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इस तरह पिएंगे पानी तो दूध जितना फायदा देगा

जल में बहुत बड़ी सजीवता होती है, जिस प्रकार पौधों को पानी देकर हरा भरा रखा जाता है, इसी प्रकार शरीर को भी जल से सिंचित किया जाता है। पौधों को पानी देने के नियमों की तरह, मनुष्य को भी पानी पीते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए, ताकि शरीर को इसका लाभ प्राप्त हो सके।

आपको कितनी भी प्यास क्यों न लगी, पानी को दूध की तरह घूंट- घूंट कर पियें। पानी को एक सांस में गटागट नहीं पीना चाहिए। घूंट घूंट कर पिया गया पानी शरीर के लिए गुणकारी होता है।  हर एक घूँट के साथ मन में यह विचार होना चाहिए- ”इस अमृत के समान जल में जो मधुरता और शक्ति है, उसको मैं अपने शरीर में प्राप्त कर रहा हूं।” इस विचार के साथ पिया हुआ पानी, दूध के समान गुणकारक होता है।

पानी पीने में किसी भी तरह ही कंजूसी नहीं होनी चाहिए। परन्तु, भोजन करते समय अधिक पानी न पियें।

सुबह सोकर उठते ही वरुण देवता की उपासना करने का एक तरीका यह है कि कुल्ला करने के बाद एक गिलास स्वच्छ जल पीया जाए। इसके बाद कुछ देर चारपाई और इधर उधर करवटें बदलनी चाहिए। इसके बाद शौच जाना चाहिए। इससे खुलकर शौच होता है और पेट साफ हो जाता है। यह ‘उषापान’ वरुण देवता की प्रत्यक्ष आराधना है।

स्नान से शरीर को साफ सुथरा ही नहीं रखा जाता, बल्कि स्नान का उद्देश्य है- जल में मिली हुई विद्युत शक्ति, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि अमूल्य तत्वों से शरीर को सिंचित करना, इसलिए ताजे, स्वच्छ, सहने योग ताप के जल से स्नान करना चाहिए।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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