं का रस चूसता है, इससे पौधे में गांठ बनती हैं। कीट के प्रकोप के कारण क्षतिग्रस्त टहनियों में फल लगने की क्षमता कम हो जाती है।
सर्दियों में कीट टहनियों से क्रोल करते हुए पौधे की जड़ों में पहुंच जाता है। सर्दियों में पौधे की जड़ों को नुकसान पहुंचाता है, इससे पौधे का विकास रुकता है। जड़ों में कीट के जाने के बाद कीट नियंत्रण काफी कठिन हो जाता है।

गर्मियों में रोजाना 15 से 20 बच्चे पैदा करता है ऊली एफिड

अप्रैल अंत से ऊली एफिड के कीट पौधों पर दिखाई देते हैं। ये अंडों के बदले सीधे बच्चे पैदा करता है। गर्मियों के दौरान यह प्रतिदिन 15-20 बच्चे देता है। इस कीट के प्रौढ़ में पंख होते हैं, जिनके सहारे उड़कर अन्य पौधों पर चला जाता है। सर्दियों में मार्च तक इसकी जीवन गति धीमी हो जाती है और यह एक-दो बच्चा ही पैदा कर पाता है। इसके बाद बगीचों में इसका प्रकोप बढ़ जाता है। इसकी बढ़ोतरी के लिए 18-20 डिग्री सेल्सियस का तापमान उत्तम है और यह सूखे के मौसम में तेजी से हमला करता है।
ऊली एफिड कीट वर्षभर रहता है। एक वर्ष में इसकी 13 पीढ़ियां तक विकसित हो जाती हैं। छोटे कीट पैदा होने के 24 घंटे में सफेद रूई की तरह का पदार्थ छोड़ते हैं। कीट इसके सुरक्षा चक्र में बचा रहता है।
M-111 तथा M – 106 रूट स्टाक के पौधों पर इस कीट का प्रभाव कम होता है, लेकिन M-9,M- 26 रूट स्टाक वाले पौधों पर अधिक देखने को मिलता है। पौधौ की जड़ों के पास से निकले सर्कल पर ऊली एफिस कीट का प्रकोप अधिक दिखाई देता है।
कीट के प्रकोप के बाद जैविक दवाइयों से इसका उपचार सम्भव नहीं है। स्वस्थ पौधों पर समय समय पर गौ मूत्र एवं नीम आधारित दवाइयों से ऊली एफिड कीट से सुरक्षात्मक बचाव किया जा सकता है।
कीट की रोकथाम के लिए कीट से प्रभावित टहनियों को हटा कर नष्ट करें तथा पौधों पर इमिडाक्लोप्रिड, क्लोरोपाइरीफास या मिथाइल डेमिटान के घोल का छिड़काव करना चाहिए । एक एमएल दवा एक लीटर पानी में या एक चम्मच दवा पांच लीटर पानी में घोल बनाकर कीट से ग्रसित पौधों पर छिड़काव करें।
जड़ों में कीट समूह को नष्ट करने के लिए जड़ों को 80 से 90 सेंटीमीटर अर्द्धव्यास में 30 से 35 सेंटीमीटर की गहराई तक खोदकर कार्बोफ्यूरान 10 ग्राम प्रति वर्ग मीटर या क्लोरोपायरीफास दवा के घोल से जड़ों को तर करें। बाद में जड़ों को मिट्टी से ढंक देना चाहिए।
बरसात के बाद जब भूमि में पर्यप्त नमी हो तो कीटनाशक का घोल डालना अति उत्तम है।
स्टिकी बैंड या चिपकू बैंड-
सर्दियों के मौसम में एफिस कीट पौधों की शाखाओं से क्रोल कर जड़ की तरफ को आते हैं। जड़ों तक पहुंचने से रोकने के लिए स्टिकी बैंड का प्रयोग करें। जमीन से एक दो फीट की ऊंचाई पर माह नवम्बर के शुरू में कीट से प्रभावित पौधों के तनों पर स्टिकी बैंड सैलो टेप की सहायता से लपेट देते हैं।
कृषि निवेशों की आपूर्ति करने वाली दुकानों से स्टिकी बैंड क्रय किए जा सकते हैं। स्वयं भी स्टिकी बैंड बनाए जा सकते हैं। चार- पांच इंच चौड़े प्लास्टिक को तने के ऊपर पूरी तरह लपेट लें, फिर प्लास्टिक के ऊपर गम वैसलीन पेट्रोलियम जैली कोई भी चिप चिपा पदार्थ लगा लें, जिस पर कीट आसानी से चिपक सकें।

सर्दियों के मौसम में पौधे की टहनियों से कीट क्रोल करते हुए जब जड़ की तरफ बढे़गा, जैसे ही स्टिकी बैंड के ऊपर से चलने की कोशिश करेगा तो कीट स्टिकी बैंड पर चिपक जाता है। फरवरी मार्च माह में स्टिकी बैंड हटा दें।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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