By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Reading: मौत के मुंह से पानी लेकर आता है देहरादून का यह गांव
Share
Notification Show More
Font ResizerAa
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
Font ResizerAa
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Advertise
  • Advertise
© 2022 Foxiz News Network. Ruby Design Company. All Rights Reserved.
- Advertisement -
Ad imageAd image
NEWSLIVE24x7 > Blog > Blog Live > मौत के मुंह से पानी लेकर आता है देहरादून का यह गांव
Blog LiveFeaturedUttarakhandVillage Tour

मौत के मुंह से पानी लेकर आता है देहरादून का यह गांव

Rajesh Pandey
Last updated: July 27, 2024 7:19 pm
Rajesh Pandey
3 years ago
Share
देहरादून जिले के डोमकोट गांव में गर्मियों में पानी का संकट छा जाता है। ग्रामीण जोखिम उठाकर घने जंगल में स्थित स्रोत तक पहुंचते हैं। ग्रामीण राकेश ने हमें उस स्रोत तक पहुंचने में मदद की। फोटो- गजेंद्र रमोला
SHARE

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

“गर्मियों में पूरा गांव, पानी के लिए उस स्रोत पर जाने के लिए मजबूर है, जहां जंगली जानवर प्यास बुझाते हैं। हम पानी के लिए वहां इकट्ठे होकर जाते है, कभी वो (जंगली जानवर) हमें देखकर भाग जाते हैं और कभी हम उनको देखकर छिप जाते हैं। वो भी क्या करें, उनको भी पानी पीना है और हम इंसानों को भी,” संपत्ति देवी कहती हैं।

57 साल की संपत्ति देवी, देहरादून जिला के डोमकोट गांव में रहती हैं। खेतीबाड़ी और बकरीपालन उनके परिवार की आजीविका के प्रमुख स्रोत हैं। बकरियां चराने जा रही थीं, तभी उनसे हमारी मुलाकात हुई। संपत्ति हमें, गांव में पानी की कहानी सुनाती हैं। बताती हैं, इन दिनों सर्दियों में तो नलों में पानी आ रहा है, पर गर्मियां बहुत दुखदाई होती हैं। गर्मियों में जिस स्रोत से पानी लाते हैं, उसका रास्ता ऐसा है कि जरा सा पैर फिसला नहीं, सीधा गहरी खाई में।

स्रोत तक जाने का एक और रास्ता है, जो ‘गुफा’ से होकर जाता है। यहां दो बड़ी चट्टानों के बीच रास्ता है, जिसे लोग गुफा कहते हैं। यह रास्ता भी कम जोखिम वाला नहीं है।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से लगभग 25 किमी. दूरी पर मालदेवता से आगे, डोमकोट गांव का कच्चा, ऊबड़ खाबड़ पगडंडीनुमा रास्ता है। बरसात में आपदा के बाद, यह रास्ता भी खराब हो गया था, जिस पर भूस्खलन से बड़े पत्थर गिर गए थे। गांववालों ने खुद ही इस रास्ते को आने जाने लायक बनाया। मालदेवता से छोटी छिमरौली मार्ग से इस गांव के लिए कच्चा रास्ता है।

देहरादून के डोमकोट गांव के कच्चे रास्ते से पहले अपनी दुकान पर सोबन सिंह। फोटो- राजेश पांडेय

इस कच्चे रास्ते के शुरू होने से थोड़ा पहले ही सोबन सिंह चाय और नाश्ते की दुकान चलाते हैं। सोबन और अन्य ग्रामीण गांव तक सड़क पहुंचाने के लिए जनप्रतिनिधियों से कई बार पत्राचार कर चुके हैं।

ऊंचाई पर करीब दो से ढाई किमी. पैदल चलने के बाद सरौना ग्राम पंचायत के डोमकोट गांव में पहुंचते हैं। डोमकोट गांव के राकेश खंदियाल, जो खेतीबाड़ी और निर्माण कार्यों में श्रम करते हैं, हमें बताते हैं, हमारा गांव सबसे ज्यादा पिछड़ा है, इसकी वजह यहां तक सड़क नहीं होना है। यहां न तो सिंचाई के लिए पानी है और न ही पीने के लिए। गर्मियों में पानी का इंतजाम करना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। राकेश से हमारी मुलाकात, छोटी छिमरौली से पहले एक दुकान पर, उस समय हुई थी, जब हम डोमकोट जाने का रास्ता पूछ रहे थे। राकेश हमें अपने गांव ले गए।

