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आपदा प्रभावित चिफल्डी-1ः रातभर पेट दर्द से रोता है पांच महीने का प्रिंस

जिलाधिकारी ने कहा, मौके पर जाएगी मेडिकल टीम, बच्चे के उपचार की समुचित व्यवस्था होगी

चिफल्डी से राजेश पांडेय और गजेंद्र रमोला की रिपोर्ट

अगस्त की 19 तारीख शुक्रवार की रात नदी ने तौलिया काटल ग्राम पंचायत के चिफल्डी (ग्वाली डांडा) गांव को तबाह कर दिया। जिस नदी में बाढ़ से गांव तहस नहस हो गया है, उसका नाम भी चिफल्डी है। टिहरी गढ़वाल की धनोल्टी विधानसभा के इस गांव से थोड़ा ऊंचाई पर प्राइमरी स्कूल का भवन है। इस भवन के दो कमरों में पांच परिवारों के 28 लोगों को शरण लिए हुए एक सप्ताह हो गया है। आपदा के दिन से गांव में बिजली नहीं है, इसलिए ग्रामीणों की रात उमस और मच्छरों से परेशान होकर बीतती है। यहां सबसे छोटी उम्र मात्र पांच माह के प्रिंस अपनी मां रजनी के साथ हैं।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 30 से 35 किमी. दूर चिफल्डी गांव में आपदा के कहर को देखना है तो ग्राउंड जीरो पर जाना होगा, वहां ग्रामीणों के ध्वस्त मकानों को देखना होगा। यहां कुछ मकान तो बाढ़ ने गायब ही कर दिए।

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टिहरी गढ़वाल जिला के धनोल्टी क्षेत्र में स्थित चिफल्डी गांव में आपदा से भारी तबाही हुई है। प्रताप सिंह पंवार का क्षतिग्रस्त मकान। फोटो- राजेश पांडेय

आपदा की भयावह रात करीब साढ़े 12 बजे की बात है, चिफल्डी गांव के मकान एक एक करके बाढ़ की चपेट में आने लगे। नदी के तेज बहाव से प्रताप सिंह पंवार का मकान भी ध्वस्त होने लगा। पूरा परिवार बच्चों को उठाकर घरों से बाहर दौड़ने लगा। बारिश बहुत तेज थी। करीब 26 वर्षीय रजनी बताती हैं, उनको कुछ नहीं सूझ रहा था। वो अपने पांच माह के बच्चे प्रिंस को उठाकर घर से बाहर दौड़ीं और इससे पहले कि पानी और तेज हो जाए, परिवार की मदद से उन्होंने प्रिंस को करीब चार सौ मीटर ऊंचाई पर बने प्राइमरी स्कूल के भवन तक पहुंचा दिया। सभी लोग पूरी तरह भींग चुके थे।

इस घटना के समय प्रिंस के पिता हुकम सिंह पंवार घर पर नहीं थे, वो देहरादून के तुनवाला इलाके में जॉब करते हैं। सप्ताह में ही घर आते-जाते हैं।

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रजनी बताती हैं, प्रिंस का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। मुझे अपने बेटे की सबसे ज्यादा चिंता है। प्रिंस का देहरादून के एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज चल रहा है। हमें 24 तारीख को चेकअप के लिए देहरादून जाना था, पर अब हम क्या कर सकते हैं। गांव से बाहर जाने के रास्ते बंद हैं। कोई भी ऐसा रास्ता नहीं है, जहां से पांच महीने के बच्चे को लेकर जा सकें।

टिहरी गढ़वाल जिला के धनोल्टी क्षेत्र में स्थित चिफल्डी गांव में आपदा के बाद से परिवारों को प्राइमरी स्कूल भवन में रहना पड़ रहा है। स्कूल भवन में मां रजनी के साथ पांच माह का प्रिंस। फोटो- राजेश पांडेय

टिहरी गढ़वाल जिला के धनोल्टी क्षेत्र में स्थित चिफल्डी गांव में आपदा के बाद से परिवारों को प्राइमरी स्कूल भवन में रहना पड़ रहा है। स्कूल भवन में मां रजनी के साथ पांच माह का प्रिंस। फोटो- राजेश पांडेय

“प्रिंस के पेट में दर्द होता है। सभी दवाइयां, पर्चे और रिपोर्ट बाढ़ में बह गए। यहां (प्राइमरी स्कूल का भवन) रात को बहुत उमस रहती है।बच्चे गर्मी में परेशान रहते हैं। मेरा बेटा दर्द में रातभर बेचैन होकर रोता है। हम उसके लिए कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। कल डॉक्टर यहां चेकअप के लिए आए थे, उनको दिखाया था, जो दवाइयां दी गईं, उससे आराम नहीं मिला। बेटे की क्या दवाइयां चल रही थीं, हमें कोई जानकारी नहीं है। हम चाहते हैं, प्रशासन प्रिंस का देहरादून चेकअप कराने में सहयोग करे,” रजनी कहती हैं।

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रजनी ने बताया, प्रिंस को गांव से मंगाकर दूध पिला रहे हैं, जो उसको नहीं पच पा रहा है। वह रातभर रोता है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उषा बताती हैं, उस रात रजनी और उनके परिवार के साथ मैं भी अपने डेढ़ वर्षीय बच्चे को लेकर यहां पहुंची। ईश्वर का शुक्र है कि हम सभी बच गए। प्राइमरी स्कूल के दो कमरों में 28 लोग हैं, जिनमें 15 महिलाएं, छह पुरुष और सात बच्चे हैं।

टिहरी गढ़वाल जिला के धनोल्टी क्षेत्र में स्थित चिफल्डी गांव में आपदा के बाद से प्रभावित परिवार तौलिया काटल के प्राइमरी स्कूल भवन में रह रहे हैं। फोटो- राजेश पांडेय

इस मामले में न्यूज लाइव ने टिहरी गढ़वाल के जिलाधिकारी डॉ. सौरभ गहरवार से संपर्क किया। उनका कहना है, गांव में चेकअप के लिए कल (बुधवार को) भी डॉक्टर गए थे। कल फिर (शुक्रवार को) डॉक्टर्स की टीम चिफल्डी गांव जाएगी। बच्चे का समुचित उपचार किया जाएगा, यदि किसी भी प्रकार की कोई इमरजेंसी की स्थिति होती है तो उसी के अनुसार व्यवस्था होगी। परिवार को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

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जिलाधिकारी का कहना है, नदी में पानी कम होने पर चिफल्डी गांव के आपदा प्रभावित परिवारों को अस्थाई रूप से किसी सुविधाजनक स्थान पर भेजेंगे। टिहरी गढ़वाल जिले से आपदा प्रभावित कुछ गांवों में यह व्यवस्था की गई है। जब प्रभावितों के गांव में सभी व्यवस्थाएं, सुविधाएं सुनिश्चित हो जाएंगी, उनको वापस स्थाई रूप से ले आएंगे। प्रभावितों को आवास को पहुंचे नुकसान के अनुसार मुआवजा दिया जा रहा है। राहत सामग्री गांवों तक भेजी जा रही है। प्रभावित गांवों का भूगर्भीय सर्वे कराया जाएगा। सर्वे रिपोर्ट में यदि कोई गांव रहने लायक नहीं पाया जाएगा, तो शासन से पुनर्वास की संस्तुति की जाएगी।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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