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Video: कहानी सेबूवाला कीः बंद पड़ी सौ साल पुरानी घराट भी चलेगी और बिजली भी पैदा होगी

पंद्रह से भी ज्यादा गांवों का अनाज पीसने वाली घराट के अवशेष पड़े हैं नदी किनारे

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

हमने आपसे एक ऐसे गांव का जिक्र किया था, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह मुगलों के जमाने में बस गया था। दिल्ली से आए कुछ परिवारों ने यहां बस्ती बसाई थी। यह गांव सूर्याधार झील (Suryadhar Lake) से लगभग ढाई किमी. आगे है। देहरादून जिले के इस छोटे से गांव सेबूवाला में इस समय दो परिवार ही रह रहे हैं। गांव भले ही छोटा है, पर संभावनाएं बहुत बड़ी हैं। यहां कृषि एवं पर्यटन गतिविधियों के साथ मछली उत्पादन से लाभ कमाया जा सकता है। इसको आदर्श गांव बनाया जा सकता है। यहां एक समय में घराट थी और पानी से तीन किलोवाट बिजली पैदा करने वाली छोटी टरबाइन भी चलती थी।

सेबूवाला निवासी मेहर सिंह मनवाल संभावनाओं को धरातल पर उतारने की पहल कर रहे हैं। प्रगतिशील किसान मेहर सिंह को केंद्रीय पशुपालन मंत्री ने डेयरी फार्मिंग एवं मत्स्यपालन में उत्तराखंड शक्ति अवार्ड तथा राज्य सरकार ने किसान भूषण से सम्मानित किया है।

पहली खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें- Video: सूर्याधार झील से आगे बढ़कर है एक गांव, जिसकी हैं बहुत सारी कहानियां

गांव तक पानी पहुंचाने की दो व्यवस्थाएं

भले ही जाखन नदी सेबूवाला गांव के पास से होकर बह रही है, पर नदी से यहां के खेतों तक पानी पहुंचाना आसान टास्क नहीं है। वो इसलिए, क्योंकि नदी गांव से बहुत नीचे बह रही है। यहां खेतों और घराट तक पानी पहुंचाने के लिए दो तरह की व्यवस्थाओं पर काम किया गया है।

देहरादून जिला की सिंधवाल ग्राम पंचायत के सेबूवाला गांव में सिंचाई के लिए जाखन नदी का पानी पाइप में टेप करके लाया जा रहा है, यह व्यवस्था सात-आठ दशक पुरानी बताई जाती है। नदी से काफी ऊंचाई पर आरपार गुजरती पाइप लाइन को तारों से बांधा गया है। फोटो-डुगडुगी
ग्रामीणों की इंजीनियरिंग: गांव तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था

पहली व्यवस्था लगभग सात-आठ दशक पुरानी बताई जाती है। ग्रामीणों ने गांव से लगभग दो सौ मीटर पहले उस स्थान पर पानी को टेप किया, जहां नदी का स्तर गांव से ऊंचा है। जहां से पानी टेप किया जा रहा है, वो स्थान गडूल ग्राम सभा का हिस्सा है। नदी ने गडूल और सिंधवाल ग्राम पंचायतों का परिसीमन किया है।  गांव की ऊंचाई पर नदी के आरपार तारों से बांधकर बिछाए पाइप देख सकते हैं, जिनमें हर समय गांव तक पानी पहुंचता है। यह पानी गूल के माध्यम से खेतों और मछली तालाबों में पहुंच रहा है। जब पानी की जरूरत नहीं होती, तब बंधा लगाकर उसको वापस नदी में ही प्रवाहित कर देते हैं। बहुत शानदार और इंजीनियरिंग का कमाल है, नीचे बहती नदी के ऊपर बिछे पाइप में पानी के बहाव को देखना। यह उन ग्रामीणों का कार्य है, जिन्होंने शायद इंजीनियरिंग नहीं पढ़ी होगी।

देहरादून जिला के सेबूवाला गांव में जाखन नदी से घराट तक पानी पहुंचाने के लिए की गई व्यवस्था। फोटो- डुगडुगी
घराट तक सीधे नदी से पानी पहुंचाने की व्यवस्था

दूसरी व्यवस्था, खासकर वर्षों पुरानी घराट के लिए की गई है। यह व्यवस्था केवल घराट तक पानी पहुंचाने के लिए है, क्योंकि घराट और नदी के लेवल में ज्यादा अंतर नहीं है। पर, यह व्यवस्था तभी कामयाब हो सकती है, जब नदी का बहाव ज्यादा होगा या फिर नदी में एक बंधा बनाया जाए। जलागम परियोजना ने बहाव को एक छोटी नहर के जरिये उस जगह तक पहुंचाने के लिए यह व्यवस्था की है, जहां इन दिनों घराट के अवशेष पड़े हैं। सेबूवाला निवासी मेहर सिंह मनवाल पुनः पनचक्की बनाने की योजना बना रहे हैं। वो कहते हैं, भविष्य में घराट चलाने की योजना है, इसीलिए यह व्यवस्था की गई है।