“हम गर्मियों में जिस स्रोत से पानी ढोते हैं, वहां तक पहुंचने की हिम्मत न तो अफसरों के पास है और न ही कोई प्रतिनिधि या पत्रकार वहां पहुंचा है। यहां मीडिया के लोग और विभागों के अधिकारी आते हैं, पर स्रोत वाले रास्ते को देखकर वापस ही लौट जाते हैं। आप भी वहां नहीं जा पाओगे,” राकेश कहते हैं।

गांव में राकेश हमारी मुलाकात अपने भाई राजेश और पिता करीब 65 वर्षीय घनश्याम जी से कराते हैं। राजेश, लॉकडाउन से पहले देहरादून में प्राइवेट जॉब कर रहे थे। अब घर पर ही हैं और खेतीबाड़ी के अलावा, राजमिस्त्री का काम भी करते हैं। जबकि घनश्याम जी, घर पर रहकर खेतीबाड़ी संभालते हैं।

देहरादून जिला के डोमकोट गांव के निवासी 65 वर्षीय घनश्याम। फोटो- राजेश पांडेय

घनश्याम बताते हैं, इन दिनों आप नलों में पानी देख रहे हैं, यह पानी यहां से लगभग पांच किमी. दूर स्रोत से आ रहा है। हम एक टैंक में स्रोत का पानी इकट्ठा करते हैं, जहां से यह गांव तक सप्लाई होता है। आपदा में पेयजल लाइन टूट गई थी, जिसे गांववालों ने कई दिन की मरम्मत के बाद ठीक किया। यहां गर्मियों में सबसे ज्यादा दिक्कत है, क्योंकि तब नलों में पानी नहीं आता। इस स्रोत पर पानी बहुत कम होता है या फिर सूख जाता है।

देहरादून जिले के डोमकोट गांव में ग्रामीण हमें गांव से जलस्रोत (लाल घेरे में) दिखाते हैं, जो काफी गहराई में है और वहां घना जंगल है। फोटो- राजेश पांडेय

राकेश  हमें, गांव से करीब आधा किमी. चलकर उस स्थान पर ले जाते हैं, जहां से बहुत गहराई में घना जंगल दिखता है। इसी जंगल में एक जल स्रोत की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, हम गर्मियों में वहां से पानी लाते हैं। वहां तक जाने के लिए, पहले आपको इस चट्टान में बनाए गए सीढ़ीनुमा रास्ते से नीचे उतरना होगा।

पहली बार तो उस चट्टानी रास्ते को, जो खड्ड की ओर जाता है, देखकर मैं घबरा गया। पर, हम ग्रामीणों की दिक्कतों को सुनने नहीं, बल्कि समझने और कुछ समय उनको जीने के लिए आए थे, इसलिए इस जोखिम को उठाने का मन बना लिया। गजेंद्र रमोला और राकेश ने मुझे सतर्कता से कदम रखने की हिदायत दी। साथ ही, यह आश्वासन भी दिया कि वो मुझे वहां तक पहुंचने में मदद करेंगे।

देहरादून जिले के डोमकोट गांव में गर्मियों में पानी का संकट छा जाता है। ग्रामीण जोखिम उठाकर घने जंगल में स्थित स्रोत तक पहुंचते हैं। गांव निवासी राकेश ने हमें उस स्रोत तक पहुंचने में मदद की। फोटो- गजेंद्र रमोला

एक बार में एक ही व्यक्ति इन टूटी सीढ़ियों पर चढ़ या उतर सकता है। एक तरफ गहरी खाई और दूसरी तरफ चट्टान वाले इस संकरे रास्ते पर लोग, जिनमें महिलाएं, बच्चे, युवा शामिल हैं, कैसे पानी से भरे बरतन लेकर आते-जाते होंगे, सोचकर ही मेरी बेचैनी बढ़ जाती है। क्योंकि इन पर कई बार मैं बैठकर नीचे उतरा हूं।

