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Uttarakhand: दो लीटर दूध बेचने के लिए रैजा देवी का संघर्ष, बाघ और हमारा रास्ता एक ही है

सुबह चार बजे दूध लेकर पहाड़ की पगडंडियों से होते हुए अगस्त्यमुनि पहुंचती हैं रैजा देवी

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

रुद्रप्रयाग के बुडोली गांव की रैजा देवी पशुपालन और खेतीबाड़ी करती हैं। सुबह चार बजे दो लीटर दूध लेकर पहाड़ की ऊबड़ खाबड़ पगडंडियों से होते हुए सिल्ली और फिर अगस्त्यमुनि के गंगानगर इलाके में पहुंचती हैं। पचास रुपये प्रति लीटर के रेट पर दो लीटर दूध बेचने के लिए रैजा देवी का यह रोज का काम है और इसके लिए उनको हर मौसम में दस किमी. पैदल चलना पड़ता है। बुडोली से सिल्ली के रास्ते में उनको गुलदार, जिसे स्थानीय लोग बाघ कहते हैं, अक्सर दिखता है। बाघ दिखता है तो क्या करते हो, पर हंसते हुए कहती हैं, “जब वो पीछे से आता है तो हम भागते हैं, हम भाग जाते हैं और क्या करेंगे, कई बार लगता है कि हमारी जान खतरे में है।”

महिलाओं के मुद्दों पर संवाद के दौरान रैजा देवी बताती हैं, दूध लेकर मैं अकेली नहीं जाती। गांव के तीन-चार औरतें और एक-दो आदमी और हैं। हम सभी एक साथ जाते हैं, पर बाघ का डर तो रहता ही है। आज (20 जुलाई, 2022) भी रास्ते में बाघ दिखाई दिया।

क्या आप अपना रास्ता नहीं बदल सकते ?, पर रैजा का जवाब था, “रास्ता तो एक ही है, बाघ का रास्ता भी वही है, हमारा रास्ता भी वही है। जब भी वो हमारे रास्ते से गुजरता है तो बहुत डर लगता है। वो सीधा हमारे पीछे आता है, खाने के लिए। भागते हैं, हम भाग जाते हैं।”

रैजा बताती हैं, वो किन्हीं और का भी, दो लीटर दूध शहर तक पहुंचाती हैं, जिसके लिए हर महीने प्रति लीटर के हिसाब से दो सौ रुपये मिलते हैं। कुल मिलाकर रैजा देवी को प्रति माह 3400 रुपये की आय होती है। इतनी कम राशि के लिए कड़ी मेहनत करने वालीं, जोखिम उठाने वालीं रैजा को किसी से शिकायत नहीं है।

वो अगस्त्यमुनि से गांव लौटकर फिर से खेतों में चली जाती हैं, घास लाने के लिए। यह उनका रोजाना का काम है, भले ही कितनी बारिश हो या धूप या फिर सर्दी ही क्यों न हो। बताती हैं, उनको पशुओं को पालना है, इसलिए घास तो लानी ही होगी।

रुद्रप्रयाग के बुडोली गांव की सड़क से नीचे ढलान से घास लेकर आती महिला। फोटो- राजेश पांडेय

हम जब, तिलवाड़ा से बुडोली गांव की ओर से जा रहे थे, रास्ते में कुसुम रावत पहाड़ के ढलान पर दरांती से घास काटते हुए मिलीं। पास में ही उन्होंने सोल्टी (घास रखने की कंडी) रखी थी। कुसुम ने बताया, और भी महिलाएं ढलान पर घास लेने गई हैं। यहां घास के लिए काफी दिक्कत होती है। हमने देखा, रैजा देवी, गुड्डी रावत और बेबी देवी घास से भरीं कंडियां लेकर ढलान से सड़क की ओर चढ़ रही हैं। यह देखकर आप दिल से कहेंगे, पहाड़ की महिलाएं बहुत मेहनत करती हैं।

आप सुबह से लेकर देर शाम तक मेहनत करते हो, अपने लिए समय कैसे निकालते हो। क्या आप गाने सुनना पसंद करते हो। रैजा देवी हंसते हुए कहती हैं, हम अपने लिए समय निकाल लेते हैं। मैं गाने भी सुनती हूं। बेबी देवी बताती हैं, जब भी समय मिलता है, हम एक दूसरे के घर इकट्ठा हो जाती हैं। बातें करती हैं।

रुद्रप्रयाग जिले के कुमड़ी ग्राम पंचायत के बुडोली गांव में पशुपालन के लिए घास जुटातीं रैजा देवी, गुड्डी देवी, कुसुम रावत एवं एक अन्य महिला। फोटो- राजेश पांडेय

क्या आपके गांव तक कोई गाड़ी नहीं आ सकती, जो सभी गांववालों से दूध लेकर शहर में बिक्री करे, पर महिलाएं कहती हैं, यहां कोई गाड़ी नहीं आती। सभी तो दूध लेकर शहर जाते हैं।

कांति रावत का कहना है, गाड़ी आने के लिए सड़क भी तो अच्छी होनी चाहिए। गांव तक सड़क नहीं है, कच्चा रास्ता तो आपने देखा ही होगा।

