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हितेश नेगी से मुलाकातः डेयरी फार्मिंग का मतलब दूध ही नहीं है, यहां बहुत सारे लाभकारी उत्पाद हैं

हितेश नेगी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इकोनॉमिक्स में पोस्टग्रेजुएट हैं। कृषि और पशुपालन को आर्थिकी का प्रमुख स्रोत मानने वाले हितेश कहते हैं, किसान और गाय का चोली दामन का साथ है। ये दोनों अगर ठीक रहेंगे तो आपको तमाम तरह की सरकारी योजनाओं की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

करीब 49 वर्षीय हितेश ने डेयरी फार्मिंग को स्वरोजगार बनाया है और इसको व्यवस्थित ढंग से संचालित कर रहे हैं। वो डेयरी फार्मिंग को केवल दूध उत्पादन के नजरिये से ही नहीं देखते, बल्कि डेयरी में उपलब्ध होने वाले अन्य उत्पादों से लाभ पर भी चर्चा करते हैं।

उनसे बातचीत में हमने जाना कि पशुओं के लिए उचित माहौल क्या होना चाहिए तथा वो कौन से आवश्यक संसाधन हैं, जिनसे डेयरी फार्मिग को बेहतर बना सकते हैं। उनसे पशुपालन के आर्थिक पहलुओं पर भी बात की। पेश हैं उनसे वार्ता के प्रमुख अंश-

देहरादून जिला के माजरीग्रांट में प्रोगेसिव डेयरी फार्मर हितेश नेगी की डेयरी फार्मिंग। फोटो- सार्थक पांडेय

हितेश कृषक परिवार से हैं और घर में पशुओं को पालते रहे हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद माजरी ग्रांट में डेयरी फार्मिंग को अपनाया। चार लोगों को रोजगार भी दिया है। माजरी ग्रांट देहरादून जिला के डोईवाला ब्लाक में हैं। यह ग्रामीण इलाका डोईवाला से हरिद्वार जाते हुए पड़ता है।

निराश्रित पशुओं की सेवा से डेयरी फार्मिंग

उनकी डेयरी फार्मिंग की सबसे बड़ी खास बात, उनके पास 70 फीसदी पशु वो हैं, जो सड़कों पर बेसहारा घूम रहे थे। उनकी डेयरी में 45 पशु हैं, जिनमें गाय, भैंसे, बछड़े-बछड़ियां शामिल हैं।

एक एचएफ गाय के पास ले जाते हुए उन्होंने बताया, इसका नाम हमने करी रखा है। उस समय 13 या 14 माह की बछड़ी थी, जब यह खराब हालत में मिली थी। हमने इसकी सही तरीके से देखरेख की। वर्तमान में यह दोनों टाइम 25 लीटर दूध दे रही है।

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उन्होंने सिंधी नस्ल की एक गाय दिखाई, जिसे स्नेह से गौरी नाम से पुकारते हैं। सही देखरेख से यह गाय गाभिन हो गई। एचएफ (Holstein Friesian) नस्ल की ही गाय व्हाइटी और देशी नस्ल की लारी भी गाभिन है। देशी गाय रेवती ने दूसरी बार बच्चे को जन्म दिया है। बताते हैं, उनकी डेयरी में पशुधन खरीदने में मात्र छह से सात लाख रुपये ही व्यय हुए।

डेयरी का मतलब केवल दूध से ही नहीं है

उनका कहना है, डेयरी का मतलब दूध से ही नहीं है, हमें इसको मल्टीपरपज प्रोडक्ट्स के महत्व से भी समझना होगा। यहां गोबर, गोमूत्र को भी व्यावसायिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

देहरादून जिला के माजरीग्रांट में प्रोगेसिव डेयरी फार्मर हितेश नेगी की डेयरी में गायों की देखरेख करने वाले कर्मचारी महेंद्र, यहां चार कर्मचारी कार्य करते हैं। फोटो- सार्थक पांडेय

