
हमने एक दमदार पत्रकार खो दिया, राकेश भाई, आप बहुत याद आओगे…
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में पत्रकारिता के नये आयाम स्थापित करने वाले राकेश खंडूड़ी 54 साल की आयु में हमें छोड़कर चले गए। वो हमेशा मेरे लिए बड़े भाई और अच्छे दोस्त की भूमिका में रहे। हम बचपन से एक साथ रहे। पढ़ाई लिखाई, खेलना कूदना…सब एकसाथ। आप मुझसे दो साल बड़े थे और क्लास में सीनियर भी। हम 1999 के अप्रैल माह में अमर उजाला में नौकरी करने एक साथ हिमाचल प्रदेश गए। राकेश जी को शिमला और मुझे मंडी जिले में पोस्टिंग मिली। नौकरी पेशे के सिलसिले में व्यस्त रहने के कारण अब हमारी मुलाकात कम ही होती थी। कभी कभार राकेश जी डोईवाला के चौक बाजार में मिल जाते और मुझे अपनी बाइक पर देहरादून लाते। अब तो इस दौरान ही हमारी बातें होती थीं।
पिछले साल, दिसम्बर माह में राकेश खंडूड़ी से लंबी बात हुई, जिसमें उन्होंने कई जानकारियां साझा कीं।
डोईवाला में पले बढ़े राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला अखबार में उत्तराखंड स्टेट ब्यूरो प्रमुख थे। वो शिक्षक बनना चाहते थे, तैयारी भी की, पर संयोग ऐसे बनते गए कि उनकी राह पत्रकारिता की तरफ मुड़ गई। पत्रकारिता के ग्लैमर ने उनको उस दौर में आकर्षित किया, जब इंटरनेट का एक्सेस हर किसी के लिए नहीं था। कई घटनाओं की सूचना तो तीन दिन बाद मिलती थी और पांचवें दिन अखबारों में छप पाती थीं।
उन्होंने जो भी कुछ बताया था, वो उन्हीं के शब्दों में…
“उस समय डोईवाला बहुत बड़ा और घनी आबादी वाला इलाका नहीं था। पर, राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। अमर उजाला अखबार के लिए डोईवाला से रिपोर्टिंग का मौका मिला। हमारी रिपोर्टिंग ग्रामीण इलाकों की समस्याओं और समाधान पर केंद्रित रही। हम गांवों में जाते, लोगों से बात करते और खबरें लिखते थे।”
“अपने दोस्त अश्वनी गुप्ता के साथ डोईवाला ब्लॉक के कौड़सी गांव पहुंचे। यह 1997 की बात है, उस समय उत्तर प्रदेश का शासन था। कौड़सी इसलिए गए थे, क्योंकि यह उनके अंग्रेजी के शिक्षक वेदप्रकाश शर्मा जी का गांव है। वेदप्रकाश जी जनप्रतिनिधि भी रहे हैं। उस समय कौड़सी शतप्रतिशत साक्षरता वाले गांव के रूप में जाना जाता था। वहां हर परिवार से कम से कम एक सदस्य तो सरकारी सेवा में था। पर, उस समय उनकी खबर थी, गांव की टूटी सिंचाई गूलों पर और विकास कार्यों को लेकर। उन्होंने लोगों से बात की और एक खबर लिखी, जो उस समय आठ कॉलम में प्रकाशित हुई थी। वो उनकी पहली खबर थी, जो अखबार में इतनी प्रमुखता से छपी थी।”
“खबर का हेडिंग “शतप्रतिशत साक्षरता वाला कौड़सी विकास कार्यों में फिसड्डी” था। खबर प्रकाशित होते ही सबसे पहले सुबह ही खंड विकास अधिकारी का फोन आया। उन्होंने कहा, खंडूड़ी जी आज क्या छाप दिया। जवाब दिया, जो मौके पर देखा और ग्रामीणों ने बताया, वो ही प्रकाशित हुआ है। उन अधिकारी ने बताया, संभवतः आज डीएम साहब उस गांव का भ्रमण करेंगे।”