देहरादून जिला का सेबूवाला गांव , जो तीन और से पहाड़ियों से घिरा है , यहां तरक्की की तमाम संभावनाएं मौजूद हैं। फोटो- डुगडुगी
अनाज पिसाने आए दूर गांवों के लोग सेबूवाला में करते थे रात्रिविश्राम

मेहर सिंह बताते हैं, उनके दादा जी यहां पानी से चलने वाली घराट (पनचक्की) चलाते थे। उस समय इठारना, सतेली, नाहीं, जाकर, फर्ती, कैरवान, गुआड़, बसोई, शिला चौकी, कंडोली, खरक, कालबन, घेराणी सहित 15 से भी ज्यादा गांवों के लोग अनाज पिसाने आते थे। इस इलाके की यह एक मात्र घराट थी। दिनभर में 20 से 25 लोगों का अनाज ही पिस पाता था। गांवों से लोग पैदल ही अनाज लेकर पहुंचते थे। अनाज पिसाने आए दूर गांवों के लोग रात सेबूवाला गांव में बिताते थे। खाना भी खुद बनाते थे। आटा खूब था और सब्जी की भी कमी नहीं थी। हम उस समय बहुत छोटे थे।

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बच्चों की पढ़ाई के लिए भोगपुर जाना पड़ा, घराट बंद हो गई

“पहले दादा जी, पिता जी और उनके बाद मैंने घराट को चलाया। मुझे बच्चों की पढ़ाई के लिए भोगपुर में रहना पड़ रहा था। हालांकि, नियमित तौर पर गांव आता रहा। पिता ने घराट को संभाला हुआ था। लगभग सौ साल पुरानी घराट वर्ष 2013-14 में बंद करना पड़ा। भोगपुर में हमारी बिजली से चलने वाली चक्की है। भोगपुर में लोग उनको चक्की वाले मनवाल जी के नाम से जानते हैं। प्रयास है कि सेबूवाला में बंद पड़ी घराट को फिर से चलाऊं। नदी में पानी खूब है, थोड़ा सा प्रयास करना होगा, घराट चल जाएगी, ” मेहर सिंह मनवाल बताते हैं।

पनचक्की के पिसे अनाज की बात ही कुछ और है

मेहर सिंह के अनुसार,  बिजली की चक्की से पीसे अनाज में वो बात नहीं होती, जो पनचक्की से पीसे अनाज में होती है। पनचक्की का पीसना (आटा) ठंडा होता है और इसमें अनाज के सभी पौष्टिक तत्व होते हैं, क्योंकि यह अनाज को धीमे धीमे पीसता है। जबकि बिजली की चक्की से पिसा अनाज गर्म होता है और पौष्टिकता कम हो जाती है। यह अनाज को बहुत तेजी से पीसती है। पर, हर जगह तो पानी वाले घराट नहीं हो सकते।

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वो कहते हैं, उनको मालूम है कि अब दूरदराज के गांवों से उतने लोग यहां नहीं पहुंचेंगे, जितने पहले आते थे। अब तो पहले की तुलना में बिजली वाली चक्कियां और घराट ज्यादा हो गए हैं, पर वो यहां आने वाले लोगों को पनचक्की से पिसे अनाज का सेवन करने के लिए प्रेरित करेंगे। पनचक्की पर पिसा अनाज पैकेट बनाकर बिक्री कर सकते हैं। वो पनचक्की से पिसे अनाज का उद्यम विकसित करना चाहते हैं। हम यहां जो भी कुछ उगाते हैं, वो जैविक है। हमने अपने खेतों में कभी कैमिकल नहीं डाला। गोबर की खाद ही इस्तेमाल की है।

देहरादून जिला के सेबूवाला गांव में तीन किलोवाट बिजली उत्पादन के लिए लगाए गए उपकरण, फिलहाल रेत में दबे हैं। पर, यहां फिर से बिजली उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है। फोटो- डुगडुगी
जाखन नदी से पैदा करते थे तीन किलोवाट बिजली

सेबूवाला में, जाखन नदी किनारे रेत में धंसी हुई मशीन और मोटर देखी, जो एक बड़े पाइप से जुड़ी है। इसके बारे में मेहर सिंह बताते हैं, यहां कभी बिजली पैदा करते थे। यह छोटी टरबाइन है, जो ऊपर से पानी गिराने पर घूमती थी और इससे बिजली पैदा होती थी। इसकी क्षमता तीन किलोवाट बिजली उत्पादन की है।

देहरादून जिला के सेबूवाला गांव में प्रगतिशील किसान मेहर सिंह मनवाल ने हमें जल विद्युत निर्माण के लिए लगाए गए उपकरणों की जानकारी दी। फोटो- डुगडुगी

उरेडा के माध्यम से 2012-13 में इस जल विद्युत निर्माण को शुरू किया था। कुछ परिस्थितियों के चलते यह भी वर्ष 2015 में बंद हो गया। इसकी देखरेख के लिए समय ही नहीं मिल पा रहा था। पहले हमारे घर इसी बिजली से रोशन होते थे। अभी हम ऊर्जा निगम की बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं। पर, इसको फिर से चालू करना है।… जारी

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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