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आपदा प्रभावित चिफल्डी-2ः पता नहीं कब खत्म होंगी डराने वाली रातें

बाढ़ में घर टूटने पर खाली हाथ पहुंचे थे बारिश में भींगते हुए, दो कमरों में 28 लोग रह रहे

चिफल्डी से राजेश पांडेय

ससुराल से 15 किमी. पैदल चलकर तौलिया काटल पहुंची गीता अपनी मां बिमला देवी से मिलते ही रोने लगती हैं। आपदा के बाद से गीता पहली बार अपने मायके वालों से मिलने आई हैं। सारे रास्ते बंद थे, नदियां उफान पर थीं, इसलिए उनको मां के पास तक पहुंचने में एक हफ्ता लग गया।

गीता, टिहरी गढ़वाल के जौनपुर ब्लाक के सेरा गांव में रहती हैं, जहां से इन दिनों तौलिया काटल तक पहुंचना खुद को जोखिम में डालने जैसा है। गीता अपने परिवार के लोगों के साथ, सुबह छह बजे पैदल चलीं और दोपहर साढ़े 12 बजे तक मां बिमला देवी के पास पहुंच पाईं। बताती हैं, हमें उसी दिन पता चल गया था कि लोग बेघर हो गए हैं। उनके पास खाने पीने का सामान तक नहीं है। पर, हम मजबूर थे, क्या कर सकते थे, हम यहां कैसे पहुंचते। गीता अपने साथ, राशन सामग्री भी लेकर पहुंची हैं।

टिहरी गढ़वाल जिले के चिफल्डी गांव के आपदा प्रभावित परिवार तौलिया काटल के प्राइमरी स्कूल भवन में रह रहे हैं, गांव के लोग उनके लिए राशन सामग्री लेकर पहुंच रहे हैं। फोटो- राजेश पांडेय

गीता की मां बिमला देवी ने पति प्रताप सिंह, तीन बेटों, पुत्र वधुओं और उनके बच्चों के साथ प्राइमरी स्कूल में शरण ली है। कहती हैं,  मैंने यहां कभी ऐसी आपदा नहीं देखी। गांव की आजीविका खेतीबाड़ी और पशुपालन पर टिकी थी। अब तो सबकुछ बर्बाद हो गया। हमारे पशु और घर में रखा सामान बाढ़ में बह गए। हमारे मकान में 11 कमरे थे, पर अब कुछ नहीं बचा। 19 अगस्त की रात तेज बारिश में हम छोटे-छोटे बच्चों को लेकर यहां इतनी ऊंचाई पर दौड़ते हुए पहुंचे। सब पूरी तरह भींगे हुए थे। हम सब खाली हाथ थे।

तौलिया काटल का प्राइमरी स्कूल भवन नदी से थोड़ा ऊँचाई पर है, जो चिफल्डी गांव से लगभग चार सौ मीटर दूर होगा।

” यहां स्कूल के दो कमरों में 28 लोग रह रहे हैं। इनमें छह पुरुष, 15 महिलाएं और सात बच्चे हैं। पूरे इलाके में आपदा के बाद से ही बिजली गायब है। रात को यहां उमस रहती है, दिन में तेज धूप। रातभर मच्छर परेशान करते हैं और जंगली जानवरों, खासकर भालू का डर रहता है। पानी की व्यवस्था भी, एक हफ्ते बाद हो पाई है। यहां इन हालात में हमें कब तक रहना पड़ेगा?”, 52 वर्षीय बिमला पंवार यह सवाल उठाती हैं।

उनका कहना है, हमें यहां कब तक रहना पड़ेगा, नहीं मालूम। कुछ दिन में स्कूल खुल जाएगा, तब हम यहां से कहां जाएंगे। हमारे पास कपड़े तक नहीं हैं। गांववालों ने जो कपड़े दिए, उन्हीं को पहन रहे हैं। उनका पौत्र प्रिंस मात्र पांच माह का है, जिसकी दवा चल रही है। पेट में दर्द से प्रिंस रातभर रोता है। वो चाहते हैं, जल्द से जल्द प्रशासन हमें सुरक्षित एवं सुविधाजनक स्थान पर पहुंचा दे।

टिहरी गढ़वाल के चिफल्डी गांव में आपदा प्रभावित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उषा, तौलिया काटल के प्राइमरी स्कूल भवन में। फोटो- गजेंद्र रमोला