” बहुत उत्साहित हो गया और खुश था कि मेरी लिखी खबर का असर होने वाला है। उनको और दूसरे अखबार के पत्रकार साथी को अपनी गाड़ी में बैठाकर बीडीओ सबसे पहले उस समय मसूरी क्षेत्र से विधायक रहे राजेंद्र शाह के निवास पर गए। वहां से सभी कौड़सी गांव पहुंचे। तब देहरादून के डीएम रहे पीके मोहंति भी वहां पहुंच गए। डीएम ने पूरी स्थिति को वैसे ही पाया, जैसा कि खबर में था। उन्होंने हमारी प्रशंसा की और कहा, आपने मौके की रिपोर्टिंग की, यही तो पत्रकारिता है। विधायक और डीएम ने वार्ता की, जिसके परिणाम यह रहा है कि गांव में विकास कार्यों के लिए 30 लाख रुपये मंजूर किए गए।”
कहते थे, “अगर खबर दमदार है तो प्रभाव जरूर छोड़ती है। उस खबर का संज्ञान जरूर लिया जाता है।”
शिक्षक बनना चाहता था…
उनकी प्राथमिकता शिक्षक बनने की थी। इसके लिए उन्होंने तैयारी भी खूब की थी, पर बीएड के एंट्रेंस में मात्र दो नंबर से मेरिट में स्थान नहीं बना पाए, नहीं तो वो आज शिक्षक होते। हालांकि उन्होंने दसवीं से 12वीं तक के छात्रों को इंगलिश की ट्यूशन पढ़ाई है।
पत्रकारिता को ऐसे बनाया करिअर
पत्रकारिता को करिअर बनाने पर उन्होंने बताया था कि “मेरे ताऊ जी के बेटे नंद किशोर खंडूड़ी भी पत्रकार हैं। वो हमें पत्रकारिता के बारे में बताते थे। उन दिनों पढ़ाई कर रहा था। मैं उनकी बातों को खूब ध्यान से सुनता और सोचता था कि यह प्रोफेशन शानदार है। बस फिर क्या था, मैंने भी पत्रकार बनने की दिशा में कदम उठाया। गढ़वाल विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की। शुरुआत में दिल्ली तक कई बड़े संस्थानों में जाकर बात की, पर सभी से सलाह मिली कि देहरादून जाकर किसी भी अखबार से शुरुआत करो। दून दर्पण ज्वाइन किया। राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान रिपोर्टिंग का अनुभव मिला।”
“फिर, देहरादून में अपने भाई साहब, जो उस समय देहरादून प्रमुख विज्ञापन कंपनी एक्सएस कम्युनिकेशन का संचालन कर रहे थे, ने साप्ताहिक अखबार की जिम्मेदारी सौंपी।” आपने हंसते हुए कहा था, “सच बताऊं, मैं पहले दिन से संपादक की भूमिका में था।”
“इसके बाद उनको अमर उजाला अखबार में डोईवाला कस्बे की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मिली। कुछ समय बाद, हिमाचल प्रदेश से अमर उजाला अखबार की शुरुआत हुई। 1999 में डोईवाला से सीधे हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मिली। सफर चलता रहा, कई उतार चढ़ाव आए, पर उनको तो पत्रकारिता करनी थी। शिमला में रहने के दौरान पत्रकारिता की बहुत सारी बारीकियों को जाना, बहुत कुछ सीखने को मिला।”
क्रिकेट और पेंटिंग की दीवानगी
राकेश खंडूड़ी हमेशा से रचनात्मक रहे। पढ़ाई के दौरान क्रिकेट आपका पसंदीदा रहा। डोईवाला और आसपास का कोई ऐसा मैदान नहीं है, जहां उन्होंने क्रिकेट नहीं खेला हो। फास्ट बॉलिंग की वजह से आपको बैट्समैन पसंद नहीं करते थे। क्रिकेट की दीवानगी में आप स्कूल की परीक्षाओं का भी ध्यान नहीं रखते। पेपर छूटते ही राकेश खंडूड़ी क्रिकेट के मैदान में।