उनका मानना है, हम डेयरी फार्मिंग या कोई अन्य व्यवसाय करते हैं तो हमें सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने के साथ, यह भी देखना होगा कि हमारे व्यवसाय से कितने तरीके के कार्य और जुड़े हैं। कृषि का उदाहरण देते हुए कहते हैं, कृषि से तमाम तरह की रोजगारपरक गतिविधियां जुड़ी हैं, हमें उनका उपयोग व्यवसाय हित में करना चाहिए। अगर, हम यह सब सीख गए तो खेती कभी घाटे का सौदा नहीं रहेगी।

कहते हैं,  डेयरी फार्मिंग को ही ले लीजिए, यहां दूध के उत्पादन के साथ ही, गोबर, गोमूत्र भी व्यवसायिक हित में हैं। गोबर से वर्मी कल्चर, वर्मी वॉश, गैस प्लांट, गोमूत्र एवं गोशाला से निकलने पानी से पेस्टीसाइड्स तैयार किए जा सकते हैं। गोशाला से निकलना वाला वेस्ट कृषि को उन्नत करता है।

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सरकार से भी अपील करते हैं कि उसके अनुदान से जो प्रोडक्ट्स बनाए जा रहे हैं, उनके अपशिष्टों को कैसे प्रोडक्टिव बनाया जा सके, इस दिशा में भी सहयोग करे।

देहरादून जिला के माजरीग्रांट में प्रोगेसिव डेयरी फार्मर हितेश नेगी की डेयरी फार्मिंग परिसर में बैठे पशु। इस डेयरी में लगभग 70 फीसदी पशु ऐसे हैं, जो पहले निराश्रित सड़कों पर घूम रहे थे। सही देखरेख एवं पोषण से इनमें से कई गायें दूध दे रही हैं। फोटो- सार्थक पांडेय

हितेश बताते हैं कि उनकी वर्मी कल्चर पर काम करने की तैयारी है। इसका अच्छा मार्केट है, जो 10 से 12 रुपये किलो के हिसाब से बिक जाता है। गोशाला से निकलने वाले गंदे पानी से कंपोस्ट बनाएंगे, जो दवा एवं पेस्टीसाइड्स का काम करेगा। गोमूत्र में ऐसे तत्व पाए  जाते हैं, जो पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमताओं को बढ़ाते हैं।

देहरादून जिला के माजरीग्रांट में प्रोगेसिव डेयरी फार्मर हितेश नेगी की डेयरी फार्मिंग के पास कृषि। हितेश कहते हैं, पशुपालन एवं कृषि का चोली दामन का साथ है। फोटो- सार्थक पांडेय

कहते हैं, गोबर को लेकर किए जा रहे प्रयोग बड़ी संस्थाओं तक ही सीमित हैं, उनको धरातल पर लाने की जरूरत है। यह कार्य तो किसान के ब्लड में आना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो हम कितनी भी रिसर्च कर लें, कोई फायदा नहीं होने वाला।

देहरादून जिला के माजरीग्रांट में प्रोगेसिव डेयरी फार्मर हितेश नेगी की डेयरी फार्मिंग। फोटो- सार्थक पांडेय

मैं फिर से दोहराता हूं, डेयरी का नाम सुनते ही दिमाग में दूध नहीं आना चाहिए। दिमाग में वर्मी कम्पोस्ट, उसके द्वारा कीटों की रोकथाम के लिए दवाइयां बनाने का विचार आना चाहिए। गांवों में पशुपालन से पर्याप्त गोबर होता है, वहां इस तरह के प्रयोग हों।

डेयरियों में गाय की बछिया को भी अच्छे से तैयार किया जाए

कहते हैं, अक्सर दूध देने वाली गाय पर ध्यान दिया जाता है। हमारा मानना है कि गाय की बछिया को भी अच्छे से तैयार किया जाए। हम अच्छी नस्ल की गाय लाते हैं, पर व्यापारी पर निर्भर रहना पड़ता है। वो कैसा दूध देगी, के बारे में नहीं पता रहता।

