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यह पहाड़ी प्याज तो बदल रहा जिंदगी

उत्तराखंड में लगभग 4 हजार हेक्टेयर में प्याज की खेती की जा रही है। इसके लिए लगभग 300 कुन्तल बीज की प्रति वर्ष आवश्यकता पड़ती है। पर्वतीय क्षेत्रों के लिए लम्बी प्रकाश अवधि वाली प्याज (पहाड़ी प्याज) को अपनाकर ही अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।

वीएल -3 प्याज विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा से विकसित लम्बी प्रकाश अवधि वाली एक उन्नत प्रजाति है, जिसके बीज की कम उपलब्धता को देखते हुए हिमोत्थान परियोजना ने किसानों द्वारा इस प्रजाति के बीज उत्पादन की दिशा में एक बड़ी पहल की गई, जिसमें विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनसंधान संस्थान का पूरी तरह से तकनीकी सहयोग रहा है।

इसके अन्तर्गत शुरू में (2012-13) हिना व गणेशपुर (उत्तरकाशी) तथा कठपुड़ियाछीना (बागेश्वर) के गांवों में  वीएल-3 प्याज 3 के प्रदर्शन खेती के प्रयास किए गए। इसकी उच्च उत्पादकता (5-6 कुंतल प्रति नाली) और अच्छी भण्डारण क्षमता को किसानों ने काफी सराहा। फलस्वरूप, वर्ष 2013-14 में इस परियोजना में इसके बीज उत्पादन का कामें बड़े स्तर पर शुरू किया गया।

परिणामस्वरूप, वर्ष 2016 में किसानों ने वीएल-3 प्याज का 160 किलोग्राम बीज का उत्पादन किया। इन किसानों को विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा में प्रशिक्षण के माध्यम से बीज उत्पादन के तरीके बताए जाएंगे। समय-समय पर बीज उत्पादन में आने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. निर्मल हेडाऊ ने भी भ्रमण के दौरान प्रशिक्षण दिया।

किसान वी.एल -3 प्याज के बीज उत्पादन के साथ-साथ बड़ी मात्रा में प्याज की पौध का उत्पादन कर रहे हैं। यह आय का एक बड़ा स्रोत साबित हो रहा है। संस्थान के  निदेशक डा. अरुणव पटनायक ने इस प्रयास को प्रदेश के दुर्गम स्थानों में पर्वतीय प्याज के बीज की उपलब्धता बढ़ाने और प्याज उत्पादकों को बीज उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर करने के लिए एक सफल कदम बताया।

हिमोत्थान सोसायटी की निदेशक डा. मालाविका चौहान ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों को उच्च गुणवत्तायुक्त बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए हिमोत्थान वृहद स्तर पर पर्वतीय फसलों के बीज उत्पादन कार्यक्रम को संचालित करेगा। इस संबंध में  डा. राजेन्द्र सिंह कोश्यारी, टीम लीडर, कृषि, हिमोत्थान सोसायटी  (9412107905) तथा डा. निर्मल हेडाऊ, वरिष्ठ वैज्ञानिक, विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा ( 9412017146) से संपर्क किया जा सकता है।

केस स्टडी-1

प्याज बीज उत्पादन बना आमदनी का अच्छा जरिया
कुशुम देवी (43) और उनके पति विजयपाल ग्राम हीना, भटवाड़ी ब्लाक उत्तरकाशी में अपने दो बच्चों के साथ रहते हैं। कुशुम के पति पूर्व में ड्राइवर थे। अब 4 वर्षों से घर पर ही रहकर पत्नी के साथ खेती, पशुपालन में सहयोग कर परिवार चला रहे हैं। कुशुम व उनके पति गांव के आम किसानों की तरह अपने छोटे व छितरे जोतों (कुल 12 नाली सिंचित व 6 नाली असिंचित) में धान व गेहूं की खेती करते आ रहे हैं। वर्ष 2013 में गांव में टाटा ट्रस्ट व हिमोत्थान के सहयोग से हिमालय ट्रस्ट के मार्गदर्शन में पर्वतीय कृषि विकास परियोजना शुरू हुई।

प्रसार कायकर्ता ने महिला किसानों से परियोजना की चर्चा की और उनको एक उत्पादक समूह बनाने के लिए प्रेरित किया। समूह बनाने के बाद कुशुम ने प्याज, मिर्च व धनिया का उत्पादन अपने खेत के छोटे से हिस्से में शुरू किया। चूॅकि परियोजना ने वैज्ञानिक विधि से चयनित नगदी फसलों की खेती को सख्ती से लागू किया था। इश पर विजयपाल कहते हैं पहली बार इस तरह खेती करने में हमें बहुत परेशानी हुई। लेकिन अब बहुत आसानी से खेती कर लेते हैं। जब इस प्रयोग से परिवार ने पहली फसल का उत्पादन देखा तो उन्हें उत्पादन में आशातीत वृद्धि से बहुत आश्चर्य हुआ।

उन्होंने तुरंत निर्णय लिया कि जिन खेतों में धान व गेहूं उगाते थे, उनमें प्याज, धनिया व मिर्च का उत्पादन वैज्ञानिक विधि से करेंगे। विजयपाल के अनुसार विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के वैज्ञानिक डा. निर्मल हेडाऊ, हिमालय ट्रस्ट तथा हिमोत्थान ने उन्हें बीज उत्पादन के गुर सिखाए और समय-समय पर बीज उत्पादन में आने वाली समस्याओं को दूर करने में सहयोग किया।

इस परिवार ने वर्ष 2015 में 160 वर्ग मीटर (0.8 नाली) में लम्बी प्रकाश अवधि के प्याज वीएल- 3 का बीज उत्पादन शुरू किया। पुनः बीज उत्पादन कार्य की बारीकियों को देखते हुए विजयपाल भविष्य में इस कार्य को करने के लिए मना करने लगे, लेकिन जब जून 2016 में प्याज का बीज पैदा हुआ और उसे परियोजना अन्तर्गत स्थापित कृषकाें के संगठन से संचालित किसान सेवा केन्द्र में 12 किग्रा बीज का 1,000 रुपये प्रति किग्रा की दर से रुपये 12,000 भुगतान किया गया, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

कुशुम व उनके पति ने अन्य 2 किग्रा बीज गांव में ही अपने साथी किसानों को 2,000 रुपये में बेचा। कुशुम व विजयपाल कहते हैं कि उक्त खेत में वे लोग वर्षों से लगभग 1,000 रुपये का गेहूं पैदा कर रहे थे। जबकि फसल में बदलाव व तकनीकी में थोड़े सुधार से उसी खेत से उन्हें 14,000 रुपये कमाये।उनका कहना है कि अब नगदी फसलों का वैज्ञानिक विधि से उत्पादन कर कई गुना मुनाफा कमा रहे हैं और साथ ही अन्य किसान साथी भी इस कार्य को करने लगे हैं। वर्तमान में भी वह प्याज का बीज उत्पादन कर रहे हैं, भविष्य में वृहद स्तर पर करना चाहते हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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