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वर्मी कम्पोस्ट को जानना है तो कविता पाल से मिलिए 

वर्मी कम्पोस्ट यानी केचुओं द्वारा तैयार की जाने वाली जैविक खाद। हम बचपन से सुनते आए हैं कि केचुएं किसानों के मित्र हैं, वो इसलिए क्योंकि केचुएं मिट्टी को उर्वरक बनाते हैं। पर, जैसे जैसे कृषि उत्पादों की मांग बढ़ती गई, वैसे खेती में उपज को रसायनों के हवाले किया जाता रहा और केचुओं पर निर्भरता भी कम हुई और मित्रता भी।
रसायनों के प्रभाव से बढ़ते हेल्थ इश्यु ने हमें फिर से जैविक खानपान की ओर प्रेरित किया। अब केचुओं से खाद खेतों से बाहर भी बनवाई जा रही है, जिसे वर्मी कम्पोस्ट, वर्मी वॉश के नाम से जाना जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्मी कम्पोस्ट अधिक व जैविक पैदावार, स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ स्वरोजगार से जुड़ा मुद्दा भी है।
डोईवाला में कविता आर्गेनिक्स की संस्थापक युवा उद्यमी कविता पाल ने वर्मी कम्पोस्ट बनाने की छोटी सी पहल की, उनको भी अनुमान नहीं था कि यह पहल तीन माह में ही विस्तार लेती दिखेगी। पर, वर्मी कम्पोस्ट को स्वरोजगार बनाने से पहले उन्होंने इससे जुड़ी हर बारीकी को जाना और प्रशिक्षण लिया।

उनका कहना है कि प्रशिक्षण लेना अलग बात है और कार्य करना अलग। किसी भी कार्य को करने के लिए मनोबल ऊंचा रहना चाहिए। दिक्कतें आती हैं, पर आपको उनका सामना करना है, तभी आप आगे बढ़ेंगे और दूसरों को रोजगार दे पाएंगे।
चांदमारी के पास टोंगिया में उन्होंने करीब एक बीघा जमीन किराये पर लेकर उसमें वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिए गोबर की बेड्स बनवाईं।  वर्मी कम्पोस्ट के लिए गोबर की डिमांड हमेशा रहती है, जिसकी पूर्ति आसपास के गांवों या डेयरियों से की जाती है। पर, देखने में आ रहा है कि शहरों में डेयरियों का गोबर नालियों में बहाया जा रहा है। हम तो इसको इस्तेमाल कर रहे हैं और वो भी रोजगार के लिए।

एक बेड में लगभग एक चौथाई ट्राली गोबर इस्तेमाल किया है, इसमें डाले गए केचुएं गोबर से खाद बना रहे हैं। लगभग तीन माह में आपको उत्पादन मिल जाएगा। आप ज्यादा गोबर और केचुएं इस्तेमाल करेंगे तो ज्यादा उत्पादन होगा। साथ ही, केचुओं की संख्या भी लगातार बढ़ती जाती है।
तीन माह में उनका अनुमान है कि इस समय उनके पास दस कुन्तल से ज्यादा केचुएं होंगे, जबकि उन्होने 30 बेड्स में लगभग 600 किलो केचुएं डाले थे। इसका परिणाम यह है कि उनको एक और फील्ड में बीस बेड्स बनवानी पड़ीं, जिसमें केचुआ डालकर खाद तैयार की जाएगी।

कविता के अनुसार, केचुओं के लिए नमी की आवश्यकता होती है। छाया वाला स्थान हो या फिर मल्चिंग की जाए। मल्चिंग का मतलब, वर्मी बेड्स को पुआल, घास पत्तियों से ढंक दिया जाए। इससे तापमान ज्यादा नहीं होगा। बेड तीन फीट से ज्यादा चौड़े और डेढ़ फीट से ज्यादा ऊंचे नहीं होने चाहिए। यह सब खास बातें, आप कार्य करने के दौरान सीखते हो।
उनका कहना है कि एक केचुआ दिनभर में अपने वजन की लगभग आधा मात्रा खुराक लेता है। इस्तेमाल किए गए गोबर का लगभग 40 फीसदी जैविक खाद में उत्पादन हो सकता है। साथ ही, कृषि के लिए गोबर में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा दोगुनी होती है।

इस प्रक्रिया में गोबर के साथ आसपास के जंगलों में बिखरी पत्तियां, जो जंगल में आग लगने और दीमक पैदा होने का कारण बनती हैं, को अगर हम  कम्पोस्ट बनाने में इस्तेमाल करें तो ये आजीविका का जरिया बनती हैं। यह कम्पोस्ट की क्वालिटी को बेहतर करता है। कुल मिलाकर हम इसमें सभी नेचुलर वेस्ट को इस्तेमाल कर सकते हैं। अर्थवॉर्म (केचुआ) सेकेंडरी डिकम्पोजर होते हैं, प्राथमिक डिकम्पोजर तो फफूंद, बैक्टीरिया होते हैं।
आप देखते हैं कि नमी के वजह से किसी भी चीज या पत्तियों में फंगस लग जाता है, बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते हैं। इनसे वो सेमी डिकम्पोज हो जाते हैं। अर्थ वॉर्म उनको खाकर पूरी तरह डिकम्पोज कर देता है।