प्रोगेसिव डेयरी फार्मर हितेश नेगी का मानना है कि पशुपालकों को बछिया की देखरेख पर अच्छे से ध्यान देना चाहिए। फोटो- सार्थक पांडेय

प्रोगेसिव डेयरी फार्मर हितेश नेगी का मानना है कि पशुपालकों को बछिया की देखरेख पर अच्छे से ध्यान देना चाहिए। फोटो- सार्थक पांडेय

जिस भी बुल के सीमैन का इस्तेमाल करते हैं, उसका पूरी रिकार्ड चेक करना चाहिए। डेयरियां फेल होने का एक कारण यह भी है कि वहां जो बछिया तैयार करते हैं, उनके बारे में पता नहीं होता कि ये कितना दूध दे पाएंगी।

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गाय की स्थिति एवं उसका भोजन, सबसे महत्वपूर्ण है। बाजार में तरह-तरह के आर्टिफिशियल फीड्स बिक रहे हैं। दावा किया जाता है कि इससे गाय ज्यादा दूध देगी। इनमें तरह-तरह के कैमिकल्स होते हैं। इनसे गाय दूध तो ज्यादा देती है, पर उसके स्वास्थ्य पर बहुत ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बिना जांचे दिए गए सप्लीमेंट्स गाय के स्वास्थ्य के लिए खतरा है। गाय के स्वास्थ्य का मतलब है कि वो दोबारा से गाभिन नहीं हो पाती।

पशुओं को रखने वाले कमरे या हॉल में हों ये सुविधाएं

यदि हम गायों को बांधकर रख रहे हैं तो 40 गायों के लिए 80 फीट गुना 30 फीट यानी 2400 स्क्वायर फीट का हॉल होना आवश्यक है। इस हॉल में पर्याप्त वेंटीलेशन होना जरूरी है। पशुओं के लिए हवा एवं रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। इस पूरे इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए सरकारी सहयोग नहीं लिया। मैं किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) पर लगभग 20 लाख का ऋण लिया है।

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पशुओं का कमरा हवादार इसलिए होना चाहिए, क्योंकि पशुओं के गोबर और मूत्र से मीथेन गैस निकलती है, जिससे आंखों में जलन होती है। कमरा हवादार नहीं होगा को पशुओं और उनकी देखरेख करने वालों की आंखों में जलन होने लगेगी।

छत सीमेंट की चादरों वाली होनी चाहिए। इस पर लेंटर न हो। प्लास्टिक या टीन की चादर नहीं हो, क्योंकि गर्मियों में इनसे हॉल या कमरा काफी गर्म हो जाता है। टीन शेड का आकार झोपड़ीनुमा होना चाहिए।

गायें मिट्टी पर बैठना पसंद करती हैं। हम इनको सीमेंटेड फर्श पर रखते हैं, इसलिए इनको उठने बैठने में दिक्कत होती है। इसी समस्या को दूर करने के लिए मैट बिछाया जाता है।

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डेयरी फार्मिंग में मुर्गे मुर्गियां का भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। ये पशुओं के खुरों में जमा मैल और कीटों को खा लेते हैं। फोटो- सार्थक पांडेय

आपके पास पर्याप्त स्टाफ होना चाहिए। इन्फ्रास्ट्रकचर सही है तो 40 गायों की देखभाल के लिए कम से कम तीन लोग होने चाहिए। यदि एक व्यक्ति किसी कार्य से कहीं जाता भी है तो देखभाल हो सकती है। डेयरी फार्म फेल होने के कारण पर्याप्त कर्मचारी नहीं होना भी है।