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ऊषा बताती हैं, मैं गांव में ही किराये के कमरे में रहती हूं। मैं भी अपने डेढ़ साल के बच्चे के साथ तेज बारिश में स्कूल तक दौड़ी थी। जब हम स्कूल में पहुंचे तो पता चला कि हमारे पास यहां के कमरों की चाबियां नहीं हैं। अब हम वहां वापस नहीं जा सकते थे। चाबियां तो वैसे भी नहीं मिलती, क्योंकि सबकुछ बाढ़ में बह रहा था। हमें दो कमरों के तालों को तोड़ना पड़ा। बिजली नहीं थी और हम पूरी रात भींगे कपड़ों में बैठे रहे। सुबह देखा तो हमारे घर टूटे पड़े थे। नदी पूरे गांव में बह रही थी।

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“यहां की रसोई आंगनबाड़ी केंद्र भवन की ओर है, जहां रात को अकेले जाने में डर लगता है। जब महिलाएं खाना बनाती हैं, तब पुरुषों को वहां रहना पड़ता है, क्योंकि बिजली नहीं होने से रात को यहां अंधेरा हो जाता है। एक बार तो यहां स्कूल के वक्त भालू पास ही दिखाई दिया। बच्चों को उस दिन कमरे में ही रखा गया। कई दिन तक भालू का डर सताता रहा। गांव के वीर सिंह पर भी भालू ने हमला किया था,” ऊषा ने बताया।

उधर, टिहरी के जिलाधिकारी डॉ. सौरभ गहरवार का कहना है, नदी में पानी कम होने पर चिफल्डी गांव के आपदा प्रभावित परिवारों को अस्थाई रूप से किसी सुविधाजनक स्थान पर भेजेंगे। टिहरी गढ़वाल जिले से आपदा प्रभावित कुछ गांवों में यह व्यवस्था की गई है। जब प्रभावितों के गांव में सभी व्यवस्थाएं, सुविधाएं सुनिश्चित हो जाएंगी, उनको वापस स्थाई रूप से ले आएंगे। प्रभावितों को, आवास को पहुंचे नुकसान के अनुसार मुआवजा दिया जा रहा है। राहत सामग्री गांवों तक भेजी जा रही है।

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देहरादून शहर से लगभग 35 किमी. दूर चिफल्डी गांव (ग्वाल डांडा) में आपदा से खेतीबाड़ी, मकान तबाह हो गए, जो घर बचे भी हैं, उनमें मलबा भर गया या नदी के प्रवाह क्षेत्र में आकर हमेशा के लिए खतरे की जद में आ गए। गांव वाले बताते हैं, 19 अगस्त, 2022 की रात जैसा कहर गांव पर पहले कभी नहीं बरपा। चिफल्डी नदी तो गांव से काफी नीचे बहती थी, पर अब नदी ने पूरे गांव में विस्तार ले लिया है। वहीं, ऊपर पहाड़ से आ रहा गदेरा भी कम कहर नहीं बरपा रहा है।

टिहरी गढ़वाल की धनोल्टी विधानसभा के गांव चिफल्डी में सोबन सिंह, जिनके घर को नदी और गदेरे दोनों से खतरा है। फोटो- राजेश पांडेय

इस गदेरे से थोड़ा दूरी पर सोबन सिंह का मकान है। सोबन सिंह खेतीबाड़ी व पशुपालन करते हैं। बताते हैं, पहले कभी इस गदेरे में इतना पानी नहीं आया। 19 तारीख की रात का जिक्र करते हुए सोबन बताते हैं, मलबा घर की निचली मंजिल में घुसने लगा, जिसमें हमारे पशु रहते हैं और अनाज रखा जाता है। किसी तरह पशुओं को बाहर निकालकर थोड़ा ऊंचाई पर ले गए। उन्होंने पत्नी चमनी देवी के साथ घर छोड़ दिया और पास ही एक पहाड़ी की ओट में खड़े हो गए। इस समय उनके साथ गांव के कुछ लोग और थे।

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बताते हैं, जहां हम लोग खड़े थे, वहां तक गदेरे का पानी आने लगा। हम घबराकर थोड़ा आगे बढ़ गए। पूरी रात बारिश में ही गुजारी। सोबन के अनुसार, गदेरे का पानी उनके मकान तक पहुंचा रहा है।