अंजू देवी बताती हैं, ऐसा नहीं है कि पशुपालन घाटे का सौदा है। यह आजीविका का बड़ा स्रोत है। कोई बचत भी करता है। यहां जो आप मकान देख रहे हो, वो सभी गांववालों ने दूध बिक्री से ही बनाए हैं। पहले लोग नौकरी वाले नहीं होते थे। यहां अधिकतर परिवार दुग्ध व्यवसाय पर निर्भर रहे। गांव में पहले डेयरी की गाड़ी आती थी। डेयरी वाले कम पैसे देते हैं। वो दूध को जांच करने के बाद ही लेते हैं। थोड़ी भी कमी होने पर दूध वापस कर देते थे। इसलिए अधिकतर गांववाले खुद ही शहर तक दूध पहुंचा रहे हैं। डेयरी की गाड़ी अब नहीं आती।

“हर परिवार से एक व्यक्ति सुबह चार बजे दूध लेकर शहर चला जाता है। छह बजे तक घर आ जाता है। कोई दो लीटर, कोई तीन लीटर के हिसाब से दूध ले जाता है। ऐसा नहीं है कि सभी एक साथ दूध इकट्ठा करके ले जाएं। लोग यहां से सिल्ली होते हुए अगस्त्यमुनि, गंगानगर तक जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो किन्हीं और के माध्यम से दूध शहर तक पहुंचाते हैं, इसलिए प्रति लीटर के हिसाब से प्रति माह दो-ढाई सौ रुपये किराया देते हैं, ” अंजू देवी ने बताया।

रुद्रप्रयाग के बुडोली गांव में महिलाओं से संवाद। फोटो- हिकमत सिंह रावत

क्या दो या तीन लीटर दूध बेचने वाले पशुपालक प्रति माह तीन से साढ़े चार हजार रुपये कमाने के लिए सुबह से लेकर शाम तक पशुपालन में व्यस्त रहते हैं। वहीं, उनको हर मौसम में रोजाना दस से पंद्रह किमी. पैदल भी चलना पड़ता है, कभी घास लाने के लिए, कभी पशुओं को चराने के लिए, इस सवाल पर कांति रावत का कहना है, और क्या करें, कोई साधन नहीं है। जिनके यहां कमाने वाले नहीं होंगे, वो क्या करेंगे। उनको इसी तरह मेहनत करनी होगी। यहां तो जो दूध लेकर शहर में बेचने के लिए जाता है, उसे ही पशुओं के लिए घास पत्ती जुटानी पड़ती है। खेतीबाड़ी और घर के कामकाज अलग से। यहां अधिकतर महिलाएं ही पशुपालन और खेतीबाड़ी करती हैं।

बुजुर्ग पार्वती देवी बताती हैं, पशुओं पर भी काफी खर्च करना होता है। जो पशुओं के दूध से आय होती है, उसमें से अधिकतर पशुओं पर ही खर्च होती है। उनको चावल, आटा, सूजी, गुड़ भिगोकर खिलाते हैं। जिस तरह आप अन्न खाते हैं, उसी तरह पशुओं को भी खाने को चाहिए। जो कमाते हैं, वही पशुओं पर खर्च कर देते हैं।

गुड्डी रावत जंगल से घास लाने, पेड़ों पर चढ़ने के दौरान क्या डर नहीं लगता है, के सवाल पर कहती हैं, जंगल जाकर घास लाना हमारी मजबूरी है। ऊपर से पत्थर गिरने का डर रहता है। पिछले साल सावन के महीने में घास के लिए गई महिला पर चीड़ की लकड़ी गिर गई। कांति ने बताया, जंगल में घास लेने के लिए गई महिलाओं के साथ दो तीन घटनाएं हो चुकी हैं। पिछले साल ऊपर से टहनी गिरी, एक महिला की मृत्यु हो गई थी।

आपको घास, चारा पत्ती के लिए जंगल में नहीं जाना पड़े, इसका कोई विकल्प है, पर महिलाएं एक साथ जवाब देती हैं, कोई विकल्प नहीं है। बारिश हो, धूप हो, चढ़ाई हो या उतराई हो, जंगल तो जाना ही पड़ता है। कुसुम रावत बताती हैं, यहां आसपास घास की बहुत दिक्कत है। पेड़ पर चढ़कर चारा पत्ती काटने होते हैं। क्या आपको डर नहीं लगता, पर कुसुम कहती हैं, अब तो आदत हो गई है। 15 साल की आयु से घास पत्ती जुटा रहे हैं। बारिश कितनी भी हो, घास के लिए जाना ही है। पार्वती देवी रावत बताती हैं, खेतों में घास भी नहीं मिलता। सूअर, बंदर खेतों को बर्बाद कर रहे हैं।

उत्तराखंड की आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22 की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2022 तक रुद्रप्रयाग जिले में दुग्ध समितियों की संख्या राज्य में सबसे कम 40 है, जबकि महिलाओं की समितियां मात्र 60 है, जो कि सभी 13 जिलों में सबसे कम है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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