हितेश नेगी ने डेयरी में पशुओं के खुरों से कीट व मैल निकालने के लिए मुर्गी पालन किया है। जब पशु हॉल से बाहर खुले में रहते हैं तो मुर्गे-मुर्गियां उनके खुरों में जमे मैल और कीटों को निकालते हैं। वहीं, गोबर में मौजूद अनाज के दानों को भी चुगते हैं। यहां कुछ भी वेस्ट नहीं जाता।

गाय को दाना कम, हरी घास ज्यादा खिलाएं

गाय के आहार की दो टाइमिंग होती हैं। हमारे हिसाब से गाय को 75 फीसदी हरी घास एवं 25 फीसदी दाना देना चाहिए। बहुत सी डेयरियों में देखा है, या तो घास बहुत दे देंगे या फिर दाना ही बहुत ज्यादा खिला देंगे, यह एकदम गलत है।

गायें दाना खाने के लिए नहीं बनी हैं, इनका मूल आहार घास है। इनके शरीर का स्ट्रक्चर रूमैन (पशु का प्रथम पेट) घास की वजह से ही बनता है।  गाय को एक समय हरा घास जरूर देना चाहिए, इससे उसका रूमैन बहुत अच्छा रहता है।

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हरे घास में सूखी घास की बजाय पोषक तत्वों की मात्रा अधिक होती है। डेयरियों में जहां गायों को सूखी घास खिलाई जाती है, वहां रूमैन बनाने के लिए गायों को तमाम तरह के पाउडर खिलाए जाते हैं।

पशुओं की चिकित्सा के लिए संसाधनों की कमी चिंता की बात

हमारे सबसे बड़ी दिक्कत यह है आपको डॉग्स एवं कैट्स के डॉक्टर मिल जाएंगे, लेकिन गाय के चिकित्सक नहीं मिल पाएंगे। यहां पशु चिकित्सा व्यवस्था सही नही हैं। उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि मैं 92 परसेंट एचएफ गाय लेकर आया, लेकिन वो यह बच नहीं पाई। डॉक्टर उसको डायग्नोस ही नहीं कर पाए। पंजाब में एचएफ गाय रह रही है, जबकि उत्तराखंड में इनके लिए पंजाब से ज्यादा अनुकूल माहौल है।

यहां इन गायों को डायग्नोस करने में डॉक्टर्स के सामने संसाधनों की कमी की दिक्कत आ रही है। यहां न तो इन गायों की एन्डोस्कोपी की व्यवस्था है और न ही एक्सरे की। यहां 90 परसेंट से ऊपर एचएफ गाय को रखना मुश्किल है। उसकी केयर की बहुत जरूरत है।

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आंचल से जुड़े होने के कारण यहां उनकी टीम हमारी डेयरी में आती है। उनकी टीम सहयोग करती है, पर उनके सामने भी एंडोस्कोपी और एक्सरे की मशीन नहीं होने की दिक्कत है। इस वजह से मुझे भी काफी नुकसान उठाना पड़ा।

गाय मुख्य रूप से बीमार ही अपने पेट की वजह से होती है। क्योंकि हम उनको जो एक्सट्रा एनर्जी देते हैं, वो उसको पचा नहीं पाता। डॉक्टर भी संसाधनों की कमी से उनको डायग्नोसिस नहीं कर पाते।

गायों को सामान्य रूप से थनैला और मिल्क फीवर होता है। इसके लिए पहले तो डॉक्टरों पर निर्भर था, लेकिन अब देशी नुस्खों को आजमाता हूं।

लागत को ध्यान में रखें तो ज्यादा होनी चाहिए दूध की कीमत

प्रतिदिन सुबह चार बजे गायों की मिल्किंग करते हैं। अच्छी कंपनी की मिल्किंग मशीन इस्तेमाल करेंगे तो गायों को कोई दिक्कत नहीं आएगी। हमारे यहां 80 फीसदी एचएफ भी आपको 30 लीटर दूध दे सकती है। यहां 300 लीटर दूध उत्पादन होता है। हम 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक्री करते हैं। इस समय मार्केट में यही रेट चल रहा है। वैसे सभी तरह की लागत को ध्यान में रखते हुए हमारे हिसाब से गाय का दूध 50 से 55 रुपये प्रति लीटर बिक्री होना चाहिए।

