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जलेबी की कहानी, उसी की तरह गोल-गोल है

न्यूज लाइव डेस्क24×7.कॉम डेस्क

जलेबी जितनी लाजवाब है, उतने ही इसके किस्से भी। जलेबी के किस्से हजारों वर्ष पुराने हैं। पर, एक बात तो है, वो यह कि, जलेबी की कहानियां ठीक उसी तरह गोल-गोल घुमाने वाली हैं।

जलेबी गोल-गोल क्यों होती है, सीधी क्यों नहीं, यह सवाल मुझे चक्कर में डाल देता है। आपके पास इसका जवाब हो तो जरूर बताना।

चलिए, जलेबी की कहानी को एक फिल्मी गाने से शुरू करते हैं-

अफ़गान जलेबी, माशूक फ़रेबी

घायल है तेरा दीवाना

भाई वाह, भाई वाह !

यह गाना तो अफगान यानी अफगानिस्तान की जलेबी की बात कर रहा है।

क्या जलेबी अफगानिस्तान से होते हुए भारत पहुंची या फिर भारत में ही जन्मीं है। इस पर तो बात करनी होगी।

वैसे तो जलेबी भारत की ही है, क्योंकि यह भगवान श्रीराम के राज में भी बनती थी, पर उस समय इसका नाम क्या था, हम आपको बताते हैं।

पहले के जमाने में जलेबी को ‘कर्णशष्कुलिका’ कहा जाता था। बताते हैं, रावण वध के बाद भगवान श्रीराम को उनकी पसंद की मिठाई जलेबी खिलाई गई। तब से दशहरे पर जलेबी खाने की परंपरा बन गई। उस समय जलेबी को ‘शश्कुली’ कहा जाता था।

17वीं सदी के ऐतिहासिक दस्तावेज में मराठा ब्राह्मण रघुनाथ ने जलेबी बनाने की विधि का उल्लेख कुण्डलिनि नाम से किया है।

क्या आपको पता है, इंदौर अपनी सबसे भारी और घुमावदार जलेबी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है।

अब जलेबी नाम कहां से आया, इसको लेकर अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं। कुछ लोगों का कहना है कि जलेबी मूल रूप से अरबी शब्द है। इस मिठाई का असली नाम जुलाबिया बताया जाता है। ईरान में इसको जुलाबिया कहते हैं।

कहा जाता है कि मध्यपूर्व से ही जलेबी भारत में पहुंची, पर बहुत सारे लोग इन बातों को नहीं मानते। उनके अपने तर्क हैं।

शरदचंद्र पेंढारकर, इसे भारत में जन्मा बताते हैं। उन्होंने अपनी किताब बनजारे बहुरूपिये शब्द में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताया है।

वो रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल’ नामक ग्रंथ का हवाला भी देते हैं, जिसमें इसको बनाने का उल्लेख है। इसे ‘जल-वल्लिका भी कहा गया है। रस भरी होने की वजह से इसे यह नाम मिला और फिर इसका नाम हुआ जलेबी। बाद में, फारसी और अरबी में इसको शक्ल बदलकर जलाबिया कहा जाने लगा।

कहा यह भी जाता है कि मुगल जब भारत आए, तब जलेबी की स्वादिष्ट रेसिपी भी अपने साथ लेकर आए।

तुर्की व फारसी व्यापारी जलेबी लेकर भारत पहुंचे और यह जल्द ही लोकप्रिय हो गई और यहां के उत्सव- महोत्सवों की शान बन गई।

1450 में प्रियंकर नृपकथा नाम की पुस्तक में इसका उल्लेख है। इसमें यह बताया गया है कि कैसे अमीर व्यापारी अपनी सभा में, जलेबी को बड़े चाव से खाते थे।

17वीं शताब्दी की पुस्तक गुण्यगुणबोधिनी में भी, इसका उल्लेख मिलता है, जो संस्कृत पद्य में है। इस पुस्तक में जलेबी तैयार करने के, विभिन्न तरीकों की व्याख्या है। यह तरीके जलेबी बनाने के आजकल के, तरीकों से समानता रखते हैं।

नादिर शाह को जलोबिया बहुत पसंद थी। वह इस पकवान को इराक से भारत लेकर आया। इसे यहां का प्रमुख मिष्ठान बनने में अधिक समय नहीं लगा।

ईरान में जलेबी को चाय के साथ परोसा जाता रहा है। भारत में जलेबी की तरह दिखने वाली इमरती भी खूब प्रसिद्ध है। इसका पुराना नाम अमृती यानी अमृत के समान मीठा था, लेकिन फारसी प्रभाव के कारण, इसे इमरती कहा जाने लगा।

जलेबी का एक नाम और आपको बताते है, वो है जलेबा। खानपान के लिए मशहूर इंदौर में 300 ग्राम का ‘जलेबा’ मिलता है। यहां पनीर जलेबी भी मिलती है, जिसमें कद्दूकस में कसा पनीर डाला जाता है।

जलेबी को लेकर एक कहानी और है-

जलेबी से कोयल की रिश्तेदारी है, एक तथ्य इस तरह का भी सामने आया। कहा जाता है कि जलेबी में जो मिठास है, वही कोयल की सुरीली कुहुक में भी है। अरबी में जिरयाब का मतलब है काली चिड़िया यानी कोयल होता है।

कहा जाता है कि अरब में महान संगीतकार अबु अल हसन अबी इब्न नफी उर्फ जिरयाब थे, जो 789 में बग़दाद में पैदा हुए। अफ्रीकी मूल के अबु में जन्मजात संगीत की प्रतिभा थी। उनका कंठ बेहद सुरीला था, इसके चलते उन्हें जिरयाब कहा जाने लगा।

प्रतिभा के दम पर जिरयाब को संगीत सीखने का मौका मिला और बाद में खलीफा उनकी संगीत कला का कायल हो गया। बाद में, खलीफा के एक आदेश पर जिरयाब को इराक छोड़कर स्पेन जाना पड़ा।

जिरयाब बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। न सिर्फ संगीत बल्कि कला के हर क्षेत्र में अपना प्रभाव रखते थे। उन्होंने खास किस्म की भुनी हुई मछली की रेसिपी बनाई, जो आज भी जिरयाबी के नाम से जानी जाती है।

इसी तरह खास अरबी पेस्ट्री, जो खूब रसभरी होती है, पश्चिम में जिरयाबी कहलाती है, इसी का रूप हुआ जलाबिया, जो फारस होते हुए जलेबी के रूप में हिन्दुस्तान में मशहूर हो गई।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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