आपदा के बाद से बंद हैं रास्ते  

टिहरी गढ़वाल जिले की ग्राम पंचायत तौलिया काटल की आबादी लगभग साढ़े चार सौ के आसपास बताई जाती है। इसके मजरे चिफल्डी गांव, जहां बाढ़ से काफी तबाही मची है, लगभग डेढ़ सौ से दो सौ की आबादी प्रभावित हुई है। गांव तक आने जाने के सुरक्षित रास्ते एक सप्ताह बाद भी बंद हैं। चिफल्डी नदी का लगभग 30 साल पुराना पुल भी बह गया। इसी पुल से गांव देहरादून से जुड़ा था। उधर, तौलिया काटल के राजेश पंवार बताते हैं, बाढ़ से कई मकानों को नुकसान पहुंचा है। तीन चार मकान खतरे की जद में हैं। सौंदड़ा में सौंग नदी पर बनी ट्रालियां, जिनको स्थानीय लोग गरारी कहते हैं, बाढ़ में बह गईं। इन ट्रालियों में बैठकर ही नदी पार की जाती थी।

चिफल्डी तक पहुंचना खतरे से खाली नहीं

धनोल्टी विधानसभा के इस हिस्से तक पहुंचने के लिए देहरादून से पहले मालदेवता, कुमाल्डा होते हुए दुबड़ा गांव तक पहुंचना होगा। दुबड़ा से चिफल्डी जाने के लिए लगभग चार किमी. तक उस रास्ते पर चलना होगा, जो अभी बन रहा है। नियो विजन के संस्थापक गजेंद्र रमोला के साथ, हमने चिफल्डी गांव के ऊपरी हिस्से के खेतों की पगडंडियों को पार किया।

दुबड़ा से होते हुए चिफल्डी नदी तक पहुंचने के लिए इस तरह का रास्ता है, जो एक बड़े नाले के किनारे से होता हुआ जाता है। नियोविजन के संस्थापक गजेंद्र रमोला चिफल्डी गांव तक जाते हुए। फोटो- राजेश पांडेय

कुछ घरों के सामने से होते हुए शुरू होता है, वो जोखिमभरा रास्ता, जो पहाड़ से आ रहे खाले के किनारे होते हुए चिफल्डी नदी तक पहुंचाता है। बड़े पत्थरों और बजरी के ढेरों पर पैरों को काफी संभालकर रखना पड़ रहा था। पैरों के नीचे से बजरी खिसकने का डर बना था। यह खाला, तबाही वाले दिन कितना रौद्र होगा, यहां बिखरे पड़े बड़े पत्थरों और पेड़ों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां थोड़ा आगे बढ़ते हैं, तो रास्ता बंद मिलता है, फिर खोजनी पड़ती है, वो जगह जहां से चिफल्डी नदी तक पहुंचा जा सके। जोखिम उठाते हुए चिफल्डी के पास तक पहुंच गए। इस खाले के बहाव को नियंत्रित करने के लिए लगाए गए बड़े पत्थरों की जालियां, पुस्ते सबकुछ तो तबाह हो गए।

देहरादून से चिफल्डी गांव तक पहुंचने के लिए चिफल्डी नदी को पार करना होगा, जिसके किनारे पड़े बड़े पेड़ों और पत्थरों को देखकर बाढ़ की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। फोटो- राजेश पांडेय

ग्रामीण कमल सिंह, जो चिफल्डी (ग्वाल डांडा) के ही रहने वाले हैं, हमें नदी के इस छोर पर ही मिल जाते हैं। नदी से कुछ ऊंचाई पर धान के खेत लहलहा रहे हैं। पर, जैसे ही नदी के पास जाने के लिए नीचे उतरते हैं, आपदा कितनी भयावह थी, साफ पता चल जाता है। इन दिनों नदी में पहले की तरह ज्यादा पानी नहीं है, इसलिए इसको पैदल पार कर सकते हैं, कमल सिंह हमें यह जानकारी देते हैं। पर, हमारे हिसाब से नदी को इस समय पार करने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए।

चिफल्डी नदी के किनारे बड़े पेड़ों, चट्टानों जैसे पत्थरों से भरे पड़े है। हमारे अनुसार, पानी अभी भी तेज है। कमल हमें चिफल्डी गांव ले जाने के लिए हाथ पकड़कर नदी पार कराते हैं। तेज बहाव के बीच आपके पैरों पर टकराते पत्थर साफ महसूस होते हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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