
Empowerment & Struggle
- प्रभा थपलियाल, ऋषिकेश, 11 मार्च

नारी केवल एक शब्द नहीं, बल्कि अनंत महानता और जगत जननी मां जगदंबा का साक्षात स्वरूप है। अपने परिवार के लिए किसी अडिग पर्वत की तरह संघर्षों को झेलना, चेहरे पर मुस्कान रखना और अपने आंचल में पूरे संसार को समेट लेना, यही नारी की वास्तविक शक्ति है। मैं, प्रभा थपलियाल, स्वयं को इतना सक्षम नहीं पाती कि इस संसार की मातृ-शक्ति की महिमा का पूर्ण गुणगान कर सकूं, लेकिन अपनी माता जी के जीवन को देखकर जो मैंने सीखा है, उसे शब्दों में पिरोने का एक छोटा सा प्रयास कर रही हूं।
Empowerment & Struggle : समाज को जन्म देने वाली, अंगुली पकड़कर चलना सिखाने वाली और प्रथम शब्द का बोध कराने वाली नारी ही वास्तव में शक्ति का केंद्र है। आज के समय में एक ‘सशक्त महिला’ वह है, जो अपने बच्चों को न केवल अच्छे संस्कार दे, बल्कि उन्हें एक अच्छे नागरिक के रूप में विकसित करे। समाज के उत्थान की प्रेरणा हमें अपने माता-पिता से ही मिलती है, और यही अच्छी सोच पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज हित में अग्रणी रहती है।
पहाड़ का संघर्ष और ‘दाई माँ’ का निस्वार्थ सेवाभाव
Empowerment & Struggle : मैं बात कर रही हूं पहाड़ की उन नारियों की, जिन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी बगैर किसी सुविधा, मानदेय या सम्मान के केवल अपना कर्तव्य निभाया। वह समय जब पहाड़ों में न डॉक्टर थे और न ही चिकित्सा सुविधाएं, तब एक महिला का प्रसव पूरे परिवार के लिए किसी पुनर्जन्म से कम नहीं होता था। उस कठिन दौर में पूरे गांव और क्षेत्र की एकमात्र उम्मीद और विश्वास ‘दाई मां’ पर टिका होता था।
मैंने स्वयं अपने गांव दाबडा (पट्टी गजा, टिहरी गढ़वाल) में अपनी मां को इसी रूप में देखा है। जिन्होंने न केवल हमें संभाला, बल्कि पूरे समाज की निस्वार्थ सेवा की।
श्रीमती बिंद्रा देवी: सेवा की एक जीवंत प्रतिमूर्ति
मेरी माता जी, श्रीमती बिंद्रा देवी जी, उत्तराखंड की उन सशक्त नारियों का प्रतीक हैं, जिन्होंने पहाड़ की विषमताओं से जूझते हुए भी कभी हार नहीं मानी। पिछले 50 वर्षों से उन्होंने अनगिनत बच्चों की ‘दाई मां’ के रूप में सेवा की है। उनके पास कोई औपचारिक डिग्री नहीं थी, लेकिन उनके पास जो अनुभव, ममता और कौशल था, वह आज की बड़ी-बड़ी डिग्रियों पर भारी है।
एक तरफ मेरे पिता जी एक सैनिक की भूमिका में सीमा पर रहकर देश की रक्षा की, तो दूसरी तरफ मेरी माता जी ने समाज की सेवा का बीड़ा उठाया। माता जी ने गुरिल्ला ट्रेनिंग भी हासिल की। वहीं, उनके हाथों से जन्मे हुए न जाने कितने बच्चे आज देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपना उज्ज्वल भविष्य बना रहे हैं और समाज के हित में कार्य कर रहे हैं। आज भी हमारे गांव और आसपास के क्षेत्रों में, आधुनिक सुविधाओं के बावजूद, मेरी मां पर लोगों का विश्वास अडिग है। अपनी जिम्मेदारियों को मुस्कुराकर निभाना ही मेरी माता जी के जीवन का मूल मंत्र रहा है। वह सच में पहाड़ों की समस्याओं से जूझकर निखरी हुई एक ‘सशक्त नारी’ हैं।
जगत की ऐसी समस्त मातृ-शक्ति और मेरी पूजनीय माता जी को मेरा कोटि-कोटि नमन।