रही बात किसी व्यक्ति के एक ही गाय पर निर्भर रहने की, तो उनके लिए दूध की कीमत सौ रुपये प्रति लीटर भी होगी तो भी वो लाभ प्राप्त नहीं कर पाएंगे। एक या दो गाय के दूध पर आजीविका नहीं चल सकती। एक या दो गाय, वो व्यक्ति ही रखते हैं, जिनकी आजीविका का विकल्प कुछ और होता है। वो परिवार की दूध की मांग पूरी करने के लिए गाय पालते हैं।

हमारी आंचल डेयरी कोआपरेटिव के माध्यम से काम करती है। वो फैट पर दूध लेती है और उसका दूध का रेट 30 रुपये प्रति लीटर से अधिक नहीं आता। उससे पैसा समय पर नहीं मिलता।

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गायों की मनोदशा पर भी बात होनी चाहिए

मूल रूप से गाय हो या भैंस हों, उनका मूल कैरेक्टर फ्रीडम का है, हम उनको उनके स्वभाव के विपरीत बांधकर रखते हैं। इससे गाय की मनोदशा पर असर पड़ता है। हम गाय को बांधते हैं और उसके ऊपर छत की वजह से उसे धूप नहीं मिल पाती। धूप से उसे विटामिन मिलता है। अगर, हम सभी चीजें सप्लीमेंट्स में देने लगे तो गाय पालने की जरूरत नहीं होगी। प्राकृतिक रूप से मिलने वाले विटामिन्स एवं अन्य पोषक तत्वों की बात ही कुछ और होती है।

शहरों में महंगी जगह होती है और दूध की डिमांड ज्यादा होती है, इसलिए डेयरी फार्मर कम जगह में ज्यादा पशुओं को बांधते हैं, इस संबंध में कोई बात नहीं करता।

प्रोगेसिव डेयरी फार्मर हितेश नेगी की डेयरी फार्मिंग में धूप में सुखाए जाते दूध के कैन। फोटोः सार्थक पांडेय

शहरीकरण जिस तरह से बढ़ा है, मेरे हिसाब से शहरों में डेयरी नहीं होनी चाहिए। वहां वेस्ट के निस्तारण का सवाल नहीं है, सबसे महत्वपूर्ण बात है कि वहां गायों को किस स्थिति में रखा जाता है। एक गाय को जितने स्थान की आवश्यकता होती है, उतने में वहां कम से कम तीन गायों को बांधकर रखा जाता है। वो सबसे बड़ा माइनस प्वाइंट है।

नगर पालिकाएं डेयरियों से निकलने वाले अपशिष्ट को मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा मानती हैं, पर इन डेयरियों में कम स्थान में बंधी गायों की स्थिति पर बात नहीं होती। इसलिए मेरा मानना है कि डेयरियां शहरों में नहीं बल्कि खेतों के पास गांवों में स्थापित होनी चाहिए, वो भी पशुओं के लिए पर्याप्त स्थान को ध्यान में रखते हुए। यहां उनको पर्याप्त रोशनी, हवा मिल पाएंगे। साथ ही, गंदगी भी कम होगी।

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सही देखरेख से गाय के दूध से ही लाखों की बचत

वैसे तो एचएफ गायें दस हजार से लीटर दूध भी दे देती हैं। पर, एक सामान्य एवं स्वस्थ गाय अपने पीरियड में औसतन लगभग पांच हजार लीटर दूध दे देती है। कुल मिलाकर एक गाय से औसतन लगभग दो लाख रुपये का दूध मिल जाता है।

