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कांगड़ में पेड़ काटने आए मजदूरों ने कुल्हाड़ी छोड़ गैंती फावड़े उठाए

  • प्रदीप बहुगुणा
  • लेखक श्री सुंदर लाल बहुगुणा के सुपुत्र एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।
प्रख्यात पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा के सिल्यारा आश्रम के ऊपर धार गांव कांगड़ के जंगल में पेड़ काटने आए श्रमिकों ने बहुगुणा की अपील पर न केवल कुल्हाड़ियां छोड़ दीं, बल्कि गैंती और फावड़े उठा लिए और गोरियासौड़ में फलदार पौधे रोप कर उनकी सुरक्षा के लिए पत्थरों की दीवार बनाने में जुट गए। बहुगुणा ने उनसे नारे लगवायेः- वृक्षारोपण कार्य महान, एक वृक्ष 10 पुत्र समान।
चिपको की वजह से हेंवल घाटी में ठेकेदार के माध्यम से पेड़ कटाने में असफल रहने पर वन महकमे ने टिहरी जिले के भिलंगना ब्लाॅक में वन निगम के द्वारा स्थानीय लोगों के माध्यम से पेड़ों को कटाने की योजना बनाई।
अकेले धार गांव में चीड़ के 740 पेड़ काटने के लिए छापे गए थे। सिल्यारा गांव के ही पांच लोगों शक्ति प्रसाद, केदार सिंह, मोर सिह और सुंदर सिंह और सुरेशानंद को कर्मचारी बनाया और मजदूर भी स्थानीय रखे। लेकिन वे कांगड़ के ऊपर धार गांव के जंगल में चीड़ के पेड़ों का कटान शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। तब डीएफओ बहुगुणा के ही पैतृक गांव सिराईं के बीडी रतूड़ी थे। वे वन निगम के अधिकारी अमर सिंह के साथ चमियाला आए। उन्होंने कर्मचारियों को वन कटान के लिए प्रोत्साहित किया।
तय किया गया कि दिसंबर में जब बहुगुणा दंपति अपनी बेटी मधु की शादी के लिए ऋषिकेश जाएंगे तो पेड़ कटान का श्रीगणेश कर दिया जाए। 3 दिसंबर को शिवानंद आश्रम मुनिकीरेती ऋषिकेश में मधु की शादी थी। 30 नवंबर को जैसे ही बहुगुणा की धर्मपत्नी विमला बहुगुणा बेटी को लेकर ऋषिकेश के लिए निकली। तभी सिल्यारा से निगम के कर्मचारी धार गांव पहुंचे और 1 दिसंबर से पेड़ काटने का काम शुरू कर दिया।
बकौल केदार सिंह, रात को भी गैस जलाकर मजदूर पेड़ गिराते रहे। मधु की शादी में शामिल होने घूम सिंह नेगी और प्रताप शिखर को भी जाना था। लेकिन जैसे ही उन्हें वन कटान की सूचना मिली, वो 2 दिसंबर को जंगल पहुंच गए। उन्होंने मजदूरों से पेड़ नहीं काटने की अपील की। मजदूर नहीं माने तो धूम सिंह नेगी ने वहीं एक झोपड़ी में डेरा डाल दिया और उपवास शुरू कर दिया। प्रताप शिखर आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने चमियाला लौट गए।
तीन दिसंबर को इंटर काॅलेज फतेपुर लाटा से कुछ छात्र साब सिंह, अब्बल सिंह, सरोप सिंह आदि प्रताप शिखर के साथ जंगल पहुंचे, लेकिन मजदूर काफी संख्या मे थे, ऐसे में वे उन्हें पेड़ कटाने से नहीं रोक पाए। उधर बासर से जंगल घास काटने आईं महिलाओं ने जब धार गांव में पेड़ काटने की सूचना गांव में दी तो बहुगुणा के सहयोगी दलेब सिंह के नेतृत्व बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष ढोल बाजों के साथ 5 दिसंबर को धार गांव पहुंच गए।
उधर, सुंदर लाल बहुगुणा को जब धार गांव में पेड़ काटे जाने की सूचना मिली तो वे बेटी को विदा किए बिना ही जंगल लौटने की जिद करने लगे। विमला बहुगुणा के अनुसार उनके आध्यात्मिक गुरु स्वामी चिदानंद के निर्देश पर वे 4 दिसंबर को बेटी को रेल से वाराणसी के लिए विदा कर 5 दिसंबर को अंधेरे में ही धार गांव के लिए निकल पड़े।
पांच दिसंबर को वे भी धार गांव पहुंच गए। बकौल केदार सिंह रौतेला तब तक मजदूर 298 पेड़ काट चुके थे। सुंदर लाल बहुगुणा और बड़ी संख्या में ग्रामीणों के जंगल पहुंचते ही मजदूर डर गए। महिलाओं ने स्थानीय मजदूरों को पेड़ काटने के लिए धिक्कारा और चेतावनी दी कि यदि वे अब पेड़ काटने की जुर्रत करेंगे तो वे घास काटने के लिए लायी गयी रस्सी से उन्हें पेड़ों पर बांध देंगीं। ग्रामीण पेड़ों पर चिपक गए और नारे लगाने लगे:-