मैं सोच रहा था, इसी रास्ते से होकर वापस कैसे लौटूंगा। क्या एक बार फिर मुझे जोखिम उठाना पड़ेगा। कभी राकेश तो कभी गजेंद्र रमोला ने मेरा हाथ पकड़कर सीढ़ियों से नीचे उतरने में मदद की।

फिर हम पहुंच गए उस स्थान पर, जो पहले से ज्यादा सुरक्षित था, पर हमें जंगली झाड़ियों के बीच से होते हुए पगडंडी पर आगे बढ़ना था। लगभग दो किमी. का रास्ता लगभग एक घंटे में पार हो सका। रास्ते में पड़े बड़े पत्थरों को चढ़कर पार करना पड़ा।

देहरादून जिले का डोमकोट गांव गर्मियों में घने जंगल में स्थित इस जलधारा पर निर्भर करता है। फोटो- राजेश पांडेय

आखिरकार हम उस स्रोत तक पहुंच गए, जहां तक पहुंचने के लिए ग्रामीण बड़ा जोखिम उठाते हैं। यह झरना है, जो किसी चट्टान से नीचे उतर रहा है। यहां पानी बहुत ज्यादा नहीं है, पर इतना अवश्य है कि दस-बारह परिवारों की प्रतिदिन की पूर्ति हो सके। राकेश बताते है,यहां जंगली जानवर भी पानी पीने आते हैं। इस रास्ते में बघेरा ( गुलदार), भालू, जंगली सूअर और छोटे जीव हैं। हालांकि, सौभाग्य से अभी तक कोई घटना नहीं हुई। यह इसलिए भी, क्योंकि ग्रामीण यहां समूह में पानी लेने के लिए आते हैं।

देहरादून जिला के डोमकोट गांव निवासी संपत्ति देवी। फोटो- राजेश पांडेय

डोमकोट गांव की ही,  संपत्ति देवी बताती हैं, हम लोगों ने यहां जंगली जानवरों को देखा है, पर यह कोई बताने वाली बात इसलिए भी नहीं है, क्योंकि वो जंगल के ही जीव है, इसलिए जंगल में ही रहेंगे। हम ही उनके पानी वाले स्थान तक जाते हैं। कई बार ऐसा हुआ कि वो हमें देखकर भागे और हम उनको देखकर छिप गए।

जंगल वाले पानी के झरने से थोड़ा पहले ही राकेश ने चप्पलें उतार दीं। हाथ जोड़े और फिर पानी पिया। हमने झरने के सामने हाथ जोड़ने की वजह पूछी, तो राकेश बताते हैं, यह भगवान का पानी है। हम गांव वाले किसी भी शुभ कार्य से पहले यहां पूजा भी करते हैं। यह झरना आज से नहीं बल्कि हमारे पूर्वजों के समय से है। वो भी इसको भगवान का पानी कहते थे।

“आप पहले मीडिया वाले हैं, जो हमारे स्रोत तक पहुंचे और इस पूरे रास्ते को देखा। जिस रास्ते से हम लोग यहां आए हैं, इसके अलावा एक और रास्ता है, यहां तक आने के लिए। उस रास्ते में एक गुफा भी है। पर, वो रास्ता थोड़ा लंबा है। जोखिम उतना ही है। गांव के बुजुर्ग लोग, गुफा वाले रास्ते से होकर इस स्रोत तक पहुंचते हैं। हम ग्रामीणों को तो दोनों रास्तों पर चलने की आदत है। आप यहां गर्मियों में आओगे, तो पानी के बर्तन रखे हुए मिलेंगे। इस रास्ते पर पानी से भरे बरतन लेकर जाते हुए लोग दिखाई देंगे,” राकेश कहते हैं।

राकेश हाथ जोड़कर कहते हैं, “हमारी सरकार से मांग है कि हमारे गांव को सड़क और पानी की समस्या से मुक्ति दिला दे। हमें पूरे सालभर पानी मिल जाए, चाहे इस स्रोत से पानी मिले या किसी और से। हम गर्मियों में पानी ढोते-ढोते थक जाते हैं। बच्चों की पढ़ाई का हर्जा होता है। घर के कामकाज प्रभावित होते हैं। कामधंधा छूट जाता है। हम अपने पशुओं को प्यासा नहीं देख सकते।”