परिवार के लोग उनके क्रिकेट के प्रति जुनून से परेशान थे। क्रिकेट के चक्कर में परीक्षाओं की भी चिंता नहीं रहती थी।
राकेश खंडूड़ी ने मुझे पढ़ाया, वो शानदार शिक्षक और आर्टिस्ट थे
डोईवाला में चीनी मिल के पास रेलवे फाटक पार करते ही एक बड़ी सी दो मंजिला बिल्डिंग उनका आशियाना थी, जिसकी ऊपरी छत पर बैठकर अक्सर आती जाती ट्रेनों को देखने का आनंद उठाते। उस छत से डोईवाला का पूरा प्रेमनगर बाजार दिखता था। हालांकि उस समय प्रेमनगर बाजार में घरों की संख्या कम थी, ज्यादातर भूमि कृषि ही थी। पहले जब भी कॉलेज या चौक बाजार जाते तो उनका घर रास्ते में पड़ता। आपका नया घर बाजार से कुछ दूरी पर है, जो बेहद शांत इलाका है।
मैं, राकेश खंडूड़ी से मैथ पढ़ने के लिए उनके घर जाता था। आपके बड़े भाई राजेंद्र खंडूड़ी से भी मैथ, साइंस पढ़ा। घर पर राकेश जी का कैनवास सजा रहता था, जिस पर कोई न कोई आर्ट वर्क होता। पास में रखे कलर्स की डिब्बियां मुझे लुभाती थीं। वो हमें बताते थे कि आज उनके पास चित्रकारी को लेकर क्या कुछ नया आइडिया है। मेरी आर्ट हमेशा से खराब रही है, तो मेरे पास कोई खास आइडिया उनको बताने के लिए नहीं रहता। एक और खास बात, आपके घर की चाय हमेशा से मेरी पसंदीदा रही।
हार्मोनिका हमेशा साथ रखते थे
राकेश अपनी हार्मोनिका (Harmonica) यानी माउथ आर्गन हमेशा साथ रखते थे। फरमाइश पर सुना देते थे, पर इसे सीखने के लिए आपने बहुत मेहनत की। राकेश खंडूड़ी में सीखने की ललक हमेशा से रही। उन्होंने बताया था, “मैंने डीबीएस कॉलेज में पढ़ाई के दौरान दोस्तों के चैलेंज को स्वीकार किया और डटकर मेहनत की और माउथ आर्गन बजाना सीख लिया।” माउथ आर्गन बजाते राकेश खंडूड़ी को सुनना हम दोस्तों को अच्छा लगता था।
नेहरू युवा मंडल डोईवाला का गठन करके हम सभी दोस्तों ने क्षेत्र में जागरूकता के कार्यक्रम चलाए। आयोडीन नमक की पहचान को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में अभियान चलाया। गली मोहल्लों में सफाई अभियान चलाए। बच्चों के बीच सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता, प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कराए गए। राकेश खंडूड़ी नेहरू युवा मंडल डोईवाला के अध्यक्ष रहे और पूरी तन्मयता से इन कार्यक्रमों का नेतृत्व किया।
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में हम जुलूस, प्रदर्शन में शामिल होते। क्रमिक अनशन कार्यक्रम चलाते।
गांवों की पैदल यात्राएं
पत्रकारिता से जुड़ने पर अक्सर गांवों का भ्रमण किया और लोगों से उनकी समस्याओं पर बात की। उस दौर में उनके पास बाइक भी नहीं थी। वो विक्रम टैंपों से मुख्य मार्गों तक जाते और फिर पैदल दूरी तय करते। अच्छी तरह याद है, राकेश खंडूड़ी के साथ मैं सूर्याधार गांव जाने के लिए भोगपुर तक विक्रम टैंपों से गया था। वहां से पैदल-पैदल जाखन नदी के किनारे से होते हुए सूर्याधार गांव पहुंचे। हमारे पास फोटो लेने के लिए किसी भी तरह का कोई कैमरा नहीं था। खबरें चार कॉलम में लगतीं, पर बिना फोटो के।
ॐ शांति…