अगर, अच्छे से देखरेख करो तो गाय पर एक पीरियड में लगभग एक से सवा लाख रुपये तक खर्चा आ जाता है। एक लाख रुपये की यह बचत आपको तभी दिखेगी, जब आपके पास अच्छे से व्यस्थित डेयरी है। रही बात आहार की, तो आप बल्क में अनाज खरीदकर आहार बनाएं, इसमें आपको लाभ मिलेगा।  पहले की तुलना में आहार महंगा हो गया है।

डेयरी में ही बनाया और पकाया जाता है पशु आहार 

हितेश नेगी कहते हैं, पशुओं को कच्चा दाना नहीं खिलाना चाहिए। अनाज को पीसकर और पकाकर दलिया बना लें और सुबह-शाम खिलाएं।

बिनौला को कच्चा खिलाने पर गाय को टॉक्सिन होने का खतरा रहता है। इसलिए वो सभी किसानों को सलाह देते हैं कि पशुओं को कच्चा बिनौला नहीं देना चाहिए। चाहे कोई भी मौसम हो।  अपने अनुभव के आधार पर कह सकते हैं कि गाय को पका हुआ दाना देना चाहिए।

वो बिनौला, गेहूं, मक्का, बिनौला, सोयाबीन, तीरा, खल, अजवायन, नमक मिलाकर एक समय में पानी सहित लगभग तीन कुंतल दलिया पकाते हैं। दोनों समय में प्रतिदिन लगभग छह कुंतल दलिया बनाया जाता है। दलिया सभी 40-45 पशुओं के लिए काफी है। गाभिन गाय एवं बछिया को आधा-आधा बाल्टी तथा दूध देने वाली गायों को एक-एक बाल्टी पका हुआ दलिया देते हैं।

उत्तराखंड में डेयरी फार्मिंग की सबसे ज्यादा संभावनाएं

हितेश नेगी की डेयरी में देशी, एचएफ, क्रास ब्रीड, साहीवाल, सिंधी गायों के साथ ही भैंसें भी हैं। उनके अनुसार, सबसे अच्छी प्रजाति साहीवाल है, यह इसी वातावरण में रह सकती है। पूरा प्रदेश एक ठंडा इलाका है, साहीवाल ठंडे इलाकों में रह सकती हैं। दूध और क्वालिटी के हिसाब से भी साहीवाल अच्छी है।

प्रोगेसिव डेयरी फार्मर हितेश नेगी से कृषि एवं पशुपालन से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई। फोटो- सार्थक पांडेय

देशी गायों की तुलना में एचएफ गायों को ज्यादा पालने के संबंध में उनका कहना है, भारत की जनसंख्या कुछ वर्षों में डेढ़ अरब के आसपास पहुंच जाएगी। दूध जिसका महत्वपूर्ण योगदान है, उसकी आपूर्ति करने के लिए एचएफ को डेयरी फार्मिंग में अपनाया जा रहा है। एचएफ देशी गायों की तुलना में दूध अधिक देती हैं।

उत्तराखंड में छोटी एवं बिखरी हुई जोत है, इसलिए यहां डेयरी फार्मिंग सहित विभिन्न सहवर्गीय खेती को आजीविका के विकल्प के तौर पर अपनाया जा सकता है। यहां संभावनाएं भी बहुत हैं।

डेनमार्क 80 से 90 फीसदी पर्वतीय इलाका है। डेनमार्क उत्तराखंड की तरह लगता है। वहां डेयरी फार्मिंग बहुत तरक्की पर है, उत्तराखंड में भी डेयरी फार्मिंग की असीम संभावनाएं हैं। यहां उन्नत दालें उगाई जा सकती हैं। सरकार किसानों के साथ पूरे मनोयोग से काम करे तो यहां डेयरी फार्मिंग, आर्गेनिक फार्मिंग, हॉर्टिकलचर पर काफी काम किया जा सकता है।

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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