देहरादून जिले के डोमकोट गांव के गर्मियों वाले पानी के स्रोत पर सॉफ्टवेयर इंजीनियर गजेंद्र रमोला। फोटो- राजेश पांडेय

नियोविजन संस्था के गजेंद्र रमोला, जो हमारे साथ स्रोत पर पहुंचे थे, का कहना है, “वास्तव में यह रास्ता बहुत खतरनाक है। आते समय अगर मैं हिम्मत खो देता या फिर रास्ते को जोखिम वाला बताकर पीछे हट जाता तो, शायद आप भी यहां नहीं पहुंचते। जब हम यहां नहीं पहुंचते तो इतनी बड़ी समस्या को समझने का अवसर नहीं मिलता। हमने रास्ते में देखा कि जंगली सुअरों ने रास्ते में मिट्टी खोदी हुई थी। जैसा कि गांववाले बता रहे हैं कि पानी ढोते हुए लोगों को यहां शाम तक हो जाती है। यहां जंगली जीवों की आवाजें भी सुनाई देती हैं। हम महसूस कर सकते हैं, ग्रामीणों को कितना हौसला जुटाना होता है।”

देहरादून जिला के डोमकोट गांव में दो चट्टानों के बीच से जाता रास्ता, जिसे ग्रामीण ‘गुफा’ कहते हैं। गुफा के रास्ते से भी ग्रामीण स्रोत से पानी लेकर आते हैं। फोटो- राजेश पांडेय

स्रोत से आते समय हम ‘गुफा’ की तरफ से आए। रास्ते में हमें डोमकोट गांव की दीपा, आरती व लक्ष्मी मिले। दीपा बताती हैं, गर्मियों के दिन में पांच-छह चक्कर पानी के स्रोत तक लगाने पड़ते हैं। पशुओं के लिए भी पानी वहीं से लाना पड़ता है।

देहरादून जिला स्थित डोमकोट गांव में दीपा देवी धनिया की निराई करते हुए। शाम  को दीपा, आऱती और लक्ष्मी के साथ घास लेने के लिए जाते हुए मिलीं। फोटो- राजेश पांडेय

हम घास लेने पास के जंगल में जाते हैं। घास लाने के लिए ‘गुफा’ वाला रास्ता नजदीक है और पानी के लिए चट्टान वाला रास्ता। चट्टान वाला रास्ता कम दूरी का है, पर ज्यादा कठिन है। वैसे, ये दोनोंं ही रास्ते ही मुश्किल वाले हैं। गर्मियों में स्रोत से पानी लाना पूरे गांव की मजबूरी है। एक चक्कर में कम से एक घंटा लग जाता है।

देहरादून के डोमकोट गांव में गुफा के पास सॉफ्टवेयर इंजीनियर गजेंद्र रमोला। फोटो- राजेश पांडेय

हमें स्रोत से वापस लौटने में काफी समय लग गया। शाम हो गई थी। करीब पांच बजे, हम वापस लौटने लगे, उस गांव से जो उत्तराखंड की राजधानी के पास होने के बाद भी, पानी के लिए जोखिम उठा रहा है।

You Might Also Like

AIIMS RISHIKESH ने इतिहास रचा, रोबोटिक सर्जरी से किया लीवर कैंसर का इलाज 
किसान की कहानीः खेती में लागत का हिसाब लगाया तो बैल बेचने पड़ जाएंगे !
मतदाता सत्यापन अभियान से जुड़िये
सीएम पुष्कर सिंह धामी का पंचायत प्रतिनिधियों से संवाद
इन परिवारों को बहुत डराती हैं बारिश वाली रातें
TAGGED:Domkot Village in UttarakhandSustainable Drinking Water Resourceswater resources in Uttarakhandwater scarcity in IndiaWhat causes water scarcity in India?
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp Email Copy Link Print
ByRajesh Pandey
Follow:
newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
Previous Article पशुओं और खेतीबाड़ी को बचाने के लिए 80 साल की मुन्नी देवी का संघर्ष
Next Article पैरों में दर्द सहते, बारिश में भींगने वाले इन स्कूली बच्चों की तरफ भी देखो
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

https://newslive24x7.com/wp-content/uploads/2026/04/CM-Dhami-4-Year-Journey-2026-2-Min-1.mp4

Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun
Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun Doiwala, PIN- 248140
9760097344
© 2026 News Live 24x7| Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?