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उत्तराखंड में प्रियंका का नारा कितना बुलंद करेगी कांग्रेस

कांग्रेस के लड़की हूं, लड़ सकती हूं अभियान की पोस्टर गर्ल भाजपा में शामिल

देहरादून। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में लड़की हूं, लड़ सकती हूं, नारा बुलंद किया और यूपी चुनाव में कांग्रेस इसी थीम पर चुनाव लड़ रही है, पर कांग्रेस के चुनावी अभियान को उस समय धक्का लगा, जब उनके इस नारे की पोस्टर गर्ल डॉ. प्रियंका मौर्य भाजपा में शामिल हो गईं। उत्तराखंड में भी कांग्रेस को ऐसा ही एक और झटका तब लगा, जब महिला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सरिता आर्य ने भाजपा की सदस्यता ही नहीं ली, बल्कि उनको नैनीताल सीट से प्रत्याशी भी बना दिया गया।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने टिकटों के बंटवारे में महिलाओं को प्रमुखता दी है, जैसा कि प्रियंका गांधी ने 40 फीसदी टिकट महिलाओं को देने की घोषणा की है, पर उत्तराखंड में कांग्रेस इस नारे को कितना बुलंद कर पाएगी, यह तो प्रत्याशियों के नामों की लिस्ट देखने पर ही कहा जा सकेगा।

उत्तराखंड में भाजपा ने प्रत्याशियों की पहली लिस्ट में 59 नामों की घोषणा की है, जिनमें छह महिलाएं शामिल हैं, जबकि तीन का टिकट काट दिया है। ऐसे में अभी तक भाजपा तो मात्र दस फीसदी महिलाओं को ही टिकट दे पाई। पर, क्या कांग्रेस उत्तराखंड में महिला दावेदारों की संख्या को भाजपा से ज्यादा करेगी, यह देखना है। यह सवाल इसलिए भी बनता है, क्योंकि यूपी में कांग्रेस 40 फीसदी टिकट महिलाओं को देने की बात कर रही है, इस लिहाज में उत्तराखंड में 28 महिलाओं की दावेदारी बनती है।

2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में 75,92,996 में से महिला मतदाताओं की संख्या 36,02,801 है। वहीं, 2017 के चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या 47 फीसदी थी। पिछले चुनाव में उत्तराखंड की 70 सीटों में से मात्र 41 पर ही महिलाएं चुनाव मैदान में उतरीं। कुल 62 महिलाओं ने चुनाव लड़ा, जिनमें से रायपुर सीट पर सबसे अधिक मात्र चार महिलाएं उम्मीदवार थीं। भाजपा ने पांच, कांग्रेस ने आठ, बसपा ने तीन, सपा ने पांच सीटों पर महिलाओं को उम्मीदवार बनाया था। अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में 30 महिलाओं ने निर्दलीय चुनाव लड़ा था। चुनाव में पांच महिलाओं ने विजय हासिल की, जिनमें भाजपा की तीन, कांग्रेस की दो प्रत्याशी शामिल हैं।

उत्तराखंड में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, महिलाओं की आबादी 49.48 लाख है, जबकि पुरुषों की संख्या 52.38 लाख है। वहीं राज्य की 71 फीसदी महिला आबादी गांवों में निवास करती है। राज्य की 65 फीसदी आबादी की आजीविका कृषि है। राज्य में 64 फीसदी महिलाएं अपने खेतों में कृषि करती हैं, वहीं 8.84 फीसदी महिलाएं दूसरों के खेतों में परिश्रम करती हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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