कविता बताती हैं कि गोबर की खाद को खेतों में इस्तेमाल किया जाता है, पर कई बार हम देखते हैं कि वो पूरी तरह डिकम्पोज नहीं होती। हमें गोबर को डिकम्पोज होने का समय तो देना होगा। केचुआ इसको पूरी तरह डिकम्पोज करके उपयोग खाद के रूप में तैयार करता है।
वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी को दीमक से भी बचाता है। उनके पास मुख्य रूप से केचुएं की आईसीनिया फीटीडा, रेड विंगलर, एएनसी यानी अफ्रीकन नाइट क्रालर प्रजातियां हैं। एएनसी बहुत कम इस्तेमाल होता है, पर यह तेजी से फीड करता है और इसकी गुणवत्ता बेहतर होती है। रेड विंगलर की तुलना में एएनसी की दर दोगुनी है। हमारे पास एएनसी भी उपलब्ध है।
कविता बताती हैं कि शुरुआत में उनके समक्ष यह चुनौती थी कि केचुआ कहां से लाया जाए। कोटद्वार में शिव प्रसाद डबराल जी ने केचुआ उपलब्ध कराया और इस प्रक्रिया में मदद की।  उनसे मिली जानकारियों ने मुझे जैविक खाद, जैविक खेती की दिशा में कार्य करने का उद्देश्य दिया। आज मेरे पास इतने केचुएं हैं कि मुझे इस कार्य को और बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिल रहा है। डोईवाला में देहरादून रोड पर ही 20 और वर्मी बेड बनाए हैं।

एक सवाल पर उनका कहना है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए विविध आयामों पर काम करने की आवश्यकता है। सरकार विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं योजनाएं चला रही है। जहां तक बात वर्मी कम्पोस्ट की है, इसके लिए बहुत ज्यादा इनवेस्टमेंट की आवश्यकता नहीं है।
ग्रामीण क्षेत्र में घर पर भी वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन किया जा सकता है।  उत्तराखंड में कई जिलों में रसायनिक खाद पर रोक है, इसका विकल्प जैविक खाद है। खेती तो सभी जिलों में निरंतर जारी रहेगी और वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन से स्वरोजगार की संभावनाएं लगातार बढ़ती रहेंगी।
उनका कहना है कि वर्मी कम्पोस्ट भूमि की उर्वरकता को बढ़ाने के साथ ही भूमि की जल सोखने की क्षमता में भी वृद्धि करता है। खरपतवार कम उगते हैं तथा पौधों में रोग कम लगते हैं। मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती हैं। उत्पादकता बढ़ जाती है।
केचुओं के शरीर का 85 फीसदी भाग पानी से बना होता हैं, इसलिए सूखे की स्थिति में भी ये अपने शरीर में पानी कम होने के बाद भी जीवित रह सकते हैं और मरने के बाद भूमि को नाइट्रोजन देते हैं। वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों को बढ़ाता है।
यह भूमि को उपजाऊ एवं भुरभुरी बनाता है। खेत में दीमक एवं अन्य हानिकारक कीटों को नष्ट कर देता हैं। इससे कीटनाशक की लागत में कमी आती हैं। इसके उपयोग के बाद 2-3 फसलों तक पोषक तत्वों की उपलब्धता बनी रहती है।
उनका कहना है कि दो-तीन माह में वर्मी कम्पोस्ट से आय लगभग दोगुनी हो गई है। इसका मतलब है कि संसाधन बढ़ गए हैं यानी केचुओं की मात्रा पहले से लगभग दोगुनी हो गई। वर्मी कम्पोस्ट की डिमांड आ रही है। एक किलो से लेकर 50 किलो तक की पैकेजिंग कर रहे है।
जैविक खाद उत्पादन के इस स्वरोजगार की प्रक्रिया में ट्रैक्टर ट्राली पर गोबर परिवहन करने वाले, गोबर बेचने वाले पशुपालकों, वर्मी बेड बनाने, उत्पादित कम्पोस्ट निकालने, पैकेजिंग, मार्केटिंग कई लोगों के लिए आय उपार्जन का जरिया बनी। उन्होंने इस कार्य में दस से 15 लोगों को अप्रत्यक्ष तौर पर आय उपार्जन से जोड़ा।
उन्होंने बताया कि एक किलो की पैकेजिंग अपार्टमेंट्स या घरों में गमले लगाने व टैरेस गार्डनिंग करने वालों के लिए है। कुल मिलाकर, कविता की यह पहल उनको उद्यमिता के क्षेत्र में ऊँची उड़ान भरने का हौसला दे रही है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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