 आज हिमालय जागेगा, क्रूर कुल्हाड़ा भागेगा।
 क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी पानी और बयार।
मिट्टी पानी और बयार जिंदा रहने के आधार।
उस दिन जुलूस में लस्याल गांव, केपार्स, सिलुड़ी, मांदरा, गडारा के ग्रामीण थे। ग्रामीणों का नेतृत्व रघुनाथी देवी, सुबदेई, सित्ता देवी, सुंदरा देवी, सत्येश्वर प्रसाद आदि कर रहे थे। दलेब सिंह सजवाण का तो पूरा परिवार ही जुलूस में शामिल था। फौज में मोर्चे पर तैनात उनका बड़ा लड़का सूरत सिंह भी उन दिनों छुट्टी पर घर आया था तो वह भी पेड़ बचाने की लड़ाई में शामिल हो गया।
साभार- प्रदीप बहुगुणा
दूसरे दिन 6 दिसंबर को बासर के अलावा केमर, चमियाला, इन्वाण गांव और कांगड़ से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण पेड़ों को कटने से बचाने के लिए धार गांव के जंगल पहुंच गए। केमरा से वाचष्पति मैठाणी और लाटा से प्रताप शिखर छात्रों का जुलूस लेकर वहां पहुंचे। बूढ़ाकेदार से धर्मानंद नौटियाल और बिहारी लाल नौल बासर के छात्र और ग्रामीणों का जुलूस लेकर पहुंचे।
वहां हुई सभा में मजदूरों ने पेड़ न काटने का संकल्प लेकर कुल्हाड़ियां बहुगुणा के समक्ष डाल दीं। सुंदर लाल बहुगुणा ने उनसे पेड़ काटने की बजाय पेड़ लगाने में जुटने को कहा।
बहुगुणा ने श्रमिकों से नारे लगवाएः-
वृक्षारोपण कार्य महान, एक वृक्ष दस पुत्र समान।
जिसे मानते हुए मजदूर गोरियासौड़ में गड्ढे खोदकार फलदार पौधे रोपने और उनकी सुरक्षा के लिए पत्थरों की दीवार बनाने में जुट गए। पेड़ों को बचाने के लिए वन सुरक्षा समिति बनायी गयी। इसमें पेड़ काटने के लिए आए वन श्रमिकों को भी शामिल किया गया।
समिति का अध्यक्ष दलेब सिंह, उपाध्यक्ष सत्येश्वर प्रसाद, मंत्री सूरत सिंह, संयुक्त मंत्री  गबर सिंह, कोषाध्यक्ष कलम सिंह और सदस्य सदानंद, बचन सिंह, बाग सिंह, सूरत सिंह और विशन दास आदि को बनाया गया।
बहुगुणा ने एक मजदूर के हाथों धूम सिंह नेगी का उपवास तुड़वाया और अगले दिन से वहां श्रीमद्भागवत कथा के आयोजन की घोषणा की। सात दिसंबर से गजा कू चैतरा में भिलंग के नत्थी लाल शास्त्री ने भागवत कथा प्रवचन शुरू कर दिया। लोक कवि जीवानंद श्रीयाल भी वहां पहुंच गए। अपने गढ़वाली गीतों के माध्यम से उन्होंने लोगों में वनों के प्रति चेतना जगाने का काम किया।
श्रीयाल के गानों के बोल थेः न लाच्या न लाच्या यूं डाल्यों नी लाच्या र पराण जतना यी काचा ।
साभार- प्रदीप बहुगुणा
जब स्थानीय मजदूरों ने बहुगुणा के समक्ष अपनी कुल्हाड़ियां डाल दीं और गैंती फावड़े लेकर वन संरक्षण के कार्य में जुट गए तो वन निगम ने दूसरे इलाके के मजदूरों को लाकर पेड़ कटवाने का प्रयास किया, लेकिन पेड़ बचाने का संकल्प ले चुके स्थानीय ग्रामीणों के विरोध की वजह से इसमें कामयाबी नहीं मिल सकी।
यहां तक कि जो पेड़ काटे गए थे, उनके स्लीपर तैयार करने का काम भी निगम को चोरी छिपे करवाना पड़ा। केवल 200 स्लीपर ही जंगल से बाहर निकल पाए। इससे वन निगम व स्थानीय ठेकेदारों को भारी नुकसान सहना पड़ा। इससे बाद में भिलंगना ब्लाॅक के ही सेमल्थ और पोखार के लॉटों में कटान वन विभाग को निरस्त करना पड़ा।
इस बीच सुंदर लाल बहुगुणा समेत उनके बाकी सहयोगी बडियार गढ़ का जंगल बचाने चले गए तो प्रताप शिखर ने अकेले ही मोर्चा संभाल लिया। उन्हें अकेला देख कर ठेकेदार ने उन पर हमला कराने का भी प्रयास किया, लेकिन ग्रामीणों के विरोध की वजह से ठेकेदार अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाए। ग्रामीण जंगल की लगातार चौकसी करते रहे। बीच-बीच में सुंदर लाल बहुगुणा की बेटी मधु और वाचस्पति मैठाणी पर्वतीय नव जीवन मंडल और केमरा स्कूल के बच्चों के साथ जंगल में  में पेड़ कटान के प्रयासों को विफल करते रहे।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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